Friday, March 29, 2024

इलेक्शन 24: कंगना का अंगना, राम का नाम...


इधर भारतीय जनता पार्टी ने हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से कंगना का टिकट तय किया और उधर, कुछ ही देर बाद एक टीवी चैनल पर कंगना द्वारा उर्मिला मातोंडकर को साफ्ट पार्न स्टार कहने को लेकर किए गए कमेंट से इतना हंगामा मचा कि इससे समझ में आता चला गया कि कंगना इसी मूड में इलेक्शन लड़ने आई हैं। भला हो कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का, जिन्होंने मंडी के रेट को लेकर ऐसा कमेंट कर डाला कि कंगना को यहां से बचने का साफ मौका मिल गया। 

उर्मिला पर किए गए कंगना के कमेंट को कुछ यूं समझा जा सकता है कि कंगना ने किसी भी ऐसे इंसान को अपनी बदजुबानी का शिकार बनाया, जिनके साथ वो रिश्ते में रहीं। आदित्य पंचोली से लेकर अध्यायन सुमन (शेखर सुमन के बेटे) और रितिक रोशन तक जिसके साथ उनके अफेयर के किस्से रहे, उनको कंगना ने जमकर कोसा और किसी को ये बुरा भी नहीं लगा, क्योंकि इन्होंने कहीं न कहीं कंगना के साथ नाइंसाफी की थी।

कंगना यहीं तक नहीं रुकी थीं। महेश भट्ट, जिन्होंने फिल्म गैंगस्टर में  उनको पहला चांस दिया, उनको तो कोसा ही, लेकिन उनकी बेटी आलिया भट्ट को भी नहीं बख्शा, जो गैंगस्टर के वक्त एक छोटी बच्ची थी। 
नेपोटिज्म के नाम पर कपूर खानदान को कोसा, तो मूवी माफिया के नाम पर करण जौहर को उनके ही शो में खरी खोटी सुनाईं और फिर उनके साथ एक शो में नजर भी आईं। कंगना के तेवर शीशे की तरह साफ हैं कि वे उसी अंदाज में इलेक्शन लड़ेंगी, जो उनको आता है। 2014 को भारत की असली आजादी से लेकर गुजरात के महापुरुष को भगवान का अवतार बताने जैसे जुमलों से मीडिया की लाड़ली बनीं कंगना को मंडी की जनता किस अंजाम तक पंहुचाएगी, उसके लिए 4 जून का इंतजार करना पड़ेगा, जब चुनावों के नतीजे सामने होंगे। 
कंगना के अलावा इसी लिस्ट में भाजपा ने अरुण गोविल को यूपी में मेरठ सीट से टिकट दे दिया। उनको इसलिए टिकट नहीं मिला कि 72 साल (भाजपा में 2014 के बाद 75 साल के नेताओं को मार्गदर्शक बनाने की रिवायत है) के श्रीमान गोविल 1977 से लेकर अब तक 47 साल में सिर्फ दस-बारह फिल्मों में एक्टिंग की होगी। उनको टिकट मिलने के कारणों में पहला ये कि उन्होंने एक टीवी सीरियल में दशरथ पुत्र का रोल किया। दूसरा अब तक भाजपा प्रत्याशियों का प्रचार किया। 

अभी आई एक फिल्म (आर्टिकल 370) में प्रधानमंत्री का वैसा ही रोल निभाया, जैसा विकी कौशल की फिल्म ऊरी में रजित कपूर ने निभाया था। इस तरह से विवेक ओबेराय और रजित कपूर के बाद अरुण गोविल का नाम इतिहास की उस लिस्ट में दर्ज हो गया, जिसमें अब तक परदे पर गुजराती महापुरुष के अवतारों का जिक्र होगा। कंगना की तरह मेरठ की जनता को तय करना होगा कि टीवी पर एक किरदार को लेकर खुद को प्रभु श्रीराम कहलाने में गर्व महसूस करने वाले एक औसत दर्जे के अभिनेता को संसद में भेजना है या नहीं।

