Sunday, February 26, 2017

26 फरवरी का ब्लाग- कब खत्म होगा ये तमाशा...?

सेंसर बोर्ड और फिल्म वालों का टकराव कोई नई बात नहीं है। जब भी ये टकराव होता है, तो दोनों तरफ से अपने अपने तर्क दिए जाते हैं और अपने कदमों को जायज ठहराने की कोशिश होती है। जिस फिल्मकार की फिल्म फंसती है, वो अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देता है, तो सेंसर बोर्ड अपने कायदे कानूनों की किताब सामने रख देता है। ऐसे में कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन सही है और कौन गलत। इसीलिए कई मामले अदालतों में पंहुचते हैं और वहीं फैसला होता है।

एक बार फिर एक फिल्म का मामला सामने आया है। फिल्म प्रकाश झा की है, जिसे सेंसर बोर्ड ने पास करने से खारिज कर दिया। सेंसर बोर्ड की तरफ से ये तर्क दिया गया कि इसका कटेंट बहुत ज्यादा सेक्सुअल है, जिसे पास नहीं किया जा सकता। दिलचस्प बात ये भी है कि इस फिल्म का डायरेक्शन एक महिला ने किया है। एक महिला की फिल्म में सेक्सुअल कटेंट ज्यादा होने की बात भी कम दिलचस्प नहीं हो जाती। सेंसर बोर्ड अपने कायदे कानूनों का हवाला देकर कह रहा है कि इस कटेंट की फिल्म को पास नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि सेंसर का ये सफाईनामा न तो प्रकाश झा को मंजूर हुआ, न फिल्म की निर्देशिका अलंकृिता श्रीवास्तव को। वे दोनों लाजिमी तौर पर सेंसर बोर्ड पर बरस रहे हैं और बोर्ड के चेयरमैन पहलाज निहलानी उनके निशाने पर हैं। पहलाज भी चुप रहने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि सेंसर बोर्ड की आलोचना आज के दौर का फैशन बन गया है, लेकिन बोर्ड किसी की परवाह किेए बिना, अपने कायदे कानूनों के हिसाब से काम करता रहेगा, जैसे कि अब तक होता आया है।

तर्क पहलाज दें, सेंसर बोर्ड की सफाई आए। इनके खिलाफ प्रकाश झा और अलंकृिता श्रीवास्तव के साथ फिल्म इंडस्ट्री का एक तबका जुड़ जाए। हर किसी के पास अपने तर्क हैं, लेकिन इन तर्कों से थोड़ा आगे जाकर मुद्दे को समझने की कोशिश की जाए, तो पहली नजर में दो बातें साफ तौर पर समझ में आ जाती हैं कि सेंसर बोर्ड और फिल्म इंडस्ट्री के बीच अगर असंतुलन है, तो इसकी पहली वजह सरकारी कानूनों का पुलिंदा है और दूसरी वजह फिल्मकारों का वो लालच है, जो अब युवाओं को रिझाने के नाम पर किसी की हद तक जाने से गुरेज करने को तैयार नहीं। सेंसर बोर्ड सरकारी दफ्तर है, तो जाहिर है कि इस पर कंट्रोल सरकार में बैठी राजनैतिक ताकतें रखना चाहती हैं। यही वजह है कि जब केंद्र में सरकार बदलती है, तो सेंसर बोर्ड का रहनुमा भी बदल दिया जाता है। मौजूदा दौर में दिल्ली दरबार पर काबिज सत्ता किस तरह से सिनेमाई दुनिया को लेकर तमाशे करती आ रही है, ये किसी से छिपा नहीं है। ये अलग बहस का मुद्दा बन जाता है।

