अपने धर्म के नाम पर जौहर करके इतिहास में अमरत्व पाने वाली महारानी पद्मावती के नाम पर चल रहे प्रहसन का अंतिम परदा उठ रहा है।
आम तौर पर जब कोई प्रहसन अपने अंतिम पड़ाव पर पंहुचता है, तो उसकी टीम के सदस्य एक साथ मंच पर आकर उन दर्शकों का शुक्रिया अदा करते हैं, जो तालियों की गूंज से प्रहसन की तारीफ में अपनी कुर्सियां छोड़ खड़े हो जाते हैं। पद्मावती के नाम पर हुए इस प्रहसन में तो ये मुमकिन ही नहीं है कि इसके सारे किरदार कभी एक मंच पर आते और अपने अपने गुनाहों के लिए उन दर्शकों से माफी की गुहार लगाते, जिनके जज्बातों को जमकर छला गया।
पद्मावत का असली गुनाहगार किसे माना जाए? संजय लीला भंसाली, जो इतिहास के पन्नों में सिमटी एक गाथा को परदे पर लाने के नाम पर ये मजमा इकट्ठा कर बैठे, जहां सिनेमा से ज्यादा एक समुदाय के जज्बातों के साथ जी भरकर खेलने की कवायद की गई। क्या असली गुनाहगार सेना के नाम से जुड़े उस संगठन के आकाओं को माना जाए, जो अपनी ही महारानी के सम्मान के नाम पर देश के सम्मान को पैरों तले कुचलने में तनिक भी संकोच नहीं कर पाए। क्या पद्मावती के असली गुनाहगारों का असली चेहरा देश की सियासत का वो खौफनाक चेहरा माना जाए, जिसके लिए एक सिनेमा और एक महारानी के सम्मान से ज्यादा वोटों की लालसा नजर आती है या असली गुनाहगार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला वो माध्यम है, जिसके लिए हिंसा और क्रूरता का हर मंजर टीआरपी के खेल से ज्यादा कुछ नहीं होता।
सवाल बहुत सीधा है कि कौन है पद्मावती का असली गुनाहगार? गुनाहगारों की फेहरिस्त में आए ये सभी तंत्र अपने अपने तर्कों के साथ खुद को बेगुनाह ठहराने की कोई कोशिश भी नहीं करेंगे। गुनाहों की इस दलदल में इन सबने अपना अपना खेल खेला है और खेल इतना खौफनाक, जहां भीड़तंत्र उस लोकतंत्र के चेहरे को रौंदे चला गया। इस भीड़तंत्र को कभी एक फिल्मकार १७० करोड़ के तमाशे के नाम पर हांकने की कोशिश करता है, तो कभी इस तमाशे में साझेदार एक कारोबारी घराना दौलत कमाने की लालसा में इतिहास के नाम पर देश की मान मर्यादा का हनन करने में गुरेज नहीं करता। इस भीड़तंत्र को समाज की अस्मिता के नाम से डराने धमकाने वाले ये निजी संगठन, जिनकी ठेकेदारी सियासत के गलियारों से होकर गुजरती है और सियासत की सत्ता की कमान थामने वालों की वो मानसिकता, जो वोट के लालच के आगे सब कुछ स्वाहा करने पर आमादा हो जाती है।
कितनी विचित्र बात है कि देश की सबसे बड़ी अदालत को फरमान जारी करना पड़ता है कि सरकारी मशीनरी एक फिल्म को रिलीज करने का इंतजाम करे और सरकारी मशीनरी का हर पुर्जा अदालती आदेश के परखच्चे उड़ाने के लिए रास्ते निकालता है। जिस किसी ने भी सोचा होगा कि पद्मावती के नाम पर हो रहा तमाशा एक अदालती आदेश का मोहताज बनेगा, उसकी समझ तो किसी चुटकले से ज्यादा अहमियत नहीं रह जाती। अगर कोई मान बैठा था कि सेंसर बोर्ड के एक परचे (सार्टिफिकेट) मात्र से एक फिल्म के सिनेमाघरों तक पंहुचने का रास्ता साफ हो जाएगा, तो ये एक और चुटकला बनकर रह जाता है।