कंगना और अरुण गोविल को टिकटें देकर गोदी मीडिया में इसे मास्टर स्ट्रोक की वाहवाही लूटने के क्रम को ब्रेक लगाने का काम महाराष्ट्र में भाजपा के ही सहयोगी दल ने किया। सत्ता के लिए अपनी ही पार्टी को दोफाड़ करके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन शिंदे को न जाने कहां से उस गोविंदा की याद आ गई, जिसने 2004 में देश और सोनिया का आदेश के जुमले पर चुनाव जीता और फिर जनता के लिए कुछ नहीं किया। अगले चुनाव आने तक राजनीति में आना मेरी गलती थी जैसे जुमलों के साथ फिल्मों में लौटने वाले गोविंदा को इसी जगह पर लौटने के लिए शिंदे से ज्यादा इस सच्चाई ने मजबूर कर दिया कि हिंदी फिल्मों के सबसे शानदार और जानदार हीरो रहे गोविंदा ने अपने कैरिअर को खुद तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तो ऐसे में राजनीति के अलावा कहीं कोई और ठिकाना नहीं होना था। ये बात शिंदे नहीं समझेंगे और भाजपा के नेता बहुत पहले समझ गए कि गोविंदा के पास ऐसा क्या बचा है कि उनको इलेक्शन की टोपी पहनाई जाए। अब ये कारनामा शिंदे करने जा रहे हैं, तो मामले को भी वही समझेंगे। कयास है कि शिंदे सेना उनको उसी सीट से टिकट देगी, जिसको उन्होंने 2009 में त्याग दिया था। अब देखना होगा कि कभी कहीं न टिकने वाले चीची भैया (गोविंदा का पैटनेम) कब तक शिंदे के पाले में रह पाएंगे।

गोविंदा का मामला शिंदे तय करेंगे, लेकिन कंगना के हाथों उर्मिला की फजीहत को वो शिवसेना कैसे हजम करेगी, जो मराठी माणुस के नाम पर राजनीति करती आई है। कंगना को अगर भाजपा ने मुंबई की किसी सीट का टिकट दिया होता, तो ये मुकाबला उर्मिला बनाम कंगना हो जाता, लेकिन कंगना से मुकाबला करने के लिए उर्मिला मुंबई छोड़कर मंडी नहीं जाएंगी। ये मुमकिन है कि इंडिया अलाइंस की पार्टनर के तौर पर ठाकरे की सेना महाराष्ट्र में किसी सीट से उर्मिला को लड़ाए और जीताकर संसद भेजे, ताकि अगर कंगना भी जीत जाएं तो मुकाबला संसद में हो और कंगना का भला न हो, तो उर्मिला की जीत के मायने हजार गुना बढ़ जाएंगे। अंदरखाने तो बहुत कुछ चल रहा है। इंतजार कीजिए कि मीडिया के कैमरों के सामने संजय राउत या उद्धव का कोई और सेनापति उर्मिला के नाम का टिकट अनाउंस करता है या नहीं। 

उर्मिला का मामला लटका हुआ है, तो एक और परिवार में ऐसा ही मामला होने वाला था। कहा जा रहा था कि सुनील दत्त की सीट पर जीतने वाली प्रिया दत्त कांग्रेस छोड़कर शिंदे की शिवसेना का झंडा उठाएंगी, जहां उनके करीबी बाबा सिद्दीकी पहले ही पधार चुके हैं। कुछेक हवाबाजों ने गासिप चला दिया कि प्रिया अगर शिंदे के पाले में गईं, तो कांग्रेस उनके मुकाबले संजय दत्त को मैदान में उतारकर इसे फैमिली मैटर बना देगी। संजय का वैसे तो राजनीति से कोई वास्ता नहीं रहा, लेकिन दिवंगत अमर सिंह के बहकावे में आकर वे समाजवादी की तरफ से लखनऊ सीट पर इलेक्शन लड़ने जा पंहुचे थे। भला हो  सुप्रीम कोर्ट का, जिसने गैरकानूनी हथियार रखने के केस के हवाले से संजू बाबा को ऐसी फटकार लगाई कि वे चुनाव और राजनीति से तौबा कर बैठे। अब प्रिया दत्त को कहीं से भी टिकट मिलने के चांस न के बराबर बचे हैं। 

