Saturday, August 12, 2017

पहलाज निहलानी की ये कहानी लिखी किसने ?


पहलाज निहलानी के नपने पर बालीवुड में दीवाली से कई महीनों पहले ही दीवाली जैसा जश्न चौंकाने वाली बात नहीं है। पहलाज निहलानी ने कितनों की नाक में दम किया और कितनों के कान मरोड़े, ये लिस्ट काफी बड़ी और दिलचस्प बन सकती है। फिल्म इंडस्ट्री को मुबारक कि एक त्रासदी से मुक्ति मिल गई। पहलाज की जगह लेने वाले प्रसून्न जोशी जादु की कौन सी छड़ी से फिल्मवालों को सब कुछ ठीक हो गया का फील कराएंगे, ये आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल उनको भी मुबारकबाद ।


हर कोई मान रहा है कि पहलाज निहलानी को इस बात की सजा मिली कि उनके रवैये से फिल्मवाले परेशान थे।याद नहीं आता कि सेंसर बोर्ड में कभी कोई ऐसा चेयरमैन रहा हो, जिसकी नुमाइंदगी से फिल्म वाले परेशान न दिखे हों। जब तक सेंसर बोर्ड की नियमावली में अंग्रेजों के जमाने के कायदों की भरमार रहेगी, तब तक इस गद्दी पर बैठा हर चेयरमैन फिल्मवालों के लिए परेशानी का सबब बना रहेगा। प्रसून्न जोशी की अगुवाई में सेंसर की नियमावली बदल जाए, तो मामला अलहदा हो जाएगा। इसके लिए सब्र और इंतजार करना होगा।


सेंसर बोर्ड के चेयरमैन के पद पर हमेशा केंद्र की सत्ता पर काबिज पार्टियों की पसंद वाले लोग बैठते आए है। 2014 मई में दिल्ली में सत्ता बदली और 2015 की शुरुआत में लीला सैमसन को हटाकर पहलाज को ये कुर्सी इसी रवायत का नतीजा था कि यहां भी अपना आदमी फिट हो गया। पहलाज सचमुच केंद्रीय सत्ता के आदमी थे, जिसे कुछ लोग चाटुकारिता कहें तो कहें, पहलाज के लिए ये उस पार्टी का आदेश था, जिसके विचारों को वे पसद करते हैं। चाटुकारिया और वफादारी को लेकर बहस फिर कभी। यहां बात आगे बढ़ाते हैं।


क्या किसी ने ये सोचा था कि पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड की कुर्सी पर आकर उन तकलीफों को दूर करेंगे, जो तकलीफें लीला सैमसन के दौर में थीं। पहलाज निहलानी ऐसा कुछ नहीं करने आए थे, जो लीला सैमसन नहीं कर पा रही थीं। जब नियमों की किताबें वही हों, तो इस बात से कितना फर्क पड़ता है कि चेयरमैन के पद पर कौन बैठा है? क्या पहलाज निहलानी ने सेंसर नियमों को बदलवाने के लिए कुछ किया, तो जवाब मिलेगा- नही, तो फिर?


इस सवाल के साथ बात को और आगे बढ़ाते हैं। इतना तो समझ में आया कि पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड में किसी तरह के सुधार करने के लिए सरकारी ओहदा नहीं दिया गया था। याद करना मुश्किल नहीं कि कैसे अपनी कुर्सी संभालने के कुछ दिनों के अंदर ही पहलाज एक चैनल के इंटरव्यू में गर्व से बता रहे थे कि वे भारतीय संस्कारों के मामले में हमारी फिल्में कितनी कमजोर हैं। यहीं से संस्कारी मिशन की शुरुआत हुई। इस मिशन का मकसद और रास्ता साफ था। दिल्ली की सत्ता की विचारधारा का संदेश फिल्मवालों तक पंहुचाए। अरबों-खरबों के कारोबार वाली इस फिल्म इंडस्ट्री में पहलाज राष्ट्रवाद का मुखौटा पहनकर आए थे और उनके पास सार्टिफिकेट ये था कि वे दिल्ली में सत्ता पर काबिज पार्टी और उनके नेताओं के राष्ट्रवाद को नमन करते हैं। उधर, पुणे इंस्टिट्यूट में गजेंद्र सिह और मुंबई में सेंसर बोर्ड मे पहलाज निहलानी के ओहदे केंद्र की राष्ट्रवाद की नीतियों को फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ने का मिशन का एक अहम पड़ाव थे। नतीजा साफ था कि पिछले ढाई साल में पहलाज का जितना विरोध हुआ, वो उतने ही मजबूत होते गए। नागपुर से लेकर दिल्ली तक की सत्ता अपने आदमी के मिशन की कामयाबी से संतुष्ट थे, इसलिए विरोधी आवाजों को अनसुना ही किया जाना था।