जहां तक सेंसर बोर्ड का मामला है, तो मौजूदा समस्याओं के निदान के लिए कोई कहता है कि सेंसर बोर्ड को ही खत्म कर दिया जाना चाहिए, तो कोई कहता है कि सेंसर को सिर्फ रेटिंग के आधार पर फिल्मों को सार्टिफिकेट देने की व्यवस्था हो, जिसकी सिफारिश श्याम बेनेगल कमेटी ने भी की, जिसका गठन सरकार ने किया, लेकिन अब तक इस कमेटी की सिफारिशों को क्यों नहीं लागू किया जा रहा है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इस मुगालते में रहना भी ठीक नहीं होगा कि क्या श्याम बेनेगल की कमेटी की सिफारिशें सेंसर बोर्ड और सिनेमावालों के बीच चली आ रही रस्साकशी खत्म हो जाएगी।
दरअसल असली समस्या की जड़ में वक्त का बदलाव है, जिससे न तो फिल्मवाले अछूते हैं और न सेंसर। फिल्में बनाना एक कारोबार है और कारोबारी कोई भी हो, सबसे पहले अपना फायदा देखना चाहता है। फिल्मों का कारोबार इस दौर में सिमटता जा रहा है। रिलीज के पहले तीन दिनों में ही फिल्म का भविष्य तय हो जाता है। युवाओं को ललचाने के लिए जो फार्मूला पहले महेश भट्ट एंड कंपनी ने अपनाया, उसे अब हर कोई आजमाने को लालायित है। खुलेपन और आधुनिकता के नाम पर इस दौर के फिल्मकारों को अगर सेंसर बोर्ड से मुक्ति मिल जाए, तो कोई हैरानी नहीं होगी कि ये फिल्मवाले पॉर्न फिल्मों से कम पर बाज नहीं आएंगे। यहां आकर सेंसर बोर्ड की प्रासंगिकता समझ में आ सकती है, लेकिन अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए सेंसर बोर्ड को भी कानूनों के कोड़े फटकराने का तानाशाही रवैया छोड़ना ही होगा।

यहां एक और दिलचस्प तथ्य की चर्चा जरुरी हो जाती है, जिसका कहीं न कहीं कनेक्शन प्रकाश झा वाली फिल्म से भी है। दरअसल फिल्मवालों ने सेंसर बोर्ड के साथ टकराव को फिल्म के प्रमोशन का एक हथियार बना लिया है, जिसका धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। जो कोई फिल्म सेंसर बोर्ड में फंसेगी या अटकेगी, जाहिर है कि उसकी चर्चा मीडिया में होगी। फिल्म बड़े स्टार या निर्माता की हो तो ये चर्चा हंगामाखेज होती है, जिसके चलते फिल्म का खूब प्रचार होता है। महंगाई के इस जमाने में इस हथियार को इस तरह से इस्तेमाल किया जाता है कि फिल्मवाले जान-बूझकर ऐसे सीन डालते हैं, जिनको लेकर सेंसर से एतराज होगा, तो शोर मचेगा और फिल्म का प्रचार होगा। इस दलील या कहा जाए कि मानसिकता को भी मौजूदा समस्या से अलग नहीं किया जा सकता।

समस्या है, लेकिन इतनी गंभीर नहीं, जिसका रास्ता नहीं निकाला जा सके। सेंसर और फिल्मवालों के संगठन कभी आपस में बैठें, तो बीच का रास्ता निकालने की सोच सकते हैं। सेंसर बोर्ड की नियमावली को इस दौर की जरुरतों के हिसाब से व्यापक बदलाव की जरुरत है।
ये तो नहीं कहा जा सकता कि इन मुलाकातों से सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी, लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि एक दूसरे के नजरिए और जरुरतों को समझने से समस्याएं सुलझाने के रास्ते जरुर नजर आते हैं। ये सब एक दिन में नहीं होगा। जरुरी ये है कि फिल्मवाले सेंसर बोर्ड के तरफ बंदूके तानने की आदत को काबू में रखें और सेंसर बोर्ड कानूनों के चाबुक को काबू में रखे। एक बात याद आ जाती है कि जो सो रहा हो, उसे जगाया जा सकता है, जो आंखें मूंदकर लेटा हो, उसका क्या किया जाए। सेंसर बोर्ड और फिल्मवालों के बीच चल रही फुटव्वल भी इस तमाशे से कम नहीं, जिसके लिए दोनों ही दोषी हैं और कहा जाए तो समस्या के समाधान के लिए दोनों में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं।


Sunday, February 19, 2017

शिल्पा शेट्टी- स्टारडम का शर्मनाक चेहरा

ये तो खबर थी कि शिल्पा शेट्टी ने एक कंपनी खोली और इस कंपनी के मार्फत टेली मार्केटिंग के लिेए एक चैनल खोला और बुरी खबर ये है कि उनके इस चैनल और कंपनी को ताला लगने की नौबत आ गई। इससे भी ज्यादा बुरी खबर ये है कि अपनी कंपनी और कंपनी के कर्मचारियों की बदहाली के अनजान शिल्पा ने पिछले दिनों फिटनेस को लेकर एक नया आनलाइन प्रोजेक्ट लांच किया और बदहाली की शिकार कंपनी को लेकर मीडिया के सवालों से कन्नी काटते हुए वे वहां से बच निकली। कमाल की बात है न, दुनिया जहान को सेहत अच्छी रहने रखने की नसीहत देने वाली शेट्टी को इस बात पर कोई संकोच नहीं कि उनकी टेली मार्केटिंग कंपनी की हालत खराब है और वहां काम करने वाले कर्मचारियों का भविष्य चौपट है