इन चुनावों में सही मायने में लाटरी खुली हेमा मालिनी के नाम की। ड्रीम गर्ल के लिए माना जा रहा था कि दस साल के बाद मथुरा के हालात को देखते हुए इस बार उनको टिकट नहीं मिलेगा। हेमा मालिनी भी यही मानकर चल रही थीं। राजनीति में उन्होंने परिवारवाद का सही मतलब समझकर इस बात का जुगाड़ लगाना शुरु कर दिया था कि इस सीट से उनकी बेटी ईशा देओल को पार्टी मैदान में उतरे। यहां तक कहा जाने लगा था कि राजनीति में आने के मामले को लेकर ही ईशा का अपने पति (भरत) से मनमुटाव हुआ, जो उनके अलगाव की एक बड़ी वजह बना। जब मथुरा सीट से भाजपा उम्मीदवारी सामने आई, तो अपना नाम सुनकर सबसे ज्यादा हेमा मालिनी चौंकी। अब मथुरा की जनता उनके लिए क्या सोचती है, ये भी 4 जून को मालूम होगा। 

हेमा मालिनी के टिकट को लेकर धर्मेंद्र का खुश होना बनता था, लेकिन ये भी पक्का समझो कि पिछले चुनाव में पंजाब के गुरदासपुर में पंप उखाड़कर सीट जीतने का मैजिक दिखाने वाले सनी देओल के लिए बाद में उसी इलाके की जनता ने गुमशुदा की तलाश के पोस्टर लगाए। इसी माहौल को भांपकर सनी देओल ने इस बार आलाकमान से चुनावों को लेकर हाथ लिए। अब इस सीट पर उनकी जगह दावा करने के लिए दिवंगत विनोद खन्ना की पत्नी कविता का नाम चर्चा में है, क्योंकि विनोद खन्ना तीन बार इस सीट से जीते थे। ये मामला उन सितारों का था, जिनको भाजपा से टिकटें मिल गईं।

यहां भोजपुरी कोटे वाले मनोज तिवारी (दिल्ली), रवि किशन (जौनपुर) और दिनेश निरहुआ (आजमगढ़) को पार्टी ने फिर से मैदान में उतारा है। भाजपा वालों की मानें तो तीनों जीतेंगे और तटस्थ रहने वालों की मानें, तो इन तीनों में से दो की स्थिति तारारारारा वाली है। अब वे दो कौन हैं, इस बारे में हम कछु नाहीं बतावेंगे। 

अब बात कुछ ऐसे सितारों की, जो अब तक आस के झूले में झूल रहे हैं। इस लिस्ट में एक नाम तो अपने उसी कुमार का है, जिन्होंने पत्रकार का लबादा ओड़कर पीएम से आम काटकर खाने या चूसकर खाने जैसे मैजिकल सवाल किए थे। हमेशा से भाजपा के पक्के वाले समर्थकों में से रहे अक्षय कुमार के लिए पहले कहा गया कि दिल्ली में चादनी चौक की सीट से कुमार की टिकट पक्की है, क्योंकि वो इसी  इलाके की पराठें वाली गली के बंदे रहे। इस सीट पर मामला नहीं जमा, तो अब कहा जा रहा है कि पंजाब में सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही भाजपा किसी एक सीट पर अक्षय कुमार को उतारेगी, क्योंकि वे सिंह इज किंग के बाद पंजाबी किरदारों के मास्टर बन गए हैं। ये भी मुमकिन है कि गुरदासपुर में इस बार सनी की जगह हैंडपंप उखाढ़ने के लिए अक्षय कुमार पंहुच जाए। 

पंजाब में अक्षय कुमार तो चंडी़गढ़ की सीट पर पेंच हैं। इस सीट से अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर एमपी हैं। इस बार उनकी हेल्थ का इश्यू बताया जा रहा है, तो सीट पर अनुपम खेर आजमाइश चाहते हैं। इससे पहले अपनी होम सीट शिमला का टिकट मिलने के लिए भी खेर ने पार्टी और नेताओं की जमकर सेवा की। लंबे समय तक पार्टी के  राज्यसभा भेजने के भरोसे को सच मानकर थक चुके अनुपम खेर के लिए इस बार यहीं या कभी नहीं की पोजीशन बन गई है। एक जमाना था, जब विवेक ओबेराय टिकट पाकर सांसद विवेक बनने के सपने देखते थे। अब पार्टी उनको अगर कैंपेन के लिए बुला ले, तो वे इस पर ही सब्र कर लेते हैं। 

