Sunday, December 24, 2017

T- ट्यूबलाइट, T- टाइगर : एक हार, एक जीत


इस फिल्मी टाइगर की दहाड़ तकरीबन वैसी ही रही, जैसी होनी चाहिए थी। तय हो गया कि इस बार बाक्स आफिस की ट्यूब लाइट जगमग रोशन करेगी।  जरा सोचिए कि ये टाइगर अगर कुछ महीनों पहले ईद के मौके पर दस्तक देता, तो मुमकिन था कि सलमान खान को ट्यूब लाइट के उन अंधरों से नहीं गुजरना होता, जिनसे गुजरने के बाद उनके लिए टाइगर जिंदा है की अहमियत बढ़ी।

टाइगर जिंदा है को मिली कामयाबी इस मायने में सबसे अहम हो जाती है कि सलमान खान उस ट्रैक पर लौट आए, जिस ट्रैक पर कई सालों से उनकी फिल्में बाक्स आफिस और उनके फैंस को खुशनुमा बनाती रही हैं। ईद पर आई ट्यूबलाइट सलमान खान को उस खोल से बाहर आने के लिए एक मौका भर थी, जहां वे अपनी मसाला फिल्मों से अलग बतौर कलाकार कुछ ऐसा करें, जहां उनके सिक्स पैक या एक्शन नहीं, उनकी अदायगी की बात हो। अगर सलमान खान ये मौका चूक गए, तो इसके लिए वे अकेले जिम्मेदार नहीं, बल्कि निर्देशक कबीर खान और टीम भी जिम्मेदार है।

अब जरा एक पल के लिए सोचकर देखिए कि अगर बाक्स आफिस पर ट्यूबलाइट की बत्ती जल उठती, तो फिर टाइगर के लिए उम्मीदों का सबब कुछ और होता। मुमकिन था कि सलमान से परफारमेंस की उम्मीद की जाने लगती। इस लिहाज से देखा जाए, तो सबसे पहले सलमान के फैंस का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिन्होंने ट्यूबलाइट की बत्ती बुझाकर खान सितारे को उसी रास्ते पर वापस जाने का रास्ता दिखा दिया, जहां मसालों की कमी नहीं होती और अदायगी की संभावना नहीं रहती। ट्यूबलाइट इसी लिहाज से कमजोर फिल्म मानी गई, क्योंकि ये सलमान स्टाइल की फिल्म नहीं थी और टाइगर जिंदा है की गूंज इसलिए हुई, क्योंकि ये सलमान स्टाइल की फिल्म है। ये दोनों फिल्में स्टार सलमान और कलाकार सलमान के उस अंतर को रेखांकित करती हैं, जो ट्यूबलाइट को फ्लाप और टाइगर को सुपर हिट की श्रेणी में पंहुचा देता है।

इसके लिए सलमान खान का साधुवाद भी होना चाहिए कि उन्होंने ट्यूबलाइट के साथ आए अपने फैंस के संदेश को सुना, समझा और उस पर अमल किया। अगर वे एक और ट्यूबलाइट जैसी कोशिश में लग जाते, तो न जाने उनके स्टारडम का क्या होता। यहां मार्के की बात ये भी है कि टाइगर जिंदा है को बनाने का फैसला ट्यूबलाइट के नतीजे सामने आने के बाद नहीं हुआ था। जब ट्यूबलाइट रिलीज हुई, तो टाइगर जिंदा है का आधा सफर तय हो चुका था। ट्यूबलाइट के बाद टाइगर की टीम को यही टास्क मिला कि मसालों की डोज बढ़ाई जाए और टीम टाइगर अपने इस मिशन में कामयाब रही। सलमान के चाहने वालों ने इस कामयाबी पर अपनी रजामंदी की मुहर लगा दी।

टाइगर को मिली कामयाबी ने एक अहम काम ये किया कि अब कई सालों तक सलमान की किसी फिल्म के लिए स्टोरी, कैरेक्टर या कुछ और सोचने की जेहमत नहीं उठानी होगी। सलमान फिल्म, मतलब मसाले और मसालों के बारे में सोचने या समझने की कोई जरुरत नहीं है। इसे अन्यथा लेने की जरुरत नहीं है। सलमान ने भले ही फिल्मों मेंं तकरीबन 30 साल का सफर कर लिया है, लेकिन पिछले दस सालों में उनकी मसालेदार फिल्मों ने जिस तरह से उनके सुपरस्टारडम को मजबूती दी है, उसे किसी भी सूरत में नकारा नहीं जा सकता और ट्यूबलाइट का झटका खाने के बाद अगर सलमान अपने स्टारडम को बचाने के लिए टाइगर में मसालों की डोज बढ़ाते हैं, तो ये बात भी समझ में आ जाती है।

ये बात ट्यूबलाइट के फौरन बाद उसी वक्त समझ में आ गई थी, जब  सलमान ने रिमो डिसूजा की उस फिल्म को रोक दिया था, जिसमें वे एक 12 साल की बच्ची के विधुर पिता की संवेदनशील भूमिका में काम करने के लिए राजी हो चुके थे। ट्यूबलाइट के बाद सलमान के लिए ऐसी गैरमसालेदार फिल्म में एक और रिस्क लेना खतरे से खाली नहीं था, इसलिए इसे रोककर इसके निर्देशक को मुआवजे के तौर पर सलमान ने रेस 3 का डायरेक्टर बना दिया। अगली ईद पर आने वाली रेस 3 भी टाइगर मार्के की मसालेदार फिल्म होगी और इस बार सलमान के फैंस को वही ईदी मिलेगी, जो उनको चाहिए।

ट्यूबलाइट भी फिल्म थी और टाइगर भी फिल्म है। सलमान खान दोनों फिल्मों में नायक बने। ट्यूबलाइट में सलमान परदे पर रोए, तो वे खारिज हो गए। टाइगर में वे टाइगर की तरह दहाड़े, तो उनके फैंस गदगद हो गए। टाइगर जीत गया। उनके फैंस खुश हो गए। सबका वारा-न्यारा हो गया। एक उम्मीद लंबे समय के लिए नाउम्मीद बन गई कि अब सलमान किसी फिल्म में कहानी, किरदार की टेंशन नहीं लेंगे। स्टार सलमान को एक और कामयाबी मुबारक। एक्टर सलमान खान के लिए इस मसालेदार फिल्मों की दुनिया में अब जल्दी से कोई मौका मिलेगा, इसमें भी शंका है। स्टार सलमान के फैंस की दुनिया जगमग है। एक्टर सलमान का इंतजार न जाने कब खत्म होगा?

आखिरी बात- सौ करोड़ से ज्यादा की कमाई के बाद भी ट्यूबलाइट बाक्स आफिस की जंग जीत जाती है और रिलीज के दो दिनों में 64 करोड़ की कमाई के साथ टाइगर की पताका बाक्स आफिस पर फहरती नजर आती है। इन दो फिल्मों के बीच एक स्टार और एक एक्टर के होने के अंतर को समझा जा सकता है।



Monday, November 20, 2017

हाल-ए-पद्मावती : अंधों के शहर में आईना...


पद्मावती का मामला उस मोड़ पर पंहुच चुका है, जहां से अब किसी के लिए यू टर्न की गुंजाइश नहीं बचती। इसके आगे क्या होगा, ये समझना मुश्किल नहीं, लेकिन कैसे होगा, ये देखने वाली होगी। 1 दिसंबर से रिलीज डेट को आगे ले जाने का फैसले ने पद्मावती के नाम पर हो रहे इस खेल से जुड़े खिलाड़ियों को एक प्लेटफार्म पर ला खड़ा किया है। अब तक खुले मैदान में नजर आ रहे खिलाड़ी परदे के पीछे सौदेबाजी में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा पाने की कोशिश करेंगे।

इन खिलाड़ियों में दूध का धुला कोई नहीं है। अपने अपने फायदे के लिए एक फिल्मकार से लेकर दिल्ली की सत्ता और राजपूत महारानी के सम्मान के नाम पर कानून के परखच्चे उड़ाने वाले मर्दों के संगठन ने अपने अपने घिनौने किस्म के खेल खेले। भंसाली को ये बवाल इसलिए चाहिए था, क्योंकि उनके मुंह में खून लग चुका है। वे सिनेमाटिक लिबर्टी के नाम पर वे किरदारों को तोड़-मरोड़ने का लाइसेंस पा चुके हैं। देवदास में चंदा और पारो को साथ नचवाया, तो बाजीराव मस्तानी में मस्तानी-काशीबाई को साथ नचवा दिया। 

पद्मावती के नाम पर 170 करोड़ से ज्यादा का दांव खेलने वाले कारपोरेट घराने वायकाम 18 को ये मुफीद लगा कि फिल्म को लेकर स्टंटबाजी की जाए, तो प्रमोशन के लिए बजट में ज्यादा रकम खर्च नहीं होगी। यही सोचकर ये बात लीक कराई गई कि फिल्म में पद्मावती और खिलजी के बीच ड्रीम सिक्वेंस के नाम पर रोमांटिक गाना होगा। ऐसी लीक की हुई धांसू खबरों पर मसालेदार खबरों के भूखे मीडिया को खेलने का मौका मिलता है। किसको पता था कि जिसे प्लास्टिक सांप समझकर गले में डालने का प्रपंच रचा गया है, वो सांप हर किसी को डसने के लिए लपकेगा।

इस खेल के तीसरे किरदार में करणी सेना नाम का संगठन इस साल जनवरी में तब सुर्खियों में आया, जब जयपुर में भंसाली पर हाथ उठाने की हरकत को राजपूती आन-बान और शान से जोड़कर एक ऐसी सड़क तैयार की गई, जिस पर दौड़ना इस सेना के शूरवीरों के लिए मुश्किल नहीं था। करणी सेना ने यूं ही भंसाली के साथ मारपीट वाला सीन नहीं किया था। इस सीन की बागडोर जयपुर की सत्ता के केंद्र में थी, जो राजपूती संवेदनाओं के नाम पर राज्य की बदतर होती हालत से ध्यान हटाना चाहती थी। सत्ता राज्य की हो या केंद्र की, इस तरह के खेल खेलने में करणी सेना जैसे संगठन इनकी जेबों में होते हैं।

पद्मावती के नाम पर ये खेल रुक जाता, अगर इसमें शामिल खिलाड़ियों को अपना अपना फायदा नजर नहीं आता। भंसाली को इस फिल्म की पब्लिसिटी और स्टंटबाजी का मामला फिल्म के रिलीज तक खिंचना था, तो वे लगातार ऐसी हरकतें करते रहे। कभी करणी सेना के लोगों के साथ समझौते का खेल हुआ, तो कभी फिल्म के सेट पर आग लगने के हादसे हुए। इस दौर में जहां, सारी बड़ी फिल्मों के पहले बीमा करा लिए जाते हैं, वहां आगजनी जैसे हादसे बहुत मायने नहीं रखते। करणी सेना के नेता इस गुमान में जीते रहे कि जब फिल्म बन जाएगी, तो उनके साथ हुए समझौते का पालन करते हुए भंसाली सेंसर बोर्ड से पहले उनके दरबार में हाजिरी लगाएंगे। उनको नहीं मालूम था कि भंसाली के लिए ऐसे समझौते करना और भूल जाना कितनी छोटी बात होती है। भंसाली और वायकॉम 18 के सूरमाओं की टीम इस मिशन में कामयाब रही कि जनवरी से नवंबर के बीच वे पद्मावती को खबरों के बीच बनाए रखने में कामयाब रहे।

दिसंबर की पहली तारीख को पद्मावती को रिलीज करने का एलान हुआ, तो तय हुआ कि जनवरी में हुए हंगामे का अब पार्ट 2 शुरु होगा। पद्मावती के 1 दिसंबर को रिलीज होने के एलान से इस महीने में रिलीज होने वाली फिल्मों में मची भगदड़ से तो भंसाली का कोई वास्ता नहीं था। भंसाली और वायकॉम 18 जहां मात खा गए, वो था गुजरात के विधानसभा चुनावों का गणित, जिसके समीकरणों ने इस खेल को अपने हाथों में ऐसा लपका कि भंसाली और वायकाम 18 के लोग मुंह ताकते रह गए। राजस्थान में करणी सेना सहित भाजपा शासित राज्यों में राजपूती शान को लेकर संगठनों को हवा दी गई। गुजरात के विधानसभा चुनावों के साथ उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर दिल्ली दरबार की टेंशन को पद्मावती के विरोध का ऐसा मंत्र मिल गया था, जिसमें राजपूती समाज के वोटों को अपने साथ रखने की कवायद होनी थी। इस कवायद के लिए दिल्ली दरबार की सत्ता एक पद्मावती, तो क्या किसी भी फिल्म की बलि चढ़ाने में गुरेज न करे।