दरअसल पद्मावती के नाम पर हुए इस तमाशे के दो छोर बहुत साफ तौर पर एक घराने के मुखिया से शुरु होकर देश के मुखिया की सियासत पर जाकर जुड़ जाते हैं। दुनिया के सबसे अमीर घरानों में नाम दर्ज कराने वाली शख्सियत के लिए १७० करोड़ की रकम देश के सम्मान से ज्यादा अहम नही होती, अगर इसके तार सियासी खेल के सबसे दूसरे सबसे बड़े खिलाड़ी के दरबार तक नही पंहुचते। क्या किसी ने गौर किया कि पद्मावती के नाम पर हुए तमाशे में ये दोनों छोर खामोशी के साथ अपना अपना दांव चलते रहे। एक मामूली निजी संगठन को आगे करके इस शतरंज की बिसात पर हर वो चाल खेली गई, जो अपने अपने फायदे के लिए चली जाती है। देश की सर्वोच्च सत्ता के मुखिया का मुंह खुलता, तो ये खेल चौपट हो जाता। धर्म और समाज के नाम पर रातोंरात चमकने वाले ये संगठन यूं ही आगे नहीं किए जाते। इनकी बागडोर संभालने वाले बखूबी जानते हैं कि कब किसे क्या चाल चलनी है और कैसे शह और मात के नाम पर उस आम आदमी को ठगा जाता है, जो इन सत्ताधीशों के खेल को कभी समझने की कोशिश नहीं करता।
वरना कैसे मुमकिन होता है कि एक निजी सेना के लोग संसद और सर्वोच्च अदालत को आग लगाने की धमकी दें और सत्ताधारी दलों के नेताओं की फौज इसे मामूली बात कहकर खारिज कर दें और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिंसा का वो तांडव करने की छूट दे दे, जहां विश्व का सबसे पुराना और ताकतवर लोकतंत्र शर्मसार होता रहे और तमाशा होता रहे।
गलती किसी एक की नहीं मानी जा सकती। किसी एक को गुनाहगार ठहराने से दूसरे के गुनाहों को कमत्तर नहीं किया जा सकता। पद्मावती के नाम पर इस घिनौने खेल में हर मोहरा उतना ही बड़ा गुनाहगार है, जितना गुनाह देश के सियासती मुखिया की खामोशी है। जितनी गुनाहगार एक फिल्मकार की वो हसरत है, जो इतिहास के साथ जुड़े सामाजिक सरोकारों को सिनेमैटिक लिबर्टी के नाम पर ठगने और बिगाड़ने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान ले। खबरों की दुनिया के सूरमाओं की गुनाहगारी को कैसे कम करके आंका जा सकता है, जो आगे के हवाले हो चुके सिनेमाघरों की खाक से लेकर बच्चों की स्कूली बसों को निशाना बनाने की हरकतों को सिर्फ अपनी टीआरपी के खेल के आगे कुछ नहीं समझ पाए।
जिस इतिहास और धार्मिक जज्बातों के नाम पर ये तमाशा हुआ, उसी इतिहास में ये भी दर्ज है कि जब जब भीड़तंत्र को लोकतंत्र के नाम पर आगे लाया गया, उसने इतिहास को शर्मसार किया और इंसानियत के मुंह पर अधर्म की कालिख पोती। ये पहले भी होता रहा है और आगे नहीं होगा, ऐसा ख्याल भी मत लाइए। सत्ता के गलियारों के मठाधीश इसी खेल में तो वोटों की सियासत का इंतजाम करते हैं। चुनाव जीतने की ललक और सत्ता पर काबिज रहने की सनक के आगे पद्मावती के सम्मान के नाम पर अपमान की आग में धकेलने का काम ही सियासतदारों का असली खेल बन जाता है और ये बना रहेगा।
महारानी पद्मावती ने अपने धर्म के नाम पर खुद को आग के हवाले किया था और यहां उनके सम्मान के नाम पर सिनेमाघरों को आग के हवाले किया जा रहा है। कौन किसको रोके और सबसे बड़ा सवाल कि क्यों रोके। अगर रोकना ही होता, तो सियासत के गलियारों का असली खेल कैसे आगे बढ़ता।
माफ करना महारानी। आपका गुनाहगार न तो एक फिल्मकार है, न ही कोई कारोबारी घराना। न मीडिया और न ही ये निजी संगठन। आपके सम्मान के साथ छलावा करने का गुनाह उस भीड़तंत्र और लोकतंत्र का वो घालमेल है, जिसने सियासत के मैदान में देश के सम्मान को हर बार छला है। सत्ता और समाज का ये बदनुमा चेहरा एक महारानी के त्याग और कुर्बानी को समझने की ताकत नहीं रखता। ये मुखौटा किसी फिल्म के नाम पर सिनेमाघरों को आग के हवाले कर सकता है। बच्चों की स्कूली बसों पर पत्थर बरसाने में शर्म महसूस नहीं करता।
लोकतंत्र के नाम पर भी़ड़तंत्र का ये स्वांग जिस आग में सिनेमाघरों के परदों को खाक में मिलाने को अपनी जीत मानता है, उस आग में ही महारानी पद्मावती का सम्मान भी स्वाहा हो गया और इस तमाशे को बेबसी से देखने वाला हर शख्स अपनी हार महसूस करेगा और मन ही मन इतना ही कह पाएगा- माफ करना महारानी, हम सब आपके गुनाहगार हैं....
