सेंसर बोर्ड और फिल्म वालों का टकराव कोई नई बात नहीं है। जब भी ये टकराव होता है, तो दोनों तरफ से अपने अपने तर्क दिए जाते हैं और अपने कदमों को जायज ठहराने की कोशिश होती है। जिस फिल्मकार की फिल्म फंसती है, वो अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देता है, तो सेंसर बोर्ड अपने कायदे कानूनों की किताब सामने रख देता है। ऐसे में कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन सही है और कौन गलत। इसीलिए कई मामले अदालतों में पंहुचते हैं और वहीं फैसला होता है।
एक बार फिर एक फिल्म का मामला सामने आया है। फिल्म प्रकाश झा की है, जिसे सेंसर बोर्ड ने पास करने से खारिज कर दिया। सेंसर बोर्ड की तरफ से ये तर्क दिया गया कि इसका कटेंट बहुत ज्यादा सेक्सुअल है, जिसे पास नहीं किया जा सकता। दिलचस्प बात ये भी है कि इस फिल्म का डायरेक्शन एक महिला ने किया है। एक महिला की फिल्म में सेक्सुअल कटेंट ज्यादा होने की बात भी कम दिलचस्प नहीं हो जाती। सेंसर बोर्ड अपने कायदे कानूनों का हवाला देकर कह रहा है कि इस कटेंट की फिल्म को पास नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि सेंसर का ये सफाईनामा न तो प्रकाश झा को मंजूर हुआ, न फिल्म की निर्देशिका अलंकृिता श्रीवास्तव को। वे दोनों लाजिमी तौर पर सेंसर बोर्ड पर बरस रहे हैं और बोर्ड के चेयरमैन पहलाज निहलानी उनके निशाने पर हैं। पहलाज भी चुप रहने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि सेंसर बोर्ड की आलोचना आज के दौर का फैशन बन गया है, लेकिन बोर्ड किसी की परवाह किेए बिना, अपने कायदे कानूनों के हिसाब से काम करता रहेगा, जैसे कि अब तक होता आया है।
तर्क पहलाज दें, सेंसर बोर्ड की सफाई आए। इनके खिलाफ प्रकाश झा और अलंकृिता श्रीवास्तव के साथ फिल्म इंडस्ट्री का एक तबका जुड़ जाए। हर किसी के पास अपने तर्क हैं, लेकिन इन तर्कों से थोड़ा आगे जाकर मुद्दे को समझने की कोशिश की जाए, तो पहली नजर में दो बातें साफ तौर पर समझ में आ जाती हैं कि सेंसर बोर्ड और फिल्म इंडस्ट्री के बीच अगर असंतुलन है, तो इसकी पहली वजह सरकारी कानूनों का पुलिंदा है और दूसरी वजह फिल्मकारों का वो लालच है, जो अब युवाओं को रिझाने के नाम पर किसी की हद तक जाने से गुरेज करने को तैयार नहीं। सेंसर बोर्ड सरकारी दफ्तर है, तो जाहिर है कि इस पर कंट्रोल सरकार में बैठी राजनैतिक ताकतें रखना चाहती हैं। यही वजह है कि जब केंद्र में सरकार बदलती है, तो सेंसर बोर्ड का रहनुमा भी बदल दिया जाता है। मौजूदा दौर में दिल्ली दरबार पर काबिज सत्ता किस तरह से सिनेमाई दुनिया को लेकर तमाशे करती आ रही है, ये किसी से छिपा नहीं है। ये अलग बहस का मुद्दा बन जाता है।
