Friday, October 20, 2023

संजय दत्त- केजीएफ 2 और लिओ में फर्क


साउथ के दिग्गज सितारे विजय थलापति की नई फिल्म लियो देश भर में आज रिलीज हुई। ये भी साउथ की पैन इंडिया फिल्मों में से एक रही, जिसे साउथ की भाषाओं के साथ हिंदी में भी बनाया गया। 

लिओ के हिंदी वर्शन की बात करें, तो हिंदी बेल्ट में इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण इसमें संजय दत्त का होना था। लिओ के रिलीज होने के बाद हिंदी बेल्ट के वे दर्शक निराश हुए, जो इसे मल्टीप्लेक्स में देखना चाहते थे। ये निराशा इसलिए रही, क्योंकि सभी प्रमुख मल्टीप्लेक्स ने इसे रिलीज न करने का फैसला कई दिनों पहले कर लिया था। इसके बाद हिंदी बेल्ट में लिओ को सिर्फ सिंगल थिएटरों में ही रिलीज किया गया।  जिस वक्त मल्टीप्लेक्स मालिकों का ये फैसला सामने आया था, तो ये माना जा रहा था कि लिओ की टीम किसी समाधान तक पंहुचने की पहल करेगी, ताकि फिल्म सहजता के साथ मल्टीप्लेक्स में रिलीज होगी, लेकिन कमाल की बात ये रही कि लिओ की टीम ने समाधान के लिए कोई पहल करने की जगह साफ कर दिया कि वे ऐसा कुछ नहीं करेंगे। 

चलिए, मल्टीप्लेक्स के इस मामले को समझने की कोशिश करते हैं। इन दिनों बड़े स्तर पर बनने वाली सभी फिल्मों के ओटीटी राइट्स एडवांस में ही बिक जाते हैं। ओटीटी राइटस के लिए होने वाले एग्रीमेंट में एक अहम क्लाज होता है कि फिल्म को थिएटरों के कितने दिनों के बाद ओटीटी प्लेटफार्म पर स्ट्रीम किया जाएगा। लिओ के ओटीटी राइट्स साउथ की एक ओटीटी कंपनी को बेचे गए, जिसमें ये तय हुआ कि इसे थिएटरों के चार सप्ताह बाद ओटीटी पर स्टीम किया जाएगा। इस फैसले से लिओ के हिंदी वर्शन को रिलीज करने जा रहे मल्टीप्लेक्स थिएटरों ने इरादा बदल दिया। मल्टीप्लेक्स दूसरी फिल्मों की तरह आठ सप्ताह बाद ओटीटी पर रिलीज करने की मांग कर रहे थे।, जिसे टीम लिओ ने खारिज कर दिया और इस वजह से हिंदी बेल्ट में लिओ का हिंदी वर्शन सिर्फ सिंगल थिएटरों में रिलीज हुई। 

अब इस मामले के दो पहलू हो जाते हैं कि लिओ के निर्माताओं ने हिंदी बेल्ट को इग्नोर क्यों किया। ये तो सामान्य सी बात है कि उनका फोकस साउथ और इंटरनेशनल में वो मार्केट था, जिसमें विजय थलापति का बहुत बड़ा इंपेक्ट है और उनका मानना है कि हिंदी बेल्ट वो इलाका नहीं है। यही वजह थी कि उन्होंने उस डील को प्राथमिकता दी, जिसमें उनको साउथ की मार्केट में ज्यादा फायदा नजर आ रहा था, वरना सामान्य तौर पर कौन सी फिल्म होगी, जिसे मल्टीप्लेक्स में रिलीज न होने की स्थिति को मान लिया जाए। 

