Saturday, August 26, 2023

सरकारी पुरस्कारों की इस बंदरबांट में हैरानी किसे ?

क्या कश्मीरी फाइल को नेशनल एवार्ड मिलने से वो लोग हैरान हुए होंगे, जो इसे मुस्लिमों के खिलाफ हिंदुओं को जगाने वाली फिल्म मान रहे थे। क्या वे लोग हैरान हुए होंगे, जो इसे सरकारी प्रोपगंडा वाली ऐसी फिल्म मान रहे हों, जिसे सत्ताधीश पार्टी ने चुनाव प्रचार में खुलकर इस्तेमाल किया। 

विडंबना ये है कि मुस्लिमों पर  खुलकर कीचड़ उछालने वाली फिल्म को राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाली फिल्म की कैटेगिरी में सिलेक्ट किया गया। कुछ लोग इस बात को लेकर बहस कर सकते हैं कि इस फिल्म को बेस्ट फिल्म का, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर से लेकर बेस्ट स्टोरी, स्क्रीनप्ले वगैरहा के दूसरे एवार्ड क्यों नहीं मिले। अनुपम खेर को एवार्ड नहीं मिला, तो मीडिया में वो अपनी तकलीफ रोक नहीं पाए। 
नेशनल एवार्ड के इतिहास को देखें, तो ऐसे वाक्यों से इन पुरस्कारों का इतिहास भरा पड़ा है, जब इन पुरस्कारों पर  सरकारी पक्षपात का आरोप लगा । दरअसल ये एक ऐसी परंपरा बन चुकी है, जिसका पालन हर सरकार अपनी मर्जी से करती है। मौजूदा सरकार ने भी कुछ डिफरेंट नहीं किया। इस सरकार ने चुन चुनकर ऐसे लोगों को इन पुरस्कारों से नवाजा, जिनकी योग्यता सिर्फ सरकारी विचारधारा का खुलकर प्रचार करना हो, वो अक्षय कुमार हों या कंगना हों। 

अक्षय कुमार  वही हैं, जो प्रधानमंत्री से इंटरव्यू करते हैं और आम काटकर खाते हैं या चूसकर खाते हैं जैसे सवाल पूछकर अपनी शान बढ़ाते हैं। वे सतारुढ़ पार्टी के लिए वफादारी दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। एक अघोषित पार्टी कार्यकर्ता की तरह वे आकाओं को खुश करने के लिए ऐसी फिल्मों का निर्माण करते हैं, जिनकी कहानियों और किरदारों का झुकाव या तो हिंदुवादी सोच की तरफ रहा या फिर सरकारी कार्यक्रमों का भोंपू बजाती रहीं। अगर अगले चुनावों में यही सरकार वापसी करती है, तो ओह माय गॉड 2 के लिए अक्षय  की झोली सरकारी पुरस्कारों से भर जाएगी। 

सरकारी पार्टी का समर्थन करने में अक्षय कुमार के साथ सीधा मुकाबला करने वाली कंगना वही हैं, जिनको लगता है कि देश को 2014 में असली आजादी मिली थी। कश्मीरी फाइल के डायरेक्टर की तो बात ही क्या करनी, सरकार ने भले ही उनको नेशनल एवार्ड देकर उनको खुश किया हो, लेकिन उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में अपनी फिल्म के लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रमोशन की बात को नकार दिया। 
सरकारी पुरस्कारों में सरकारी बंदरबांट का सबसे दिलचस्प किस्सा अब भी वही माना जाता है, जब 1991 में नेशनल एवार्ड तय किए गए। 