शिल्पा शेट्टी की कंपनी की हालत इतनी दयनीय है कि पिछले तीन महीनों से वहां काम करने वालों को वेतन नहीं मिला है। कंपनी का संचालन लगभग ठप्प हो चुका है। तालाबंदी की नौबत आ चुकी है। कंपनी के सीईओ के तौर पर काम करने वाले शिल्पा शेट्टी के पतिदेव राज कुंदर दिसंबर में ही इस नौकरी से इस्तीफा लिख चुके हैं। इस्तीफा लिखते वक्त उन्होंने नोटबंदी के सरकारी फैसले को कोसा और माना कि नोटबंदी से कंपनी प्रभावित हुई। दिलचस्प बात ये भी है कि नवंबर में जब केंद्र की सरकार ने नोटबंदी का फैसला किया था, तो इसे क्रांतिकारी बताने वालों में शिल्पा शेट्टी सबसे आगे रही थीं।

नोटबंदी के फैसले से बेरोजगारी के मामले बढ़े। तमाम कंपनियों को ताले लगे। फिल्मी कारोबार भी प्रभावित हुआ। इसे लेकर बहस जारी है और जारी रहेगी। हो सकता है कि शिल्पा की कंपनी भी नोटबंदी की शिकार हुई हो, मगर यहां मुद्दा ये बचता है कि नोटबंदी से सिर्फ उनकी कंपनी प्रभावित हुई या उनकी जिंदगी पर भी कोई असर हुआ। जिंदगी पर तो कोई असर महसूस नहीं होता। फिटनेस का नया प्रोजेक्ट उन्होंने पांच सितारा होटल में किया। करोड़ों के घर में वे रहती हैं, जो किसी महल से कम नहीं है। वे और उनके श्रीमान लंदन से लेकर मुंबई तक न जाने कितने बिजनेस चलाते हैं। यहां इस बात को याद करना कोई अच्छी बात नहीं होगी कि कैसे शिल्पा शेट्टी के पति पर आईपीएल में सट्टेबाजी के घिनौने आरोप लगे और उनकी राजस्थान की टीम को ब्लाक किया गया। इसके बाद अगर उनकी कंपनी पर तालाबंदी की नौबत आई और कर्मचारियों को तीन महीनों से सैलेरी नहीं मिलती, तो क्या इसके लिए शिल्पा शेट्टी और उनके पति सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं है। इस पर भी अगर उनकी आलीशान जिंदगी पर कोई असर न हो, तो ये स्थिति बुरी नहीं, शर्मनाक है।
ये शिल्पा शेट्टी जैसे सितारों की दोहरी और कहा जाए तो दोगुली जिंदगी की एक झलक भर है, जो एक तरफ बालीवुड की जगमगाती दुनिया में करोड़ों का व्यारा-न्यारा करते हैं, लेकिन अपनी कंपनी के कर्मचारियों को उनकी पगार देने के लिए उनके पास पैसे नहीं। क्या ये इंसानियत से नीचे गिरी हुई बात नहीं है।
शिल्पा शेट्टी ने बरसों फिल्मी दुनिया में काम किया। करोड़ों रु. की कमाई की। शादी के बाद उनका फिल्मी कैरिअर तो ठप्प हो गया, लेकिन टीवी शोज में जज बनकर वे अच्छी खासी कमाई कर रही हैं। आईपीएल में सट्टेबाजी करने वाले उनके पतिदेव करोड़ों के कारोबार चला रहे हैं। कहा नहीं जा सकता कि शिल्पा शेट्टी को कभी उन कर्मचारियों के परिवारों की सुध होगी, जिनके यहां आज भुखमरी जैसी नौबत आ चुकी है। शिल्पा खुद परिवार वाली हैं। उनका बेटा है। क्या एक महिला होने के नाते, परिवार होने के नाते उनको अपनी कंपनी के कर्मचारियों के प्रति संवेदनशील नहीं होना चाहिए था। नौकरी आगे नहीं बढ़ा सकते, लेकिन उनके बकाया का तुरंत भुगतान करके उनको थोड़ी राहत मिल सकती है।
एक वक्त हुआ करता था, जब फिल्मों के सितारे आम लोगों के लिए आदर्श हुआ करते थे। आम लोग उनकी जिंदगी को अनुकरणीय मानते थे। इसके चलते उनको सम्मान भी किया करते थे। आज की स्थिति देखी जाए, तो शिल्पा शेट्टी का वाक्या इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि अपने सार्वजनिक जीवन में उनके जैसे सितारों की नैतिकता का कितना पतन हो चुका है।
 जहां तक रही कानून की बात, मालूम नहीं कि वहां क्या स्थिति है। मीडिया की जहां तक बात है, तो स्टारडम के शिकार मीडिया को इसके लिए फुर्सत नहीं होगी। शिल्पा शेट्टी इंसानियत की बात सोचेंगी, ये दूर की कौड़ी ही लगती है। ऐसे में शिल्पा शेट्टी की कंपनी के उन कर्मचारियों का भविष्य क्या होगा, ये गंभीर सवाल है, जो एक बहुत बड़ी, अमीर एक्ट्रेस की गरीब और शर्मनाक सोच के शिकार हो गए हैं। शर्मिंदगी शिल्पा को नहीं होगी, लेकिन हमें जरुर है।