भंसाली और वायकॉम 18 के हाथों से मामला निकल चुका था, लेकिन दोनों इसे लेकर खुश हो रहे थे कि विवाद बढ़ने से मीडिया के प्रमोशन बजट की रकम में कटौती हो गई। सुर्खियों के सरताज बने खबरिया चैनल तो दिन-रात पद्मावती के प्रोमोज चलाकर फोकट में भंसाली एंड कंपनी का काम आसान कर रहे थे। उधर, दिल्ली की सत्ता किसी भी कीमत पर नहीं चाहती थी कि पद्मावती के विरोध के नाम पर आगे आए विरोधियों का जोश जरा भी कम पड़े। इसके लिए हर राज्य में नेटवर्क का इस्तेमाल हुआ और पद्मावती के विरोध का मिशन हर उस राज्य में हिट होने लगा, जहां दिल्ली दरबार की सत्ता की शाखा थी और इन शाखाओं में मीडिया के नाम पर वही हो रहा था, जो दिल्ली दरबार चाहता था।

दिल्ली की सत्ता की चिंता न तो दीपिका की नाक हो सकती है, ना उन पर एसिड अटैक और सर काटने जैसी धमकियां हो सकती है और न ही भंसाली को दी गईं धमकियां। इन धमकियों का सच तो सिर्फ इतना है कि हर राज्य के सत्ताधीश नेता इन धमकियों को राजपूती संवेदनाओं से जोड़कर खींसे निपोरते रहे, क्योंकि यही करने के लिए उनको दिल्ली से आदेश हुआ था। दिल्ली की सत्ता को किसी दीपिका या भंसाली या वायकाम 18 या करणी सेना की नहीं, सबसे ज्यादा गुजरात के चुनावों की टेंशन रही और इस टेंशन में राजपूतों के लाखों वोटों को पाने का रास्ता पद्मावती से मिला, तो इसे लपकने में सत्ताधारी पार्टी कैसे पीछे रहती। गुजरात के चुनावों में मोदी की अपनी साख दांव पर है, तो यूपी के लोकल चुनावों में योगी की इज्जत पर दांव है। पद्मावती के इस खेल ने दोनों राज्यों के चुनावों में दिल्ली की सत्ता को क्या दिया और क्या छिन लिया, ये वोटों की गिनती के दिन पता चलेगा। यकीन रखिए, इन वोटों की गिनती के अगले दिन पद्मावती जैसी कोई समस्या नहीं रहने वाली।

चुनावों के वोट पड़ते ही करणी सेना इस बात पर खुश हो जाएगी कि उन्होंने भंसाली को झुका दिया और भंसाली इसलिए खुश हो जाएंगे कि उन्होंने राजपूती सम्मान के लिए समझौता कर लिया। वायकाम 18 को इतने भयंकर प्रचार के बाद पद्मावती से इतनी कमाई हो जाएगी, जो वे चाहते हैं।

इस खेल में एक और खिलाड़ी का जिक्र होना लाजिमी है। पहलाज ने जब सेंसर बोर्ड का दामन छोड़ा था, तो कई लोग इस गलतफहमी का शिकार हो गए थे कि प्रसून जोशी नाम का गीतकार इस सरकारी भोंपू के सुर बदलने का काम करेगा। लोग भूल गए थे कि पहलाज हों या प्रसून, सरकारी मेहरबानी से मिली कुर्सियों पर सवारी करने के बाद अपनी अक्ल लगाने की जगह दिल्ली दरबार के आदेशों का पालन करना ही समझदारी माना जाता है। पद्मावती के इस पूरे प्रपंच में प्रसून महाराज के सेंसर बोर्ड ने वही किरदार निभाया, जो दिल्ली से तय हुआ था। बोर्ड की कानूनों की किताबों में नियमों के नाम पर इतना कुछ लिखा हुआ है कि किसी फिल्म को लटकाना और अटकाना बोर्ड के लिए कुछ मुश्किल नहीं। जिन लोगों को लगता है कि पद्मावती के नाम पर सेंसर बोर्ड की इज्जत कम हुई, वे नहीं समझते होंगे कि सियासत की मेहरबानियों में सरकारी महकमे और सरकारी पदों की इज्जत दिल्ली की तिजोरियों में महफूज रखी जाती है।

पद्मावती से किसे क्या मिला? दिल्ली दरबार की सत्ता को रास्ता मिला कि इतिहास के नाम पर बनी फिल्मों को किस तरह से चुनावी समर में इस्तेमाल किया जा सकता है। करणी सेना को रास्ता मिला कि एक महिला के सम्मान के नाम पर महिला के नाक काटने और सर काटने जैसी धमकियों के बाद सियासत से शाबासी मिल सकती है। सेंसर बोर्ड के प्रधान जी प्रसून जोशी ने दिल्ली दरबार के सेवक होने का फर्ज निभा दिया और वायकाम 18 ने पद्मावती के नाम पर तिजोरी भरने का इंतजाम कर लिया। भंसाली ने साबित किया है कि सिर्फ उनके नाम में लीला (जो उनकी मां का नाम है) लगा हुआ है और फिल्मों के नाम पर वे भयंकर लीलाएं करने में चैंपियन हो चुके हैं।

रहा पद्मावती नाम की फिल्म की बात, उसके नाम पर ही हर किसी ने अपनी दुकान जमाई और चलाई है।पद्मावती का एक और सच ये है कि सियासत के गलियारों में क्रिएटिवटी और फिल्म मेकिंग की फ्रीडम की दलीलें देने वाले वही काम करते हैं, जो चाय की दुकान पर बीयर पीने की तलब रखने वाला कर सकता है। सियासत की फ्रीडम के आगे फिल्मी फ्रीडम की न तो कभी चली है और न कभी चलेगी। बालीवुड वालों के लिए एक ही रास्ता बचा है कि मसालेदार फिल्में बनाओ। फिल्में बनाने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटा, तो दिल्ली की सत्ता वही करेगी, तो  पद्मावती का हुआ है या हो रहा है या होगा..

हाल-ए-पद्मावती पर पुरानी एक लाइन याद आ जाती है, जो मरहूम प्रकाश मेहरा ने सुनाई थी- अंधों के शहर में आइने बेचता हूं... । पद्मावती का सबसे कड़वा सच यही तो है.... बस ये न पूछें कि आइना कौन, अंधा कौन और बेचने वाला कौन.... समझदार ये सब नहीं सोचते...

एक आखिरी बात- जहर फैलाते प्रदूषण के मामले पर कड़वी नाम की एक फिल्म बनी है। प्रदूषण से नुकसान कितना भी हो, लेकिन किसी की भावनाएं आहत नहीं होती, वरना सरकार, सेंसर, संगठनों से लेकर मीडिया तक कहीं तो इस फिल्म पर भी कोई बात होती।


Tuesday, September 12, 2017

हैलो सिमरन....



सिमरन, तुम परदे पर आने के लिए तैयार हो। हंसल मेहता के निर्देशन ने और फिल्म की अतिरिक्त लेखिका  के लेखन ने तुमको किस रुप में ढाला है, ये समझने और समझाने का वक्त अब बहुत दूर नहीं बचा है।


सिमरन, तुमको ये तो एहसास होगा कि तुमको कैमरे के सामने और पीछे तुमको सिमरन बनाने में कितनी मेहनत की गई, लेकिन क्या तुम जानती हो, रिलीज से पहले तुम्हारे नाम पर प्रचार के लिए किस कदर मेहनत की गई?

सिमरन, तुम्हारे साथ न तो किसी खान सितारे का नाम था और न किसी बड़े कारपोरेट घराने का नाम था, वरना तुम्हारे प्रमोशन पर लाखों-करोड़ो का बजट बनाता और शहर-दर-शहर और सीरियलों-गेम शोज और न जाने कहां कहां विचरण करने की रस्मों को निभाया जाता।

सिमरन, तुम जैसे छोटे किरदारों के साथ बनने वाली फिल्मों को प्रमोशन के लिए भी अलग रास्ते खोजने पड़ते हैं। इन रास्तों पर ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता। बस एक कोई मीडिया हाउस की अदालत हो, जहां एक पत्रकार जज की कुर्सी संभालें और दूसरे पत्रकार उन सवालों के बम फोड़ें, जिनसे इस कोर्ट में तालियां बजानेवाले और टीआरपी के गेम में माल बंटोरने का मामला फिट हो जाए।

सिमरन, रही बात तुम्हारी, तो तुम्हारा इस चैनल की अदालत से क्या लेना-देना। यहां तो उन किस्सों की कब्र खोदनी थी, जिनसे टीआरपी के खेल होते हैं। उस अदालत में कहीं सिमरन के किरदार का जिक्र भी हो तो याद करना और याद दिलाना...

सिमरन, तुमको फिर भी इस चैनल की कोर्ट का अभारी होना चाहिए, जिसने विवादों के पिटारे खोलकर दूसरे मीडियावालों को नींद से जगा दिया और उन मीडिया वालों को भी थैंक यू, जिन्होंने याद रखा कि सिमरन एक फिल्म का भी नाम है, जो अब रिलीज होने वाली है।

सिमरन, शुक्र मनाओ कि इन मीडिया वालों की बदौलत प्रेमकथाओं की गाथाओं के साथ तुम्हारा प्रचार तो हो गया.... और सोचो कि अगर ये प्रेम के अधूरे किस्से न होते, तो तुम्हारा प्रचार कैसे होता... कौन देता तुमको अहमियत...

सिमरन, तुमको कंफ्यूज होने की कोई जरुरत नही कि प्रचार की जरुरत तुमको थी या इस चैनल पर लक्ष्मीबाई घोषित की जा चुकी एक ऐसी बेबाक अदाकारा को, जिसने कभी किसी के साथ गलत नही किया और कभी किसी ने उसके साथ कुछ सही होने नहीं दिया।

सिमरन, तुम तो सोच भी नहीं सकती हो, जब एक स्ट्रलगर लड़की, जिसका फिल्म लाइन में अपना कोई गॉड फादर नहीं होता, तो उसे कैसे अपनी उम्र से छोटी लड़की के पापा से अफेयर करना कितना जरुरी हो जाता है, ताकि उसकी उंगली थामकर अपने कैरिअर को आगे बढ़ाने का रास्ता खोजा जाए। उसके दिए हुए मकान मे रहने से लेकर उसकी पत्नी के महंगे गिफ्ट कबूलने में क्या लिहाज। दुनिया भर में उत्पात मचाने वाला सितारा मुंबई पुलिस की लता़ड़ से सहमकर भीरू न बनता, तो सोचो, न जाने क्या क्या जुल्म करता...

सिमरन, तुमको एहसास भी नहीं होगा कि एक गैर फिल्मी परिवार से आई लड़की को फिल्म इंडस्ट्री में क्या क्या करना पड़ता है। अफेयर नंबर वन के बाद एक टीवी के सितारे के बेेटे से  अफेयर नंबर टू में भी कोई बुराई नहीं। अफेयर के बाद भी वो स्टार नहीं बना, तो उसे झटकने की समझदारी भी जरुरी हो जाती है। किसी फ्लाप हीरो को अपने साथ लटकाने में कोई फायदा नहीं, ये समझने के लिए फिल्मी या गैर फिल्मी परिवार से होने की अनिवार्यता नहीं होती।

सिमरन, अब ये सुनकर प्लीज, आंखे मत फाड़ो कि दो-दो रिलेशनशिप के बुरे नतीजों के बाद एक नई ट्राई करने में कानूनन मनाही नहीं है। हीरो बड़ा स्टार हो और ये भी शादीशुदा हो (हाय री किस्मत), बाल बच्चों वाला हो और मोबाइल के इस जमाने में ईमेल-ईमेल का खेल खेले, तो क्या हुआ... डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत नहीं सुनी क्या. ये तो तिनका नहीं, पूरा जहाज था... अफेयर के बदले फिल्म में काम देता रहा.. बर्थ डे पार्टी में  फ्लोर पर लोटपोट कर नागिन डांस करता रहा....एक और फिल्म में कास्ट किया... फिल्म नहीं चली, तो सालों बाद फिर एक नई फिल्म में कास्ट किया...और एक दिन दुनिया को पता चलता है कि वो सिली एक्स है....

सिमरन, क्या बताएं इस सत्यानासी फिल्म इंडस्ट्री का, जहां बिगड़े बाप के बिगड़ैल बेेटे अक्सर अपने स्टारडम के नशे में मासूम लड़कियों के साथ प्यार के नाम पर खेल खेलते हैं... गैर फिल्मी परिवार से आई लड़कियां तो आसानी से उनके जाल में फंस जाती है और फिर वो स्टार उनके प्यार को बदनाम करता है और रास्ता भी बदल लेता है... डियर सिमरन, ये किसी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं, ये एक सत्यकथा है, जिसे सुनकर किसी को भी सहानुभूति तो होगी ना...
     
सिमरन, क्या तुम नहीं जानती हो कि महिला आयोग बिकाऊ होता है... यहां कि महिलाएं फिल्म इंडस्ट्री के बड़े लोगों से दोस्ती के चलते एक जरुरतमंद लड़की की मदद नहीं करतीं... (छि) .... लेकिन जब सवाल होता है कि क्या महिला आयोग में कोई लिखित में शिकायत की गई, तो मामला आंय बांय शांय.. हो जाता है। मोहरतमा गैर फिल्मी परिवार की थीं, इसलिए इल्म नहीं होगा कि महिला आयोग कोई टीवी की अदालत नहीं होती, जहां सिर्फ लफ्फाजी से सब कुछ फिट हो जाए। आयोग में लिखित में शिकायत और सबूत जमा कराने पड़ते हैं... ताकि आयोग एक्शन ले सके...