भाजपा के पास फिल्मी सितारों की लंबी लिस्ट है। कभी भाजपा में रहे शत्रुघ्न सिन्हा गैरभाजपाई दलों में अकेले ऐसे सितारे हैं, जिनका चुनावी टिकट पक्का हो गया है। ममता की पार्टी ने आसनसोल (प. बंगाल) से उनको मैदान में उतारा है। कांग्रेस की लिस्ट में अभी तक कोई सितारा नहीं है। राज बब्बर आगरा या फतेहपुर से टिकट की आस लगाए हुए हैं। अमर सिंह के जमाने में सितारों की फौज जमा करने की शौकीन समाजवादी पार्टी का दामन सूना है। उनके पास दो जया थीं। जयाबच्चन ने राज्यसभा पक्की कर ली और जयाप्रदा भाजपा के पाले में चली गईं, जहां उनके लिए फिलहाल टिकट वाली बात नहीं है। 


इस बार सात चरणों में वोटिंग होगी और हर चरण के हिसाब से पार्टियां उम्मीदवारों के टिकट तय करेंगी। इस आधार पर भाजपा या किसी और पार्टी से जुड़े वे सितारे मुस्करा सकते हैं, जो अब तक हां या ना के बीच झूल रहे हैं। 

चुनावी मैदान से ये दूसरा ब्लाग हाजिर है। कुछ दिनों बाद नई लिस्टें सामने आने के बाद हमारे ब्लाग का नया  पार्ट आएगा। तक तक कमेंट बाक्स में आप ये बता सकते हैं कि आपकी निगाह में फिल्मी दुनिया के कौन-कौन से सितारों को आप संसद की सीट पर देखना पसंद करेंगे।  


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केजरीवाल का फिल्मी कुनबा- कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा

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Saturday, March 23, 2024

केजरीवाल का फिल्मी कुनबा- कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा...

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का मामला कितना राजनैतिक है, कितना चुनावी है और कितना कानूनी है, इस पर हर कोई अपनी अपनी तरह से बहस कर रहा है। अरविंद केजरीवाल और दिल्ली सरकार की शराब नीति से फिल्मी दुनिया का वैसे तो कोई वास्ता नहीं रहा। ये भी कोई ताज्जुब की बात नहीं कि गुजरात के महापुरुषों के हाथों अपना जमीर बेच चुके फिल्मी सितारों में से किसी ने केजरीवाल की गिरफ्तारी को लेकर उफ्फ तक नहीं की। अब जरा सोचिए कि अगर गुजराती महापुरुष की जय-जयकार करने का मौका आएगा, तो ये (अंध) भक्त सितारे दंडवत होकर चरण-वंदना करेंगे। 


बात उन  दिनों की है, जब राम लीला मैदान के आंदोलन के बाद दिल्ली की सत्ता में केजरीवाल का उदय हुआ था, तो मुंबई की फिल्मी नगरी में भी उनको हीरो माना गया था। केजरीवाल को फिल्म नायक के उस नायक के समकक्ष माना गया था, जो एक दिन का सीएम बनकर दबंग सीएम (अमरीश पुरी) की सत्ता और सांसे उखाड़ने देता है। उस दौर में मनोरंजन की दुनिया में  केजरीवाल और उनकी पार्टी आप के समर्थकों का एक वर्ग सामने आया था। इस वर्ग में कोई खान, कपूर या चोपड़ा नहीं था, लेकिन कुछ बुद्धिजीवी  किस्म के लोग जरुर नजर आए थे। इनमें संगीतकार विशाल-शेखर की जोड़ी वाले विशाल डडलानी, एक्टर रणवीर शॉरी, जावेद जाफरी, सोनू सूद, रेणुका श्हाणे (आशुतोष राणा की पत्नी,  गुल पनाग, चकदे फेम विद्या मालवड़े, राज जुत्शी और  डायरेक्टर अश्विनी चौधरी, अनुभव सिन्हा, हंसल मेहता, सुधीर मिश्रा  खास रहे। सोनू सूद भी इसी पार्टी के साथ गलबहियां कर रहे थे। इनके साथ एक तबका मुंबई की फिल्मों और टीवी की उन तथाकथित सेलिब्रिटीज का था, जो पैसा मिलने पर अपने बाप का रिश्ता भी बदलने के लिए तैयार हो जाते हैं। 