Monday, February 13, 2017

अनुष्का फिल्लौरी शर्मा- शीशे के घरों में रहने वाले...

मीडिया के नाम हाल ही में जारी अपने एक बयान में अनुष्का शर्मा जिस तरह से मीडिया पर बिफरी हैं, उसे देखकर हंसी ही नहीं आती, उनकी सोच पर तरस आता है और उनकी समझदारी पर दाद देने का मन करता है। साथ ही राजकुमार का वो मशहूर डायलाग भी याद आ जाता है- जिनके घर शीशे के हों, उनको दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए....

पहले मसला जान लेते हैं। अनुष्का शर्मा ने फिल्लौरी नाम से एक फिल्म बनाई है, जो 24 मार्च को रिलीज होगी। अब फिल्म बनाई है, तो पब्लिसिटी की भी जरुरत होती है। पब्लिसिटी के लिए मीडिया की भी जरुरी होती है और अनुष्का शर्मा जानती हैं कि फिल्म के लिए अच्छी-बुरी पब्लिसिटी सिर्फ पब्लिसिटी होती है और ये भी कम जरुरी नहीं होती। अच्छी पब्लिसिटी के लिए किसी को कुछ नहीं करना पड़ता। निगेटिव पब्लिसिटी के लिए मौके बनाने पड़ते हैं। बातों को उछालना पड़ता है। बड़े बड़ू सूरमाओं को इस काम पर लगाया जाता है, जो दिन रात इसी बात को लेकर पिले पड़े रहते हैं कि कैसे पब्लिसिटी के लिए स्टंटबाजी की जाए। 
पहले अनुष्का के उस दर्द की परत खोलते हैं, जिसने मैडम को मीडिया को ज्ञान बांटने का रास्ता दिखाया। विराट कोहली को हर कोई जानता है। अनुष्का के साथ विराट के रिश्तों की दास्तान से भी कोई अनजान नहीं है। सोशल मीडिया, जिसे अफवाहों का सबसे हाट बाजार माना जाता है, वहां किसी ने बात उछाल दी कि उनकी इस फिल्म में विराट कोहली का पैसा लगा हुआ है। हालांकि इसमें अजूबा जैसा कुछ नहीं था। लगा हो, तो भी भला किसे हैरानी होगी। अनुष्का की कंपनी की बैलेंस शीट का जिक्र तो नहीं था, लिहाजा इसे एक गासिप से ज्यादा तरजीह नहीं मिलती, अगर अनुष्का को ये समझ में नहीं आया होता, कि इस न्यूज से उनकी फिल्म की पब्लिसिटी का आगाज कर सकती हैं। 
उन्होंने सबसे पहले इस खबर को लेकर मीडिया के नाम लंबा चौड़ा बयान जारी कर दिया, जिसमें नसीहतों का भंडार था। सूत्रों के हवाले से लिखी खबरों पर भी सवाल थे। खबरों के झूठ सच से लेकर अपने कैरिअर की मेहनत और न जाने क्या क्या बताया गया। लब्बो लुआब यही था कि इस खबर से मीडिया ने उनका दिल दुखाया और चेताया गया कि आइंदा एेसा हुआ, तो वे और कड़े तेवर दिखाएंगी। ये मानकर चलना चाहिए कि फिल्लौरी के रिलीज होने तक अनुष्का शर्मा के साथ ऐसी खबरें उछलती रहेंगी, जिन पर उनको गुस्सा आए या न आए, लेकिन फिल्म का प्रमोशन पक्का होगा। 
वैसे मीडिया को लेकर कैसे कैसे खेल होते हैं, अनुष्का शर्मा इससे कतई अनजान नहीं हैं। ये याद करने में भी कोई हर्जा नहीं है कि कैसे सुल्तान में काम करने को लेकर उन्होंने इसी मीडिया के साथ सच-झूठ का शर्मनाक खेल खेला था। जब मीडिया में उनके सुल्तान में सलमान की हीरोइन बनने की पहली खबर आई, तो यही अनुष्का शर्मा थीं, जिन्होनें जमकर मीडिया को लताड़ा था और इसे झूठ का पुलिंदा करार दिया था। इसे गुजरे ज्यादा दिन नहीं हुए कि अनुष्का शर्मा ने सोशल मीडिया पर सलमान के साथ एक तस्वीर जारी की और साथ में लिखा- सुल्तान की हीरोइन.. यानी वे खुद। बगैर लाग लपट के एक सवाल हो जाए, कि अनुष्का शर्मा की नैतिकता उस वक्त कहां थी, जब वे सुल्तान की खबर के सच को झूठ का पुलिंदा साबित करने पर तुली हुई थीं।