सिमरन, तुमको फरवरी याद होगा, जब एक बड़ी फिल्म रिलीज होने वाली थी और इसके लिए बड़े सामान्य तरीके से मीडिया के साथ प्रमोशनल इंटरव्यू हुए और बड़ी सहजता के साथ मीडिया को बताया गया था कि अतीत को भूलकर अब आगे बढ़ने का वक्त आ गया है। बुरा बस ये हुआ कि बाक्स आफिस पर बेरंगी हुई फिल्म ने सत्यानाश कर दिया। 

सिमरन, तुमको अप्रैल की याद तो होगी।। जब गंगा घाट किनारे मीडिया के हुजूम के सामने एक भव्य फिल्म का मुहूर्त हुआ था और उस मौके पर भी सिली एक्स की बातों को अनदेखा किया गया था। सिमरन, कुछ तो याद रखा करो.. 

सिमरन, अब तो तुमको समझ में आ गया होगा कि फिल्मी परदे के लिए कहानी और किरदार गढ़ना कितना आसान होता है, लेकिन उसके लिए प्रमोशन करना कितना मुश्किल होता है। कितना कुछ कहना पड़ता है। कितना कुछ करना पड़ता है। ये सब करना पड़ता है सिमरन... 

सिमरन, बस और दो-तीन दिन की बात है। फिर तुमको भूलना होगा कि कौन सी अदालत, कौन से शर्मा जी, कौन महिला आयोग, कौन स्टार, कौन मुंबई पुलिस और कैसा ईमेल का फंडा.... बोला न करना पडता है। बोलना पड़ता है। 

सिमरन, ये फिल्म इंडस्ट्री है, जहां हर फ्राइ डे को सितारों की तकदीरें तय होती हैं। किसी सितारे की टेंशन तो तुम नही समझोगी, जिसकी पिछली फिल्म को बाक्स आफिस पर बुरी तरह से मार खानी पड़ी हो, तो कितना मुश्किल हो जाता है। 

सिमरन, तुम महज एक किरदार हो ना, बस किरदार ही रहो। किसी हीरोइन की जिंदगी का असली किरदार बनने की कोशिश मत करना... वरना न जाने क्या क्या पता चले कि जगमग दुनिया में रिश्तों के नाम पर रि्ते अक्सर स्याहा हो जाते हैं...

सिमरन, परदे पर आओ और छा जाओ.. तुम्हारे लिए हर तरह से मेहनत की गई है। अब वक्त है कि एक बड़ी स्टार के साथ होने वाले अन्याय की गाथाएं सुनकर हिंदुस्तान और दुनिया के दर्शक सिमरन देखें और ये साबित कर दें कि सहानुभूति का एक फिल्म के प्रमोशन से कोई वास्ता नहीं होता.... वो तो बस यूं ही...

सिमरन, बरसों पहले भी एक सिमरन आई थी फिल्मी परदे पर। वो फिल्म नहीं, एक किरदार का नाम था। न कोई विवाद, न रिश्तों की प्रेम कहानियां। सिमरन आई और दर्शकों के दिलों में बस गई और ऐसी बसी कि अब तक बसी हुई है। उस सिमरन को याद करके इस सिमरन का मामला बिगाड़ने की जरुरत नहीं।

सिमरन, तुम्हारा खेल अगले दो-तीन दिनों में पूरा हो जाएगा। कान करीब लाओ, तो एक राज की बात अभी से बता देते हैं। तुम्हारी किस्मत की लाटरी का मामला फिट हो गया, तो ठीक वरना...अगले साल अप्रैल में एक नए अंदाज में तुम्हारे दीदार होना तय है.... 

शु्क्रिया सिमरन, सिनेमा, स्टारडम, प्यार, अफेयर, मैरिड मैन से अफेयर और सिली एक्स की वो बातें, जो न जाने किस खुराफाती फिल्म वाले को एक और सिमरन की कहानी बनाने का मसाला थमा दे... ऐसा होगा क्या? 

कृप्या ध्यान दें- 
इससे पहले सिमरन के नाम पर हुई धींगामुश्ती को लेकर लिखे ब्लाग को पढकर इस किस्से का एक दूसरा पहलू समझा जा सकता है-

कंगना एक, जंग अनेक
http://anujalankar.blogspot.in/2017/09/blog-post.html









Tuesday, September 5, 2017

कंगना एक, जंग अनेक



ये महिला सशक्तिकरण का दौर है। देश ने रक्षा मंत्री के पद पर एक महिला निर्मला सीतारमण की नियुक्ति का जश्न मनाया। केंद्र की सत्ता की ताकतवर मंत्री के तौर पर स्मृति ईरानी ने एक झटके में बेलगाम सेंसर बोर्ड के चेयरमैन का पत्ता साफ करके देश को एक बड़ी मुसीबत से निजात दिलाने की हिम्मत दिखाई। सियासत से परे देखा जाए, तो सिनेमा की दुनिया की एक वीरांगना को इस दौर की लक्ष्मीबाई कहा जा रहा है, क्योंकि उसने करण जौहर और रितिक रोशन जैसे सितारों की सत्ता को ललकारा है। इस दौर की ये लक्ष्मीबाई दुनिया में कंगना के नाम से जानी-पहचानी जाती है। दुनिया ने देखा कि कैसे एक निजी चैनल की निजी अदालत में अवतरित इस लक्ष्मीबाई ने हिंदी फिल्मों के बड़े बड़े सूरमाओं की खबर ली और जमकर पहले तालियां बंटोरी और अब वे इंसाफ के लिए लड़ रही एक अदना सी लड़की का चेहरा बन चुकी हैं, जिसकी लड़ाई सीधे तौर पर फिल्मों के बड़े लोगों से हो रही है। इस लड़ाई के अंजाम पर अभी तप्सरा करने का सही वक्त नहीं आया है और ये वक्त कब आएगा, इसके लिए भी वक्त का इंतजार ही करना होगा।
कंगना ने उस चैनल के निजी अदालत में किसके लिए क्या कहा, ये दोहराने का कोई मतलब नहीं है। इस अदालत के जज साहब बने हिंदी के एक दिग्गज पत्रकार जब कंगना को इस दौर की लक्ष्मीबाई होने का खिताब दे देते हैं, तो ऐसा लगता है कि सब कुछ तय हो गया है। तय हो गया है कि कंगना के साथ ज्यादती हुई और ज्यादती करने वालों की चुप्पी इस बात का सबूत है कि कंगना ने न्यूज चैनल के कठघरे की आरामदेह कुर्सी पर विराजमान होकर उनको लेकर जो कुछ कहा, वही सत्य वचन है।
इंसाफ का तकाजा है कि अब करण जौहर या रितिक रोशन या कंगना के निशाने पर आए बाकी लोग भी किसी ऐसी ही अदालत की शरण में जाएं और कंगना को कोसें। न्यूज चैनलों की अदालतों में उनका दिल खोलकर स्वागत किया जाएगा। ऐसा होगा और होगा तो कब होगा, ये आने वाले वक्त में पता चलेगा। अगर ऐसा होता है, तो क्या कंगना की अदालत की तरह उन अदालतों के ट्रायल कहीं असलियत के आसपास भी फटकेंगे? इंसाफ का एक रास्ता ये भी हो कि किसी चैनल पर कंगना का मुकाबला पहले रितिक रोशन से, फिर करण जौहर से, फिर आदित्य पंचोली से और फिर अध्यायन सुमन (शेखर सुमन के बेटे, जो एक जमाने में कंगना के घोषित ब्वायफ्रेंड हुआ करते थे) से हो। वहां दोनों तरफ से वार हों, पलट वार हों। चीखने चिल्लाने वाले एंकरनुमा बंदे या बंदिया हों और इन सबसे बढ़कर टीआरपी का शानदार खेल हो.. सोचने में ये सब कितना अच्छा लगता है। हकीकत में ऐसा होने से रहा। सिर्फ इतना हो सकता है कि आने वाले दिनों में रितिक या करण जौहर अपने किसी पसंदीदा चैनल या पत्रकार के सामने हों और अपनी भड़ास निकालें और फिर से मीडिया वाले कंगना के साथ नई अदालत लगाने के चक्कर में लग जाएं। ये सब बातें फिलहाल तो हकीकत से दर ही लगती हैं।

रिश्तों के नाम पर बालीवुड की ये पहली जग नहीं है और न ही आखिरी जंग है। ऐसी जंगों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, जब दो बड़े सितारों के बीच ऐसी तनातनी हुई हो, जिसमें रिश्तों की आत्मीयता और निजता को तार तार किया गया हो। कुछ मामले एकतरफा आरोपबाजी के साथ शांत हुए, तो कुछ मामलों में दोनों तरफ से इल्जामों का दौर चला और कुछ मामलों में दोनों या एक तरफा खामोशी बरती गई और वक्त के साथ मामले खुद ही शांत हो गए। इन किस्सों का जिक्र भी किया जाए, तो मामला बेहद लंबा हो जाएगा, इसलिए बेहतर होगा कि मौजूदा दौर के इस मामले को इसी के दायरे में देखा जाए और समझने की कोशिश सिर्फ इतनी हो कि क्या ये मामला बिल्कुल वही है, जो बताया और दिखाया जा रहा है या कोई बोलकर और कोई चुप रहकर हकीकत पर से परदा डाले रहने की कवायद में लगा हुआ है।
कंगना पहली स्टार नहीं, जिन्होंने किसी से अफेयर किया। रितिक उनकी जिंदगी के पहले बंदे नहीं, जिनके साथ उनका अफेयर हुआ हो। ये भी पहली बार नहीं हुआ हो कि कामयाबी की सीढियां चढ़ती कोई हीरोइन किसी बड़े शादीशुदा स्टार के साथ अफेयर कर बैठी हो और ये भी पहली बार नहीं कि दोनोंं तरफ से अपने ही रिश्ते को जलील करने का काम किया जा रहा हो। कहने वाली बात ये है कि कंगना-रितिक के मामले में अजूबा जैसा तो कुछ भी नहीं है।
कंगना एक साथ कई मोर्चों पर उलझी हुई नजर आती हैं। रितिक के साथ रिश्तों का बवाल अपनी जगह, तो करण जौहर एंड कंपनी से फिल्मों में परिवारवाद  और उनके मूवी माफिया होने के अपने इल्जाम को लेकर भिड़ रही हैं, तो आदित्य पंचोली और अध्यायन के साथ रिश्तों के पुराने दौर को भी खंगाल रही हैं। इनसे अलग देखें, तो क्वीन और तनु वैड्स मनु के बाद उन्होंने किसी और डायरेक्टर के साथ काम न करने का एलान भी कर दिया। इस लिहाज से सिमरन और लक्ष्मीबाई पर बनने वाली फिल्मों के बाद वे खुद निर्देशन के मैदान में आएंगी और ये समझना मुश्किल नहीं कि बतौर निर्देशक वे महिला प्रधान विषयों पर ही फिल्म बनाएंगी, जिनमें हीरोइन नहीं, वे हीरो जैसे तेवरों के साथ होगी। रंगून के बाक्स आफिस पर न चल पाने के बाद उनका ये फैसला साहसिक माना जाएगा।
अगर कंगना अपने साथ हुई किसी भी ज्यादती के खिलाफ बोलना चाहती है, तो ये उनका हक है। वे कहां बोलना चाहती हैं, ये भी उनका हक है। वे किसी निजी चैनल की निजी अदालत को इसके लिए मुफीद मानती हैं, तो ये भी उनका फैसला है। ऐसा करके उनको क्या हासिल हुआ, ये आकलन करना भी उनका काम है और जिम्मेदारी भी। वैसे कंगना को जानने और मानने वाले इतना तो जानते होंगे कि वे कभी नतीजो की परवाह करके किसी जंग का आगाज नहीं करतीं। उनके लिए जंग का मतलब सिर्फ अपनी बात कहना और डंके की चोट पर अपनी बात कहने तक सीमित हो जाता है। इससे बात अधूरी रह जाए, इससे भी उनको कोई असर नहीं पड़ता। कह दिया, सो कह दिया वाली तर्ज पर कंगना की शैली, कंगना का मूड, कंगना का अल्हड़पन और कंगना का ये अंदाज नया तो नहीं है, लेकिन उनको एक ऐसी लिस्ट में जरुर शामिल कर देता है, जहां सिर्फ अपनी कहो और जोर से कहो की सोच और समझ रह जाती है।
वे लोग निश्चिंत तौर पर मुगालते मे रहेंगे, जो एक निजी चैनल की निजी अदालत में कही सुनी बातो पर मान लें कि मामला यहां खत्म हो रहा है। जी नही, ये कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि यहां से एक नई जंग शुरु होगी।इस जंग में कंगना का मुकाबला कब और किससे होगा, ये समझना बहुत मुश्किल नहीं लगता और हां, इसके किसी ठोस नतीजे की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। जहां मामला कोरी संवेदनाओं का रह जाता है, वो मामला ठोस धरातल पर बहुत अागे नहीं जा पाता। देखना सिर्फ इतना होगा कि इस जंग में कंगना के मुकाबले कौन कब सामने आता है और कब तक कोई चुप्पी के साथ तमाशा देखता है।

इस पूरे मामले की एक और तस्वीर के साथ हैलो सिमरन..... का इंतजार कीजिए... .