पहलाज निहलानी ने गड़बड़ दो तरह से कीं, जिनका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा। पहली, वे फिल्मवालों को सेंसर बोर्ड के कायदों की वे किताबें दिखाने लगे, जिनमें फिल्मवाले अक्सर खुद फंसते हैं। दूसरी, अपनी हैसियत से आगे जाकर पहलाज ने उन लोगों से पंगेबाजी शुरु कर दी, जिनका दिल्ली दरबार में उनसे भी ज्यादा रसूख था। पहलाज ये मानकर चल रहे थे कि नागपुर और दिल्ली की सत्ता उनके मिशन से खुश है, तो उनके खिलाफ किसी की सुनवाई नही होगी। इसी मुगालते ने पहलाज का काम तमाम कर दिया। सत्ता कोई भी हो, वो किसी भी ऐसे इंसान को पसंद नहीं करती, जो खुद को सत्ता का केंद्र मानने लगे। पहलाज जब तक संस्कारी लेबल के साथ फिल्मों में राष्ट्रवाद की दुहाई देते रहे, तब तक वे दिल्ली के प्यारे बने रहे। जिस दिन पहलाज ने इस मिशन से हटकर खुद की हैसियत का एहसास कराना शुरु कर दिया, तो वे सत्ता के गलियारों की आंखों की किरकिरी बने और एक झटके में उनको वहां मार्गदर्शक मंडली का मेंबर बना दिया गया।


अब पहलाज आगे क्या करेंगे, ये तो वही जानें। क्या अब भी वे पार्टी का गुणगान करते हुए फिर से किसी नए मिशन पर भेजे जाने का इंतजार करेंगे या फिर अपने बॉस (शत्रुघ्न सिन्हा) की तरह एक कोने में परकटे पंछी की तरह अवचेतना के दौर में समा जाएंगे। पहलाज निहलानी का खेल खत्म हुआ। नए खिलाड़ी मैदान में आ चुके हैं। खेल वही पुराना है। कायदे कानूनों की किताब वही है। सेंसर बोर्ड से हमेशा पंगेबाजी करने वाले फिल्मवाले भी तकरीबन वही हैं।

अगर कोई सोचता है कि पहलाज निहलानी के जाने सेंसर का खेल बदल जाएगा, तो ये मुगालते से ज्यादा कुछ नहीं है। नए बॉस को आजमाया जाएगा। उनके आगे भी मिशन की चुनौती होगी। प्रसून्न जोशी अगर दिल्ली की सल्तनत को खुश रखने में माहिर निकले, तो कुर्सी पर कोई कील नहीं निकलेगी।


Saturday, August 5, 2017

यहां से कहां जाएगा बादशाह का सफर...?