शायद अनुष्का ने जानी राजकुमार का वो धांसू डायलाग नहीं सुना होगा कि जिनके शीशे कांच के हो, उनको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। अगर फिल्म की पब्लिसिटी करनी है, तो कीजिए। निगेटिव खबरों के साथ पब्लिसिटी करनी है, वो भी कीजिए। मीडिया तो वहां भी साथ रहेगा, लेकिन नैतिकता की दुहाई उनके मुंह से अच्छी नहीं लगती, जो खुद झूठ-सच का खेल खेलते रहे हों। नैतिकता को लेकर तो अनुष्का की ये झुंझलाहट, तिलमिलाहट उनकी हार से कम नहीं लगती, जो इसी बहाने अपनी फिल्म का प्रमोशन करने के लिए बहुत ज्यादा लालायित हो चुकी हैं।
ये कतई नहीं कहा जा सकता कि मीडिया दूध का धुला है। किसी को यहां क्लीन चिट नहीं दी जा रही है। एंटरटेनमेंट मीडिया को लेकर तो काले कारनामों का स्याह इतिहास शर्मसार करता ही रहता है, लेकिन अनुष्का शर्मा अगर इसे कीचड़ मानती हैं, तो उनको दो नसीहत- अपने पांव धोकर आएं और मुंह पर रुमाल रख लीजिए और मत भूलिए कि इसी रास्ते से आपको अपनी हर फिल्म के रिलीज के मौके पर गुजरना है। अनुष्का और उनकी टीम बखूबी जानती है कि यही पब्लिसिटी करने वाला यही मीडिया प्रमोशन के बजट को आधे से भी कम कर देता है। कमर्शियल दुनिया में ये भी कम बड़ी बात नहीं होती।



अनुष्का शर्मा बालीवुड की बड़ी हीरोइन हैं। उन्होंने मेहनत से अपना मकाम बनाया है। दर्शकों ने उनको पसंद किया है। अपनी काबिलियत और कामयाबी से वे इतनी बड़ी स्टार बनी हैं कि उनकी ज्यादातर फिल्में सुपर हिट रही हैं। उनकी कामयाबी का सबसे बड़ा सच ये है कि उन्होंने तीनों खान सितारों- आमिर, सलमान और शाहरुख के साथ कामयाब फिल्मों का इतिहास रचा है। ये किसी भी हीरोइन के लिए ख्वाब से कम नहीं है। उनकी इस कामयाबी को कोई भी बिना किसी संकोच के सलाम करेगा।
जहां तक विराट कोहली के साथ उनके रिश्तों की बात है, तो ये दुधारी तलवार है। नैतिकता कहती है कि किसी के निजी रिश्तों को लेकर मीडिया को अपना दायरा तय करना चाहिए। ये भी सच है कि मीडिया अपने दायरे लांघता है, लेकिन ये मामला और पूरा विषय बहुत बड़ा है, जिसमें कई मौकों पर दोनों पक्ष दायरे लांघते हुए नजर आते हैं। इस पर चर्चा फिर कभी।
मीडिया और सेलिब्रिटिज के बीच ये द्वंद युद्ध पुराने समय से चला आ रहा है और चलता ही रहेगा। यहां हाल ही का एक किस्सा याद आ जाता है, जिसका ताल्लुक अमेरिका के नए राष्ट्रपति से है। उन्होंने अमेरिकन मीडिया की लगाम कसनी चाही, तो अमेरिकन मीडिया से उनको करारा जवाब मिला और संदेश साफ- इस खेल (मीडिया और अमेरिकन सरकार) के खेल की शर्तें हम तय करेंगे और अपनी शर्तों के मुताबिक खेलेंगे। ये है एक मीडिया का जवाब। ये है एक मीडिया का आत्मविश्वास और आत्म सम्मान।

