Saturday, December 30, 2023

घूमता आईना


2023 की विदाई के मौके पर घूमता आईना बीते साल में हिंदी सिनेमा की सैर कराएगा। लगे हाथों कुछ बातें नए साल की- 

बिजनेस का बूम बूम


फिल्मों के बिजनेस की क्या बात करनी, जब मिठाई बनाने वाला हलवाई ही टेस्ट तय करे। कारपोरेट और मल्टीप्लेक्स के इस दौर में फिल्मों में पैसा लगाने वाले कारपोरेट हाउस और उनके साथ फिल्में बनाने वाले प्रोडक्शन हाउसेस ही आंकड़ों की बाजीगरी करते हैं। मतलब, जवान बनाने वाली शाहरुख खान की कंपनी रेडचिल्ली ही बताती है कि फिल्म ने कितने रिकार्ड बनाए। इस साल भी बड़े बजट की तमाम फिल्मों को लेकर यही सुनाई दिया कि हमारी फिल्म आगे-पीछे के सारे रिकार्ड तोड़कर आल टाइम ब्लाकबस्टर की  लिस्ट में टॉप पर आ गई। इस लिस्ट में पठान, तू झूठी मैं मक्कार, रॉकी और रानी की प्रेम कहानी, जवान, टाइगर 3, एनीमल, डंकी के नाम रख लो। हां, इस लिस्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम गदर 2 का रहा। किसी ने नहीं सोचा था कि 60 साल पार कर चुके इस जेनरेशन के अंकल जी सनी देओल इस तरह का खतरु कम बैक करेंगे। बाकी सेमी हिट और एवरेज फिल्मों की लिस्ट लगभग वही रही, जो न इधर की, न उधर की कैटेगिरी में रहती हैं। अब रही फ्लाप फिल्मों की लिस्ट। इसमें तकरीबन सौ-सवा सौ वो फिल्में होती हैं, जिनको देखने के बाद अपना पैसा और समय बर्बाद करने के लिए हर कोई अपना सर पीटता है। आंकड़ों से अलग साल 2023 का कड़वा सच ये रहा कि केरला स्टोरी जैसे सरकारी प्रोपगंडों के लिए लंबी लाइन लगती है, लेकिन सैम बहादुर जैसी फिल्मों के लिए किसी के पास वक्त नहीं होता। 

उठा-पटक

2014 के बाद वाले न्यू इंडिया के हिंदी सिनेमा की खेमेबाजी किसी से छुपी नहीं है। इस साल भी मायानगरी में बैठे दिल्ली दरबार के रत्नों ने जमाकर मोर्चा संभाला। कुछ रत्नों ने मुस्लिम विरोधी भावनाओं को हवा देने के लिए फिल्मों का खेल खेला। बाकी रत्न मोदी का जयकारा करते रहे। इन तमाम रत्नों में भी कंगना ने बाजी मारी। आलम देखिए कि मोदी को नया अवतार और अपनी फिल्म न देखने वालों को देशद्रोही करार देकर भी उनका भला नहीं हुआ। इतना सब कुछ करके भी उनकी फिल्म तेजस क्रैश कर गई और भाजपा ने उनको कोई पाल्टिकल प्लेटफार्म नहीं दिया। मोदी से आम काटकर और चूसकर खाने वाले कालजयी सवाल करने वाले अक्षय कुमार  ने  कैनेडियन कुमार का टैग हटाने के लिए भारत की नागरिकता भी वापस ले ली,  फिर भी उनकी फेवरेट सत्ता के सेंसरबोर्ड ने उनकी फिल्म (ओएमजी 2) का इतना बुरा हाल किया कि वे अब तक बेहाल हैं। उनकी सारी फिल्में बाक्स आफिस पर धराशायी रहीं। कंगना और अक्षय की तरह सत्ता के करीबी सितारों ने किसी मुद्दे पर चुप्पी नहीं तोड़ी। सत्ता विरोधी खेमे में सवार अनुभव सिन्हा, अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर मौनव्रत में रहे। इस कैंप में एकमात्र एक्टिव चेहरा प्रकाश राज का रहा, जो अब भी इस सल्तनत से बैखौफ होकर डटकर मुकाबला करता है। आने वाले साल में संसद के चुनाव होने हैं। अगर चुनाव हुए, तो देख जाएगा कि किसे अपनी भक्ति का कितना प्रसाद मिलेगा। कंगना, अक्षय के अलावा अनुपम खेर पार्टी से चुनाव का टिकट पाने की क्यू में होंगे और दिल्ली दरबार हेमा मालिनी, सनी देओल, किरण खेर की किस्मत का फैसला करेगा। अमिताभ बच्चन नौवें साल में भी दिल्ली की सत्ता को मौन-समर्थन करते रहे। बच्चन परिवार सुर्खियों में रहा। श्वेता बच्चन को प्रतीक्षा बंगले का मालिक बना दिया गया, तो ऐश्वर्या राय-अभिषेक के बीच बिगड़े रिश्तों का मामला तलाक तक पंहुचने की खबरों का तांता लग गया। बच्चन परिवार इस मसले पर भी चुप रहा है। इस चुप्पी को सही या गलत आप खुद तय करें। इसी बीच कैमरों की मौजूदगी में बच्चन पिता-पुत्र (अमिताभ-अभिषेक) का सलमान खान के गले लगना भी कम बड़ी ब्रेकिंग तो नहीं है। बच्चन परिवार से अलग ये साल देओल बंधुओं पर मेहरबान रहा। सनी देओल ने गदर मचाया, तो एनिमल में बाबी देओल छा गए। सनी देओल को एक बैंक ने कर्जा न लौटाने के लिए नोटिस दे दिया और फिर इसे अपनी गलती बताकर वापस ले लिया। 