पिक्चर अभी बाकी है...

इस पिक्चर के किस्से को समझने के लिए ये लिंक खोलिए और पढिए- हैलो सिमरन

http://anujalankar.blogspot.in/2017/09/blog-post_12.html

Saturday, August 12, 2017

पहलाज निहलानी की ये कहानी लिखी किसने ?


पहलाज निहलानी के नपने पर बालीवुड में दीवाली से कई महीनों पहले ही दीवाली जैसा जश्न चौंकाने वाली बात नहीं है। पहलाज निहलानी ने कितनों की नाक में दम किया और कितनों के कान मरोड़े, ये लिस्ट काफी बड़ी और दिलचस्प बन सकती है। फिल्म इंडस्ट्री को मुबारक कि एक त्रासदी से मुक्ति मिल गई। पहलाज की जगह लेने वाले प्रसून्न जोशी जादु की कौन सी छड़ी से फिल्मवालों को सब कुछ ठीक हो गया का फील कराएंगे, ये आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल उनको भी मुबारकबाद ।


हर कोई मान रहा है कि पहलाज निहलानी को इस बात की सजा मिली कि उनके रवैये से फिल्मवाले परेशान थे।याद नहीं आता कि सेंसर बोर्ड में कभी कोई ऐसा चेयरमैन रहा हो, जिसकी नुमाइंदगी से फिल्म वाले परेशान न दिखे हों। जब तक सेंसर बोर्ड की नियमावली में अंग्रेजों के जमाने के कायदों की भरमार रहेगी, तब तक इस गद्दी पर बैठा हर चेयरमैन फिल्मवालों के लिए परेशानी का सबब बना रहेगा। प्रसून्न जोशी की अगुवाई में सेंसर की नियमावली बदल जाए, तो मामला अलहदा हो जाएगा। इसके लिए सब्र और इंतजार करना होगा।


सेंसर बोर्ड के चेयरमैन के पद पर हमेशा केंद्र की सत्ता पर काबिज पार्टियों की पसंद वाले लोग बैठते आए है। 2014 मई में दिल्ली में सत्ता बदली और 2015 की शुरुआत में लीला सैमसन को हटाकर पहलाज को ये कुर्सी इसी रवायत का नतीजा था कि यहां भी अपना आदमी फिट हो गया। पहलाज सचमुच केंद्रीय सत्ता के आदमी थे, जिसे कुछ लोग चाटुकारिता कहें तो कहें, पहलाज के लिए ये उस पार्टी का आदेश था, जिसके विचारों को वे पसद करते हैं। चाटुकारिया और वफादारी को लेकर बहस फिर कभी। यहां बात आगे बढ़ाते हैं।


क्या किसी ने ये सोचा था कि पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड की कुर्सी पर आकर उन तकलीफों को दूर करेंगे, जो तकलीफें लीला सैमसन के दौर में थीं। पहलाज निहलानी ऐसा कुछ नहीं करने आए थे, जो लीला सैमसन नहीं कर पा रही थीं। जब नियमों की किताबें वही हों, तो इस बात से कितना फर्क पड़ता है कि चेयरमैन के पद पर कौन बैठा है? क्या पहलाज निहलानी ने सेंसर नियमों को बदलवाने के लिए कुछ किया, तो जवाब मिलेगा- नही, तो फिर?


इस सवाल के साथ बात को और आगे बढ़ाते हैं। इतना तो समझ में आया कि पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड में किसी तरह के सुधार करने के लिए सरकारी ओहदा नहीं दिया गया था। याद करना मुश्किल नहीं कि कैसे अपनी कुर्सी संभालने के कुछ दिनों के अंदर ही पहलाज एक चैनल के इंटरव्यू में गर्व से बता रहे थे कि वे भारतीय संस्कारों के मामले में हमारी फिल्में कितनी कमजोर हैं। यहीं से संस्कारी मिशन की शुरुआत हुई। इस मिशन का मकसद और रास्ता साफ था। दिल्ली की सत्ता की विचारधारा का संदेश फिल्मवालों तक पंहुचाए। अरबों-खरबों के कारोबार वाली इस फिल्म इंडस्ट्री में पहलाज राष्ट्रवाद का मुखौटा पहनकर आए थे और उनके पास सार्टिफिकेट ये था कि वे दिल्ली में सत्ता पर काबिज पार्टी और उनके नेताओं के राष्ट्रवाद को नमन करते हैं। उधर, पुणे इंस्टिट्यूट में गजेंद्र सिह और मुंबई में सेंसर बोर्ड मे पहलाज निहलानी के ओहदे केंद्र की राष्ट्रवाद की नीतियों को फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ने का मिशन का एक अहम पड़ाव थे। नतीजा साफ था कि पिछले ढाई साल में पहलाज का जितना विरोध हुआ, वो उतने ही मजबूत होते गए। नागपुर से लेकर दिल्ली तक की सत्ता अपने आदमी के मिशन की कामयाबी से संतुष्ट थे, इसलिए विरोधी आवाजों को अनसुना ही किया जाना था।


पहलाज निहलानी ने गड़बड़ दो तरह से कीं, जिनका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा। पहली, वे फिल्मवालों को सेंसर बोर्ड के कायदों की वे किताबें दिखाने लगे, जिनमें फिल्मवाले अक्सर खुद फंसते हैं। दूसरी, अपनी हैसियत से आगे जाकर पहलाज ने उन लोगों से पंगेबाजी शुरु कर दी, जिनका दिल्ली दरबार में उनसे भी ज्यादा रसूख था। पहलाज ये मानकर चल रहे थे कि नागपुर और दिल्ली की सत्ता उनके मिशन से खुश है, तो उनके खिलाफ किसी की सुनवाई नही होगी। इसी मुगालते ने पहलाज का काम तमाम कर दिया। सत्ता कोई भी हो, वो किसी भी ऐसे इंसान को पसंद नहीं करती, जो खुद को सत्ता का केंद्र मानने लगे। पहलाज जब तक संस्कारी लेबल के साथ फिल्मों में राष्ट्रवाद की दुहाई देते रहे, तब तक वे दिल्ली के प्यारे बने रहे। जिस दिन पहलाज ने इस मिशन से हटकर खुद की हैसियत का एहसास कराना शुरु कर दिया, तो वे सत्ता के गलियारों की आंखों की किरकिरी बने और एक झटके में उनको वहां मार्गदर्शक मंडली का मेंबर बना दिया गया।


अब पहलाज आगे क्या करेंगे, ये तो वही जानें। क्या अब भी वे पार्टी का गुणगान करते हुए फिर से किसी नए मिशन पर भेजे जाने का इंतजार करेंगे या फिर अपने बॉस (शत्रुघ्न सिन्हा) की तरह एक कोने में परकटे पंछी की तरह अवचेतना के दौर में समा जाएंगे। पहलाज निहलानी का खेल खत्म हुआ। नए खिलाड़ी मैदान में आ चुके हैं। खेल वही पुराना है। कायदे कानूनों की किताब वही है। सेंसर बोर्ड से हमेशा पंगेबाजी करने वाले फिल्मवाले भी तकरीबन वही हैं।

अगर कोई सोचता है कि पहलाज निहलानी के जाने सेंसर का खेल बदल जाएगा, तो ये मुगालते से ज्यादा कुछ नहीं है। नए बॉस को आजमाया जाएगा। उनके आगे भी मिशन की चुनौती होगी। प्रसून्न जोशी अगर दिल्ली की सल्तनत को खुश रखने में माहिर निकले, तो कुर्सी पर कोई कील नहीं निकलेगी।


Saturday, August 5, 2017

यहां से कहां जाएगा बादशाह का सफर...?

मामला बहुत ज्यादा पुराना नहीं हुआ है। एक फिल्म एवार्ड समारोह को शाहरुख खान होस्ट कर रहे थे। मंच पर एक फिल्मी लेखक (कलाकार संजय मिश्रा) जिद्द करते हैं कि शाहरुख वहीं उनकी कहानी सुन लें। शाहरुख मान जाते हैं। लेखक महोदय कहानी सुनाना शुरु करते हैं कि एक लड़के और लड़की को जवानी में प्यार हो जाता है, लेकिन वे बिछड़ जाते हैं। बरसों बाद उनका फिर मिलना होता है और उनके बीच फिर से प्यार हो जाता है। शाहरुख इसे बकवास कहानी कहकर खारिज कर देते हैं, तो लेखक उनको याद दिलाता है कि ये उनकी फिल्म दिलवाले की वन लाइन स्टोरी है। शाहरुख खान झेंपकर रह जाते हैं और समारोह के मेहमानों की हंसी गूंज जाती है। मामला एक कामेडी एक्ट का था, इसलिए बात वहीं खत्म हो गई। 

दिलवाले को लेकर इस कटाक्ष को भले ही उस वक्त एक मजाक ही मान लिया गया था, लेकिन इसकी याद एक बार फिर आई, जब शुक्रवार की सुबह प्रेसवालों के लिए उनकी नई फिल्म जब हैरी मीट सेजल का शो हुआ, तो शाहरुख वहां पंहुचे। स्टाइल तो वही था। माथे तक झूलते बाल और आंखों पर काला चश्मा और आसपास सिक्योरिटी गार्ड्स का घेरा। इस घेरे से बाहर आकर वे फिल्म का शो शुरु होने से पहले मीडिया के अपने दोस्तों से भी मिले, लेकिन दिलवाले का किस्सा इसलिए याद आ गया कि जब हैरी... का शो शुरु होने से पहले ही शाहरुख खान के कंधे और आंखें जिस अंदाज में झुके झुके से नजर आए, वो खामोशी से बहुत कुछ बयां कर रहा था। अपनी फिल्म की रिलीज वाले दिन शाहरुख खान की नजरें झुकी हुई नजर आना कोई ब्रेकिंग न्यूज न हो, लेकिन लंबे वक्त से उनसे जुड़े रहने वालों के लिए बात बड़ी थी। 
थोड़ा और पीछे चलते हैं। चेन्नई एक्सप्रेस रिलीज होने वाली थी। शाहरुख खान ने अपने दोस्त पत्रकारों को मन्नत में बुलाया। माहौल अलग था। वे गर्मजोशी के साथ पत्रकार दोस्तों के साथ मिल रहे थे। मस्ती-मजाक के उस माहौल में महसूस हो रहा था कि शाहरुख अपनी फिल्म को लेकर आश्वस्त हैं। आंखों में चमक भी किसी से छुपी नहीं थी। 
चेन्नई एक्सप्रेस से जब हैरी... के सफर की यादें थम गईं। जब हैरी.. के प्रेस शो का इंटरवल हुआ और शाहरुख बिना कुछ कहे-सुने अपनी कार में बैठकर चले गए। अलबत्ता उनकी इस फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली एक कोने में जमीं पर बैठे भांप चुके थे कि फिल्म पसंद नहीं आ रही है। इम्तियाज का सपाट चेहरा देखते हुए फिल्मी पत्रकार इंटरवल के बाद की फिल्म देखने वापस हाल में जा बैठे। फिल्म खत्म हुई, तो इम्तियाज भी जा चुके थे। बात उनको समझ में आ चुकी थी कि फिल्म का खेल बिगड़ चुका है। बेचारे इम्तियाज, अपनी पहली धमाकेदार कामयाब फिल्म रही जब वी मीट... की यादों को सेजल-हैरी मीट.. से जोड़कर परेशान ही हो रहे होंगे। 

जब हैरी... रिलीज हो गई है। मीडिया में इस फिल्म का पोस्टमार्टम हो चुका है। इसे दोहराने की कोई वजह नहीं है। यहां कुछ और अहम बातों को लेकर इस सवाल पर चर्चा हो सकती है कि चेन्नई एक्सप्रेस और जब हैरी... के बीच के सफर में शाहरुख खान कहां खड़े नजर आते हैं। 
वे हिंदी सिनेमा के बादशाह हैं और बेताज बादशाह भी नहीं हैं। चेन्नई एक्सप्रेस और जब सेजल... के बीच का सफर चंद ऐसे सवालों को जरुर सामने लाता है, जिनको अगर शुक्रवार को जब सेजल... के रिलीज वाले दिन उनके चेहरे के हावभाव को याद किया जाए, तो जवाब पाने की मशक्कत दिलचस्प जरुर हो जाती है। पहले सवालों पर गौर करते हैं-

शाहरुख खान क्या अब थक गए हैं?
शाहरुख खान पर क्या उम्र का असर होता जा रहा है?
शाहरुख खान क्या रोमांटिक इमेज के चक्र में फंस चुके हैं
शाहरुख की बादशाहत को वाकई खतरा हो चुका है
या फिर...
हिट-फ्लाप से परे ये बादशाह क्या अब भी धमाकेदार वापसी की कुव्वत रखता है? 