पुरस्कारों को तय करने के लिए जब अशोक कुमार (दादा मणि) के नेतृत्व में ज्यूरी की दिल्ली में मीटिंग हो रही थी, तो वहां एक मंत्री (तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री सुबोधकांत सहाय) आते हैं और ये कहकर चले जाते हैं कि ज्यूरी बेस्ट हीरो के लिए कोई नाम तय न करे। सरकार ने (मतलब प्रधानमंत्री स्तर पर) उस साल बेस्ट हीरो के लिए एक नाम तय कर लिया, जिसके बारे में ज्यूरी को भी भनक नहीं थी। जब पुरस्कारों की घोषणा हुई, तो ज्यूरी को ये पता चला कि इस साल का नेशनल एवार्ड फिल्म अग्निपथ के लिए अमिताभ बच्चन को दिया जाता है। ये पहला मौका था, जब अमिताभ को कोई नेशनल एवार्ड मिला था। 

अगले साल के आम चुनावों में मौजूदा सत्ता वापसी करती है या नहीं, ये आने वाले वक्त की बात है। इस दौर का सत्तातंत्र हमेशा इस बात के लिए याद किया जाएगा, इस दौरान आजाद भारत के हर तंत्र को अपने हिसाब से बदला। ऐसे में ये मुमकिन नहीं था कि फिल्म इंडस्ट्री और सरकारी एवार्ड अछूते रह जाते। और हां, अगर कोई ये सोचता है कि अगली बार (जब कभी) सत्ता परिवर्तन के बाद नेशनल एवार्ड मैरिट पर दिए जाने लगेंगे, तो ये भी ख्याली पुलाव ही है। मुमकिन है कि वहां चेहरे और किरदार बदले हुए हों, लेकिन परदे के पीछे का सरकारी तमाशा ऐसा ही होगा,जैसा अब हो रहा है। उस वक्त उस दौर के किसी अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, कंगना से लेकर किसी कश्मीरी फाइल के साथ यही बंदरबांट हो रही हो।

 

  