शादी-वादी 

बालीवुड की शादियों की लिस्ट में परिणीती चोपड़ा-राघव चड्ढा से लेकर सिद्धार्थ मल्होत्रा-क्यारा आडवाणी की रिश्तेदारी बनी। रणदीप हुड्डा ने मणिपुर से अपनी दुल्हनिया खोजी। सुनील शेट्टी की बेटी अथिया की मैरिज इनिंग केएल राहुल के साथ शुरु हुई, तो आशीष विद्यार्थी ने इस उम्र में अपना नया जीवनसाथी तय किया। स्वरा भास्कर ने भी फरहाद के साथ अपनी शादी बेपरदा की, मगर सबसे ज्यादा चौंकाया अरबाज खान ने, जो मलाइका के साथ तलाक के बाद सालों तक विदेशी  जार्जिया एंड्रियानी के साथ डेटिंग करते रहे और एक दिन मेकअप डिजाइनर शूरा के साथ उन्होंने निकाह पढ़ लिया। तमाम जोड़ियों को मुबारकबाद। 

 गुडबाय 

इस साल जिन सितारों ने इस जमीं का साथ छोड़ दिया. उनमें कैलेंडर सतीश कौशिक से लेकर महाभारत के शकुनि मामा गुफी पेंटल, मल्टीस्टारर फिल्मों के चैंपियन डायरेक्टर राजकुमार कोहली, यशराज की धूम 1 और धूम 2 के निर्देशक संजय गड़वी, सत्तर के दशक के सबसे बड़े चाइल्ड स्टार जूनियर महमूद, परिणीता (विद्या बालन) वाले निर्देशक प्रदीप सरकार के अलावा चरित्र कलाकार नितेश पांडे, जावेद खान के नाम शामिल रहे। ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति दे। 