मामला बहुत ज्यादा पुराना नहीं हुआ है। एक फिल्म एवार्ड समारोह को शाहरुख खान होस्ट कर रहे थे। मंच पर एक फिल्मी लेखक (कलाकार संजय मिश्रा) जिद्द करते हैं कि शाहरुख वहीं उनकी कहानी सुन लें। शाहरुख मान जाते हैं। लेखक महोदय कहानी सुनाना शुरु करते हैं कि एक लड़के और लड़की को जवानी में प्यार हो जाता है, लेकिन वे बिछड़ जाते हैं। बरसों बाद उनका फिर मिलना होता है और उनके बीच फिर से प्यार हो जाता है। शाहरुख इसे बकवास कहानी कहकर खारिज कर देते हैं, तो लेखक उनको याद दिलाता है कि ये उनकी फिल्म दिलवाले की वन लाइन स्टोरी है। शाहरुख खान झेंपकर रह जाते हैं और समारोह के मेहमानों की हंसी गूंज जाती है। मामला एक कामेडी एक्ट का था, इसलिए बात वहीं खत्म हो गई। 

दिलवाले को लेकर इस कटाक्ष को भले ही उस वक्त एक मजाक ही मान लिया गया था, लेकिन इसकी याद एक बार फिर आई, जब शुक्रवार की सुबह प्रेसवालों के लिए उनकी नई फिल्म जब हैरी मीट सेजल का शो हुआ, तो शाहरुख वहां पंहुचे। स्टाइल तो वही था। माथे तक झूलते बाल और आंखों पर काला चश्मा और आसपास सिक्योरिटी गार्ड्स का घेरा। इस घेरे से बाहर आकर वे फिल्म का शो शुरु होने से पहले मीडिया के अपने दोस्तों से भी मिले, लेकिन दिलवाले का किस्सा इसलिए याद आ गया कि जब हैरी... का शो शुरु होने से पहले ही शाहरुख खान के कंधे और आंखें जिस अंदाज में झुके झुके से नजर आए, वो खामोशी से बहुत कुछ बयां कर रहा था। अपनी फिल्म की रिलीज वाले दिन शाहरुख खान की नजरें झुकी हुई नजर आना कोई ब्रेकिंग न्यूज न हो, लेकिन लंबे वक्त से उनसे जुड़े रहने वालों के लिए बात बड़ी थी। 
थोड़ा और पीछे चलते हैं। चेन्नई एक्सप्रेस रिलीज होने वाली थी। शाहरुख खान ने अपने दोस्त पत्रकारों को मन्नत में बुलाया। माहौल अलग था। वे गर्मजोशी के साथ पत्रकार दोस्तों के साथ मिल रहे थे। मस्ती-मजाक के उस माहौल में महसूस हो रहा था कि शाहरुख अपनी फिल्म को लेकर आश्वस्त हैं। आंखों में चमक भी किसी से छुपी नहीं थी। 
चेन्नई एक्सप्रेस से जब हैरी... के सफर की यादें थम गईं। जब हैरी.. के प्रेस शो का इंटरवल हुआ और शाहरुख बिना कुछ कहे-सुने अपनी कार में बैठकर चले गए। अलबत्ता उनकी इस फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली एक कोने में जमीं पर बैठे भांप चुके थे कि फिल्म पसंद नहीं आ रही है। इम्तियाज का सपाट चेहरा देखते हुए फिल्मी पत्रकार इंटरवल के बाद की फिल्म देखने वापस हाल में जा बैठे। फिल्म खत्म हुई, तो इम्तियाज भी जा चुके थे। बात उनको समझ में आ चुकी थी कि फिल्म का खेल बिगड़ चुका है। बेचारे इम्तियाज, अपनी पहली धमाकेदार कामयाब फिल्म रही जब वी मीट... की यादों को सेजल-हैरी मीट.. से जोड़कर परेशान ही हो रहे होंगे। 

जब हैरी... रिलीज हो गई है। मीडिया में इस फिल्म का पोस्टमार्टम हो चुका है। इसे दोहराने की कोई वजह नहीं है। यहां कुछ और अहम बातों को लेकर इस सवाल पर चर्चा हो सकती है कि चेन्नई एक्सप्रेस और जब हैरी... के बीच के सफर में शाहरुख खान कहां खड़े नजर आते हैं। 
वे हिंदी सिनेमा के बादशाह हैं और बेताज बादशाह भी नहीं हैं। चेन्नई एक्सप्रेस और जब सेजल... के बीच का सफर चंद ऐसे सवालों को जरुर सामने लाता है, जिनको अगर शुक्रवार को जब सेजल... के रिलीज वाले दिन उनके चेहरे के हावभाव को याद किया जाए, तो जवाब पाने की मशक्कत दिलचस्प जरुर हो जाती है। पहले सवालों पर गौर करते हैं-