Tuesday, August 22, 2023

सनी हों या अमिताभ, कर्ज का मर्ज सबसे भारी


ऐसे में, जब गदर 2 बाक्स आफिस पर रिकार्ड तोड़ कमाई कर रही हो, ये खबर चौंकाने वाली थी कि फिल्म के हीरो सनी देओल की मुंबई में स्थित जुहू विला को बैंक आफ बड़ोदा नीलाम करने जा रहा है, क्योंकि सनी देओल पर 56 करोड़ का कर्ज है। बैंक ने अखबारों में नीलामी के विज्ञापन निकाले और इससे पहले कुछ हो पाता, किसी तकनीकी वजह को आधार बनाकर नीलामी के प्रोसेस पर रोक लगा दी। सनी फिल्म इंडस्ट्री के पहले हीरो नहीं है, जिनके कर्जे का ये नतीजा देखने को मिला। याद किया जा सकता है कि अमिताभ बच्चन ने भी कर्जे न चुका पाने का एक कड़वा दौर देखा है। सनी और अमिताभ बच्चन के मामलों की तुलना नहीं हो सकती। अमिताभ बच्चन का मामला ज्यादा साफ था, जबकि सनी देओल के मामले की असलियत किसी को नहीं पता कि उन्होंने किसलिए ये कर्जा लिया और क्यों नहीं लौटाया। 
सनी के मामले को लेकर कोई भी शख्स सबसे पहले यही सोचेगा कि जिस हीरो की नई फिल्म (गदर 2) बाक्स आफिस पर करोड़ों की कमाई कर रही हो, उसे 56 करोड़ का कर्जा चुकाने में कैसा समस्या हो सकती है। ये फिल्म रिलीज न हो पाती, तो भी जहां तक दुनिया को सनी देओल के बारे में पता है, वे जानते हैं कि उनके पापा धर्मेंद्र की करोड़ों की प्रापर्टी है। 
सनी विला, जिसमें सनी सुपर साउंड है
मुंबई के जुहू में ही एक बड़ा बंगला है, जिसमें धर्मेंद्र, सनी और बाबी देओल के परिवार एक साथ रहते हैं। जुहू में ही सनी देओल का रिकार्डिंग स्टूडियो सनी सुपर साउंड है। जिस जगह ये स्टूडियो है, जिसका नाम सनी विला है और इसी को नीलाम करने के लिए बैंक ने ये नोटिस दिया था। सनी की गाड़ियों के काफिले में एक से बढ़कर एक महंगी कारें हैं। मुंबई के नजदीक पनवेल में उनका एक बड़ा फाम-हाउस है, जहां फिलहाल धर्मेंद्र रहते हैं। मुंबई से लेकर लंदन और पंजाब तक देओल परिवार की तमाम प्रापर्टी बताई जाती हैं। सनी और उनके छोटे भैया बॉबी देओल को किसी भी फिल्म में काम करने के लिए करोड़ों रु. की फीस मिलती है।
सनी को करीब से जानने वाले लोगों को ये खबरें नहीं चौंकाती। फिल्म इंडस्ट्री में परदे के पीछे की खबरों में अपने कर्जों को लेकर वे काफी समय से चर्चाओं में रहे हैं। अब अगर बैंक ने नीलामी का नोटिस अखबारों में न छापा होता, तो फिल्म इंडस्ट्री से बाहर की दुनिया को इस मामले का पता नहीं चलता। 
सनी को लेकर कुछ सालों का एक किस्सा बहुत चर्चा में रहा। ये उस वक्त की बात है, जब घायल, दामिनी और घातक जैसी फिल्मों की सफलता के साथ उनकी दमदार वापसी हुई थी। कुछ निर्माताओं ने निजी तौर पर अपने अनुभव शेयर किए कि नई फिल्मों को लेकर सनी ने एक चकरी घुमाई थी। 
ये चकरी कुछ इस तरह से होती थी। एक निर्माता ने सनी देओल को अपनी फिल्म के लिए साइन किया और 20 लाख का एडवांस दे दिया। कुछ दिनों में सनी ने एक और नई फिल्म साइन की और इस बार एडवांस के तौर पर उन्होंने 30 लाख रु. लिया। अब सनी ने पहले वाले उस निर्माता को बुलाया, जिससे वे 20 लाख का एडवांस ले चुके थे। सनी ने उस निर्माता को कोई मजबूरी बताकर उसकी फिल्म में काम करने से मना कर दिया और एडवांस के तौर पर लिए 20 लाख में से 10 लाख लौटा दिए और बाकी रकम बाद में लौटाने का वादा किया। इस तरह से उस फिल्म का चैपटर बंद कर दिया। अब कुछ दिनों बाद सनी ने एक और फिल्म साइन की और इस बार उन्होंने एडवांस में 40 लाख रु ले लिया। अब उन्होंने उस निर्माता को बुलाया, जिससे उन्होंने 30 लाख रु एडवांस लिया था। सनी ने कुछ मजबूरी बताकर उसकी फिल्म में भी काम करने से मना कर दिया और उसे एडवांस में लिए 30 लाख में से 15 लाख रु लौटा दिए और इस निर्माता को भी बाकी रकम जल्दी लौटाने का वादा करके उसकी फिल्म का एकाउंट भी बंद कर दिया। कुछ दिनों बाद एक और निर्माता ने सनी को एडवांस में 50 लाख रु दे दिया और सनी ने उस निर्माता को बुलाकर 20 लाख रु दे दिए, जिससे उन्होंने 40 लाख रु का एडवांस लिया था। इस फिल्म का भी एकाउंट बंद हो गया। 