2024 के नए चेहरे 

नए चेहरों को नई संभावनाएं माना जाता है। फिल्मों की दुनिया में बड़े परिवारों के नए चेहरों को नई उम्मीदों के तौर पर देखा जाता है। परिवारवाद के आरोपों की तमाम संभावनाओं के साथ नए साल में जिन चेहरों की एंट्री होने जा रही है, उनमें सैफ अली खान का बेटा इब्राहिम खान तैयार है। उसकी पहली फिल्म को बम्मई ईरानी का बेटा बनाने जा रहा है। रवीना टंडन की बेटी रशा टंडन की जोड़ी अजय देवगन के भतीजे अमान देवगन के साथ बनकर एंट्री करेगी। अभिषेक कपूर (गट्टू) इसके डायरेक्टर होंगे। संजय कपूर की बेटी शनाया कपूर की पहली फिल्म बेधड़क होगी, जिसका डायरेक्टर अभी तय नहीं है। संगीतकार राजेश रोशन की बेटी पश्मीना को इश्क विश्क की सिक्वल के लिए कास्ट किया गया है। डायरेक्टर का नाम यहां भी तय नहीं है। नए चेहरों वाली लिस्ट में बाबी देओल के बड़े बेटे आर्यमान का नाम भी है, लेकिन अभी उनके प्रोजेक्ट तय नहीं है। शाहरुख खान की बेटी सुहाना का फिल्मी सफर शुरु हो चुका है। देखना है कि आर्यन खान परदे पर कब तशरीफ लाएंगे। अमिताभ बच्चन की नातिन नव्या नवेली नंदा की पहली फिल्म का भी इंतजार है। अब इसी लिस्ट में काजोल और अजय देवगन की बेटी नायसा का नाम भी जुड़ता जा रहा है। 

नए साल की नई फिल्में 

वैसे तो हर साल हर फिल्म से कामयाबी की उम्मीदें करना लाजिमी होता है, लेकिन कुछ फिल्मों पर ज्यादा नजरें रहती हैं। 2024 की आने वाली फिल्मों की ऐसी लिस्ट में देखा जाए, तो  जनवरी में आने वाली एक्शन पैक फिल्म फाइटर में ऋतिक रोशन की जोड़ी पहली बार दीपिका पादुकोण के साथ बनी है। इसी महीने रिलीज होने जा रही सस्पेंस थ्रिलर मैरी क्रिसमस में कैटरीना कैफ की जोड़ी साउथ के विजय सेतुपति के साथ होगी। सिंघम की नई कड़ी में इस बार दीपिका पादुकोण को कास्ट किया गया है। बड़े मियां छोटे मियां में अक्षय कुमार के साथ टाइगर श्राफ होंगे। यशराज को इस साल पठान बनाम टाइगर और धूम 4 में से एक प्रोजेक्ट शुरु करना है, लेकिन अभी मामला तय नहीं है। राकेश रोशन की कृष 4 का कोई अता-पता नहीं है। अगले साल के आखिर में वेलकम सीरिज की तीसरी कड़ी में सितारों की भरमार होगी। 

जाने और आने वाले साल के घूमते आइने के आखिरी पड़ाव पर हैप्पी न्यू ईयर के सेलिब्रेशन में आप उन गानों पर थिरक सकते हैं, जिन पर इस साल दुनिया थिरकी। ये है हमारी अपनी टॉप 10

1. झूमे जो पठान... (पठान)

2. बेशर्म रंग--- (पठान) 

3. तेरे वास्ते फलक से मैं... (जरा हटके जरा बचके)

4. चल तेरे इश्क में (गदर 2) 

5. शो मी ठुमका (तू झूठी मैं मक्कार) 

6. व्हाट झुमका (रॉकी-रानी की प्रेम कहानी) 

7. लेके प्रभु का नाम.. (टाइगर 3) 

8. ओ मैं तां छलिया... (जवान)

9. जमाल जमालु कुडू--- (एनिमल)

10. लुटपुट गया... (डंकी) 

                                        

                                        फुर्सत और मूड हो तो इनके जवाब कमेंट बाक्स में शेयर कीजिए-

साल की फेवरेट फिल्म ?

साल का फेवरेट हीरो?

साल का  फेवरेट हीरोइन?

साल का फेवरेट डायरेक्टर?

साल का फेवरेट सांग ?


2023 के कुछ प्रमुख ब्लाग के लिंक भी देखिए- 



मामला रश्मिका का नहीं, लड़कियों की इज्जत का है




 








Friday, December 22, 2023

सलमान के साथ बच्चन का मिलन- कहां आग, कहां धुंआ



फिल्म प्रोड्यूसर आनंद पंडित की बर्थ डे पार्टी में सलमान खान का अभिषेक बच्चन और अमिताभ बच्चन से गले लगकर मिलना और उससे भी अहम बात ये कि कैमरों की मौजूदगी में गले मिलना, अगर कोई अजूबा  न माना जाए, तो भी ये कोई एक्सीडेंटल मामला भी नहीं बनता। 