ये सवाल कहीं से भी टेढ़े-मेढ़े नहीं हैं। न इनके जवाब तलाशने के लिए किसी राकेट साइंस की जरुरत है। सिलसिलेवार सवालों को देखें, तो जवाब पाने की सूरत भी निकल आती है। 

थकान का बढ़ती-ढलती उम्र से वास्ता होता है, ये कुदरत बताती है। अपने शरीर को तंदरुस्त रखने के सारे रास्ते शाहरुख जानते हैं। उनकी चुस्ती-फुर्ती और कहा जाए, तो चार्म पर बहुत ज्यादा असर तो नहीं माना जा सकता। तो क्या माना जाए कि चेन्नई एक्सप्रेस के बाद की उनकी फिल्मों की बाक्स आफिस पर कमजोर हुई हालत ने उनको इतना परेशान कर दिया? ये मुमकिन है। वे कमर्शियल सिनेमा के बादशाह हैं और कमर्शियल फिल्मों के गुणा भाग को बेहतर समझते हैं। फिल्म के कलेक्शन अच्छे न आएं, तो शाहरुख क्या कोई भी कलाकार मायूस ही होगा। मीडिया के कैमरों के सामने मुस्कान के साथ ये कहना अलहदा बात होती है कि मुझको पैसों की फिक्र नहीं, लेकिन कैमरों के पीछे एक कमर्शियल स्टार और प्रोड्यूसर अपनी फिल्म की अच्छी कमाई न होने से मायूस होता है, इस पर बहस की गुंजाइश नहीं बचती। शाहरुख जिस दर्जे के सितारे हैं, जब उनसे उम्मीदें बड़ी होती हैं, तो जाहिर है कि न चलने का अफसोस भी ज्यादा ही होगा। रोमांटिक इमेज वाला सवाल सबसे दिलचस्प हो जाता है। 

शाहरुख खान की बादशाहत का सबसे बड़ा तिस्लिम उनकी रुमानी छवि को ही माना जाता रहा है। हाथों को खोलकर उनका रोमांटिक पोज बनाने का स्टाइल भला किस कन्या के दिल को नहीं धड़काता होगा। इसी इमेज ने राहुल से लेकर राज और तमाम किरदारों को कन्याओं के सपनों के साथ जोड़ा और उनकी कामयाबी का बिछावन तैयार किया। 

हिंदुस्तानी सिनेमा का इतिहास गवाह है, जब अपनी इमेज की परछाई में कैद सितारों ने खुद को दोहराने की कोशिशों को बंद नहीं किया, तो उनके रास्ते मुश्किलों से जुड़ते चले गए। साफ शब्दो में कहा जाए, तो 50 पार कर चुके शाहरुख का रुमानी अंदाज आज भी कन्याओंं के दिलों को भाएगा, अगर इस अंदाज को वे ठीकठाक सी कहानी के साथ लाएं। डियर जिंदगी इसकी बेहतरीन मिसाल है, जिसमें वे उतने ही अच्छे लगे, जितने हैं, क्योंकि वहां एक कहानी थी, जिसके किरदार के साथ लोग जुड़ते चले जाते हैं। हैप्पी न्यू ईयर हो या दिलवाले हो या अब हैरी हो.... मामला वहां फंसता है, जब इस रुमानी अंदाज को न्यायसंगत बनाने के लिए कहानियों का टोटा नजर आए। यहां किसी का भी हैरान होना लाजिमी है कि आखिर शाहरुख कमजोर कहानियों पर अपनी इस इमेज का खिलवाड़ क्यों होने दे रहे हैं? इसे कमर्शियल सिनेमा की जरुरत कहा जाए या बादशाह की अपनी कमजोरी? इन दो सवालों को समझने पर असली बात सामने आ जाती है।

सालों का तजुर्बा और शोहरत की बुलंदी शाहरुख खान के जिस सफर को और बेहतर कर सकती थी, अगर वही कमजोरी बनती जाए, तो इसके लिए उनके सुपर स्टारडम से खिलवाड़ करने वाले निर्देशकों से ज्यादा खुद शाहरुख ही जिम्मेदार माने जाएंगे, क्योंकि ये बादशाहत उन निर्देशकों की नहीं, शाहरुख खान की है। इस बादशाहत को सलामत रखने की जिम्मेदारी किसी भी डायरेक्टर से ज्यादा खुद शाहरुख की है। 

कहते हैं कि कामयाबी कैसी भी हो, इसमें नशा जरुर होता है और कुदरत कहती है कि नशा जब उतरता है, तो वही दुनियाा सामने आ जाती है। शाहरुख को सुपर स्टार कहें या बादशाह कहें या किंग खान कहें या कुछ और नाम दें। ये मसला नहीं है। मसला उन तमाम चाहने वालों के जज्बात का हो जाता है, जिन्होंने दिल्ली के एक पठान बच्चे को सिनेमा का दुनिया का सबसे बड़ा मकाम दिया। ये जज्बात कभी दिलवाले देखकर मायूसी में बदलते हैं, तो कभी सेजल-हैरी का (कमजोर) किस्सा देखकर मातमी हो जाते हैं। 

वे करिश्माई हैं। दर्शकों के दिलों पर राज करने के हुनर के माहिर हैं। अगर किसी कन्या का प्यार पाने के लिए कभी राज, तो कभी राहुल बनकर जब वे कोशिश करते हैं, तो कामयाबी के रास्ते खुल जाते हैं। मामला यहां भी प्यार का है, लेेकिन किसी एक कन्या के प्यार का नहीं। करोड़ों के प्यार को फिर से पाने के लिए शाहरुख खान को बस इतना सा ही तो करना है कि फिर से एक अच्छी कहानी लाएं, फिर से एक अच्छी फिल्म बनाएं और फिर से अपनी रुमानी छवि के साथ मजबूत किरदार को परदे पर लाएं, तो क्या नहीं हो सकता। 
शाहरुख खान जिस मकाम पर हैं, वहां उनके लिए अभी बहुत कुछ बाकी है। जनता के दरवाजे अभी भी बंद नहीं हुए हैं। हमारी जज्बाती जनता तो थोड़े से प्यार से ही बलिहारी होने लगती है। शाहरुख खान और इस जनता के बीच सिर्फ एक रास्ता ही रहता है। 

इस रास्ते के एक छोर पर सुपर स्टारडम है, तो दूसरे छोर पर जनता के जज्बात और बीच में हैं खुद शाहरुख खान। रास्ता शाहरुख खान को चुनना है। कमर्शियल सिनेमा के दायरे में अभी भी वे ऐसी कहानियां ला सकते हैं, जो उनको इन दोनों छोरों से मिला सकती हैं। 
इस बादशाह की बादशाहत को किसी और से नहीं, खुद से चुनौती है। जनता का संदेश साफ है- फिर से एक नई शुरुआत कीजिए और मायूसी के अंधेरे को छितरनेे में वक्त नहीं लगेगा। इंतजार रहेगा कि जल्दी ही खिलखिलाता, मुस्कराता हुआ बादशाह अपनी फिल्म के प्रेस शो में अपने दोस्तों के साथ मस्ती भरे अंदाज में पेश आए, तो चेन्नई एक्सप्रेस का ठहरा सफर आगे बढ़ेगा और बढ़ता चला जाएगा। 


  


Saturday, June 24, 2017

ट्यूबलाइट जलेगी तो जरुर, मगर.....?




ट्यूब लाइट रिलीज हुई और सलमान खान के चाहने वालों के लिए ईद से पहले ईद हो गई। ये कई सालों से चली आ रही रस्म है, जब ईद के मौके पर सलमान की फिल्में रिलीज होती हैं और हिट भी हो जाती हैं। इसे लेकर बहस की गुंजाइश नहीं बचती। मीडिया में तो ट्यूब लाइट को स्विच आफ करार दे दिया गया। इससे सलमान के करोड़ों फैंस को शायद ही कोई फर्क पड़े। सोमवार को ईद मनाई जाएगी, तो इस फिल्म की कमाई के आंकड़ों की रफ्तार तेज होगी। 4300 से ज्यादा थिएटरों पर रिलीज हुई ये फिल्म आंकड़ों की कमाई में तो नुकसान का सौदा नहीं साबित होगी, मगर.....

इस मगर के साथ ये सवाल जुड़ता है कि क्या ट्यूब लाइट उम्मीदों पर खरी उतरती है? और अगर ये जवाब ना में सामने आता है, तो इसके कारण भी होंगे, जो कुछ परदे पर नजर आए और कुछ का ताल्लुक परदे के पीछे रहा। ट्यूब लाइट के निर्देशक कबीर खान और सलमान खान को ये समझना मुश्किल नहीं रहा होगा कि बजरंगी भाईजान के बाद वे ट्यूब लाइट लेकर आएंगे, तो दोनों फिल्मों में तुलना होगी। कबीर के साथ सलमान ने 2012 में पहली फिल्म एक था टाइगर की थी और इसके तीन साल के गैप के बाद बजरंगी 2015 में आई थी। बजरंगी के साथ ट्यूब लाइट की तुलना के और भी कारण बन जाते हैं। बजरंगी की तरह ट्यूब लाइट में सलमान एक भोलेभाले किरदार में है, जो सिर्फ अपने दिल की बात को मानता है। बजरंगी मे सलमान का किरदार एक बच्ची को घर छोड़ने के लिए सीमा पार जाता है। यहां मिशन चीन के साथ लडाई में गए अपने भाई को वापस लाने का है। बजरंगी में पवन के साथ एक बच्ची जुडती है, तो ट्यूब लाइट में लगभग उसी उम्र का बच्चा जुड़ता है। ये बात भी कम अहम नहीं हो जाती कि बजरंगी जैसा किरदार सलमान ने पहली बार किया था, जिसको हर किसी ने पसंद किया। यहां न चाहते हुए भी अगर ट्यूब लाइट से उसकी तुलना होती है, तो इसके लिए सलमान और कबीर खान की जोड़ी ही ज्यादा जिम्मेदार है। फिर भी ये तर्क माना जा सकता है कि दो फिल्मों और उनके किरदारों की तुलना न्यायसंगत न हो, मगर.....




इस मगर की गाथा को और आगे लिए चलते हैं। बात कबीर खान की करते हैं, जो इन दोनों फिल्मों के निर्देशक रहे हैं। ट्यूब लाइट का तो लेखन भी कबीर ने ही किया है और इसे ही फिल्म की बड़ी कमजोरी माना जा रहा है। क्या कबीर खान नहीं जानते थे कि सलमान के किरदार का भोलापन, पहले बच्ची और अब बच्चे से लगाव दोनों फिल्मों की तुलना का आधार बन जाएंगे। यहां तक कि फिल्म के गानों की धुनें और उनका फिल्मांकन भी जब बजरंगी की याद दिलाता है, तो इसके लिए देखने वाले तो कसूरवार नहीं हो सकते। कबीर खान ने अगर एक था टाइगर के किरदार से बजरंगी के किरदार को बिल्कुल अलग रखा था, तो बजरंगी से ट्यूब लाइट के किरदार को अलग रखने की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी, जिसे समझने में वे नाकाम रहे।

बजरंगी और ट्यूब लाइट के निर्माण के दौरान परदे के पीछे भी तमाम ऐसी बातें हुईं, जो ट्यूब लाइट की निराशा के साथ जुड़ जाती हैं। एक था टाइगर की सिक्वल (टाइगर जिंदा है) का निर्देशन सुलतान वाले अली अब्बास जाफर को मिलना भी कम अहम बात नहीं थी। इस खबर ने कबीर और सलमान के बीच बढ़ते मनमुटाव की खबरों को हवा दी। आम तौर पर सिक्वल का निर्देशन पहली फिल्म के निर्देशक को ही मिलता है। ट्यूब लाइट के शुरु होने से पहले जब एक था टाइगर की सिक्वल की खबर पहली बार चर्चा में आई थी, तो बजरंगी भाईजान के बाद अपनी अगली फिल्म फैंटम (सैफ अली खान-कैटरीना कैफ) के प्रमोशन के दौरान कबीर खान संकेत दे रहे थे कि सिक्वल वही बनाएंगे। मगर ट्यूब लाइट की शुरुआत होने के बाद एक था टाइगर की सिक्वल का मामला खबरों में लौटा, तो कबीर खान का पत्ता कट चुका था। यहां तक कि ट्यूब लाइट के पहले शेड्यूल के दौरान सलमान और कबीर खान के बीच मतभेदों के संगीन होने की खबरों के बीच ये हवा भी हो गई थी कि सलमान कबीर की जगह ट्यूब लाइट को पूरा करने की जिम्मेदारी अली अब्बास जाफर को सौंपना चाहते हैं। चर्चा रही कि सलमान के पापा सलीम की दखल अंदाजी से मामला सुलझा और कबीर खान ही फिल्म के निर्देशक बने रहे, लेकिन कबीर और सलमान के बीच लड़ाई की खबरों का आना जारी रहा। सोचना और समझना मुश्किल नहीं होता कि जब किसी फिल्म के बीच डायरेक्टर और हीरो के बीच लड़ाईयां बढ़ जाएं, तो इसका बुरा असर फिल्म पर होता है और यहां से बस किसी तरह से फिल्म को पूरा करने की औपचारिकता मात्र रह जाती है। इसे भी संयोग नहीं माना जा सकता कि ट्यूब लाइट की शूटिंग पूरी होने के फौरन बाद से कबीर खान की अगली फिल्म के लिए रितिक रोशन के नाम की चर्चा होने लगी। इसका ये भी मतलब लगाया गया कि अब कबीर खान और सलमान किसी फिल्म में साथ नहीं होगे। सलमान की आने वाली फिल्मों की लिस्ट भी इसी बात का इशारा करती है। कबीर खान भी इसे लेकर चुप हो जाते हैं, मगर....