बताते हैं कि उस दौर में सनी ने इस पैटर्न पर कम से कम आधा दर्जन (6 निर्माताओं) के साथ यही खेल खेला था। गणित जानने वाले गुणा-भाग करके जान सकते हैं कि बिना किसी फिल्म में काम किए सनी ने कितनी रकम अंदर कर ली। सनी ने जिन निर्माताओं को एडवांस की बाकी रकम लौटाने का वादा किया था, उनमें से एक भी ऐसा नहीं रहा होगा, जिसने सनी से बाकी रकम के पेमेंट के लिए कभी कांट्रेक्ट किया हो। हर निर्माता यही सोचकर राहत महसूस करता रहा कि उसकी कम से कम आधी रकम तो वापस मिल गई। 
अगर गौर से देखें, तो  अमिताभ बच्चन का मामला ज्यादा साफ था। उन्होंने एबीसीएल कंपनी बनाई, जिसने पहली बार भारत में मिस वर्ल्ड का आयोजन किया। फिल्में बनानी शुरु कीं, फिर भी एबीसीएल की नैया डगमगाने लगी। जल्दी ही ये कंपनी दिवालिया हो गई और 
अमिताभ को राहत पंहुचाने वाले अमर सिंह

अमिताभ बच्चन पर दूरदर्शन की सौ करोड़ की देनदारी हो गई। उस दौर में अगर अमर सिंह उनकी मदद के लिए आगे नहीं आए होते, तो दूरदर्शन की देनदारी चुकाने के लिए बच्चन को भी अपनी प्रापर्टी की नीलामी के दंश को सहना पड़ता। आर्थिक बदहाली के उसी दौर में अमिताभ बच्चन को फिल्मों में काम मांगने के लिए निर्माताओं के आफिसों के चक्कर लगाने पड़े। काम मांगने के लिए ही उन्होंने यश चोपड़ा से संपर्क किया, तो उनको मोहब्बत में कास्ट किया गया और इस फिल्म के बाद कौन बनेगा करोड़पति ने बच्चन की जिंदगी की दिशा और दशा दोनों को बदल दिया। 
यशराज की मोहब्बतें में अमिताभ 

आर्थिक बदहाली के इस दौर से अमिताभ बच्चन ने सबक सीखा और जब जैकी श्राफ की पत्नी आयशा की फिल्म बूम में काम करने के एवज में मिला 25 लाख का चेक बाउंस हो गया, तो बिना लाग लपेट के अमिताभ बच्चन ने उनको लीगल नोटिस भिजवाने में भी गुरेज नहीं किया और मीडिया के सामने भी माना कि वे पैसों के लिए अब कोई कंप्रोमाइज नहीं करते।
मनोरंजन की दुनिया में अमिताभ या सनी मात्र उदाहरण नहीं हैं, जो आर्थिक संकट से गुजरे हों। ये जगमग दुनिया हमेशा से अनिश्चितता से घिरी रहती है, जहां नाकामयाबी किसी को बर्बाद करने में देर नहीं लगाती। कितने ही उदाहरण ऐसे हैं, जहां आर्थिक तंगहाली से बड़े सितारों की जिंदगी का ऐसा दर्दनाक हुआ कि उनके अंतिम संस्कार के लिए भी चंदा इकट्ठा करना पड़ा।

अमिताभ बच्चन का मामला आया और चला गया। सनी का मामला भी थोड़े दिनों बाद किसी को याद नहीं रहेगा, लेकिन ये बात शायद हर किसी को याद रहेगी कि बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज दोहरे चेहरों के साथ जीते हैं और इनमें से असली चेहरे को पहचानना सबसे मुश्किल होता है। अमिताभ और सनी भी इसका अपवाद नहीं है। 





Thursday, August 17, 2023

गदर 2 और पठान की सफलता में आग लगाने वाले कौन ?


हर किसी को खुश होना चाहिए कि इस साल फिल्म इंडस्ट्री को दो ब्लाकबस्टर फिल्में अब तक मिल चुकी हैं। साल के शुरु में (जनवरी) में यशराज की फिल्म पठान ने आंकड़ों की कामयाबी की एक नई इबारत लिखी, तो पिछले हफ्ते रिलीज हुई गदर 2 ने बाक्स आफिस पर गदर मचा दिया और कामयाबी के झंडे गाड़े। ऐसा मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं था कि इन दो फिल्मों की महासफलता से फिल्म वालों की दुनिया जगमगा जाएगी, लेकिन यहां फिलहाल कुछ और ही मंजर नजर आ रहा है। 