कैमरे की कैद में मिलन 
सलमान के साथ बच्चन पिता-पुत्र का गले लगना कुछ ऐसा है, जिसे लेकर मीडिया के अंदर-बाहर गासिप की दुनिया के धुरंधर बाल की खाल तो निकालेंगे, क्योंकि ये तस्वीर कुछ दिनों पहले के उस मामले के के शेड्स में बनी है, जिसमें बड़े बच्चन ने अपना एक बंगला (प्रतीक्षा) अपनी बिटिया श्वेता के नाम कर दिया और गासिपबाजी की दुनिया में तूफान मचा कि इसे लेकर बच्चन के परिवार में सब कुछ सही नहीं है। 


यहां तक कहा गया कि अभिषेक और ऐश्वर्या राय के रिश्तों में सहजता नहीं है और असहजता का आलम इतना है कि उनके बीच डायवोर्स तक की बातें होने लगीं। अब दुविधा ये है कि इसे कैसे समझा जाए। अगर मामला कोरी गप्पबाजी का होता, तो बच्चन अपने ब्लाग पर खंडन करते या कोई सफाई देते। जया बच्चन को भी पता है कि कैसे सफाई दी जाती है। अभिषेक और ऐश्वर्या राय की तरफ से भी कुछ नहीं कहा गया। इस खामोशी के दरमियां मामला कुछ साफ हुआ, जब श्वेता बच्चन के बेटे अगस्तया नंदा की एक्टर के तौर पर पहली फिल्म के प्रीमियर पर समूचा बच्चन परिवार कैमरे के सामने एक साथ दिखा। इसके बाद अभिषेक की बेटी आराध्या के स्कूल के सलाना जलसे के मौके पर भी बच्चन परिवार (अमिताभ, अभिषेक, ऐश्वर्या राय) साथ दिखे।

इन सारी बातों को एक तार में पिरोएं तो ये समझ में आता है कि बच्चन सीनियर (अमिताभ-जया बच्चन) ने अपने एक बंगले (प्रतीक्षा) की वसीयत अपनी बेटी श्वेता के नाम कर दी है। इसमें कोई शंका नहीं है। अब इस वसीयतनामे को लेकर अगर बच्चन परिवार में किसी किस्म की उठा-पटक है, तो इसे गासिप ही मानेंगे, क्योंकि अधिकारिक तौर पर बच्चन परिवार कुछ नहीं कह रहा है। अगर कुछ लोग इस मामले को लेकर बच्चन  परिवार की खामोशी को हकीकत मानना चाहें, तो मर्जी उनकी। 

अब रह जाती हैं दो बातें, जो आपस में कनेक्ट हैं। ये गासिप नहीं है कि सलमान और बच्चन पिता-पुत्र आपस में गले लगे। इसे महज संयोग भी माना जा सकता है या ये सोचा जा सकता है कि सलमान खान और ऐश्वर्या राय के रिश्तों की बुनियाद में बच्चन परिवार ने इतने सालों से सलमान खान और उनके परिवार से किसी भी किस्म का रिश्ता नहीं रखा। सार्वजनिक तौर पर भी दोनों पक्ष एक दूसरे से दूर ही रहे। सलमान हों या बच्चन, दोनों इतने समझदार और अनुभवी जरुर हैं कि किसी इवेंट को लेकर एडवांस में पता लगा लेते हैं कि कौन आ रहा है और कब आ रहा है। हर इवेंट में कैमरों की मौजूदगी को देखते हुए ये और ज्यादा अहम हो जाता है। इसे मद्देनजर रखते हुए अगर आनंद पंडित की पार्टी में गले मिलन मूमेंट को महज इत्तेफाक कहना खटकता है और यहां सवाल हो जाता है कि क्या बच्चन परिवार गले लगकर सलमान और उनके परिवार से रिश्तों में बेहतरी देख रहा है और मिलियन डालर सवाल- क्या इसका कहीं से कोई कनेक्शन अभिषेक-ऐश्वर्या के रिश्तों के भविष्य से जुड़ता है?