मगर की इस गाथा के तीसरे पड़ाव पर नजर आते हैं सोहेल खान, जिनको ट्यूब लाइट की एक कमजोर कड़ी माना जा रहा है। सोहेल को सलमान ने अगर सिर्फ इसलिए अपने भाई का रोल दिया कि वे सगे भाई है, तो कहा जा सकता है कि सलमान की ये भाईगिरी फिल्म को भारी पड़ी। सोहेल खान ने बतौर एक्टर पहले भी बहुत कोशिश की है और पब्लिक ने ही उनकी फिल्मों को खारिज कर दिया है। कौन भूल सकता है कि वांटेड से शुरु हुई सलमान की कामयाबी के दौर में इकलौती बड़ी नाकामयाबी जय हो रही, जिसका निर्देशन सोहेल खान ने किया था। सोहेल के लिए इससे पहले सलमान ने किसान भी बनाई थी, उसमें बतौर कलाकार और बतौर निर्देशक सोहेल खान दोनों रुप में फेल हुए थे। भाई के साथ ऐसा लगाव हैरान नहीं करता, लेकिन फिल्म की वाट लगती है, तो ये बड़ा मुद्दा बन जाता है, जिसे सलमान तो मानने से रहे, मगर.....


अगर-मगर के इस खेल के अगले मोहरे बने शाहरुख खान, जिनका ट्यूब लाइट में गेस्ट एपीरिएंस है। ये समझना मुश्किल नहीं कि सलमान के साथ दोस्ती के टूटे रिश्तों के फिर से जुड़ने के बाद शाहरुख इस फिल्म का हिस्सा बने। दो दिग्गज खान सितारों की कैमिस्ट्री को लेकर जो उम्मीदें की जा रही थीं, इस मामले में भी ट्यूब लाइट फुस्स हो गई।
फिल्म में शाहरुख खान की मौजूदगी असरदार नहीं रही। दोनो के फिर से दोस्त बन जाने के बाद  पहली बार  दोनों के एक साथ बड़े परदे पर आने को लेकर उम्मीदें तो बहुत थीं, मगर....

मगर की अगली कड़ी में खुद सलमान के किरदार की कमजोरियां हैं। सलमान बहुत गंभीर किस्म के एक्टर नहीं माने जाते। सलमान स्टाइलिश स्टार हैं, जो परदे पर एक्शन करता है, तो पब्लिक खुशी से ताली बजाकर झूमती है। वे रोमांस करते हैं, तो कन्याओं के दिलों की धड़कन बढ़ जाती है। एक था टाइगर में कैटरीना हों या बजरंगी में करीना हों, सलमान रोमांस का रंग जमाने में मास्टर माने जाते हैं।

ट्यूब लाइट में इन दोनों ही मामलों में वे कमजोर हैं। एक्शन करने की बारी आती है, तो वे एक अदने से किरदार से थप्पड़ खाते रहते हैं, जो उनके फैंस को कभी हजम नहीं होगा और रोमांस करने के लिए इस बार कोई स्कोप ही नहीं दिया गया। चीनी अभिनेत्री जु जू अपने बेटे के साथ हैं, जिनका सलमान के साथ कोई रोमांटिक एंगल नहीं है।
एक्शन का चैंपियन एक के बदले चार थप्पड़ मारे और अपने पति को खो चुकी चीनी अभिनेत्री से रोमांस का रिश्ता जमाता, तो भी बात जम जाती, मगर....

मगर के आखिरी पड़ाव में जिक्र होगा उनकी शर्ट का, जो ट्यूब लाइट में उनके शरीर पर ही जमी रही। बजरंगी भाईजान में पाकिस्तानी जेल में वे जब उस एक शाट में बिना शर्ट के नजर आते हैं, तो ही थिएटर सीटियों से गूंज उठा था।
ट्यूब लाइट में तो उनकी शर्ट भी ऐसी, जिसके बटन गले तक बंद रहे। सलमान की इस शर्ट लैस अदा पर कुवांरियों के दिल धड़कते हैं, तो उनकी मसल देखकर उनके फैंस अपने सिंगल पसली होने का गम भूल जाते हैं।
ट्यूब लाइट में सलमान ने एक सीन में भी शर्ट को निकाल फेंका होता, तो कुछ बात बन सकती थी, मगर....

अगर-मगर  की इस गाथा से ट्यूब लाइट की बाक्स आफिस पर होने वाली कमाई पर कोई असर नहीं होगा। शाय बजंरगी भाईजान जैसी लाजवाब फिल्म न आई होती, तो सलमान की फार्मूला फिल्मों की सफलता के इतिहास में ट्यूब लाइट भी कहीं न कहीं फिट हो जाती। ट्यूब लाइट ने उन लोगों को ज्यादा निराश किया, जो बजरंगी भाईजान के बाद इस जोड़ी से एक और बेहतर फिल्म की उम्मीद कर रहे थे। ट्यूब लाइट जलेगी, जरुर जलेगी, मगर....


एक अच्छी फिल्म की कसौटी पर निराश करने वाली ट्यूब लाइट यहां आकर अटक जाती है कि फ्यूज बल्ब हो या ट्यूब लाइट,,, जल जा जल जा सुनकर दिल को ही जलाती है और अगर-मगर की गाथा भी इस मायूसी के सामने फीकी पड़ जाती है। इस ईद की बात तो मुकम्मल हो गई, अगले साल फिर से ईद होगी। फिर से भाई अपनी फिल्म से ईदी देंगे, मगर.......


Wednesday, June 14, 2017

तुम कौन हो कृतिका चौधरी, कुछ भी तो नहीं...

तुमको न कोई जानता था, न पहचानता था, फिर कोई कैसे तुम्हारी मौत पर मातम मनाता? किसी को क्या गरज पड़ी थी कि एक स्ट्र्गलर आर्टिस्ट की मौत पर, किसी का मन एक पल के लिए भी इंसानियत का एहसास करता। तुम एक स्ट्रगलर थीं, जिनको हिराकत से देखना बड़े लोगो का जन्मसिद्ध अधिकार होता है।

तुम अगर किसी बड़े परिवार से कोई ताल्लुक रखतीं, तो 12 जून की शाम को खबरों की दुनिया में एक धमाका होता। चैनलों पर गाय और इंसानों से लेकर मोदी और राहुल की राजनीति पर उबलने वाले चैनलों के लिए तुम्हारी मौत ब्रेकिंग न्यूज बनती। नाचते-गाते विज्ञापनों के बीच खबर के नाम पर कृतिका चौधरी नहीं रहीं की ब्रेकिंग न्यूज चलाने वाली एंकर की आंखें भर आतीं, तो पुरुष एंकर अपने दिल पर पत्थर रखते। देखते ही देखते पुलिस स्टेशन के बाहर न्यूज चैनलों की ब्रेकिंग ब्रिग्रेड की गाड़ियों से निकलते कैमरों की लपलपाहट में पुलिस स्टेशन के अंदर जाने वाला और बाहर आने वाला कोई सिपाही भी ब्रेकिंग न्यूज बन सकता था। पुलिस के बड़े साहब लोगों को कैमरे के सामने आकर बताना पड़ता कि पुलिस ने इंक्वायरी शुरु कर दी है। प्रेस-मीडिया की भीड़ को संभालने के लिए पुलिस को अपनी हिफाजत के लिए बंदोबस्त करना पड़ता।

अस्पताल के गेट के बााहर लगे कैमरों के पीछे खींसे निपोरने वालों को इंतजार होता कि डैडबाडी की एक झलक मिल जाए और इसके लिए वे मरीजों और आने जाने वाले डाक्टर-नर्सों को रोकने-टोकने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते पाए जाते। अस्पताल में अगर कोई तुमसे दोस्ती निभाने के नाम पर रात को काले चश्मे पहनकर आता, तो दोस्त के हवाले से मिलने वाली न्यूज कितने चैनलों का भला करती। तुम्हारी यादों का मातम मना रहे दोस्तों को अस्पताल में कैमरों के आगे आने के बाद घर जाकर टीवी न्यूज चैक करना जरुरी होता कि कमबख्तों ने मुझे कितनी फुटेज दी...

भला तुम्हारा घर कैमरों से दूर कैसे रहता। जितना जल्दी यमराज नहीं पंहुचा होगा,  उससे भी जल्दी से फटाफट और तेज खबरों के उस्ताद तुम्हारी जिंदगी की कुंडली निकालने के साथ साथ, आस पड़ोस के उन चेहरों की उदासी को भी कवर करते, जो शायद तुम्हारा नाम भी न जानते हों। कैमरे ऐसे में हर किसी के दुख को एक लाइन में बताने की कला में माहिर होते हैं- आपको कैसा महसूस हुआ? कोई पड़ोसी सिंगर होता, तो चैनल के कैमरों पर तुम्हारी याद में कोई गाना गुनगुनाने की फरमाइश भी जरुर होती।

तुम बड़े, अमीर घराने से नहीं थी, वरना पुलिस स्टेशन से लेकर अस्पताल और घर.. कहां कहां चैनलों के कैमरे नहीं पंहुचते। सुबह सवेरे का मंजर तुम्हारी मौत के मातम को अलग ही रंग देता। बहनों से भी ज्यादा प्यार करने वाली हीरोइनों और तुम्हारे सदमे में हर कोई सफेद पोशाक और काला चश्मा लगाए आता और साथ में टायर जैसी शक्ल में फूलों की माला के साथ वहां रुकना न भूलता, जहां कैमरे तुम्हारे दोस्तों से तुम्हारे साथ बिताए पलों को याद करने के लिए कहते और तुम्हारे दोस्तों की आंखें छलक आतीं। आपको कैसा लगा वाले सवाल पर कोई दोस्त बुरा नहीं मानता।

शमशान में कैमरो और फोटोग्राफरों की भीड़ इसलिए धक्कामुक्का करती कि तुम्हारे अंतिम सफर का चेहरा उनके लिए गुड पोज बन जाए। शमशान से निकलने वाले सितारों का मजमा फिर से आपको कैसा लगा का जवाब देते हुए आंसू बहाने लगता। और अपने फेवरेट सितारों के दर्शन पाकर शमशान घाट पर उमड़ी भीड़ स्टारों को देखकर तालियां और सीटी बजाकर खुशी जाहिर करने की रस्म भी निभा देती।

चौथे दिन तुम्हारी प्रार्थना सभा में भी यही मंजर होता। वही कैमरों की फ्लैश, वही न्यूज चैनलों के कैमरों की लपलपाहट होती। वही महंगी कारों से सफेद ड्रेस और काले चश्मेधारी दोस्तों की फौज चैनलों के साथ तुम्हारे दूर जाने का मातम मनाती। तुम्हारे विशालकाय फ्रेम वाले फोटो में तुम्हारे हंसते चेहरे पर फूलों की माला होती। मोमबत्तियां होतीं। तुम्हारी शांति के लिए मंत्रों का उच्चारण होता। एक दूसरे के गले लगकर सितारे धीमी आवाज में व्हेयर यू आर बेबी जैसी शिकायत धीमी आवाज में करते और तुम्हारी आत्मा को शांति पंहुचाकर उसी मीटिंग में नई फिल्मों के सेटअप भी तैयार होते और बमुश्किल कुछ मिनट रुककर सितारों का कारवां गला तर करने के इंतजामों में लग जाता।

क्या क्या नहीं हो सकता था। कौन जाने, तुम्हारी हैसियत बड़ी होती, तो मुल्क के प्रधानमंत्री से लेकर सियासी जमात भी तुम्हारे गम में शरीक होने के लिए सोशल मीडिया को आरआईपी के संदेशों से लबालब कर देती। न्यूज चैनलों के धुरंधरों की टीम तुम्हारी अंतिम यात्रा से लेकर प्रार्थना सभाा में आने और न आने वालों का बहीखाता निकालकर देश की सबसे बड़ी समस्या का हल निकालने की कोशिश करते नजर आते। अगर और बड़ी हीरोइन होतीं, तो म्यूजिक चैनलों पर फैंस की  डिमांड पर तुम्हारे हिट गानों की परेड होती। मूवीज चैनलों पर सारा शेड्यूल होता और तुम्हारी एक सीन वाली फिल्म को भी ट्रिब्यूट टू ए ग्रेट स्टार की तख्ती के साथ चलाया जाता, जिसके लिए स्पांसरों की लाइन तो लगनी ही थी।

कितना कुछ और हो सकता था,.. कोई तुम्हारे लिए शहर में स्टेचू लगवाने की सोचता, तो कोई तुम्हारे नाम पर गली का नाम रखने की मुहिम चलाने की सोचता, तो कोई सरकार से तुम्हारे लिए बड़ा सम्मान दिलाने की खातिर आंदोलन शुरु करने की बात भी करता।

तुमने कितना कुछ मिस कर दिया। काश तुम इस सच को समझ पातीं कि एक स्ट्रलगर हीरोइन की मौत की यहां कोई कीमत नहीं होती। चैनलों की भाषा में ऐसी मामूली खबरों से उनको टीआरपी नहीं मिलती, इसलिए एक स्ट्गलर की मौत की खबर की कोई कीमत होनी ही नहीं थी।