फिल्म के प्रमोशन के लिए अनुष्का शर्मा को अपने खेल खेलने की पूरी आजादी है। वे मीडिया के जरिए ही अपनी फिल्म का प्रमोशन करेंगी, इसमें भी कोई शंका नहीं, लेकिन जहां तक नैतिकता की बात है, तो कांच के महलवालों के लिए दिए गए संदेश की सच्चाई को उनको भी याद रखना होगा, वरना तमाशे होंगे और दोनों तरफ से होंगे। नैतिकता की कोई दुहाई और कोई जंग एक तरफा हो ही नहीं सकती। अगर अनुष्का शर्मा या किसी को भी इस बारे में कोई मुगालता है, तो दूर करना ज्यादा समझदारी होगा।

आखिरी बात महानायक अमिताभ बच्चन की- जिनका मीडिया के साथ अच्छे-बुरे रिश्तों का दौर रहा है। सालों पहले जब मीडिया में करीना कपूर और शाहिद कपूर के एमएमएस क्लिप का मामला गूंजा था, तो 40 साल से ज्यादा का तजुर्बा रखने वाले महानायक ने बहुता साफगोई से कहा था कि किसी सेलिब्रिटी की लाइफ में प्राइवेसी नहीं रह जाती। जनता जिसे स्टार बनाती है, उसके बारे में जानना चाहती है और इस चाहत को मीडिया के रास्ते पूरा किया जाता था।



ये उस दौर का भी सच था, जब हिंदी सिनेना गुरुदत्त-वहीदा रहमान से लेकर राज कपूर और नरगिस के रोमांस से लबरेज था। ये उस दौर का भी सच रहा, जब अमिताभ बच्चन के साथ रेखा के रिश्तों की गूंज रही और इस दौर का सच भी सच है, जब कपड़ों से जल्दी  सितारे अपने रिश्ते बदलते हैं।
सब जानते हैं कि अनुष्का और विराट का रिश्ता अच्छे दोस्तों से ज्यादा है। उनकी फिल्म में विराट का पैसा लगा है या नहीं, क्या ये इतना गंभीर मसला हो सकता है, जिसे लेकर नैतिकता को याद करके खुद को आइने और कठघरे में खड़ा करने की जरुरत आन पड़े। चलिए, लगे हाथों बता दिया जाए कि अनुश्का शर्मा की बतौर प्रोड्यूसर बनी फिल्म फिल्लौरी 24 मार्च को परदे पर रिलीज होगी। हो गया प्रमोशन.. 

अब तो खुश हो जाइए अनुष्का फिल्लौरी शर्मा जी.... ⇫


Monday, February 6, 2017

जॉली... के बहाने





आने वाली फिल्म जॉली एलएलबी के प्रोमो में बताया जाता है कि हमारे देश की अदालतों में साढ़े तीन सौ करोड़ से ज्यादा केस लंबित हैं। इन केसों को निपटारे तक पंहुचने में कई सदियां बीत सकती हैं। ये बात इसलिए और ज्यादा दिलचस्प हो जाती है कि देश की दो बड़ी अदालतें इन दिनों ये तय करने में बिजी हैं कि क्या इस फिल्म में कानून व्यवस्था की कोई तौहीन तो नहीं की गई है।