श्वेता बच्चन को बंगला दिए जाने से लेकर अभिषेक-ऐश्वर्या राय के रिश्तों में तल्खी और इसे लेकर बच्चन परिवार में असहजता की खबरों के बीच आनंद पंडित के जश्न की तस्वीरें इस पूरे मामले को कहां से कहां तक ले जाएंगी, ये दो बातों पर निर्भर करता है। पहला, या तो बच्चन परिवार में से कोई भी जनता जनार्दन के लिए खुलकर आए और पूरे मामले को वंस एंड ऑल क्वीयर कर दे, तो फिर गासिपबाजी की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। दूसरी बात, बच्चन परिवार खामोश रहकर गासिपबाजी को हवा देता रहे। 
 
एक बात कही जाती है कि बिना आग के धुंआ नहीं उठता। आग कहां है, धुंआ कहां है, ये तो सिर्फ बच्चन जानें।याद आता है कि बड़े बच्चन ने शाहिद-करीना के किसिंग की क्लिप के बवाल पर कहा था कि पब्लिक लाइफ मे आने के बाद सेलिब्रिटी की जिंदगी में कुछ प्राइवेट नहीं रहता। इसी लाइन में बच्चन से गले मिलते सलमान खान की तस्वीरों का सच शुमार है, अगर समझ सकें तो समझ लीजिए, वरना इसे लेकर मसाला तो गासिपबाज देते रहेंगे।

वैसे इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है, जवाब के लिए कमेंट बाक्स ओपन है। 


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ड ड ड डंकी पर सवार बादशाह

अब 'नागिन' जैसी 'धूम' नहीं

मामला रश्मिका का नहीं, लड़कियों की इज्जत का है


नाना की नानागिरी के लिए कुछ और इंतजार-





Tuesday, December 19, 2023

ड ड ड ड ड ड ड डंकी पर सवार बादशाह

ये संयोग है कि आज राजकुमार हीरानी की पहली फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस के रिलीज की बीसवीं वर्षगांठ है और इस वक्त दो दिन के बाद रिलीज होने जा रही उनकी नई फिल्म डंकी का इंतजार हो रहा है। विडंबना है कि इस वक्त दिन-रात डंकी के प्रमोशन में डूबे शाहरुख खान और राजू हीरानी के पास मुन्नाभाई की बीसवीं वर्षगांठ याद करने के लिए फुर्सत नहीं है।
मुन्नाभाई की पहली कड़ी से शाहरुख खान का भी खासा कनेक्शन रहा है। हर कोई जानता है कि मुन्नाभाई के टाइटल रोल के लिए वही पहली पसंद थे और संजय दत्त उस वक्त जहीर का रोल करने वाले थे, जो बाद में जिमी शेरगिल ने किया। मुन्नाभाई की कहानी शाहरुख खान को भी पसंद थी। उस वक्त शाहरुख खान और मुन्नाभाई सीरिज के प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा के बीच में अगर इगो क्लैश नहीं होता, तो मुन्नाभाई  का रोल शाहरुख खान ही करते। इस वक्त राजकुमार हीरानी और विनोद विधु चोपड़ा के बीच भी रिश्ते तल्खी वाले हो गए हैं, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हीरानी अपनी पहली फिल्म की वर्षगांठ को भूल जाएं या अनदेखा करें।

मुन्नाभाई की बात को यही रोककर अपनी गाड़ी डंकी वाले रास्ते पर ले आते हैं। फिल्म को रिलीज होने में दो दिन बचे हैं। फिल्म के प्रमोशन को लेकर शाहरुख खान ने हमेशा की तरह अपनी पूरी ताकत लगा दी है। डंकी उस कैटेगिरी की फिल्मों में शुमार नहीं होती, जिसके लिए ये सोचा जाए कि ये हिट होगी या नहीं। ऐसी फिल्मों को लेकर सिर्फ ये सोचा जाता है कि  पहले दिन कितना बिजनेस करेगी, वीकंड पर कितना बिजनेस रहेगा, कितने रिकार्ड तोडेगी, कितने रिकार्ड जोड़ेगी। जब से कमाई के आंकड़ों का खेल प्रोडक्शन हाउस खुद खेलने लगे हैं, तो इनका चार्म खत्म सा हो रहा है। डंकी का निर्माण शाहरुख खान की कंपनी रेडचिल्ली ने किया है और रिलीज के बाद रेडचिल्ली ही बताएगी कि डंकी का बिजनेस क्या रहा। कुछ समझे ?