मौत सबको आनी है। जीते जी मौत को महबूबा समझने वालों को भी आती है। 12 जून को कृतिका चौधरी की मौत से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। किसी ने जानने की कोशिश भी नहीं की कि उसका बेजान जिस्म अगर किसी बंद फ्लैट में सड़ांध मारता रहा, तो कुछ तो ऐसा हुआ होगा, जिसने जिंदगी को ऐसे छला...  तुम्हारी जिंदगी ने तुम्हारे सपनों को छीन  लिया, तो मौत ने जिंदगी को खामोश कर दिया।

तुम्हारी जिंदगी का सच तुम्हारे साथ चला गया। तुम्हारे जाने का गम तुम्हारे माता-पिता को होगा। तुम्हारे बहन-भाइयों को होगा। तुम्हारे गांव के दोस्तों-सहेलियों को होगा। मुंबई की चकाचौंध भरी फिल्मी दुनिया में किसी स्ट्रगलर की मौत की अहमियत नहीं होती। मीडिया से कोई गिला शिकवा करने का हक तुमको नहीं हो सकता। सितारों के रोमांस, अफेयर से लेकर दो बड़ी हीरोइनों की कैटफाइट से लेकर नंबर वन के लिए हीरो और हीरोइनों के नाम तय करने में बिजी मीडिया को एक स्ट्गलर की मौत की वजह तलाशने की फुर्सत नहीं होती।

कोई नहीं जानता कि तुम कैसी जिंदगी जी रही थीं। कोई नहीं जानता कि कौन तुम्हारा दोस्त था और कौन यहां तुम्हारा रिश्तेदार था। कोई नहीं जानता कि हर महीने किराए के लिए पैसों का इंतजाम कैसे होता होगा। कौन नहीं जानता था कि हर शाम तुमको किसी कोर्डिनेटर के काल का इंतजार होता होगा, जिसमें कोई कहे कि मैडम आपको इस रोल के लिए सिलेक्ट कर लिया है। कितने पल ये शब्द सुनने के इंतजार में कटे होंगे और सपनों की हत्याओं का सिलसिला चलता रहा होगा।

तुम अब इस दुनिया में नहीं हो। जाओ, अगर फिर से एक्ट्रेस बनने की ललक लेकर दुनिया में वापस आना हो, तो भगवान जी से सिर्फ इतना वरदान मांगना कि तुमको स्ट्रगलर कभी न बनाए। एक स्ट्रलगर की तो न जिंदगी होती है और न मौत।

शु्क्रिया कृतिका चौधरी, तुम्हारी मौत के नाम मीडिया और स्टारडम की एक दिन की अघोषित मौत की खामोशी को तुम्हारी दिवंगत आत्मा ही समझे तो समझे, धड़कते दिल, चलती सांसे और रिश्तों की राख और खाक पर जमे इंसानों के  लिए ये समझना न तो मुश्किल है और न ही जरुरी।

ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे।


Saturday, June 3, 2017

बालीवुड और हालीवुड में कामयाबी का बुनियादी फर्क


चमत्कार हमारे देश में होते रहते हैं और हमारी फिल्मी दुनिया में भी। चमत्कार को अमूमन तब नमस्कार किया जाता है, जब किसी को अप्रत्याशित कामयाबी मिले। ये मामला उल्ट समझा जा सकता है। उम्मीदों के टूटने को चमत्कार कहना शायद सही न हो, लेकिन चमत्कार कहने से ये बात जल्दी समझ में आएगी, जिसके एक छोर पर दीपिका पादुकोण और दूसरे छोर पर प्रियंका चोपड़ा और ठीक बीच में वो एक शब्द, जिसने इन दोनों देसी देवियों के अरमानों का जनाजा निकाल दिया। इस शब्द को हालीवुड की दुनिया कहा जाता है।

बालीवुड में स्टारडम को जीने के बाद प्रियंका और दीपिका ने जब हालीवुड का रुख करने का फैसला किया, तो इन दो फैसलों की वजह अलग अलग मानी गई। कौन जानता था कि अलग अलग वक्त पर रिलीज हुईं उनकी हालीवुड की पहली फिल्मों के नतीजे दोनों को एक ही कश्ती का सवार बना देगा। हमारी देसी जनता ने अपनी देसी देवियों की इन विदेशी फिल्मों को क्यों खारिज कर दिया, ये कहीं से भी न तो शोध का मामला बैठता है और न ही चौंकाने वाला लगता है। अगर दोनों में से किसी भी फिल्म को कामयाबी मिल जाती, तो मुमकिन था कि इसे चमत्कार ही मान लिया जाता।

शब्दों की बाजीगरी से थोड़ा आगे जाकर अगर बात को सीधे तौर पर समझने की कोशिश करें, तो मामला बेहद सपाट है। दीपिका और प्रियंका की फिल्मों में कामन बात ये रही कि दोनों को कमजोर रोल मिले और सिवाय एक्सपोजर के दोनों को कुछ खास करने को नहीं मिला। ये बात भी उन लोगों को कतई नहीं चौंकाती, जो बालीवुड और हालीवुड के बुनियादी अंतर को मानते हैं। अंतर बहुत साफ है। बालीवुड की फिल्में हमारे परिवेश में बनती हैं और हालीवुड की फिल्में वहां के परिवेश में। हालीवुड में भारतीय कलाकारों को भारतीय किरदारों में ही काम मिल सकता है और वहां की फिल्मों में भारतीय किरदार बहुत ज्यादा नहीं होते। अगर दीपिका या प्रियंका ये मानकर हालीवुड गई थीं कि वो दुनिया उनके बालीवुड के स्टारडम से प्रभावित हो सकती है, तो ये गलतफहमी आज इन दोनों की फिल्मों की नाकामयाबी के साथ सामने आ चुकी है। हमारी फिल्मों में भी कभी कबार कोई अंग्रेज या कोई विदेशी किरदार होता है, तो हम उनको कितनी अहमियत देते हैं? बाब क्रिस्टो (आस्ट्रेलियाई कलाकार)  जिंदगी भर हमारी फिल्मों में जूनियर कलाकार के रोल करते रहे।

इसका मतलब ये नहीं कि पूरा मामला ही निराश करने वाला रहा हो। हालीवुड में हमारे कई कलाकारों ने अपनी जगह बनाई है और अच्छा काम किया है। इरफान से लेकर नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर और दिवंगत ओमपुरी ने हालीवुड की फिल्मों में अपना रुतबा कायम किया और कामयाबी तथा सम्मान दोनों को हासिल किया, जो कम बड़ी बात नहीं कही जा सकती। कुछ दिनों पहले ही आस्कर के मंच से ओमपुरी को जिस तरह से याद किया, वो भारतीय कलाकार के तौर पर ओमपुरी का सम्मान है।

हालीवुड जाने की बात सोचने में कोई बुराई नहीं है। बड़ी बात ये है कि हमारे कलाकार क्या सोचकर वहां जाते हैं।प्रियंका और दीपिका के मामलों में सबसे बड़ी कमजोरी ये रही कि ये दोनों इस सोच के साथ वहां पंहुची कि वे बालीवुड की बड़ी स्टार हैं, तो उनके स्टारडम पर मंत्रमुग्ध होकर वहां उनको बड़ी फिल्मों में मजबूत रोल मिलेंगे। ये खोखलापन इन दोनों को भारी पड़ा। अगर हालीवुड को ग्लैमर के पीछे भागना हो, तो वहां ऐसी सुंदरता की कमी नहीं, जो उनकी फिल्मों की जरुरत को आसानी से पूरा कर सकती हैं। उनको अपनी फिल्मों के लिए भारतीय सुंदरता की जरुरत नहीं होती।

कहते हैं कि वक्त से बड़ा सबक कोई नहीं होता। दीपिका और प्रियंका के पास भी अपनी अपनी गलतियों से सबक सीखने का मौका है। बालीवुड ने उनको स्टार बनाया। भारतीय जनता ने उनको स्टारडम दिया। प्रियंका और दीपिका सिर्फ सुंदर नहीं, अभिनय के मामले में भी वे अपनी काबिलियत को साबित कर चुकी हैं। हालीवुड कभी भी उनकी क्षमताओं का पैमाना न था, न ही हो सकता है। वक्त का तकाजा तो यही है कि बालीवुड का इंटरनेशनल फेस बनने की ललक की हकीकत को पहचानकर अगर ये दोनों अपनी अपनी हालीवुड की फिल्मों के नतीजों के प्रति ईमानदारी से सोचें, तो जवाब बहुत सहज रहेगा कि कहीं जाने की जरुरत नहीं है।

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में कमर्शियल सिनेमा के बाजार के विस्तार में अगर हालीवुड की दुनिया हमारी दुनिया का हिस्सा बनना चाहती है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। आखिरकार दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाली भारतीय फिल्म इंडस्ट्री मौजूदा वक्त में इतनी मजबूत तो बन चुकी है कि हालीवुड को अपनी शर्तों पर यहां कारोबार करने का मौका दे। इन शर्तों में पहली और एकमात्र शर्त यही हो सकती है कि हमारे कलाकारों के सम्मान और काबिलियत को लेकर कोई समझौता नहीं होगा। अगर हम अपने रुख को लेकर स्पष्ट और मजबूती से खड़े रहें, तो हालीवुड को हमारी शर्तों पर काम करना होगा।
प्रियंका और दीपिका की फिल्मों का नतीजा अगर किसी को नहीं चौंकाता, तो इसलिए कि ये होना ही था। बहुत ज्यादा मायूसी की जगह अगर हकीकत के ठोस धरातल को पहचान कर दीपिका और प्रियंका पहले बालीवुड की उस जमीन को मजबूत करें, जिनके बूते वे स्टारडम के शिखर पर पंहुची हैं, तो आने वाले कल में मुमकिन है कि हालीवुड का पेशेवर बाजार उनके साथ हमारी दुनिया, हमारी जमीन पर हमारी शर्तों के साथ काम करे और वो दिन जब आएगा, तो चमत्कार को नमस्कार करने की जरुरत नहीं होगी।

Saturday, May 27, 2017

तीन शब्दों का जादुई जाप- सचिन.. सचिन... सचिन...



प्रेम की गंगा बहाने वाला हिंदी सिनेेमा अंग्रेजियत के तरीकों से अब तक तीन जादुई शब्दों को आई लव यू के तौर पर प्रचारित और प्रसारित करता आया है। शुक्रवार, 26 मई को सिनेमा के परदे पर तीन शब्दों के जादू का नया इतिहास गढ़ा गया और ये शब्द थे- सचिन... सचिन.. सचिन....   

तीन शब्दों की ये गूंज कभी क्रिकेट के स्टेडियम को सचिनमय बनाती रही। पहली बार इन तीन शब्दों ने इस गूंज को सिनेमाई परदे के साथ सीधे तौर पर जोड़ा। क्रिकेट की दुनिया का मनोरंजन की दुनिया के साथ रिश्ता भले ही कितना पुराना हो, लेकिन 26 मई को तीन शब्दों की गूंज ने इस रिश्ते को अमरत्व दे दिया।


सिनेमा दर्शकों के जज्बातों के साथ जुड़ने की परंपरा रही है, जिसे तमाम किस्म की कहानियों के साथ एक सदी से भी ज्यादा वक्त के साथ निभाया जा रहा है। 26 मई को सिनेमा के परदे का सफर एक अलग मोड़ पर जा पंहुचा, जहां परदे पर कहानी भी थी, तमाम रंगों के जज्बात भी थे, फिर भी वो परंपरागत सिनेमा नहीं था। यहां कोई मसाला नहीं था। कोई नाच-गाना नहीं था। सिनेमा के दिग्गजों के लिए भी ये अनुभव अलग किस्म का था। यही वजह थी कि समीक्षाओं के नाम पर फिल्मों का पोस्टमार्टम करने वाले पत्रकारों की बिरादरी भी भौंचक्की थी। झटपट अंदाज में फिल्मों और सितारों को नापने-तोलने और हिट-फ्लाप का फरमान सुनाने वालों को यहां खासी दिक्कत थी कि समीक्षा के नाम पर खूबियों-खामियों और रेटिंग वाले फारमेट में सचिन की फिल्म को कैसे फिट किया जाए।


ये दिक्कत बेवजह नहीं थी। सचिन की फिल्म को डाक्यू ड्रामा का नाम दिया गया। डाक्यू ड्रामा देखना न तो हमारे दर्शकों की आदत में शुमार रहा है और न ही पत्रकार बिरादरी में इसे लेकर ज्यादा कोई तजुर्बा है। अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा की समझ रखने वाले गिने-चुने पत्रकारों को डाक्यु ड्रामा कहे जाने वाले इस माध्यम को समझने का तजुर्बा हो। लिहाजा समीक्षक बिरादरी के दिग्गजों को समझने और समझाने में दिक्कत हुई कि उन्होंने जो परदे पर देखा, उसे कैसे बयां किया जाए। ये कश्माकश इस बात का सबसे बड़ा सबब थी कि सचिन की फिल्म के नाम पर परदे ने जो दिखाया, वो एक नए युग की शुरुआत है और शुरुआत उस नाम से, जिसके लिए माना जाता है कि युग-युग में सचिन एक बार ही पैदा होता है।


