दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का मामला कितना राजनैतिक है, कितना चुनावी है और कितना कानूनी है, इस पर हर कोई अपनी अपनी तरह से बहस कर रहा है। अरविंद केजरीवाल और दिल्ली सरकार की शराब नीति से फिल्मी दुनिया का वैसे तो कोई वास्ता नहीं रहा। ये भी कोई ताज्जुब की बात नहीं कि गुजरात के महापुरुषों के हाथों अपना जमीर बेच चुके फिल्मी सितारों में से किसी ने केजरीवाल की गिरफ्तारी को लेकर उफ्फ तक नहीं की। अब जरा सोचिए कि अगर गुजराती महापुरुष की जय-जयकार करने का मौका आएगा, तो ये (अंध) भक्त सितारे दंडवत होकर चरण-वंदना करेंगे।
बात उन दिनों की है, जब राम लीला मैदान के आंदोलन के बाद दिल्ली की सत्ता में केजरीवाल का उदय हुआ था, तो मुंबई की फिल्मी नगरी में भी उनको हीरो माना गया था। केजरीवाल को फिल्म नायक के उस नायक के समकक्ष माना गया था, जो एक दिन का सीएम बनकर दबंग सीएम (अमरीश पुरी) की सत्ता और सांसे उखाड़ने देता है। उस दौर में मनोरंजन की दुनिया में केजरीवाल और उनकी पार्टी आप के समर्थकों का एक वर्ग सामने आया था। इस वर्ग में कोई खान, कपूर या चोपड़ा नहीं था, लेकिन कुछ बुद्धिजीवी किस्म के लोग जरुर नजर आए थे। इनमें संगीतकार विशाल-शेखर की जोड़ी वाले विशाल डडलानी, एक्टर रणवीर शॉरी, जावेद जाफरी, सोनू सूद, रेणुका श्हाणे (आशुतोष राणा की पत्नी, गुल पनाग, चकदे फेम विद्या मालवड़े, राज जुत्शी और डायरेक्टर अश्विनी चौधरी, अनुभव सिन्हा, हंसल मेहता, सुधीर मिश्रा खास रहे। सोनू सूद भी इसी पार्टी के साथ गलबहियां कर रहे थे। इनके साथ एक तबका मुंबई की फिल्मों और टीवी की उन तथाकथित सेलिब्रिटीज का था, जो पैसा मिलने पर अपने बाप का रिश्ता भी बदलने के लिए तैयार हो जाते हैं।
जब केजरीवाल का दौर शिखर पर था, तो उनके जीवन पर बायोपिक बनाने के विचार पर न जाने कितने लेखकों ने लैपटाप पर उंगलियों को टक टक किया होगा। जैसे ही मोदी सत्ता आई, तो केजरीवाल के बायोपिक वाली फाइलें डिलीट कर दी गईं। केजरीवाल का मामला अदालत में है, इसलिए हम और आप काहे टिप्पणी करें, लेकिन उस दौर में केजरीवाल के कहने पर मैं भी आम आदमी की टोपी पहनने वालों में, कम से कम किसी में तो इतनी हिम्मत होती कि जब उनका शीर्ष नेता जेल की सलाखों के पीछे हो, तो एक बार तो अपने नेता के नाम पर नींद से जगने की एक्टिंग कर लेते।
शुद्ध हिंदी में कहा जाता है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती। जिस दिन दिल्ली का निजाम बदला और गुजरात वाले झोला उठाकर निकल लिए, उस दिन क्या ये लोग फिर से केजरीवाल या किसी और के साथ खड़े होने का दम दिखा पाएंगे और जवाब है- बिल्कुल नहीं। कोई किसी को सपोर्ट करे या न करे, ये उसकी मर्जी, ऐसा लोकतंत्र में होता है। जिस देश में लोकतंत्र आखिरी सांसे गिन रहा हो, वहां खामोशी से तमाशा देखने वाले भी गुनाहगार माने जाते हैं।
पिछले ब्लाग में सवाल था कि भाजपा की कालिख बने इलेक्ट्रोरल ब्रांड के करप्शन के मामले को लेकर अगर फिल्म बने, तो मेन लीड कौन करेगा। इस बार सवाल है कि अगर केजरीवाल पर बायोपिक बने, तो उनके रोल में कौन फिट होगा। जवाब के लिए कमेंट बाक्स ओपन है।
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2 comments:
अच्छा लेख
सही बात है. ये लोग हमेशा पकी - पकाई खाने के चक्कर में रहते हैं
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