केजरीवाल की पार्टी पर गुल पनाग ने चंडीगढ़ से चुनाव लड़ा, तो लखनऊ में जावेद जाफरी ने पार्टी की टोपी पहनी। ये अलहदा बात है कि दोनों ही चुनाव हार गए और ये कतई अलहदा बात नहीं है कि घाघ राजनीतिज्ञों की तरह चुनाव हारते ही ये दोनों अपनी पार्टी से गायब हो गए। बाकियों का हाल देखें, तो रणवीर शौरी किसी भाजपाई से ज्यादा हिंदु मुस्लिम करने में आगे निकल गए हैं। अश्विनी चौधरी, हंसल मेहता और अनुभव सिन्हा में से शायद किसी को याद भी नहीं हो कि वे कभी केजरीवाल के साथ थे। अगर किसी को याद होगा, तो सीबीआई और ईडी और सीडी के डर से कोई ये बात याद रखना पसंद नहीं करेगा।  

केजरीवाल और उनकी पार्टी से जुड़ने वालों में पंजाबी सितारों का मामला अलग रहा। स्टैंड अप कामेडी से चमके दो सितारों ने केजरीवाल का साथ पकड़ा, जिनमें से भगवंत मान तो पंजाब का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद वहां के मुख्यमंत्री बन गए और दूसरे स्टैंडअप  कामेडियन गुरुप्रीत घुग्गी भी इसी पार्टी के साथ हैं। 

जब केजरीवाल का दौर शिखर पर था, तो उनके जीवन पर बायोपिक बनाने के विचार पर न जाने कितने लेखकों ने लैपटाप पर उंगलियों को टक टक किया होगा। जैसे ही मोदी सत्ता आई, तो केजरीवाल के बायोपिक वाली फाइलें डिलीट कर दी गईं। केजरीवाल का मामला अदालत में है, इसलिए हम और आप काहे टिप्पणी करें, लेकिन उस दौर में केजरीवाल के कहने पर मैं भी आम आदमी की टोपी पहनने वालों में, कम से कम किसी में तो इतनी हिम्मत होती कि जब उनका शीर्ष नेता जेल की सलाखों के पीछे हो, तो एक बार तो अपने नेता के नाम पर  नींद से जगने की एक्टिंग कर लेते। 

शुद्ध हिंदी में कहा जाता है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती। जिस दिन दिल्ली का निजाम बदला और गुजरात वाले झोला उठाकर निकल लिए, उस दिन क्या ये लोग फिर से केजरीवाल या किसी और के साथ खड़े होने का दम दिखा पाएंगे और जवाब है- बिल्कुल नहीं। कोई किसी को सपोर्ट करे या न करे, ये उसकी मर्जी, ऐसा लोकतंत्र में होता है। जिस देश में लोकतंत्र आखिरी सांसे गिन रहा हो, वहां खामोशी से तमाशा देखने वाले भी गुनाहगार माने जाते हैं। 

पिछले ब्लाग में सवाल था कि भाजपा की कालिख बने इलेक्ट्रोरल ब्रांड के करप्शन के मामले को लेकर अगर  फिल्म बने, तो मेन लीड कौन करेगा। इस बार सवाल है कि अगर केजरीवाल पर बायोपिक बने, तो उनके रोल में कौन फिट होगा। जवाब के लिए कमेंट बाक्स ओपन है।  

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Saturday, March 16, 2024

इलेक्टोरल बॉन्ड कांड- एक मसाला फिल्म की धांसू स्टोरी

राजनीति और मनोरंजन की दुनिया में रिश्तों को लेकर बहस होती रहती है। इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर मचे घमासान के बीच भी अनायास इन रिश्तों की बानगी एक बार फिर चर्चा में आ गई है। सोशल मीडिया में ऐसे मीम्स की बाढ़ आ गई है, जिसमें इलेक्ट्रोल बांडस के घटनाक्रम को किसी पाल्टिकल थ्रिलर फिल्म (या इस दौर में वेब सीरिज) के लिए एक दिलचस्प कहानी के तौर पर देखा जा रहा है। 



माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में इस थीम पर कुछ न कुछ जरुर बनेगा। हो सकता है कि आदित्य धर (आर्टिकल 370 के निर्माता) से लेकर विवेक अग्निहोत्री और विपुल शाह (केरल स्टोरी वाले गुजराती)  लेकर मधुर भंडारकर तक यहां प्रतिभाशाली निर्देशकों की कतार मौजूद है, जो अपने आका का एक  इशारा पाकर ऐसी कहानी तैयार करेगी, जिसमें इलेक्टोरल बॉन्ड को किस तरह से भारत ही नहीं, देश की सबसे बड़ी क्रांति साबित किया जाएगा और इस बात का डंका पिटा जाएगा कि सत्तर सालों में जो काम नेहरु और गांधी परिवार नहीं कर पाया, वो इस महामानव ने कर दिखाया। अमेठी की सांसद इस पर भी अपने प्रिय विषय (राहुल गांधी) को जोड़ने से संकोच नहीं करेंगी। 