डंकी के साथ दो अहम बातें जुड़ी हुई हैं। पहली बात, डंकी के साथ ही बाहुबली वाले साउथ के दिग्गज सितारे प्रभास  की फिल्म सालार रिलीज होने वाली है। इस टकराव को लेकर मीडिया में ज्यादा बवेला नहीं है, तो वजह साफ है कि सालार पैन इंडिया फिल्म होने के बाद भी साउथ और ओवरसीज में अच्छा करेगी, लेकिन हिंदी में शाहरुख खान की फिल्म के आगे इसका टिकना मुश्किल है। बाहुबली के बाद प्रभास की पिछली रिलीज  सभी फिल्मों ने हिंदी बेल्ट में उनके ब्रैंड को धरती पर ला पटका है। 

शाहरुख खान की फिल्म से साउथ की फिल्म के मुकाबले को लेकर एक दिलचस्प मामला याद आता है, जब 2018 में शाहरुख खान की जीरो के सामने केजीएफ रिलीज हुई थी। यश उस वक्त हिंदी बेल्ट के लिए नामालूम हुआ करते थे। बाक्स आफिस के नतीजे में जीरो का मामला  शून्य जैसा रहा और केजीएफ ने हिंदी बेल्ट मे ंजगह बना ली। कहना मुश्किल है कि डंकी बनाम सालार में ऐसा कुछ होगा। अगर होगा तो ये चमत्कार होगा और चमत्कार रोज रोज नहीं हुआ करते। 

डंकी को लेकर दूसरी बात ये है कि  शाहरुख खान हैट्रिक पर हैं। पठान और जवान के बाद उनका एक ही साल में तीसरी फिल्म लेकर आना एक ऐसा वाक्या है, जो अपने आप में विचित्र इसलिए है कि ऐसा न तो पहले हुआ, न ही आने वाले समय में होने की गुंजाइश है। जीरो के नतीजे को लेकर बुरी तरह से हिले शाहरुख खान ने ये सोच-विचार में चार साल लगा दिए कि अब उनको किस तरह की फिल्मों में काम करना चाहिए और अब तक उनका ये निशाना सटीक रहा है। ये भी महज संयोग है कि इन तीनों फिल्मों के निर्देशकों के साथ शाहरुख खान ने पहली बार काम किया। 

अब छोटी-सी बात राजकुमार हीरानी की, जिनको हिंदी सिनेमा का नाट आउट बैटसमैन कहा जाता है क्योंकि बाक्स आफिस पर उनकी सभी फिल्में सफल रही हैं। इससे भी बड़ी ये बात है कि सामाजिक दायरे में उनकी सभी फिल्मों ने जोरदार मौजूदगी दर्ज कराई है। उनका LCD (laughter cry drama) फार्मूला बेजोड़ साबित हुआ है। अब तक उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा के साथ फिल्में बनाई हैं। चोपड़ा से खटपट के बाद ये उनकी पहली फिल्म है। कहना मुश्किल है कि डंकी को लेकर ये बात कितनी अहम है। ज्यादा संभावना इस बात की है कि इस फिल्म के बाद चोपड़ा को हीरानी के साथ पंगा लेने पर अफसोस होगा।  

जाते जाते एक और बात याद आ गई। बुजुर्गवार कह गए कि एक न एक गिन हर गधे के अच्छे दिन जरुर आते हैं। क्या इस कहावत का इस फिल्म के साथ कोई कनेक्शन है ? ब्लाग खत्म करने से पहले यहां दो सवाल आपके लिए-

पहला,  शाहरुख खान से पहले मुन्नाभाई एमबीबीएस के लिए किस एक्टर को अप्रोच किया गया था?

दूसरा, राजकुमार हीरानी की अब तक रिलीज फिल्मों में आप किसे बेस्ट मानते हैं? 

जवाब के लिए कमेंट बाक्स ओपन है

शाहरुख खान से जुड़े ब्लाग के ये लिंक भी देखिए- 






यहां से कहां जाएगा सुपर स्टार का सफर ?