यहां ताज्जुब की बात ये लगती है कि लिओ की टीम ने फिल्म में संजय दत्त की मौजूदगी के बाद भी हिंदी बेल्ट को इग्नोर किया। इससे कोई मना नहीं कर सकता कि डब फिल्मों की बदौलत हिंदी बेल्ट में पहचान कायम करने के बाद भी लिओ के लिए इस बेल्ट में सबसे बड़ा आकर्षण संजय दत्त था, जिसे स्पष्ट शब्दों में कहा जाए, तो लिओ की टीम ने न सिर्फ पूरी तरह से इग्नोर किया, बल्कि फिल्म के लिए एक बड़ा मौका भी खो दिया। लियो की टीम ने ये जानबूझकर किया या नहीं, इसे लेकर आगे चर्चा करेंगे। 

यहां साउथ की एक ही एक और फिल्म की चर्चा करते हैं, जिसने बाक्स आफिस पर रिकार्डतोड़ कामयाबी पाई। इस फिल्म ने साउथ के साथ ही हिंदी बेल्ट में कामयाबी के झंडे गाड़े। ये फिल्म थी केजीएफ 2, जिसमें मेन विलेन के रोल में थे संजय दत्त और केजीएफ की टीम ने अधीरा के रोल में संजय दत्त की मौजूदगी को प्रमोशन में इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2018 में जब केजीएफ रिलीज हुई थी, तो इस फिल्म की टीम को हिंदी बेल्ट में मिली कामयाबी के बाद ये तय किया गया था कि इसके पार्ट 2 में हिंदी फिल्मों के किसी बड़े चेहरे को शामिल किया जाएगा, जिससे हिंदी बेल्ट में फायदा मिले और इसी सोच के साथ केजीएफ-2 में अधीरा के रोल में संजय दत्त को कास्ट किया गया। 

संजय दत्त भले ही शाहरुख खान न हों, लेकिन इतना जरुर है कि हिंदी बेल्ट में उनकी पहचान को लेकर कोई संकट नहीं है। केजीएफ 2 की टीम ने न सिर्फ इन फिल्म अधीरा के कैरेक्टर को पालिश करने में जमकर मेहनत की, बल्कि रिलीज के मौके पर संजय दत्त को प्रमोशन का एक प्रमुख हिस्सा बनाया गया। हिंदी बेल्ट में केजीएफ के राकी भाई, यानी यश ने संजय दत्त के साथ मुंबई, दिल्ली के अलावा हिंदी राज्यों के कई मेट्रो शहरों का दौरा किया। नतीजा ये हुआ कि साउथ में यश का जादू चला, तो हिंदी बेल्ट में यश के साथ साथ अधीरा के किरदार में संजय दत्त का जलवा रहा और बाक्स आफिस पर फिल्म ने रिकार्ड्स की लाइन लगा दी। 

अब केजीएफ 2 के निर्माताओं की पालिसी को ध्यान में रखकर देखा जाए कि लिओ के निर्माताओं ने संजय दत्त के साथ क्या किया। अधीरा की कामयाबी के बाद साउथ की एक और बड़ी फिल्म में संजय दत्त की एंट्री को बड़े अवसर के तौर पर देखा गया। विजय थलापति जैसे दिग्गज सितारे के साथ संजय दत्त की फिल्म को हिंदी बेल्ट में अहमियत मिली। ये भी मान लिया गया था कि लिओ को पैन इंडिया के तौर पर कामयाबी के लिए संजय दत्त की कास्टिंग एक बड़ी भूमिका निभाएगी। ज्यादातर लोग मान रहे थे कि संजय दत्त-विजय का कांबिनेशन लिओ को केजीएफ 2 जैसी महासफलता दिला सकता है। लिओ की टीम ने ये मौका गंवाया और ये कहने में गुरेज नहीं हो सकता कि ऐसा उन्होंने अंजाने में नहीं किया। लिओ की टीम के कारनामों पर गौर कीजिए- 