मुंबई के एक वकील ने हाईकोर्ट में केस दर्ज किया कि फिल्म में न्याय व्यवस्था की मजाक उड़ाई गई है। चूंकि मामला वकील ने दर्ज किया था, इसलिए करोड़ों केस लंबित होने के बाद भी मुंबई हाईकोर्ट ने इसे संज्ञान में लिया और तीन वकीलों का पैनल बना दिया, जिसको फिल्म देखकर अदालत को ये रिपोर्ट देनी थी कि क्या सचमुच फिल्म में कानूनी व्यवस्था की तौहीन हुई है। इससे पहले मामला आगे बढ़ता, दो दिलचस्प बातें हो गईं। एक तरफ, फिल्म के निर्माण से जुड़ी कंपनी ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती की। कंपनी का तर्क था कि इस तरह का पैनल बनाना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, लिहाजा सुप्रीम कोर्ट इस पैनल के गठन को अमान्य करे। 


Mumbai High Court
देश की सर्वोच्च अदालत में ये मामला पंहुचा, तो वहां भी तुरत फुरत में मामला सुनवाई के लिए पंहुच गया। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद अपनी व्यवस्था में पैनल को अवैध मानने की दलील को खारिज किया और केस फिर से हाई कोर्ट में मोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि पहले वकीलों के पैनल की रिपोर्ट हाईकोर्ट में दर्ज हो। फिर हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई की संभावना बनती है। जाहिर है कि अगर तीन वकीलों के पैनल ने हाईकोर्ट में अपनी रिपोर्ट में कहा कि कोई तौहीन नहीं हुई है, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है और अगर पैनल की रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट मानता है कि फिल्म में कानून व्यवस्था की तौहीन हुई है, तो मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट में पंहुचने के आसार बनते हैं। सोमवार या मंगलवार तक इस केस में हाईकोर्ट का फैसला आने की संभावना है, जबकि फिल्म को 10 फरवरी को रिलीज होना है। फिल्म अपने तय समय पर रिलीज हो पाती है या नहीं, ये जाहिर है कि हाईकोर्ट के फैसले पर तय होगा।
Supreme Court

इस बीच दूसरी एक बड़ी घटना का जिक्र करना जरुरी हो जाता है, जिसका इस केस के साथ बेहद दिलचस्प रिश्ता है। फिल्म सेंसर बोर्ड पंहुची। सेंसर बोर्ड अपनी गाइडलाइन के हिसाब से किसी भी फिल्म को जज करता है और अहम बात ये रही कि सेंसर बोर्ड से फिल्म बिना किसी आपत्ति के पास हो गई। साफ सी बात है कि सेंसर बोर्ड को बिल्कुल ही नहीं लगा होगा कि इस फिल्म में कानून की किसी भी तरह की अवमानना हुई है, वरना पहलाज निहलानी की टीम आदित्य चोपड़ा की बेफिक्रे पर मेहरबान हो सकती है, मगर जॉली.. को तो सेंसर बोर्ड अपने पंजे में जकड़ ही लेता। यहां अब दिलचस्प तस्वीर बन जाती है कि सेंसर बोर्ड को नहीं लगता कि फिल्म में कुछ भी गलत है। सेंसर बोर्ड को देश की सरकार ने ये अधिकार दिया हुआ है कि वो किसी फिल्म को अपने दिशा निर्देशों के मुताबिक देश के सिनेमाघरों में रिलीज करने के लिए सार्टिफिकेट दे। मोटे तौर पर सेंसर बोर्ड के फैसले को ही मान्य किया जाता है। अगर किसी को गलत लगे, तो सेंसर बोर्ड के फैसले को भी अदालत में चुनौती देने का विकल्प भी मौजूद रहता है। 




मजे की बात ये है कि जॉली एलएलबी के इस केस में तो ये प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई। फिल्म को लेकर सेंसर बोर्ड का फैसला हुआ भी नहीं था, उससे पहले ही मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दौड़ा दिया गया। हाईकोर्ट में भी इस बाबत इंतजार करना सही नहीं समझा गया कि सेंसर बोर्ड इस फिल्म को लेकर क्या रुख अपनाता है। अब अगर सेंसर बोर्ड मानता है कि फिल्म में कुछ गलत नहीं है, तो फिर हाईकोर्ट में इस केस का आधार क्या रह जाता है। अगर मुंबई का एक वकील फिल्म के प्रोमो देखकर ये मान ले कि फिल्म में कानून व्यवस्था का अपमान हुआ है, तो फिर हो सकता है कि देश के किसी भी कोने का कोई भी वकील या आम आदमी इसी आधार पर फिल्म के विरोध में अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है और अगर ऐसा होता है, तो सोचिए कि फिल्म को क्या कभी थिएटरों का मुंह देखना नसीब हो पाएगा। 