इंटरनेट की दुनिया में होड़ इस बात को लेकर मची हुई है कि बाक्स आफिस पर गदर बड़ी हिट हुई है या पठान। आंकड़ों की बाजीगरी दिखाने के लिए दोनों तरफ की फौज जमा हो गई है। सबसे ज्यादा अफसोस की बात ये है कि इस खेल में कुछ ऐसे विद्वान भी शामिल हो गए हैं, जो इस मुकाबलेबाजी को हिंदु-मुस्लिम बनाने पर तुले हुए हैं और इसे सनी देओल बनाम शाहरुख खान का अखाड़ा बनाया जा रहा है। आंकड़ेबाजी का तमाशा करने वालों में से हर कोई जानता है कि इस दौर में किसी के पास किसी भी फिल्म के सही आंकड़े नहीं होते। हर किसी फिल्म की  प्रोडक्शन कंपनी या फिर कारपोरेट हाउस की तरफ के जो आंकड़े दे दिए जाते हैं, उनको ही सच मान लिया जाता है। इन आंकड़ों की सच्चाई जानने का बैरोमीटर किसी के पास नहीं है। 

90 के दशक तक मामला अलग होता था, जब फिल्म इंडस्ट्री के कारोबार पर नजर रखने का काम ट्रेड मैग्जीन किया करती थीं। उस दौर में चार-पांच ऐसी ट्रेड मैग्जीन हुआ करती थीं, जिनके पास देश भर के हर सिनेमाघर से हर शो के आंकड़े सीधे पंहुच जाया करते थे। ये वो दौर था, जब सिंगल थिएटरों में फिल्मों की कमाई हुआ करती थी। सिनेमाघरों से आने वाले  टिकटों की कमाई के आंकड़ों से फिल्म की शुरुआती कमाई का अनुमान लगाया जाता था और अगले सप्ताह के अंत तक फिल्म की कमाई की स्थिति ज्यादा साफ हो जाया करती थी। उस वक्त सिनेमाघरों में सीटों की क्षमता (मान लीजिए, एक सिनेमाघर में 320 सीटें हैं) और हर शो में टिकटों की बिक्री के गुणा-भाग से प्रति शो से लेकर प्रति दिन और प्रति सप्ताह तक की कमाई को लेकर तस्वीर साफ हो जाया करती थी। उस वक्त एक और खुशनुमा तस्वीर सामने आया करती थी। उदाहरण के तौर पर समझिए, अगर जब उस दौर में गदर जैसी फिल्म को बड़ी कामयाबी मिलती थी, तो सनी देओल की आने वाली फिल्मों के निर्माताओं और निर्देशकों की ओर से ट्रेड पत्रिकाओं में विज्ञापनों के जरिए खुशी व्यक्ति की जाती थी और इस बात पर ताज्जुब नहीं होता था, जब पठान की टीम, यानी यशराज की ओर से भी ट्रेड पेपर में गदर की कामयाबी के लिए टीम को मुबारकबाद के विज्ञापन आते थे। ये एक ऐसा रिवाज था, जो दुनिया को संदेश दिया करता था कि किस तरह से इंडस्ट्री के लोग एक दूसरे के साथ मिलकर काम करते थे। हर शुक्रवार को नई फिल्म रिलीज होती थी और शनिवार को ट्रेड मैग्जीन मार्केट में आया करती थी, जिसके लिए फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों से लेकर स्पाट ब्वाय तक हर कोई इंतजार करता था। 90 के दशक तक हिंदी सिनेमा से जुड़े लोग याद कर सकते हैं कि कैसे मुंबई सिटी के ग्रांट रोड इलाके की नाज बिल्डिंग में ट्रेड मैग्जीनों के आने तक जश्न या मातम का माहौल बन जाया करता था और आंकड़ों का खेल बेपरदा हो जाता था। इन मैग्जीनों में प्रकाशित होने वाले आंकड़ों के आधार पर ही बाकी मीडिया भी फिल्मों की बाक्स आफिस परफारमेंस की खबरें तैयार किया करता था। 

