Monday, November 20, 2017

हाल-ए-पद्मावती : अंधों के शहर में आईना...


पद्मावती का मामला उस मोड़ पर पंहुच चुका है, जहां से अब किसी के लिए यू टर्न की गुंजाइश नहीं बचती। इसके आगे क्या होगा, ये समझना मुश्किल नहीं, लेकिन कैसे होगा, ये देखने वाली होगी। 1 दिसंबर से रिलीज डेट को आगे ले जाने का फैसले ने पद्मावती के नाम पर हो रहे इस खेल से जुड़े खिलाड़ियों को एक प्लेटफार्म पर ला खड़ा किया है। अब तक खुले मैदान में नजर आ रहे खिलाड़ी परदे के पीछे सौदेबाजी में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा पाने की कोशिश करेंगे।

इन खिलाड़ियों में दूध का धुला कोई नहीं है। अपने अपने फायदे के लिए एक फिल्मकार से लेकर दिल्ली की सत्ता और राजपूत महारानी के सम्मान के नाम पर कानून के परखच्चे उड़ाने वाले मर्दों के संगठन ने अपने अपने घिनौने किस्म के खेल खेले। भंसाली को ये बवाल इसलिए चाहिए था, क्योंकि उनके मुंह में खून लग चुका है। वे सिनेमाटिक लिबर्टी के नाम पर वे किरदारों को तोड़-मरोड़ने का लाइसेंस पा चुके हैं। देवदास में चंदा और पारो को साथ नचवाया, तो बाजीराव मस्तानी में मस्तानी-काशीबाई को साथ नचवा दिया। 

पद्मावती के नाम पर 170 करोड़ से ज्यादा का दांव खेलने वाले कारपोरेट घराने वायकाम 18 को ये मुफीद लगा कि फिल्म को लेकर स्टंटबाजी की जाए, तो प्रमोशन के लिए बजट में ज्यादा रकम खर्च नहीं होगी। यही सोचकर ये बात लीक कराई गई कि फिल्म में पद्मावती और खिलजी के बीच ड्रीम सिक्वेंस के नाम पर रोमांटिक गाना होगा। ऐसी लीक की हुई धांसू खबरों पर मसालेदार खबरों के भूखे मीडिया को खेलने का मौका मिलता है। किसको पता था कि जिसे प्लास्टिक सांप समझकर गले में डालने का प्रपंच रचा गया है, वो सांप हर किसी को डसने के लिए लपकेगा।

इस खेल के तीसरे किरदार में करणी सेना नाम का संगठन इस साल जनवरी में तब सुर्खियों में आया, जब जयपुर में भंसाली पर हाथ उठाने की हरकत को राजपूती आन-बान और शान से जोड़कर एक ऐसी सड़क तैयार की गई, जिस पर दौड़ना इस सेना के शूरवीरों के लिए मुश्किल नहीं था। करणी सेना ने यूं ही भंसाली के साथ मारपीट वाला सीन नहीं किया था। इस सीन की बागडोर जयपुर की सत्ता के केंद्र में थी, जो राजपूती संवेदनाओं के नाम पर राज्य की बदतर होती हालत से ध्यान हटाना चाहती थी। सत्ता राज्य की हो या केंद्र की, इस तरह के खेल खेलने में करणी सेना जैसे संगठन इनकी जेबों में होते हैं।

पद्मावती के नाम पर ये खेल रुक जाता, अगर इसमें शामिल खिलाड़ियों को अपना अपना फायदा नजर नहीं आता। भंसाली को इस फिल्म की पब्लिसिटी और स्टंटबाजी का मामला फिल्म के रिलीज तक खिंचना था, तो वे लगातार ऐसी हरकतें करते रहे। कभी करणी सेना के लोगों के साथ समझौते का खेल हुआ, तो कभी फिल्म के सेट पर आग लगने के हादसे हुए। इस दौर में जहां, सारी बड़ी फिल्मों के पहले बीमा करा लिए जाते हैं, वहां आगजनी जैसे हादसे बहुत मायने नहीं रखते। करणी सेना के नेता इस गुमान में जीते रहे कि जब फिल्म बन जाएगी, तो उनके साथ हुए समझौते का पालन करते हुए भंसाली सेंसर बोर्ड से पहले उनके दरबार में हाजिरी लगाएंगे। उनको नहीं मालूम था कि भंसाली के लिए ऐसे समझौते करना और भूल जाना कितनी छोटी बात होती है। भंसाली और वायकॉम 18 के सूरमाओं की टीम इस मिशन में कामयाब रही कि जनवरी से नवंबर के बीच वे पद्मावती को खबरों के बीच बनाए रखने में कामयाब रहे।