फिल्म देखने वाली पब्लिक के लिए भी परदे का ये नजारा नया जरुर था, लेकिन उनको भौंचक्का इसलिए नहीं कर रहा था कि हमारी पब्लिक सालों से अपने फेवरेट सितारों को परदे पर देखकर खुश होने का हुनर जानती है। इस बार फर्क ये था कि परदे पर नजर आने वाला सितारा किसी लेखक की कल्पना का नतीजा नहीं था। इसके बावजूद परदा उन दर्शकों को अपने साथ बांध चुका था। कभी हंसी, कभी मुस्कान, कभी आंखों में नमी, कभी आंसू, कभी खुशी का ठहाका  कभी तालियों की गूंज, तो कभी उदासी भरी खामोशी.. क्या नहीं हो रहा था परदे पर। दर्शक हमेशा से परदे पर ये ही सब तो देखते आ रहे हैं, मगर ये फर्क कम बड़ा नहीं था।
आज परदा किसी काल्पनिक नायक के दायरे से बाहर निकलकर उस नायक की नायिकी को सलाम कर रहा था, जिसके लिए पब्लिक की दीवानगी का हर शब्द छोटा हो चुका है। एक और दिलचस्यप बात ये रही कि यहां सचिन और  क्रिकेट के  फैन होने या न होने का फर्क मिट गया। सचिन के फैंस के लिए उनके भगवान की गाथा परदे पर थी, तो क्रिकेट और सचिन के फैन न होने वाले भी छाती चौड़ी कर रहे थे कि ये वो बंदा है, जो हमारा है, सिर्फ हमारा सचिन।

फिल्में हर शुक्रवार को रिलीज होती हैं। नई फिल्मों के साथ हर शुक्रवार को नए नायक या तो गढ़े जाते हैं या मिट जाते हैं। कुछ लड़खड़ाते हैं, तो कुछ बिखर जाते हैं और कुछ नए चांद की मानिंद सिनेमा के आकाश को चमकीला करते हैं। धड़कनों को तेज करता सदी पुराने इस खेल का नायक रहा शुक्रवार 26 मई को दंडवत की मुद्रा में था। इस दिन सिनेमा का परदा उस दिन उस चमत्कार के अवतार से चकाचौंध था, जिसके आगे कामयाबी और नायिकी के शब्दों ने भी पनाह मांग ली हो। कोई यूं ही तो भगवान का दर्जा नहीं पा लेता। सचिन खुद को भगवान नहींं मानते, तो ताज्जुब नहीं। भगवान ने भी आखिर कब खुद को भगवान माना है। जो भगवान में विश्वास करता है, वो क्रिकेट के इस भगवान को नमन करने में संकोच नहीं करेगा।


सिनेमा का सफर आगे बढ़ेगा। फिर से किस्म किस्म की फिल्में आएंगी। नायकों का मेला लगेगा। सब कुछ होगा, जो 26 मई से पहले होता रहा है। 26 मई को सिनेमा का इतिहास करवट ले चुका है। अब जब भी परदे के नायकों की गाथा का जिक्र होगा, तो इसमें दो बातों को कोई अनदेखा नहीं कर पाएगा। पहली बात- क्रिकेट का भगवान हमारे सिनेमा के परदे को धन्य कर चुका है और दूसरी बात- इस भगवान की भक्ति तीन शब्दों में ही तो सिमट जाती है- वही तीन शब्दों का जादू- सचिन सचिन सचिन....!





Wednesday, May 24, 2017

बिहारी बाबू और गुजराती बापू होने का सियासी फर्क



चलिए, बगैर किसी लाग लपेट के बात शुरु करते हैं। परेश रावल चाहते हैं कि कश्मीर को लेकर अलग सुर में बोलने वाली अरुंधिति राय को फौजी जीप के आगे बांधकर उनको सजा दी जाए। शत्रुघ्न सिन्हा चाहते हैं कि उनकी पार्टी के नेता बिहार और देश में  विरोधियों पर बिना सबूतों के आरोप लगाने की सियासत बंद करें। परेश रावल और शत्रुघ्न सिन्हा दोनों भाजपा के सीनियर नेताओं में आते हैं। दोनों ने सियासी मैदान में आने से पहले फिल्मों की दुनिया में लंबी पारी खेली है। दोनों ने ही चुनावों के वक्त पार्टी के प्रचारक की हैसियत से अपनी सियासी पारी की शुरुआत की और दोनों को चुनावी मैदान में उतारा गया।


एक बिहारी बाबू हैं, तो दूसरे को दिल्ली के सियासी गलियारों में गुजराती बापू कहा जाता है। यहां बापू का मतलब महात्मा गांधी से नहीं, बल्कि गुजरात में अपने से बड़े को सम्मान माना जाता है। अभिनेता से नेता बने ये दोनों दिग्गजों इस वक्त जिन खबरों को लेकर चर्चा में हैं, उनका आपस में सीधे तौर पर कोई रिश्ता नहीं बैठता, मगर विरोध का तरीका और सलीका इसमें ऐसा
कामन फैक्टर है, जहां दोनों अलग अलग छोर पर खड़े हुए नजर आ रहे हैं। सियासत के मैदान में शत्रुघ्न सिन्हा के मुकाबले परेश रावल का अनुभव कम जरुर है, लेकिन दोनों की सियासी जमीं और सोच में सबसे बड़ा फर्क ये है कि शत्रुघ्न सिन्हा राजनीति के सिद्धांतों की वो डुगडुगी बजाते हैं, जो सिर्फ उनको भाती है, जबकि मौजूदा दौर में उनकी राजनीति गैरप्रासंगिक हो चुकी है। परेश रावल राजनीति की उस जमींन पर खड़े हैं, जो आज के दौर की जरुरत है। परेश रावल अपनी सियासत में वो सब कुछ करते हैं, जो उनकी पार्टी की लीडरशिप को अच्छा लगता है। शत्रुघ्न सिन्हा बीते जमाने की राजनीति से चिपके रहकर खुद को खुश और पार्टी को नाराज करने में संकोच नहीं करते, तो परेश रावल अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं को खुश रखने के गुर समझ चुके हैं और इसी मंत्र के बूते तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

सियासत में वैचारिक स्तर पर विरोध होता है, इसलिए शत्रु्घ्न सिन्हा और परेश रावल में से किसी की बात को अजूबा नहीं कहा जा सकता। विरोध की सियासत परेश रावल भी कर रहे हैं और शत्रुघ्न सिन्हा भी। फर्क इतना है कि दोनों ने विरोध का ऐसा तरीका अपनाया कि दोनों को लेकर बहसबंदी का दौर शुरु हो गया। इसमें कौन गलत है और कौन सही है, ये आकलन अलग बात है। वैसे भी सियासत का पहला सबक यही पढ़ा और पढ़ाया जाता है कि कोई नेता कभी अपनी बात को गलत नहीं मान सकता।


दोनों के विरोध की ताजा खबरों के आकलन को और आगे बढ़ाएं तो मामला और दिलचस्प हो जाता है। बिहारी बाबू के निशाने पर अपनी ही पार्टी के नेता हैं। भाजपा में नई लीडरशिप के सामने आने के बाद शत्रु अक्सर अपनी ही पार्टी और सरकार को झेंपने के लिए मजबूर करते आए हैं। सियासी तजुर्बे के बच्चे भी बता सकते हैं कि भाजपा में शत्रु के दोस्त और दिन लगातार कम होते जा रहे हैं। सिद्धांतवादी राजनीति से अपना सफर शुरु करने वाले शाटगन खुद को खुश करने के चक्कर में गलत मौके पर गलत तरीके से सही बात करने के शिकंजे में इतने जकड़े गए कि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व तो उनको अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शक मंडल में भी उनको जगह देने का जोखिम नहीं लेगा। देखने वाली बात सिर्फ इतनी है कि शत्रु खुद शहीद होंगे या पार्टी उनकी शहादत की औपचारिकता निभाएगी?


परेश रावल का मामला ज्यादा दिलचस्प है। उनके निशाने पर अंरुधिंति राय हैं, जो किसी सियासी जमात से नहीं है। अरुंधिति का विरोध परेश रावल को अपनी पार्टी के राष्ट्रवाद के उस कट्टरपन के साथ जोड़ता है, जहां पार्टी और सरकार का विरोध देशविरोधी मानने वालों में परेश रावल भी हैं और खुद ही सजा भी मुकर्रर करना नहीं भूलते। देशभक्ति के नाम पर देश की सत्ता के मुखर और मौन समर्थन ने जो स्थिति बना दी है, उसमें एक सांसद महोदय का किसी महिला के लिए सजा मुकर्रर करना हैरान नहीं करता, क्योंकि उस महिला के विचार परेश रावल की पार्टी की सोच से मेल नहीं खाते। जो लोग ये समझ रहे हों कि परेश रावल ने खालिश तैश में आकर अरुंधिती के लिए इस तरह की सजा मुकर्रर की है, वे न तो परेश रावल को जानते हैं और न उनकी सियासत को समझ पाएंगे। परेश रावल की सियासत का गुणा भाग जमाने से पहले एक बात समझना जरुरी हो जाता है कि परेश रावल किसी भी एंगल से शत्रुघ्न सिन्हा वाली भावुकता और संवेदनाओं से नहीं जुड़े हैं। ये गुजराती बाबू सियासत में बिहारी बाबू सरीखी बकबक वाली सियासत करने नहीं आए। शत्रुघ्न सिन्हा अगर अपनी पार्टी से बाहर होने के कगार पर हैं तो अरुंधिति वाले मामले में उनकी बहादुरी के लिए परेश रावल को उनकी पार्टी की लीडरशिप पार्टी या सरकार में उनको कोई बड़ा ओहदा देकर उनको नवाज सकती है।


दरअसल शत्रुघ्न सिन्हा जो बात सालों से सियासत के मैदान में रहकर नहीं समझ पाए, वो परेश रावल ने पहले दिन से समझ ली थी कि सियासत में वो मत कहो, जिसमें नैतिकता या  सिद्धांतों की गंध आती हो। परेश रावल उस सियासत का चेहरा हैं, जहां विरोध की चीख-पुकार का कोई नैतिक आधार तलाशने वाले मूर्ख साबित हो जाता है।
शत्रुघ्न सिन्हा ने सियासत के जिस रास्ते पर चलकर अपनी ही पार्टी के विरोधी होने का तमगा पहनकर खुद को अलग थलग होने की हालत में पंहुचाया, तो परेश रावल ने समझदारी दिखाते हुए राष्ट्रवाद का वो रास्ता चुना, जहां उनकी तरक्की के नए रास्ते खोलता है। याद रहे कि इस साल के आखिर में गुजरात के विधानसभा के चुनाव होने हैं। कौन जाने, आज के सम्मानित सांसद महोदय को इन चुनावों के बाद अपने गृहराज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने का मौका भी मिल जाए।

असली मुद्दा वैचारिक मतभेदों का ही रह जाता है। मुमकिन है कि परेश रावल को अपनी पार्टी के वो भूतपूर्व प्रधानमंत्री याद हो, जिनके अभूतपूर्व राजनैतिक कौशल का लोहा उनके सियासी विरोधी निसंकोच मानते थे। परेश रावल नहीं जानते हों तो याद दिलाया जा सकता है कि विरोधियों का सम्मान करना माननीय अटल
बिहारी वाजपेयी की सियासत का मुख्य आधार रहा। परेश रावल सियासत में आए हैं, तो विरोधियों पर वार करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो जाता है, लेकिन परेश रावल जब विरोध के सुरों को अमर्यादित बनाने में कोताही नहीं करते, तो वे ऐसी मुद्रा में पंहुच जाते हैं, जहां एकमेव लक्ष्य अपने नेतागणों की कृपा पाने तक हो जाता है और यहां आकर जब उनकी गुजराती रंगमंच से लेकर बालीवुड के कद्दावर अभिनेता की लंबी पारी को याद किया जाए, तो नेता परेश रावल और अभिनेता परेश रावल के बीच जमीन-आसमान का अंतर साफ तौर पर दिखाई देता है।


परेश को दोषी ठहराने या शत्रुघ्न को निर्दोष बताने की यहां कतई कोशिश नहीं है। यहां सिर्फ बात हो रही है विरोध के स्तर की। दोनों ही फिल्मी दुनिया से राजनीति में गए हैं, तो वो दौर भी याद आता है, जब इन दोनों से पहले भी बालीवुड के तमाम सितारों ने सियासती गलियारों का सफर देखा। इतिहास बताता है कि फिल्मी सितारों ने सियासी मैदान में या तो मौनव्रत साधे रखा या तंग आकर खुद अपनी दुनिया में लौट आए। दो बातें खास तौर पर याद आती हैं। राजनीति के मैदान में लंबी पारी खेलने वाले सितारों ने कभी किसी के विरोध को लेकर वो रास्ता नहीं अपनाया, जिस पर आज की राजनीति के सिरमौर बने गुजराती महापुरुष और उनका अनुसरण कर रहे बापू परेश रावल सरपट दौड़ रहे हैं और बिहारी बाबू सिद्धांतवादी राजनीति के नाम पर लड़खड़ा रहे हैं।
इन दोनों की सोच, समझ और भविष्य को समझना कतई मुश्किल नहीं..,


कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...