इससे पहले पठान बनाम गदर 2 के मामले पर लौटा जाए, फिल्म के बिजनेस के एक और एंगल को समझने की जरुरत है। पहले जहां सिनेमाघरों से ट्रेड मैग्जीनों तक सीधे आंकड़े आया करते थे, लेकिन देखते ही देखते ये मामला पूरी तरह से बदलता चला गया। फिल्मों को दिखाने के लिए सिंगल थिएटरों की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले ली और फिल्म मेकिंग में प्रााइवेट प्रोड्यूसरों और फाइनेंसरों की जगह कारपोरेट हाउसेस ने ले ली। मल्टीप्लेक्स पर उन कारपोरेट घरानों का ही दबदबा कायम हो गया, जो फिल्मों के लिए फाइनेंस भी देते थे और इन घरानों के पास पैसों की कोई कमी नहीं होती थी, जबकि पहले के दौर में निर्माता को अपने फाइनेंसरों को उनकी रकम लौटाने के साथ भी बड़ी रकम सूद में देनी होती थी। यहां उदाहरण दिया जाए, तो एक करोड़ की रकम के फाइनेंस में बीस प्रतिश्त तक ब्याज देना होता था और अगर फिल्म किसी वजह से वक्त पर बनकर रिलीज नहीं हुई, तो प्रोड्यूसर को ये अतिरिक्त ब्याज चुकाना पड़ता था। 

हां, एक बात जरुर माननी होगी कि उस दौर में भी ट्रेड मैग्जीनों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते थे और कई बार बिजनेस के आधार पर उनके पक्षपाती होने के मामले भी सामने आया करते थे, लेकिन ये सब आटे में नमक के बराबर माना जाता था। अगर ऐसा नहीं होता, तो उस दौर में शोले के रिव्यू में इसे वाहियात फिल्म कहने की हिम्मत नहीं दिखाई जाती और उससे भी बढ़कर, जब शोले सफलता के आसमान में बुलंद हुई, तो उसे वाहियात कहने वाली ट्रेड मैग्जीन ने अपनी गलती मानते हुए माफी मांगी और शोले का फिर से रिव्यू किया। सोचिए, क्या मौजूदा दौर में ये मुमकिन है। 

इस दौर के कारपोरेट घराने फिल्मों की मेकिंग में सीधी भागेदारी करते हैं। वे निर्माता को फिल्म बनाने के लिए बजट के मुताबिक पैसे देते हैं और मेकिंग में एक्टिव रहते हैं। फिल्म के लिए स्टोरी से लेकर सितारों की महंगी फीस और मार्केटिंग से लेकर प्रमोशन तक हर फील्ड की प्लानिंग पर काम करते हैं। एक तरह से देखा जाए, तो हालीवुड की तर्ज पर अब बड़ी फिल्म कंपनियां कारपोरेट घरानों के लिए कमिशन पर फिल्में बनाती हैं और इसके एवज में उनको बड़ी रकम मिल जाती है। फिल्म की सफलता और असफलता से उनका डायरेक्ट कोई लेना देना नहीं होता। इस बात को पठान और गदर 2 के मामले से समझा जा सकता है। इन दोनों फिल्मों के आंकड़े कुछ भी कहें, लेकिन पठान यशराज की फिल्म है, तो इसके आंकड़ों से शाहरुख खान को कोई नुकसान या फायदा नहीं होने वाला। इसी तरह से सनी देओल ने गदर 2 में काम किया है, जिसके लिए उनकी फीस तय हुई। अब फिल्म के बाक्स आफिस पर आंकड़ों से सनी देओल का भी कोई कनेक्ट नहीं। अगर पठान का निर्माण शाहरुख खान की कंपनी रेड चिल्ली एंटरटेनमेंट ने किया होता और गदर 2 को सनी देओल ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी विजेयता फिल्म्स में बनाया होता, तो उस हालत में ये तय था कि बाक्स आफिस के आंकड़ों से उनकी कंपनियों का सीधा कनेक्शन होता। 