लगे हाथों ये भी सोचिए कि अगर ये धुरंधर अगर भ्रष्टाचार के इस सबसे बड़े खुलासे को मोदी की महानता में बदलने की कवायद करें, तो इस बार प्रमुख भूमिका कौन निभाएगा।

जी हां, इस कतार में पहला नंबर तो उसी खिलाड़ी का लगेगा, जो पत्रकार का चोला पहनकर पीएम हाउस में आम काटकर खाने और आम चूसने की पत्रकारिता करने पंहुचा था। ये अलग बात है कि  इस वक्त उसके अपने सितारे गर्दिश में चल रहे हैं और फिल्में बाक्स आफिस पर नाकामयाबी की धूल फांक रही हैं। लेकिन बंदा अब भी मोदी भक्ति में लीन है और अपने भगवान को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी करेगा जैसी स्थिति में है। 

अगर इन सज्जन का पत्ता कटा, तो दूसरे नंबर पर हिंदी फिल्मों के गुटका किंग कहे जाने वाले देवगन भैया होंगे, लेकिन उनके लिए बात शायद इसलिए न बने, क्योंकि उनको महामानव के नजदीक जाने का कोई मौका नहीं मिला है। वे भी लंबे अरसे से मोदी भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्ति में लीन हैं। 

अगर उनका नंबर कैंसिल हुआ, तो कतार में लगे आएंगे वही विवेक, जो पहले भी परदे पर महामानव की आकृति में नजर आए थे, ये अलग बात है कि उनके उस अवतार को किसी ने देखना पसंद नहीं किया और इसके साथ ही पहले से बेहाल चल रहे उनके कैरिअर का पूर्ण विराम जैसा हो गया। अगर फिल्मों की दुनिया में कुछ नहीं बचा, तो उनके पास पार्टी (या कहें मोदी) की सेवा के अलावा क्या बचेगा। 

हो सकता है कि इस बार किसी नए अभिनेता को मौका देने की तर्ज पर उनको भी बैरंग कर दिया जाए और उम्रदराज हो चुके अनुपम खेर को ये मौका दिया जाए। लंबे समय से राज्यसभा की आस में टकटकी लगाए खेर को ये करने से भी गुरेज नहीं होगा। ये अलग बात है कि इतनी सेवा के बाद भी खेर को न राज्यसभा में भेजा गया और न लोकसभा में भेजने के लिए कोई टिकट मिला। खबरों में बनने के शौकीन और उस्ताद खेर को अपने भगवान को खुश करने के लिए ये भी करना पड़ा, तो मान जाएंगे।  

उनके साथ भी बात न बने,  तो अपने अनिल कपूर भी मौजूद हैं, जिनको चमचागिरी करने और कराने का लंबा अनुभव है और वे इसके लिए किसी मौके को हाथ से नहीं जाने देंगे। 
मान लीजिए कि डायरेक्टर और मेन हीरो की बात तय भी हो गई, लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि चुनाव सर पर आ गए हैं और अब फिल्म से कोई एडवांटेज मिलना मुमकिन नहीं है, तो फिर ये प्रस्ताव टाला जा सकता है। 

अब ये मई में ही पता चलेगा कि इसे लेकर अगला फैसला या तो मौजूदा प्रधानमंत्री करेंगे या नए प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल गांधी करेंगे। ये भी मान लीजिए कि ये गुजराती महापुरुष अगर भूतपूर्व प्रधानमंत्री हो गए, तो फिर इन  इलेक्टोरल बॉन्ड पर फिल्म बनाने में होड़ जरुर मचेगी और इस मुकाबले में निर्देशन के लिए अनुराग कश्यप से लेकर अनुभव सिन्हा और मुख्य भूमिका के लिए प्रकाश राज के नाम सामने आएंगे। 

