Sunday, March 26, 2017

कामयाबी के सुरुर और गुरुर में डूबे कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर



ये विचित्र संयोग है कि देश का मीडिया उस महान सांसद को लेकर त्राही-त्राही कर रहा है, जिसने एयर लाइंस के कर्मचारी पर अपने पैर के सैंडिल से पौरुषत्व दिखाया, तो दूसरी तरफ कुछ दिनों पहले दुनिया के सामने आए कपिल शर्मा की बहादुरी के किस्से में भी इस बात का जिक्र है कि कैसे एक हवाई यात्रा के दौरान उन्होंने सुनील ग्रोवर पर जूता फेंका, जिसके बाद दोनों के बीच बात बढ़ती चली गई और आज दोनों उलट छोर पर खड़े नजर आ रहे हैं।  

बहादुरी की इन दो अलग अलग वारदातों का इक सच ये है कि सत्ता और कामयाबी का नशा जब सर पर सवार होता है, तो दो आंखों वाले इंसान अंधे हुए नजर आते हैं। मीडिया का मातम तो अगली ब्रेकिंग न्यूज के साथ खत्म हो जाएगा, मगर कामयाबी के स्याह पन्नों पर ये सच दर्ज हो गया कि एक स्टार अपने स्टारडम की चकाचौंध में नीच हरकत करने में शर्म महसूस नहीं करता। 

सिर्फ सिनेमा ही नहीं, मनोरंजन की दुनिया का इतिहास ऐसे सूरमाओं के किस्सों से अटा पड़ा है, जो स्टारडम की अंधी चमक के शिकार होकर गुमनामी के अंधेरे में खोते चले गए।  कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर के बीच की मौजूदा कलह में भले ही पहली नजर में कसूरवार कपिल नजर आएं, लेकिन अगर धरातल और अतीत को मिलाया जाए, तो शक नहीं रह जाता कि कसूर दोनों का है। इनके बीच की कलह स्टारडम के नशे के सिवाय कुछ नहीं है, जिसके सुरुर और गरुर का नशा इन दोनों के सर पर बुरी तरह से सवार हो चुका है। ये कलह न तो इस नशे का पहला उदाहरण है और न ही आखिरी। इस कलह में बहस का लब्बोलुआब महज इतना रह जाता है कि स्टारडम के नशे में दोनों में से कौन कम और कौन कितना ज्यादा डूब चुका है। दरअसल इन शूरवीरों के बीच असली टकराव उस हवाबाजी को लेकर है, जिसमें इन दोनों में से किसी को ये मंजूर नहीं कि उस शो का क्रेडिट दूसरे को मिले, जिस पर वे अपना और सिर्फ अपना हक मानते हैं और इसी को लेकर दोनों एक दूसरे से भिड़ने का मौका हाथ से नहीं जाने देते। 
दोनों इस टकराव की झलक इससे पहले पार्ट 1 का शो दिखा चुके हैं, जब कपिल का शो कलर चैनल पर चल रहा था, तो गुत्थी की कामयाबी से आसमान पर पंहुचे सुनील ग्रोवर ने अपने स्टारडम की पावर दिखाने और कपिल के शो को चैलेज करने के लिए स्टार प्लस पर अपना कामेडी शो शुरु किया था। स्टारडम की पावर को लेकर हुए इस भद्दे मुकाबले में दोनों ही फेल साबित हुए। स्टार प्लस पर सुनीील ग्रोवर का शो फ्लाप रहा, तो कलर पर कपिल का शो बंद हुआ और कपिल सोनी पर शिफ्ट हुए, तो उनकी टीम में खिसियानी बिल्ली की तरह सुनील ग्रोवर को वापस आना पड़ा। सुनील की वापसी को कपिल शर्मा ने खुशी से स्वीकार नहीं किया। दरअसल सुनील ग्रोवर की वापसी ने इस बात की मुहर लगा दी कि पहले गुत्थी और फिर डाक्टर के गेटअप में उनकी अदायगी इस शो की टीआरपी के खेल का अहम हिस्सा है। ये बात न तो कपिल शर्मा को हजम हुई और न ही सुनील ग्रोवर स्टार प्लस पर अपने शो की नाकामयाबी को भूल सके। ये भी कड़वी हकीकत है कि अगर शो को टेलीकास्ट करने वाले सोनी चैनल का चाबुक न होता, तो सर्कस के शेरों की मानिंद इनकी उछलकूद के किस्से पहले ही बाहर आ जाते। 
मनोरंजन के नाम पर खुले चैनलों के आका जिस टीआरपी के खेल के लिए कोई भी खेल खेलने में शर्म नहीं करते, उसी टीआरपी के खेल ने कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर को दौलत का ढेर तो दे दिया, लेकिन शर्म, हया और इंसानियत की तरफ जाने का मौका नहीं दिया। 