इस  बात से कोई मना नहीं कर सकता कि देश के किसी भी नागरिक की तरह किसी वकील को भी अगर कुछ गलत लगता है, तो वो किसी अदालत में मामला दर्ज कर सकता है। यहां आकर मुंबई के वकील द्वारा जॉली एलएलबी को लेकर हाईकोर्ट में दायर याचिका का कानूनी आधार तो बनता है, लेकिन कुछ अहम सवाल फिर भी खड़े रह जाते हैं, जिनका न सिर्फ इस फिल्म से, बल्कि देश की कानून व्यवस्था के साथ गहरा सरोकार है। पहला सवाल ये कि इस केस की सुनवाई से पहले हाईकोर्ट ने सेंसर बोर्ड का फैसला आने का इंतजार क्यों नहीं किया। वकीलों के पैनल के गठन को लेकर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने में फिल्म की प्रोडक्शन टीम ने क्या जल्दबाजी नहीं की। अगर हाईकोर्ट के निर्देश पर अमल करते हुए वकीलों के पैनल को फिल्म जल्द दिखाई जाती, तो मुमकिन था कि फिल्म की रिलीज पर आशंका के ये बादल न मंडराते।

जहां तक कानून व्यवस्था के अपमान की बात है, तो ये एक बेहद गहरा और संवेदनशील मुद्दा इसलिए बन जाता है कि सालोंसाल इंसाफ के लिए अदालतों के दरवाजों में ठोकरे खाते देश के आम आदमी से ज्यादा इस बात को कौन समझ सकता है कि न्याय व्यवस्था की मजाक का सही अर्थ क्या होता है। हैरानी होती है कि ये वकील साहब उन अखबारों और सोशल नेटवर्किंग साइटस पर रोज केस क्यों नहीं करते, जिन पर रोज कानून व्यवस्था को लेकर तमाम किस्से पूरी दुनिया में पंहुचते हैं। 



यहां चूंकि मामला एक फिल्म का था, इसलिए देश की दो बड़ी अदालतों ने इसे गंभीरता से लिया। पूरी दुनिया में अगर हमारी व्यवस्था पर सवाल हों, तो कोई बात नहीं, लेकिन एक फिल्म में (अगर) हो जाए, तो अपमान बहुत बड़ा हो जाएगा, जिस पर देश की दो बड़ी अदालतों का तुरत फुरत में हरकत में आना जरुरी हो जाता है। इसके लिए धन्यावाद।

जॉली एलएलबी 2 का भविष्य क्या होगा, अब ये तो अदालत ही तय करेगी, लेकिन अदालतों के लिए बालीवुड से जुड़ी एक और अहम बात बताना जरुरी हो जाता है कि फिल्म के रिलीज से ठीक पहले फिल्मों से जुड़े कोर्ट तक पंहुचने वाले केसों पर गौर किया जाए, तो पता चलेगा कि ज्यादातर केसों में मामला महज पब्लिसिटी पाने की ललक तक होता है। जॉली.. के मामले में ये शौक कोई वकील साहब पूरा करें या फिर फिल्म की टीम ऐसी कोई प्लानिंग करे, ये सच तो अपनी जगह, लेकिन जब साढ़े तीन सौ करोड़ केसों के लंबित रहने के बाद भी कोई अदालत ऐसे केसों को लेकर गंभीरता दिखाती है, तो उन आम आदमियों की मायूसी का ख्याल जरुर आ जाता है, जिनके अतिगंभीर मामले अदालतों में सालों तक खींचते रहते हैं। 

Sunny Deol in Damini

आखिरी बात- जब राजकुमार संतोषी की फिल्म दामिनी में सनी देओल का वकील किरदार परदे पर अदालती सिस्टम की बखिया उधेड़ते हुए तारीख, तारीख और तारीख की गर्जना कर रहा था, तो मुमकिन है कि ये वकील साहब या तो भीड़ में शामिल होकर सनी के डायलॉग पर तालियां पीट रहे होंगे या फिर ये मुमकिन है कि दामिनी के रिलीज होने तक कानून और व्यवस्था की किसी ने तौहीन नहीं की हो। कम से कम किसी फिल्म में तो ऐसी अवमानना कभी नहीं हुई होगी। 


वाकई.. ?

 

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...