शाहरुख खान क्या अब थक गए हैं?
शाहरुख खान पर क्या उम्र का असर होता जा रहा है?
शाहरुख खान क्या रोमांटिक इमेज के चक्र में फंस चुके हैं
शाहरुख की बादशाहत को वाकई खतरा हो चुका है
या फिर...
हिट-फ्लाप से परे ये बादशाह क्या अब भी धमाकेदार वापसी की कुव्वत रखता है? 

ये सवाल कहीं से भी टेढ़े-मेढ़े नहीं हैं। न इनके जवाब तलाशने के लिए किसी राकेट साइंस की जरुरत है। सिलसिलेवार सवालों को देखें, तो जवाब पाने की सूरत भी निकल आती है। 

थकान का बढ़ती-ढलती उम्र से वास्ता होता है, ये कुदरत बताती है। अपने शरीर को तंदरुस्त रखने के सारे रास्ते शाहरुख जानते हैं। उनकी चुस्ती-फुर्ती और कहा जाए, तो चार्म पर बहुत ज्यादा असर तो नहीं माना जा सकता। तो क्या माना जाए कि चेन्नई एक्सप्रेस के बाद की उनकी फिल्मों की बाक्स आफिस पर कमजोर हुई हालत ने उनको इतना परेशान कर दिया? ये मुमकिन है। वे कमर्शियल सिनेमा के बादशाह हैं और कमर्शियल फिल्मों के गुणा भाग को बेहतर समझते हैं। फिल्म के कलेक्शन अच्छे न आएं, तो शाहरुख क्या कोई भी कलाकार मायूस ही होगा। मीडिया के कैमरों के सामने मुस्कान के साथ ये कहना अलहदा बात होती है कि मुझको पैसों की फिक्र नहीं, लेकिन कैमरों के पीछे एक कमर्शियल स्टार और प्रोड्यूसर अपनी फिल्म की अच्छी कमाई न होने से मायूस होता है, इस पर बहस की गुंजाइश नहीं बचती। शाहरुख जिस दर्जे के सितारे हैं, जब उनसे उम्मीदें बड़ी होती हैं, तो जाहिर है कि न चलने का अफसोस भी ज्यादा ही होगा। रोमांटिक इमेज वाला सवाल सबसे दिलचस्प हो जाता है। 

शाहरुख खान की बादशाहत का सबसे बड़ा तिस्लिम उनकी रुमानी छवि को ही माना जाता रहा है। हाथों को खोलकर उनका रोमांटिक पोज बनाने का स्टाइल भला किस कन्या के दिल को नहीं धड़काता होगा। इसी इमेज ने राहुल से लेकर राज और तमाम किरदारों को कन्याओं के सपनों के साथ जोड़ा और उनकी कामयाबी का बिछावन तैयार किया। 

हिंदुस्तानी सिनेमा का इतिहास गवाह है, जब अपनी इमेज की परछाई में कैद सितारों ने खुद को दोहराने की कोशिशों को बंद नहीं किया, तो उनके रास्ते मुश्किलों से जुड़ते चले गए। साफ शब्दो में कहा जाए, तो 50 पार कर चुके शाहरुख का रुमानी अंदाज आज भी कन्याओंं के दिलों को भाएगा, अगर इस अंदाज को वे ठीकठाक सी कहानी के साथ लाएं। डियर जिंदगी इसकी बेहतरीन मिसाल है, जिसमें वे उतने ही अच्छे लगे, जितने हैं, क्योंकि वहां एक कहानी थी, जिसके किरदार के साथ लोग जुड़ते चले जाते हैं। हैप्पी न्यू ईयर हो या दिलवाले हो या अब हैरी हो.... मामला वहां फंसता है, जब इस रुमानी अंदाज को न्यायसंगत बनाने के लिए कहानियों का टोटा नजर आए। यहां किसी का भी हैरान होना लाजिमी है कि आखिर शाहरुख कमजोर कहानियों पर अपनी इस इमेज का खिलवाड़ क्यों होने दे रहे हैं? इसे कमर्शियल सिनेमा की जरुरत कहा जाए या बादशाह की अपनी कमजोरी? इन दो सवालों को समझने पर असली बात सामने आ जाती है।