ये बात इसलिए अहम हो जाती है कि सोशल मीडिया पर फैंस होने का दावा करने वालों को तो रहने दीजिए, सालों से खुद को फिल्म के ट्रेड एक्सपर्ट होने का दावा करने वाले भी दिन रात इस प्रोपगंडा को फैलाने में लगे हुए हैं कि कैसे सनी ने बाक्स आफिस के मैदान में शाहरुख खान को पटक दिया, मतलब उन साहब के हिसाब से गदर 2 ने पठान से ज्यादा बिजनेस किया है, इसलिए वे गदर 2 को सुपर हिट कहते हैं और पठान के आंकड़ों के लिए शाहरुख खान को कोसते हुए उनको कोई शर्म भी नहीं आती, जबकि असलियत ये है कि पठान का कारोबार पूरा हो चुका है। फिल्म थिएटरों की स्क्रीन से लेकर ओटीटी तक का सफर कर चुकी है, जबकि गदर 2 को रिलीज हुए अभी एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ है। (ब्लाग लिखे जाने तक गुरुवारकी सुबह) बात साफ तौर पर समझ में आ सकती है कि ये साहब, जो खुद को ट्रेड एक्सपर्ट का तमगा देते हैं, वे सनी देओल और उनकी फिल्म गदर 2 के प्रमोशन की कमान थामे हुए हैं, लेकिन इससे भी ज्यादा उनकी खुन्नस शाहरुख खान से है। खुन्नस की वजह वे ही जानते होंगे। ट्रेड को समझने वाला क्या ये बात नजर अंदाज कर सकता है कि पठान का निर्माण शाहरुख खान ने नहीं, यशराज ने किया है और इस फिल्म को लेकर हुई कमाई पर शाहरुख खान नहीं, यशराज का हक है। अगर फिल्म को हुए मुनाफे में से कुछ हिस्सा शाहरुख खान को मिला हो, जैसा कि अमूमन हर बड़े सितारे का प्रोडक्शन कंपनी और कारपोरेट के साथ करार में दर्ज होता है, तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं। फिर भी ये ट्रेड एक्सपर्ट साहब सुबह सवेरे से देर रात तक न जाने कितनी बार गदर 2 के गाने गाते हैं और उतनी ही बार पठान के आंकड़ों के लिए शाहरुख खान को कोसकर खुश होते हैं। कुछ दिनों पहले तक ये साहब शाहरुख खान के स्टारडम की तारीफों में दिन-रात एक कर देते थे, इसलिए ये शाहरुख खान से खुन्नस का मामला ज्यादा लगता है। सबसे बड़ी अफसोस की बात ये है कि शाहरुख खान से खुन्नस में ये लोग इतने अंधे हो चुके हैं कि दो फिल्मों की बड़ी कामयाबी को हिंदु-मुस्लिम के नैरेटिव देने की कोशिश कर रहे हैं और इसे जबरदस्ती सनी बनाम शाहरुख मुकाबला बनाने पर तुले हुए हैं। अच्छी बात तो ये है कि गदर 2 और पठान एक दिन रिलीज नहीं हुई, वरना ये मुकाबला शाहरुख खान और सनी से ज्यादा हिंदु बनाम मुस्लिम का हो जाता। मजे की बात ये है कि सनी की फिल्म के साथ बाक्स आफिस पर उसी दिन अक्षय कुमार की फिल्म ओमाई गॉड 2 रिलीज हुई, लेकिन कहीं से भी इसे सनी बनाम अक्षय का मुकाबला नहीं माना गया। 