इन दोनों ने लंबे संघर्ष के बाद कामयाबी की जिस जमीन को तैयार किया, उसकी फसल पर दोनों आपसी फुटव्वल में लग गए, अपनी कामयाबी के असली नायकों को तो दोनों में से कोई याद नहीं करता। इन दोनों को कामयाबी का ये तोहफा देश और विदेश की उस हिंदुस्तानी अवाम ने दिया, जो इनकी हंसी को अपनी हंसी मानने लगी। किसी भी चैनल के किसी भी शो को टीआरपी के खेल मेें जीतने के लिए जब पब्लिक का साथ मिल जाए, तो फिर बल्ले बल्ले ही होती है, लेकिन कपिल की महानता की मिसाल देखिए कि अपने ही शो में आए या बुलाए गए आम जनता की इज्जत से  खिलवाड़ करने का कोई मौका उन्होंने छोड़ा नहीं। दूसरों की इज्जत से खिलवाड़ करने में कपिल शर्मा का कोई सानी नहीं हो सकता। मक्कारी से लेकर चापलूसी के हर गुर में माहिर इस कामेडियन की कामयाबी की खोखली इमारत को आज नहीं, तो आने वाले वक्त में भरभराकर ही गिर जाना है। सुनील ग्रोवर तो पहला धक्का मार ही चुके हैं। जिस दिन चैनलों के टीआरपी के खेल में कपिल की कामेडी पिछड़ने लगी, उस दिन इन चैनलों के आका उनको समझाएंगे कि दूध में से मक्खी को कैसे बाहर निकाला जाता है। 
सुनील ग्रोवर भी दध के धुले नहीं हैं। वे भी इसी वहम में जीते आ रहे हैं कि देश और दुनिया में उनसे बड़ा कामेडियन कोई नहीं है। सुनील ग्रोवर ने भी इतिहास का वो सबक नहीं पढ़ा, जिसमें दर्ज है कि अहम की मार के शिकार सूरमाओं को किस तरह जमींदोज होना प़ड़ा। सुनील ग्रोवर ने कभी ये जताने का मौका नहीं छोड़ा कि शो में भले ही नाम कपिल शर्मा का जुड़ा
हो, लेकिन शो सिर्फ उनकी वजह से चल रहा है। स्टार प्लस पर अपने शो की विफलता (जिसके कारण भी कम दिलचस्प नहीं हैं) के बाद सुनील ग्रोवर की कुंठा उस वक्त ज्यादा बढ़ी, जब उनको उसी कपिल शर्मा शो में वापसी करनी पड़ी, जिसको औकात बताने की हुंकार के साथ वे स्टार प्लस पर पंहुचे थे। कपिल और सुनील साथ में काम करते आए, तो इसलिए नहीं कि दोनों एक दूसरे की जरुरत को महसूस करते रहे, बल्कि दोनों अपनी अपनी मजबूरी से बंधे हुए थे और दोनों ने कभी इस मजबूरी से आजादी पाने की कोशिश नहीं की। ये मजबूरी चैनलों की टीआरपी का वो खेल है, जिसमें हर कोई मजबूर होकर हर फैसला कबूल करता है। यही मजबूरी इन दोनों को वक्त बेवक्त टकराव के उस मकाम पर ले आती है, जिसमें दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने के शौक को तबियत से पूरा करना चाहते हैं। यही पहले हुआ था, यही अब हुआ और अगर चैनल ने इस बार बीच-बचाव कर लिया, तो भी ये आगे भी होगा। दोनों अपने ईगो की लड़ाई में सबसे ज्यादा अपमान उस जनता का कर रहे हैं, जिसने गलती से उनको इस कामयाबी का रास्ता दिखा दिया।