जहां तक सेंसर बोर्ड का मामला है, तो मौजूदा समस्याओं के निदान के लिए कोई कहता है कि सेंसर बोर्ड को ही खत्म कर दिया जाना चाहिए, तो कोई कहता है कि सेंसर को सिर्फ रेटिंग के आधार पर फिल्मों को सार्टिफिकेट देने की व्यवस्था हो, जिसकी सिफारिश श्याम बेनेगल कमेटी ने भी की, जिसका गठन सरकार ने किया, लेकिन अब तक इस कमेटी की सिफारिशों को क्यों नहीं लागू किया जा रहा है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इस मुगालते में रहना भी ठीक नहीं होगा कि क्या श्याम बेनेगल की कमेटी की सिफारिशें सेंसर बोर्ड और सिनेमावालों के बीच चली आ रही रस्साकशी खत्म हो जाएगी।
दरअसल असली समस्या की जड़ में वक्त का बदलाव है, जिससे न तो फिल्मवाले अछूते हैं और न सेंसर। फिल्में बनाना एक कारोबार है और कारोबारी कोई भी हो, सबसे पहले अपना फायदा देखना चाहता है। फिल्मों का कारोबार इस दौर में सिमटता जा रहा है। रिलीज के पहले तीन दिनों में ही फिल्म का भविष्य तय हो जाता है। युवाओं को ललचाने के लिए जो फार्मूला पहले महेश भट्ट एंड कंपनी ने अपनाया, उसे अब हर कोई आजमाने को लालायित है। खुलेपन और आधुनिकता के नाम पर इस दौर के फिल्मकारों को अगर सेंसर बोर्ड से मुक्ति मिल जाए, तो कोई हैरानी नहीं होगी कि ये फिल्मवाले पॉर्न फिल्मों से कम पर बाज नहीं आएंगे। यहां आकर सेंसर बोर्ड की प्रासंगिकता समझ में आ सकती है, लेकिन अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए सेंसर बोर्ड को भी कानूनों के कोड़े फटकराने का तानाशाही रवैया छोड़ना ही होगा।
यहां एक और दिलचस्प तथ्य की चर्चा जरुरी हो जाती है, जिसका कहीं न कहीं कनेक्शन प्रकाश झा वाली फिल्म से भी है। दरअसल फिल्मवालों ने सेंसर बोर्ड के साथ टकराव को फिल्म के प्रमोशन का एक हथियार बना लिया है, जिसका धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। जो कोई फिल्म सेंसर बोर्ड में फंसेगी या अटकेगी, जाहिर है कि उसकी चर्चा मीडिया में होगी। फिल्म बड़े स्टार या निर्माता की हो तो ये चर्चा हंगामाखेज होती है, जिसके चलते फिल्म का खूब प्रचार होता है। महंगाई के इस जमाने में इस हथियार को इस तरह से इस्तेमाल किया जाता है कि फिल्मवाले जान-बूझकर ऐसे सीन डालते हैं, जिनको लेकर सेंसर से एतराज होगा, तो शोर मचेगा और फिल्म का प्रचार होगा। इस दलील या कहा जाए कि मानसिकता को भी मौजूदा समस्या से अलग नहीं किया जा सकता।
समस्या है, लेकिन इतनी गंभीर नहीं, जिसका रास्ता नहीं निकाला जा सके। सेंसर और फिल्मवालों के संगठन कभी आपस में बैठें, तो बीच का रास्ता निकालने की सोच सकते हैं। सेंसर बोर्ड की नियमावली को इस दौर की जरुरतों के हिसाब से व्यापक बदलाव की जरुरत है।
ये तो नहीं कहा जा सकता कि इन मुलाकातों से सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी, लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि एक दूसरे के नजरिए और जरुरतों को समझने से समस्याएं सुलझाने के रास्ते जरुर नजर आते हैं। ये सब एक दिन में नहीं होगा। जरुरी ये है कि फिल्मवाले सेंसर बोर्ड के तरफ बंदूके तानने की आदत को काबू में रखें और सेंसर बोर्ड कानूनों के चाबुक को काबू में रखे। एक बात याद आ जाती है कि जो सो रहा हो, उसे जगाया जा सकता है, जो आंखें मूंदकर लेटा हो, उसका क्या किया जाए। सेंसर बोर्ड और फिल्मवालों के बीच चल रही फुटव्वल भी इस तमाशे से कम नहीं, जिसके लिए दोनों ही दोषी हैं और कहा जाए तो समस्या के समाधान के लिए दोनों में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं।