एक जमाना था, जब सिनेमा में राजनीति की उठा-पटक को लेकर फिल्में बना करती थीं। सत्तर के दशक में गुलजार की आंधी से लेकर उसी दौर में आई किस्सा कुर्सी का हो या अस्सी में अमिताभ बच्चन को लेकर इंकलाब और सच या फिर नब्बे के दशक में मणिरत्नम की रोजा, बांबे और दिल से जैसी फिल्मों के बाद यहां राजनीतिक आधार वाली फिल्में बनना बंद हो गईं और 2014 के बाद इन फिल्मों की जगह सरकारी प्रोपेगंडा वाली फिल्मों का दौर शुरु हो गया, जिसमें टॉयलेट लव स्टोरी (अक्षय कुमार), ताना जी (अजय देवगन) से लेकर मोदी (विवेक ओबेराय), कश्मीरी फाइल, केरल स्टोरी और सावरकर (रणबीर हुड्डा) जैसी फिल्मों की बाढ़ आ गई और सिनेमा की दुनिया साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटती चली गई। 

अतीत से निकलकर वर्तमान में लौटते हैं और सोचते हैं कि जब मौजूदा सत्ता ने देश को ही बर्बाद कर दिया, तो सिनेमा की दुनिया कहां से बचती। अब मनोरंजन की दुनिया में बदलाव की बात तो मई में चुनावों के नतीजों के बाद ही आगे बढ़ेगी, तब तक इलेक्टोरल बॉन्ड की घटनाओं से लेकर सिनेमा के लेखक तैयारियां कर सकते हैं। 

अब आप भी बता दीजिए कि क्या ये आजाद भारत में सरकारी करप्शन का सबसे बड़ा स्कैम है या इससे भी ज्यादा कुछ होने जा रहा है? जवाब के लिए कमेंट बाक्स ओपन है। 

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 एक ही किस्सा एक ही कहानी, हे अंबानी हे अंबानी

मौत के नाम पर तमाशा

राम तेरे कितने नाम

ये कैसी नानागिरी ?

2023-2024 : घूमता आईना



मामला रश्मिका का नहीं, लड़कियों की इज्जत का है















Tuesday, March 5, 2024

एक ही किस्सा, एक ही कहानी- हे अंबानी, हे अंबानी


अंबानी पुत्र अनंत संग राधिका की शादी का मामला अगर पूरी दुनिया में फैल गया, तो हैरानी कैसी। दुनिया के सबसे पंहुचे हुए धन्ना सेठों में से एक मुकेश भाई के बालक की शादी में ऐसी धूम नहीं मचेगी, तो कहां मचेगी। ख्याल रखा जाए कि अभी ब्याह वाली बात नहीं है। अंग्रेजी रिवायत में इसे प्री वैडिंग इवेंट कहते हैं। बात आगे बढ़ाते हैं..

शादी का मामला, यानी हलद बांध से लेकर मंडा, घुड़चढ़ी, महिला संगीत से लेकर सात फेरे और जयमाला वाले सारे शगुन अभी नहीं, जुलाई की बारह तारीख को संपन्न होंगे। प्री इवेंट में जामनगर के छोटे से हवाई अड्डे को इंटरनेश्नल एयरपोर्ट का दर्जा मिल गया। सोचिए, बारह जुलाई वाले प्रोग्राम में क्या क्या अजूबे होंगे। सोचने बैठ जाइए। बात और आगे बढ़ाते हैं.. 

अंबानी पुत्र के लिए जामनगर वाले इवेंट में फिल्मी सितारों की वही रौनक रही, जो अक्सर एंटीलिया (मुंबई में अंबानी का आशियाना) में होने वाले जच्चा-बच्चा से लेकर मुंडन-टुंडन वाले किसी भी समारोह में नजर आती है। सोशल मीडिया पर इन सितारों की रौनक को लेकर हल्ला-गुल्ला ठीक नहीं लगता। लड़के वाले ब्याह में पड़ोसियों-रिश्तेदारों को लेकर जाते ही हैं। ये तो फिर भी पेरोल पर पलने वाले वे सितारे हैं, जिनके लिए ये सब करना जरुरी भी है और मजबूरी भी है, वरना...  बात और आगे बढ़ाते हैं... 