दिसंबर की पहली तारीख को पद्मावती को रिलीज करने का एलान हुआ, तो तय हुआ कि जनवरी में हुए हंगामे का अब पार्ट 2 शुरु होगा। पद्मावती के 1 दिसंबर को रिलीज होने के एलान से इस महीने में रिलीज होने वाली फिल्मों में मची भगदड़ से तो भंसाली का कोई वास्ता नहीं था। भंसाली और वायकॉम 18 जहां मात खा गए, वो था गुजरात के विधानसभा चुनावों का गणित, जिसके समीकरणों ने इस खेल को अपने हाथों में ऐसा लपका कि भंसाली और वायकाम 18 के लोग मुंह ताकते रह गए। राजस्थान में करणी सेना सहित भाजपा शासित राज्यों में राजपूती शान को लेकर संगठनों को हवा दी गई। गुजरात के विधानसभा चुनावों के साथ उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर दिल्ली दरबार की टेंशन को पद्मावती के विरोध का ऐसा मंत्र मिल गया था, जिसमें राजपूती समाज के वोटों को अपने साथ रखने की कवायद होनी थी। इस कवायद के लिए दिल्ली दरबार की सत्ता एक पद्मावती, तो क्या किसी भी फिल्म की बलि चढ़ाने में गुरेज न करे।

भंसाली और वायकॉम 18 के हाथों से मामला निकल चुका था, लेकिन दोनों इसे लेकर खुश हो रहे थे कि विवाद बढ़ने से मीडिया के प्रमोशन बजट की रकम में कटौती हो गई। सुर्खियों के सरताज बने खबरिया चैनल तो दिन-रात पद्मावती के प्रोमोज चलाकर फोकट में भंसाली एंड कंपनी का काम आसान कर रहे थे। उधर, दिल्ली की सत्ता किसी भी कीमत पर नहीं चाहती थी कि पद्मावती के विरोध के नाम पर आगे आए विरोधियों का जोश जरा भी कम पड़े। इसके लिए हर राज्य में नेटवर्क का इस्तेमाल हुआ और पद्मावती के विरोध का मिशन हर उस राज्य में हिट होने लगा, जहां दिल्ली दरबार की सत्ता की शाखा थी और इन शाखाओं में मीडिया के नाम पर वही हो रहा था, जो दिल्ली दरबार चाहता था।

दिल्ली की सत्ता की चिंता न तो दीपिका की नाक हो सकती है, ना उन पर एसिड अटैक और सर काटने जैसी धमकियां हो सकती है और न ही भंसाली को दी गईं धमकियां। इन धमकियों का सच तो सिर्फ इतना है कि हर राज्य के सत्ताधीश नेता इन धमकियों को राजपूती संवेदनाओं से जोड़कर खींसे निपोरते रहे, क्योंकि यही करने के लिए उनको दिल्ली से आदेश हुआ था। दिल्ली की सत्ता को किसी दीपिका या भंसाली या वायकाम 18 या करणी सेना की नहीं, सबसे ज्यादा गुजरात के चुनावों की टेंशन रही और इस टेंशन में राजपूतों के लाखों वोटों को पाने का रास्ता पद्मावती से मिला, तो इसे लपकने में सत्ताधारी पार्टी कैसे पीछे रहती। गुजरात के चुनावों में मोदी की अपनी साख दांव पर है, तो यूपी के लोकल चुनावों में योगी की इज्जत पर दांव है। पद्मावती के इस खेल ने दोनों राज्यों के चुनावों में दिल्ली की सत्ता को क्या दिया और क्या छिन लिया, ये वोटों की गिनती के दिन पता चलेगा। यकीन रखिए, इन वोटों की गिनती के अगले दिन पद्मावती जैसी कोई समस्या नहीं रहने वाली।