दोनों की कामयाबी का आईना उस वक्त भी सामने आया था, जब दोनों ने फिल्मों के परदे पर स्टारडम की ताल ठोकी थी। अब्बास मस्तान की फिल्म के नतीजे में कपिल के स्टारडम की कलई खुली थी, तो सुनील ग्रोवर की फिल्म (काफी विद डी) को दो शो की कामयाबी भी नहीं मिली थी। दोनों को अपनी कामयाबी के इस आईने पर शायद ही शर्मिंदगी होने की जरुरत महसूस हुई हो। ये तमाशा हुआ, तो इसलिए कि दोनों स्टारडम के शिकार हैं। दोनों उस कामयाबी के नशे में चूर हैं, जिसकी उम्र बहुत लंबी नहीं होती। दोनों इससे कोई सबक सीखेंगे, ऐसी उम्मीद भी नहीं की जा सकती। 



अपनी कमजोर और खोखली कामयाबी के मैदान में उछलकूद कर रहे इन दो महानुभवों को काश कोई अमिताभ बच्चन की उस लाइन की कापी पंहुचा दे, जिसमें सदी के महानायक ने कहा था कि कामयाबी का असली कारण टेलेंट नहीं, बल्कि वे मौके होते हैं, जो आपको मिल जाते हैं। इन मौकों को कामयाबी में बदलने में पहली जरुरत उस विनम्रता और सहनशीलता की होती है, जो टेलेंट के लिए रास्ता बनाती हैं। कड़े संघर्ष के बाद कामयाबी का लंबा सफर तय करने वाले महानायकी के इस सच से कपिल और सुनील ग्रोवर सरीखी आत्माएं अगर सबक सीख सकतीं, तो उनके स्टारडम की इतनी लचर कतई नहीं होती। 

Saturday, March 18, 2017

इस सिनेमा का स्वागत कीजिए...


Raj Kumar Rao and Director Vikramaditya Motwani
सितारों के मुकाबले नए चेहरों को लेकर छोटे बजट की फिल्मों ने कई मौकों पर न सिर्फ कामयाबी के नए आयाम स्थापित किए हैं, बल्कि हिंदुस्तानी सिनेमाई परदे को चौंकाया् है। राजकुमार राव के साथ बनी विक्रमादित्य मोटवानी की फिल्म ट्रैप्ड इसी कड़ी में शामिल हो जाती है और ये फिल्म इसलिए बड़ी हो जाती है कि इससे गैरमसालों वाले सिनेमा की उम्मीदें हिल्लौरे खाती नजर आने लगती हैं। ट्रैप्ड एक सिनेमा के साथ एक ऐसा पल है, जो खुशी और राहत का सबब देता है और इसका जश्न मनाने की जरुरत है।

सिनेमा के इतिहास में अगर बड़े सितारों वाली भारीभरकम बजट वाली फिल्में कमाई के खजाने भरकर सुर्खियां बंटोरती हैं, तो नए, अजनबी चेहरों के साथ छोटे बजट की गंभीर फिल्में भी अपना असर छोड़ती रही हैं। इनका इतिहास लंबा है और दिलचस्प है। ट्रैप्ड का बनना ऐसे मौके पर ज्यादा अहम हो जाता है, जब कारपोरेट घरानों के पंजों में जकड़ा बालीवुड छटपटा रहा है और बड़े बजट की फिल्मों का बाजार सिनेमा पर हावी है।