सितारों का ये मजमा बहुत साफ वाले बैरौमीटर पर होता है। यहां स्टारडम का स्टैंडर्ड बेस प्राइस होता है, जिसका उनकी फिल्मों की कामयाबी-नाकामयाबी से कोई लेना-देना नहीं होता। यहां अर्जुन कपूर पाए जाएंगे, जिनको खुद याद नहीं होगा कि उनकी कोई फिल्म कब हिट हुई होगी, लेकिन मनोज वाजपेयी या नवाजुद्दीन सिद्दीकी या पंकज त्रिपाठी जैसों की मौजूदगी नहीं होगी। मामला हाई-फाई सोसायटी का है, जिसका किसी की फिल्मोग्राफी से कोई लेना-देना नहीं। बात और भी आगे बढ़ाते हैं... 

किसी ने अच्छा कहा कि मुकेश अंबानी ने ब्याह से चार महीने पहले प्री वेडिंग इवेंट इसलिए किया, क्योंकि हफ्ता-दस दिन में पार्लियामेंट वाले इलेक्शन के लिए आचार सहिता लग गई, तो केंद्र में तैनात मोदी के मोटा भाई की फौज उनके किसी काम नहीं आती और अगर चुनावी नतीजों में कुछ ऊपर-नीचे हो गया, तो प्रधानमंत्री राहुल गांधी से मुकेश अंबानी किसी सहुलियात की उम्मीद कर ही नहीं पाएंगे।  

घर के गार्डन में ही लिमिटेड मेहमानों को एडजेस्ट किया जाएगा। इस झंझट से बचने के लिए अंबानी ने ये रास्ता निकाल लिया। अब ये वक्त साबित करेगा कि बारह जुलाई को लौंडे के ब्याह में वो प्रधानमंत्री बनकर हाजिरी देंगे या पूर्व प्रधानमंत्री की हैसियत से लिफाफा देंगे।  अंबानी ने अपने यारों-दोस्तों के बड़े मजमे को इस प्री इवेंट में बुलाकर निपटा दिया कि कहीं कोई बुरा न मान जाए या खास तौर पर किसी फिल्मी सितारे को ताना न सुनने पड़े कि अरे, आप जामनगर में नजर नहीं आए। बारह जुलाई के लिए जिसकी बुकिंग होनी है, वो अभी से हो जाएगी, डोंट वरी। बात को और भी आगे बढ़ाते हैं.. 
सोशल मीडिया का तो हिसाब-किताब समझ में नहीं आया। हर किसी को तलाबेली और चुहल है कि अंबानी के लौंडे के ब्याह में क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। कौन आ रहा है और कौन नहीं आ रहा है। बिन बुलाए मेहमानों की तरह यहां भी कैमरे और मुंह उठाए मीडियावीरों का मजमा है। एक ही सांस में मजमा लगाने के लिए अंबानी को बुरा-भला कहो और फिर इवेंट की तस्वीरों को शेयर करके लाइक और व्यूज की कमाई का रास्ता भी खोले रखो। भाई जी, इसे चलती-फिरती हिंदी जुबां में दोगुलापन कहते हैं। अंबानी का लौंडा, अंबानी का पैसा, अंबानी के चापलूस, अंबानी के पालतू, हमारा-आपका क्या। क्यों डुगडुगी बजाएं और क्यों रौतड़ा करें। अमां बैठो यार, जिनको आदत है, उनको इवेंट का मजा लूटने दो, जिसको आदत नहीं है, उसे सोशल मीडिया पर तस्वीरों को निहराने दो। कुंवारी कन्याओं को आहें भरने दो कि काश इस अंबानी के दो-चार और लौंडे होते, तो क्या एक मेरे नसीब में नहीं होता। अब ये कंप्लेंट तो भगवान जी के पोर्टल में ही रजिस्टर्ड हो सकती है। बात यहीं रोकते हैं, मगर... 

बात-बात में बात यहां तक आ गई। समझ में नहीं आ रहा है कि पिछले 6-7 सालों से रिश्ते में बंधे अनंत-राधिका को दूधो नहाओ पूतो फलो वाला आशीर्वाद अभी देना है या इसके लिए बारह जुलाई का दिन फिक्स है। खासी इंग्लिश्स्तानी में कांग्रेट ब्रो कहना ज्यादा ठीक रहेगा। क्यों, पब्लिक क्या बोलती है। बात को यहीं पर रोक देते हैं... 

पापा जी (मुकेश भाई) ये पढ़कर रोना नहीं, हमें सारे इमोशंस समझ में नहीं आते। जैसे आपको भी नहीं आते। 

न कोई बात, न कोई तकरार, अब बारह जुलाई का करें इंतजार। 

जै जनेंद्र। जै कृष्ण 


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