चुनावों के वोट पड़ते ही करणी सेना इस बात पर खुश हो जाएगी कि उन्होंने भंसाली को झुका दिया और भंसाली इसलिए खुश हो जाएंगे कि उन्होंने राजपूती सम्मान के लिए समझौता कर लिया। वायकाम 18 को इतने भयंकर प्रचार के बाद पद्मावती से इतनी कमाई हो जाएगी, जो वे चाहते हैं।

इस खेल में एक और खिलाड़ी का जिक्र होना लाजिमी है। पहलाज ने जब सेंसर बोर्ड का दामन छोड़ा था, तो कई लोग इस गलतफहमी का शिकार हो गए थे कि प्रसून जोशी नाम का गीतकार इस सरकारी भोंपू के सुर बदलने का काम करेगा। लोग भूल गए थे कि पहलाज हों या प्रसून, सरकारी मेहरबानी से मिली कुर्सियों पर सवारी करने के बाद अपनी अक्ल लगाने की जगह दिल्ली दरबार के आदेशों का पालन करना ही समझदारी माना जाता है। पद्मावती के इस पूरे प्रपंच में प्रसून महाराज के सेंसर बोर्ड ने वही किरदार निभाया, जो दिल्ली से तय हुआ था। बोर्ड की कानूनों की किताबों में नियमों के नाम पर इतना कुछ लिखा हुआ है कि किसी फिल्म को लटकाना और अटकाना बोर्ड के लिए कुछ मुश्किल नहीं। जिन लोगों को लगता है कि पद्मावती के नाम पर सेंसर बोर्ड की इज्जत कम हुई, वे नहीं समझते होंगे कि सियासत की मेहरबानियों में सरकारी महकमे और सरकारी पदों की इज्जत दिल्ली की तिजोरियों में महफूज रखी जाती है।

पद्मावती से किसे क्या मिला? दिल्ली दरबार की सत्ता को रास्ता मिला कि इतिहास के नाम पर बनी फिल्मों को किस तरह से चुनावी समर में इस्तेमाल किया जा सकता है। करणी सेना को रास्ता मिला कि एक महिला के सम्मान के नाम पर महिला के नाक काटने और सर काटने जैसी धमकियों के बाद सियासत से शाबासी मिल सकती है। सेंसर बोर्ड के प्रधान जी प्रसून जोशी ने दिल्ली दरबार के सेवक होने का फर्ज निभा दिया और वायकाम 18 ने पद्मावती के नाम पर तिजोरी भरने का इंतजाम कर लिया। भंसाली ने साबित किया है कि सिर्फ उनके नाम में लीला (जो उनकी मां का नाम है) लगा हुआ है और फिल्मों के नाम पर वे भयंकर लीलाएं करने में चैंपियन हो चुके हैं।

रहा पद्मावती नाम की फिल्म की बात, उसके नाम पर ही हर किसी ने अपनी दुकान जमाई और चलाई है।पद्मावती का एक और सच ये है कि सियासत के गलियारों में क्रिएटिवटी और फिल्म मेकिंग की फ्रीडम की दलीलें देने वाले वही काम करते हैं, जो चाय की दुकान पर बीयर पीने की तलब रखने वाला कर सकता है। सियासत की फ्रीडम के आगे फिल्मी फ्रीडम की न तो कभी चली है और न कभी चलेगी। बालीवुड वालों के लिए एक ही रास्ता बचा है कि मसालेदार फिल्में बनाओ। फिल्में बनाने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटा, तो दिल्ली की सत्ता वही करेगी, तो  पद्मावती का हुआ है या हो रहा है या होगा..

हाल-ए-पद्मावती पर पुरानी एक लाइन याद आ जाती है, जो मरहूम प्रकाश मेहरा ने सुनाई थी- अंधों के शहर में आइने बेचता हूं... । पद्मावती का सबसे कड़वा सच यही तो है.... बस ये न पूछें कि आइना कौन, अंधा कौन और बेचने वाला कौन.... समझदार ये सब नहीं सोचते...

एक आखिरी बात- जहर फैलाते प्रदूषण के मामले पर कड़वी नाम की एक फिल्म बनी है। प्रदूषण से नुकसान कितना भी हो, लेकिन किसी की भावनाएं आहत नहीं होती, वरना सरकार, सेंसर, संगठनों से लेकर मीडिया तक कहीं तो इस फिल्म पर भी कोई बात होती।


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