यहां आकर पहला जिक्र विक्रमादित्य मोटवानी का, जो इससे पहले अपनी पहली फिल्म उड़ान में दिखा चुके थे  कि वे किस तरह के सिनेमा में विश्वास रखते हैं। विक्रमादित्य लुटेरे में रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा के स्टारडम में लड़खड़ाए, लेकिन अच्छी बात ये है कि ट्रैप्ड से वे अपने पुराने रास्ते पर लौट आए। विक्रमादित्य को लेकर एक और दिलचस्प बात ये है कि वे जिस प्रोडक्शन कंपनी में पार्टनर हैं, वहां विकास बहल और स्वनाम धन्य अनुराग कश्यप जैसे फिल्मकार मौजूद हैं, जो कमर्शियल सिनेमा के साथ खेलने के सारे तौर तरीके जानते हैं और कारपोरेट वाले सिनेमा के माहिर हैं। उनके बीच रहकर अगर विक्रमादित्य मोटवानी अपनी सोच पर कायम रहते हैं या कहें कि लुटेरे के बाद अपनी पटरी पर लौट आते हैं, तो ये न सिर्फ सुखद एहसास है, बल्कि उस सिनेमा की छोटी जीत का रास्ता है, जिस पर विक्रमादित्य को भरोसा रहा है। ये भरोसा उनको इस दिलचस्प अतीत के साथ और दिलचस्प बना देता है कि वे संजय लीला भंसाली को गुरु और मनमोहन देसाई के सिनेेमा के साथ मानते हैं। विक्रमादित्य की फिल्मों में न तो भंसाली सरीखी भव्यता होती है और न मनमोहन देसाई के खोए-पाए फार्मूले का कोई अंश होता है। जब कोई फिल्मकार अपने गुरु और अपने मेंटर के सिनेमा से अपना रास्ता अलग करता है, तो सही मायनों में वो अपने लिए कामयाबी की पहली बड़ी रेखा खिंचता है। इस कारनामे के लिए विक्रमादित्य के नाम तालियां तो बजती हैं।


अब बात राजकुमार राव की। ये बहुत सही बात है कि कोई भी फिल्मकार अपनी किसी फिल्म की सोच के साथ उस वक्त तक न्याय नहीं कर सकता, जब तक उसकी फिल्म के किरदारों की कल्पनाशीलता को पकड़ने वाले कलाकारों की टीम न बन जाए। ये कहना सबसे आसान होगा कि ट्रैप्ड में काम करने को लेकर राजकुमार राव ने एक प्रयोग किया और ये कहना इससे भी ज्यादा ठीक रहेगा कि वे इस प्रयोग के साथ खुद को आजमाने के लिए इसलिए तैयार हो गए, क्योंकि उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं था। मतलब, राजकुमार राव किसी ऐसे सितारे का नाम नहीं है, जो किसी सितारे की तरह अपने स्टारडम की इमेज से बंधा हो। राजकुमार राव अच्छे एक्टर हैं, ये बात बहुत पहले समझ में आ गई थी। ट्रैप्ड से पहले शाहिद और अलीगढ़ फिल्मों में राजकमार राव को जब भी कुछ करने का मौका मिला, उन्होंने आजाद परिंदे की तरह उड़ान भरी। शुक्रगुजार होना चाहिए विक्रमादित्य का, जिन्होंने राव की इस उड़ान के लिए ये आसमान मुहैया कराया, जिसको ट्रैप्ड नाम मिला है।

ट्रैप्ड में खूबियां हैं, तो कमियां भी रही होंगी, लेकिन यहां न तो फिल्म की समीक्षा हो रही है और न पोस्टमार्टम। यहां जिक्र सिर्फ इस सकून भरे एहसास का है, कि इस दौर में भी राजकुमार राव के साथ विक्रमादित्य मोटवानी अच्छे सिनेमा की उम्र और दायरे को बढ़ाने के लिए आगे आ जाते हैं। जब एक ट्रैप्ड बनती है, तो उसे देखकर न जाने कितने विक्रमादित्य मोटवानी सरीखे नए फिल्मकारों के हौसलों की उड़ान नए परवाज भरने की उमंग से लबरेज हो जाती है। इनमें से ही कोई नया फिल्मकार किसी राजकुमार राव के साथ इस सिनेमा को नए आयाम दे सकता है।