यहां फैंस की बात समझ में आ सकती है। अक्सर हर बड़ी फिल्म के रिलीज के मौके पर बड़ी फिल्मों के सितारे इस तरह की आजमाइश में लग जाते हैं कि सलमान बड़े सितारे हैं या शाहरुख या आमिर या उनके मुकाबले अक्षय कुमार, अजय देवगन और रितिक रोशन बड़े स्टार हैं। ये आपसी फुटव्वल इंटरनेट तक ही रहती है और इनके फैंस व्यूज और लाइक से होने वाली कमाई में लग जाते हैं, तो थोड़े दिनों बाद सब शांत हो जाता है। यहां सबको आजादी है कि वो किसी फिल्म या किसी स्टार को अच्छा या बुरा कहें। ये आजादी इन जनाब ट्रेड एक्सपर्ट को भी है, जो किसी पेंदी के लोटे की तरह पैंडलुम हो रहे हैं, लेकिन अफसोस की एक ही बात है कि अपनी खुन्नस में एक इंसान इस बेमेल मुकाबले को इस हद तक घसीट रहा है, जिसे अब शाहरुख खान के मुस्लिम होने या सनी के हिंदु होने को लेकर आपस में गाली गलौज होने लगे।

फिल्म इंडस्ट्री कोई आइडियल जगह कभी नहीं रही। हर दौर में स्टार हुए और उनका स्टारडम रहा, तो इस को लेकर उनके आपसी विवाद भी हुए। फिल्मों के हिट-फ्लाप के गेम भी अपने अपने तरह से खेले गए। बालीवुड के किंग कहे जाने वाले शाहरुख खान की फ्लाप फिल्मों की कमी नहीं रही है, तो सनी देओल की फ्लाप फिल्मों की लिस्ट भी कम बड़ी नहीं है। कहने वाली बात ये है कि शाहरुख खान और उनके फैंस ने पठान की कामयाबी को एंज्वाय किया। अब सनी का वक्त आया है। उनको और गदर 2 की पूरी टीम को कामयाबी एंज्वाय करने दी जाए और साथ में अक्षय कुमार की फिल्म को मिली सफलता के हिसाब से उनकी टीम को भी सेलिब्रेशन का मौका मिले। फिल्म लाइन बहुत बड़ी है। यहां हर किसी को मौका मिलता है। हर किसी को कामयाबी और नाकामयाबी के दौर से गुजरना पड़ता है। रही जहां तक इन कथित ट्रेड एक्सपर्ट की, तो ये उस मौसमी वैज्ञानिक की तरह होते हैं, जो सिर्फ कामयाबी को सलाम करते हैं। ऐसे लोग आज सनी के साथ हैं, तो पलटी मारकर फिर से शाहरुख खान जिंदाबाद के नारे लगाने में इनको वक्त नहीं लगेगा। इनसे एक ही गुजारिश है- जो तमाशा करना है, फैन बनकर कीजिए। ये ज्यादा मजेदार होता है, क्योंकि फैंस के पास आंकड़ों की गिनती नहीं होती और खुद को ट्रेड एक्सपर्ट कहलाने का मौका भी नहीं होता। आखिरी बात- ऐसे लोग न तो पठान बना सकते हैं और न ही गदर 2 बनाने में कोई योगदान दे सकते हैं। विशुद्द तौर पर चढ़ते सूरज की तरह आज सनी तो कल शाहरुख और परसों कोई और की सोच पर इनकी कलाबाजियां चलती रहेंगी। ये तमाशा भी एक तरह से एंटरटेनमेंट है, जिसे कोई शाहरुख या सनी जैसे लोग कभी सीरियस नहीं लेते और न ही ऐसे ट्रेड के जानकारों को। 

बात खत्म करने से पहले गदर 2 की कामयाबी के लिए सनी और फिल्म की टीम को बधाई और पठान के लिए शाहरुख खान और यशराज की टीम को बधाई और ओमाईगॉड2 के लिए अक्षय और उनकी टीम को बधाई। जश्न मनाने का मौका है, जश्न मनाया जाए। 



कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...