सालों का तजुर्बा और शोहरत की बुलंदी शाहरुख खान के जिस सफर को और बेहतर कर सकती थी, अगर वही कमजोरी बनती जाए, तो इसके लिए उनके सुपर स्टारडम से खिलवाड़ करने वाले निर्देशकों से ज्यादा खुद शाहरुख ही जिम्मेदार माने जाएंगे, क्योंकि ये बादशाहत उन निर्देशकों की नहीं, शाहरुख खान की है। इस बादशाहत को सलामत रखने की जिम्मेदारी किसी भी डायरेक्टर से ज्यादा खुद शाहरुख की है। 

कहते हैं कि कामयाबी कैसी भी हो, इसमें नशा जरुर होता है और कुदरत कहती है कि नशा जब उतरता है, तो वही दुनियाा सामने आ जाती है। शाहरुख को सुपर स्टार कहें या बादशाह कहें या किंग खान कहें या कुछ और नाम दें। ये मसला नहीं है। मसला उन तमाम चाहने वालों के जज्बात का हो जाता है, जिन्होंने दिल्ली के एक पठान बच्चे को सिनेमा का दुनिया का सबसे बड़ा मकाम दिया। ये जज्बात कभी दिलवाले देखकर मायूसी में बदलते हैं, तो कभी सेजल-हैरी का (कमजोर) किस्सा देखकर मातमी हो जाते हैं। 

वे करिश्माई हैं। दर्शकों के दिलों पर राज करने के हुनर के माहिर हैं। अगर किसी कन्या का प्यार पाने के लिए कभी राज, तो कभी राहुल बनकर जब वे कोशिश करते हैं, तो कामयाबी के रास्ते खुल जाते हैं। मामला यहां भी प्यार का है, लेेकिन किसी एक कन्या के प्यार का नहीं। करोड़ों के प्यार को फिर से पाने के लिए शाहरुख खान को बस इतना सा ही तो करना है कि फिर से एक अच्छी कहानी लाएं, फिर से एक अच्छी फिल्म बनाएं और फिर से अपनी रुमानी छवि के साथ मजबूत किरदार को परदे पर लाएं, तो क्या नहीं हो सकता। 
शाहरुख खान जिस मकाम पर हैं, वहां उनके लिए अभी बहुत कुछ बाकी है। जनता के दरवाजे अभी भी बंद नहीं हुए हैं। हमारी जज्बाती जनता तो थोड़े से प्यार से ही बलिहारी होने लगती है। शाहरुख खान और इस जनता के बीच सिर्फ एक रास्ता ही रहता है। 

इस रास्ते के एक छोर पर सुपर स्टारडम है, तो दूसरे छोर पर जनता के जज्बात और बीच में हैं खुद शाहरुख खान। रास्ता शाहरुख खान को चुनना है। कमर्शियल सिनेमा के दायरे में अभी भी वे ऐसी कहानियां ला सकते हैं, जो उनको इन दोनों छोरों से मिला सकती हैं। 
इस बादशाह की बादशाहत को किसी और से नहीं, खुद से चुनौती है। जनता का संदेश साफ है- फिर से एक नई शुरुआत कीजिए और मायूसी के अंधेरे को छितरनेे में वक्त नहीं लगेगा। इंतजार रहेगा कि जल्दी ही खिलखिलाता, मुस्कराता हुआ बादशाह अपनी फिल्म के प्रेस शो में अपने दोस्तों के साथ मस्ती भरे अंदाज में पेश आए, तो चेन्नई एक्सप्रेस का ठहरा सफर आगे बढ़ेगा और बढ़ता चला जाएगा। 


  


कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...