सिनेमा की हर धारा दर्शकों के मनोरंजन की प्यास बुझाने के लिए जरुरी होती है। सिनेमा मनमोहन देसाई का हो या संजय लीला भंसाली का या फिर विक्रमादित्य मोटवानी का। हर सिनेमा की हर विधा को एक पहचान की जरुरत होती है। उससे भी ज्यादा जरुरत इस बात की है कि युवा निर्देशकों की पीढ़ी अपने सिनेमा में विश्वास करें। इसका मतलब ये नहीं कि बड़े सितारों के सिनेमा से कोई गुरेज किया जाए। ये सिनेमा जरुरी है, तो वो सिनेमा भी जरुरी है और इनके बीच अनुराग कश्यप की महानता के दर्शन भी जरुरी हैं, जो बांबे वैलवेट से सिर्फ इतना भला करते हैं कि इसकी नाकामयाबी में एक बोर्ड टांग देते हैं, जहां लिखा होता है कि सिनेमा से खुद को बड़ा समझने वालों की नादानी एक भयंकर चेतावनी से कम नहीं है।

अनुराग का पुराण किसी और वक्त। ये जश्न का मौका है। ये मौका है विक्रमादित्य के सिनेमा के जश्न का। ये मौका है राजकुमार राव सरीखे कलाकार की जीविषा के जश्न का और ये मौका है उस युवा दर्शक वर्ग की  उमंग और समझ का, जो किसी मसालेदार फिल्म में टाइमपास करने की जगह ट्रैप्ड के जाल में जकड़ कर खुश होते हैं। हिंदुस्तानी सिनेमा की नई रोशनी, नई चमक को रेखांकित करने के लिए मोटवानी, राव और टीम का शुक्रिया।

Thursday, March 9, 2017

करण जौहर को ये हक किसने दिया..



किसी ने यूं ही नहीं कहा कि कामयाबी अपने साथ जिम्मेदारी लाती है। करण जौहर बड़े फिल्मवाले तो बन गए, लेकिन अगर उनको जिम्मेदार का एहसास होता, तो वे कंगना को फिल्म इंडस्ट्री छोड़कर जाने की सलाह न देते। शब्दों की जुगाली में इसे सिर्फ सलाह मानना इसके उस खतरनाक पहलू को अनदेखा करने से कम नहीं होगा, जिसमें मानसिकता सलाह से ज्यादा ये साबित करने की है कि वे फिल्म इंडस्ट्री से किसी को बाहर करने का माद्दा रखते हैं। 

दो बातों को लेकर शक की गुंजाइश नहींं के बराबर होती है। पहली बात, करण जौहर फिल्म इंडस्ट्री के बड़े फिल्मकार हैं और दूसरी बात, कंगना भी फिल्म इंडस्ट्री का अनजाना चेहरा नहीं हैं। बालीवुड की इन दो दिग्गज हस्तियों के बीच टकराव के कारणों से हटकर देखें तो ये बालीवुड की चमक-दमक के स्याहपन को बेपरदा करता है। 

करण जौहर फिल्म इंडस्ट्री से हैं। उनके पिता कामयाब निर्माता रहे और करण जौहर को कामयाब साम्राज्य अपने पिता से विरासत में मिली। ये कहने से करण जौहर की अपनी कामयाबी और काबिलित रत्ती भर भी कम नहीं होती। उन्होंने अपने पिता की विरासत को कामयाबी का साम्राज्य में अपने दम पर बदला और चोटी पर पंहुचे। दूसरी ओर कंगना संघर्ष की जमीन पर अपनी कामयाबी का महल खड़ा करने की मिसाल हैं। करण जौहर से उलट, उनका फिल्म इंडस्ट्री में कोई नहीं था। वे यहां के लिए बाहरी थीं। 

फिल्मी परिवारों से आने वाले लोगों और बाहरी लोगों के संघर्ष और कामयाबी में यही सबसे बड़ा फर्क होता है। वे अपने लिए अपनी जमीन खुद तैयार करते हैं। कंगना ने भी अपनी कामयाबी की जमीन खुद तैयार की। इससे उनका क्रेडिट छिनने की कोई हिमाकत भी नहीं कर सकता। ये इस टकराव का सबसे खतरनाक और भयावह मंजर है, जो बाहरी बनाम फिल्म इंडस्ट्री वाला के रुप में सामने आया है। कोई नहीं भूल सकता कि कंगना ने किस तरह से  बालीवुड के एक बड़े सितारे से टकराव मोल लिया और रितिक रोशन, जो खुद फिल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक रखते हैं, से इस टकराव में कभी उन्नीस नहीं नजर आईं। 