जब फिल्म का टीजर आया, तो संजय दत्त को प्रमुखता नहीं दी गई। जब फिल्म का ट्रेलर आया, तो भी इसे दोहराया गया। ये उम्मीद की जा रही थी कि लिओ के मूल तमिल वर्शन के ट्रेलर लांच का समारोह चेन्नई में होगा और हिंदी बेल्ट के लिए संजय दत्त के साथ हिंदी वर्शन को लांच करने के लिए विजय थलापति मुंबई में इवेंट करेंगे और दिल्ली  सहित हिंदी बेल्ट के मेट्रो शहरों में प्रमोशन के लिए जाएंगे। लिओ की टीम ने सभी भाषाओं में फिल्म के ट्रेलर को सोशल मीडिया पर लांच किया और बाद में भी लिओ के प्रमोशन में विजय को प्रमुखता दी गई, जो लाजिमी था, लेकिन संजय दत्त को पूरी तरह से इग्नोर किया गया। इसके बाद ओटीटी राइट्स को लेकर लिए गए फैसलों ने हिंदी बेल्ट में लिओ के भविष्य को चौपट कर दिया। यहां केजीएफ2 और लिओ का फर्क देखिए कि संजय दत्त दोनों फिल्मों में विलेन के रोल में थे और दोनों फिल्मों की टीमों ने संजय दत्त का कैसे इस्तेमाल किया। लिओ की टीम से एक सीधा सवाल हो सकता है कि अगर आपको ये ही करना था तो संजय दत्त जैसे सितारे को कास्ट करने की जरुरत क्या थी। लिओ को लेकर संजय दत्त पर तो कोई फर्क नहीं होगा, लेकिन लिओ की टीम ने विजय थलपति को हिंदी बेल्ट में चमकाने के मौके का खुद कत्ल कर दिया। साथ ही इस पैन इंडिया फिल्म के हिंदी बेल्ट में नाकामयाबी के लिए भी लिओ की टीम ही जिम्मेदार रहेगी। 

जहां तक रहा सवाल संजय दत्त का, तो केजीएफ 2 के बाद उनके लिए साउथ की फिल्मों के दरवाजे खुल चुके हैं और वो इस वक्त वहां की कई फिल्मों में काम कर रहे हैं। हिंदी फिल्मों में भी संजय दत्त के पास फिल्मों की कमी नहीं है। जहां तक रही बात विजय थलपति की, तो वे साउथ, खास तौर पर तमिल सिनेमा के सबसे कामयाब और चमकीले सितारों में हैं और उनका जबरदस्त क्रेज है। लिओ के रिलीज के पहले ही दिन ये संकेत मिल गए कि साउथ के मार्केट में लिओ को बड़ी कामयाबी मिलने जा रही है। विजय थलापति को मिली  बेशुमार कामयाबी का मामला अपनी जगह और संजय दत्त का स्टारडम अपनी जगह। 
सवाल सिर्फ एक ही रह जाता है कि अगर पैन इंडिया मार्केट का मतलब समझना है, तो सिर्फ हिंदी फिल्मों के किसी बड़े चेहरे को कास्ट करने से काम नहीं होता। बाहुबली ने पैन इंडिया मार्केट के जो दरवाजे खोले, उस रास्ते पर  केजीएफ 2 ने कामयाबी का झंडा लहराया, तो लिओ की टीम ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। केजीएफ 2 और लिओ का फर्क साउथ के उन निर्माताओं की टीमों के लिए सबक है, जो पैन इंडिया मार्केट के लिए पहले हिंदी बेल्ट को समझा जाए, जहां केजीएफ 2 की टीम की समझदारी की जरुरत है, न कि टीम लिओ की मूर्खता की, जिसके पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं पड़ी, बल्कि टीम के दिग्गज  पैरों को ही कुल्हाड़ी पर मार आए। 

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3 comments:

Anonymous said...

Bilkul sahi

Ekta'Ek' said...

हिंदी भाषी दर्शकों की पसंद को ध्यान रखते हुए बहुत ही बेहतरीन आंकलन किया गया है इस लेख में। दक्षिणी सिनेमा को समझने की आवश्यकता है कि हिंदी कलाकार को लेकर बनी फिल्म वे हिंदी भाषी तक पहुँच पाए । ये उनकी कृति को सकारात्मक परिणाम ही देगा।

atul sharma said...

अच्छा लिखा है 👍

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