एक बार फिर एक फिल्म का मामला सामने आया है। फिल्म प्रकाश झा की है, जिसे सेंसर बोर्ड ने पास करने से खारिज कर दिया। सेंसर बोर्ड की तरफ से ये तर्क दिया गया कि इसका कटेंट बहुत ज्यादा सेक्सुअल है, जिसे पास नहीं किया जा सकता। दिलचस्प बात ये भी है कि इस फिल्म का डायरेक्शन एक महिला ने किया है। एक महिला की फिल्म में सेक्सुअल कटेंट ज्यादा होने की बात भी कम दिलचस्प नहीं हो जाती। सेंसर बोर्ड अपने कायदे कानूनों का हवाला देकर कह रहा है कि इस कटेंट की फिल्म को पास नहीं किया जा सकता। जाहिर है कि सेंसर का ये सफाईनामा न तो प्रकाश झा को मंजूर हुआ, न फिल्म की निर्देशिका अलंकृिता श्रीवास्तव को। वे दोनों लाजिमी तौर पर सेंसर बोर्ड पर बरस रहे हैं और बोर्ड के चेयरमैन पहलाज निहलानी उनके निशाने पर हैं। पहलाज भी चुप रहने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि सेंसर बोर्ड की आलोचना आज के दौर का फैशन बन गया है, लेकिन बोर्ड किसी की परवाह किेए बिना, अपने कायदे कानूनों के हिसाब से काम करता रहेगा, जैसे कि अब तक होता आया है।
तर्क पहलाज दें, सेंसर बोर्ड की सफाई आए। इनके खिलाफ प्रकाश झा और अलंकृिता श्रीवास्तव के साथ फिल्म इंडस्ट्री का एक तबका जुड़ जाए। हर किसी के पास अपने तर्क हैं, लेकिन इन तर्कों से थोड़ा आगे जाकर मुद्दे को समझने की कोशिश की जाए, तो पहली नजर में दो बातें साफ तौर पर समझ में आ जाती हैं कि सेंसर बोर्ड और फिल्म इंडस्ट्री के बीच अगर असंतुलन है, तो इसकी पहली वजह सरकारी कानूनों का पुलिंदा है और दूसरी वजह फिल्मकारों का वो लालच है, जो अब युवाओं को रिझाने के नाम पर किसी की हद तक जाने से गुरेज करने को तैयार नहीं। सेंसर बोर्ड सरकारी दफ्तर है, तो जाहिर है कि इस पर कंट्रोल सरकार में बैठी राजनैतिक ताकतें रखना चाहती हैं। यही वजह है कि जब केंद्र में सरकार बदलती है, तो सेंसर बोर्ड का रहनुमा भी बदल दिया जाता है। मौजूदा दौर में दिल्ली दरबार पर काबिज सत्ता किस तरह से सिनेमाई दुनिया को लेकर तमाशे करती आ रही है, ये किसी से छिपा नहीं है। ये अलग बहस का मुद्दा बन जाता है।
जहां तक सेंसर बोर्ड का मामला है, तो मौजूदा समस्याओं के निदान के लिए कोई कहता है कि सेंसर बोर्ड को ही खत्म कर दिया जाना चाहिए, तो कोई कहता है कि सेंसर को सिर्फ रेटिंग के आधार पर फिल्मों को सार्टिफिकेट देने की व्यवस्था हो, जिसकी सिफारिश श्याम बेनेगल कमेटी ने भी की, जिसका गठन सरकार ने किया, लेकिन अब तक इस कमेटी की सिफारिशों को क्यों नहीं लागू किया जा रहा है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इस मुगालते में रहना भी ठीक नहीं होगा कि क्या श्याम बेनेगल की कमेटी की सिफारिशें सेंसर बोर्ड और सिनेमावालों के बीच चली आ रही रस्साकशी खत्म हो जाएगी।