यहां करण जौहर या रितिक रोशन से टकराव में कंगना को क्लीन चिट देने या उनके पक्ष को ही जायज मानने की कोई कोशिश नहीं है। यहां अपने पक्ष पर कायम रहने के उनके जज्बे को सलाम करने की कोशिश है, जिसने सामने वाले दो धाकड़ों को डिफेंड मोड में लाने का काम तो कर ही दिया है। 



कंगना के साथ करण जौहर के कितने भी गंभीर मतभेद हो सकते हैं। रितिक के साथ कंगना के निजी रिश्तों का सच वही दोनों जानते होंगे, लेकिन यहां सीधा सरल सवाल है कि आखिरकार क्या इसलिए करण जौहर किसी को फिल्म इंडस्ट्री से बेदखल करने की बात कह सकते हैं, क्योंकि कंगना बाहर से हैं।  कंगना को अगर इस आधार पर निशाना बनाया जाए कि वे बाहर से हैं या कहा जाए कि फिल्म इंडस्ट्री के किसी परिवार में उनकी पैदाइश नहीं हुई, तो इस आधार को किसी भी तर्क पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्या ये नहीं माना जाए कि अपने वाक्य और छोटी सोच के चलते करण जौहर ने कंगना को वो मजबूती दे दी, जो उनको करण के मुकाबले बड़ा बनाती है। 

कंगना की अपनी कमजोरियां रही हैं। रिश्तों की छिछलेदारी करने से लेकर अपने कैरिअर के प्रति घोर लापरवाही वाला रवैया रखने से लेकर खुद को ही गंभीरता न लेने के अवगुणों के चलते कंगना ने बहुत कुछ ऐसा खोया, जो वे बचा सकती थीं। इन अवगुणों का खामियाजा कंगना ने ही भुगता है, लेकिन इस आधार पर तो करण जौहर या कोई भी शख्स कंगना या किसी को भी फिल्म इंडस्ट्री से बाहर जाने की चेतावनीनुमा सलाह नहीं दे सकता। 

करण जौहर ने खुद हाल ही में एक बड़े संकट का सामना किया, जब पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर उन पर हमलेे हुए। उन्होंने देशभक्ति के गुणगाने वाला वीडियो बनाकर सफाई दी, तो एक घाघ कारोबारी की तरह राजनेताओं से सौदेबाजी में भी वे पीछे नहीं रहे। उस संकट में करण जौहर जिस फिल्म इंडस्ट्री को परिवार कह रहे थे, उस परिवार के वे हिस्सा तो हैं, लेकिन मुखिया होने का मुगालता उनको कब और कैसे हुआ, ये वही जाने। हो सकता है कि अतीत में करण जौहर ने अपने रुतबे से किसी कलाकार को फिल्म इंडस्ट्री से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया हो। हो सकता है कि करण जैसे किसी दंभी फिल्मकार ने किसी के साथ ये किया हो, लेकिन जहां तक कंगना का मामला है, तो करण जौहर के लिए पैगाम बहुत साफ है-
नहीं सर, न तो ये इंडस्ट्री आपकी है, न कंगना आपकी मेहरबानी की मोहताज हैं। कंगना अपनी जगह सही या गलत हो सकती हैं, लेकिन करण जौहर की ये सोच कहीं से भी संही नहीं हो सकती, न इसे कोई स्वीकार करेगा। 

करण जौहर अगर अपनी फिल्म को लेकर देश से माफी मांगने के लिए आगे आ सकते हैं, तो एक महिला कलाकार का अपमान करने और फिल्म इंडस्ट्री की छवि धूमिल करने के लिए माफी मांगकर अपनी शर्मिंदगी दूर कर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ, तो ये करण जौहर की उस काबिलियत और कामयाबी की जीत होगी, जिसके चलते उन्होंने अपने पिता की विरासत को सफलतापूर्वक संभाला। 
अब अपनी कामयाब छवि की रक्षा करने की जिम्मेदारी करण जौहर की है और मुस्कराने की बारी कंगना की है, जिन्होंने इतने बड़े फिल्मकार के दंभ को चकनाचूर कर दिया। 

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...