दरअसल असली समस्या की जड़ में वक्त का बदलाव है, जिससे न तो फिल्मवाले अछूते हैं और न सेंसर। फिल्में बनाना एक कारोबार है और कारोबारी कोई भी हो, सबसे पहले अपना फायदा देखना चाहता है। फिल्मों का कारोबार इस दौर में सिमटता जा रहा है। रिलीज के पहले तीन दिनों में ही फिल्म का भविष्य तय हो जाता है। युवाओं को ललचाने के लिए जो फार्मूला पहले महेश भट्ट एंड कंपनी ने अपनाया, उसे अब हर कोई आजमाने को लालायित है। खुलेपन और आधुनिकता के नाम पर इस दौर के फिल्मकारों को अगर सेंसर बोर्ड से मुक्ति मिल जाए, तो कोई हैरानी नहीं होगी कि ये फिल्मवाले पॉर्न फिल्मों से कम पर बाज नहीं आएंगे। यहां आकर सेंसर बोर्ड की प्रासंगिकता समझ में आ सकती है, लेकिन अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए सेंसर बोर्ड को भी कानूनों के कोड़े फटकराने का तानाशाही रवैया छोड़ना ही होगा।
यहां एक और दिलचस्प तथ्य की चर्चा जरुरी हो जाती है, जिसका कहीं न कहीं कनेक्शन प्रकाश झा वाली फिल्म से भी है। दरअसल फिल्मवालों ने सेंसर बोर्ड के साथ टकराव को फिल्म के प्रमोशन का एक हथियार बना लिया है, जिसका धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। जो कोई फिल्म सेंसर बोर्ड में फंसेगी या अटकेगी, जाहिर है कि उसकी चर्चा मीडिया में होगी। फिल्म बड़े स्टार या निर्माता की हो तो ये चर्चा हंगामाखेज होती है, जिसके चलते फिल्म का खूब प्रचार होता है। महंगाई के इस जमाने में इस हथियार को इस तरह से इस्तेमाल किया जाता है कि फिल्मवाले जान-बूझकर ऐसे सीन डालते हैं, जिनको लेकर सेंसर से एतराज होगा, तो शोर मचेगा और फिल्म का प्रचार होगा। इस दलील या कहा जाए कि मानसिकता को भी मौजूदा समस्या से अलग नहीं किया जा सकता।
समस्या है, लेकिन इतनी गंभीर नहीं, जिसका रास्ता नहीं निकाला जा सके। सेंसर और फिल्मवालों के संगठन कभी आपस में बैठें, तो बीच का रास्ता निकालने की सोच सकते हैं। सेंसर बोर्ड की नियमावली को इस दौर की जरुरतों के हिसाब से व्यापक बदलाव की जरुरत है।
ये तो नहीं कहा जा सकता कि इन मुलाकातों से सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी, लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि एक दूसरे के नजरिए और जरुरतों को समझने से समस्याएं सुलझाने के रास्ते जरुर नजर आते हैं। ये सब एक दिन में नहीं होगा। जरुरी ये है कि फिल्मवाले सेंसर बोर्ड के तरफ बंदूके तानने की आदत को काबू में रखें और सेंसर बोर्ड कानूनों के चाबुक को काबू में रखे। एक बात याद आ जाती है कि जो सो रहा हो, उसे जगाया जा सकता है, जो आंखें मूंदकर लेटा हो, उसका क्या किया जाए। सेंसर बोर्ड और फिल्मवालों के बीच चल रही फुटव्वल भी इस तमाशे से कम नहीं, जिसके लिए दोनों ही दोषी हैं और कहा जाए तो समस्या के समाधान के लिए दोनों में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं।



