चलते चलते बात नाना पाटेकर से जुड़े ब्लाग की। याद है जी और जल्दी ही हाजिर होंगे नाना की नानागिरी के साथ 


Monday, December 4, 2023

स्वर्णकाल का हरफनमौला

शशि कपूर का दुनिया से रुखसत होना अगर किसी को हैरान नहीं कर सका, तो इसलिए वे सालों से जिस दर्द से जूझ रहे थे, उस दर्द से मुक्ति का कोई और रास्ता भी नहीं था। दो साल पहले जब मुंबई में दादा साहेब फाल्के उनको दिया गया, तो उस समारोह में शून्य में खोए शशि कपूर को देखना भी किसी त्रासदी से कम नहीं था।
शुक्र है कि फिल्म इंडस्ट्री में शशि कपूर की शख्सियत के साथ इंसाफ न हुआ हो, मगर सरकारी तंत्र पर ये तोहमत नहीं लग सकती। सरकार इस भले इंसान के सम्मान में सिनेमा का सर्वोच्च पुरस्कार दे सकती थी और ये जिम्मेदारी पूरी कर ली गई।
दो सवाल सीधे तौर पर बनते हैं। शशि कपूर को इतिहास किस तौर पर याद रखेगा? कमर्शियल सिनेमा का एक ऐसा चेहरा, जिसकी कामयाबी को उनके ही भाई (राज कपूर) ने टैक्सीवाला कहकर बहुत छोटा बनाने की कोशिश की थी या फिर एक ऐसा सितारा, जिसने बहुत आगे की सोच रखते हुए अपने पिता की याद में एक ऐसा स्मारक (पृथ्वी थिएटर) स्थापित कर दिया, जो कपूर खानदान के दिग्गजों को आईना दिखाता रहा या ऐसा कलाकार, जिसने कमर्शियल सिनेमा के स्टारडम की पारी खेलते हुए फिल्मकार के तौर पर उस सिनेमा के रास्ते को चुना, जिसे कला या समांतर सिनेमा कहा जाता है और विडंबना ये रही कि जब कमर्शियल सिनेमा के इस दिग्गज सितारे ने कमर्शियल सिनेमा के निर्माण का फैसला किया, तो अनुभव इतना पीड़ादायक रहा कि शशि कपूर ने फिल्म निर्माण से ही तौबा कर ली और कभी पलटकर नहीं देखा।
शशि कपूर बहुआयामी माने नहीं जाते थे, लेकिन उनकी शख्सियत का ये एक ऐसा रुप था, जो कभी न तो मीडिया में सुर्खी बना और न ही इसे गंभीरता से लिया गया और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसकी सबसे बड़ी वहज खुद शशि कपूर थे, जो खुद को कभी संपूर्ण व्यक्तित्व के साथ सार्वजनिक होने की जद्दोजेहद से दूर ही रहे। जिसने उनको जैसा समझा, शशि कपूर ने उसको वैसा ही समझने की पूरी आजादी दी, लेकिन खुद के अंदर वे बहुआयामी व्यक्तित्व के साथ जीते रहे।
शशि कपूर के फिल्मी सफर के इन तीनों पड़ाव को अगर एक नजर से देखा जाए, तो समझना मुश्किल नहीं होता कि कपूर खानदान के आभामंडल के आगे खुद को नतमस्तक न होने देने की उनकी अपनी जीविषा उनके व्यक्तित्व का पहला आभास दिलाती रही। शशि कपूर एक बड़े खानदान से होने के बाद भी संघर्ष की जमीन पर आगे आए। वे फिल्मकारों से मिलते और घर लौट जाते। उनको जिन फिल्मों में जिस तरह के रोल मिलते, वे उनको अपनी शिद्दत से निभाते रहे और कैरिअर की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। शशि कपूर के साथ काम करने वाले जानते और मानते हैं कि उनके अंदर सिर्फ उम्दा रोल करने की कोई जिद्द जैसी बात नहीं थी। वे जानते थे कि कमर्शियल सिनेमा की दुनिया में अपने लिए रास्ते और मकाम बनाने के लिए कुछ भी आसान नहीं था। तिस पर कपूर खानदान से होने का लेवल उनकी मुश्किलों को और बढ़ाता चला गया, लेकिन शशि कपूर ने अपने रास्ते बदलने के लिए हाथ-पांव नहीं पटके। शशि कपूर जब सिनेमा की दुनिया में दाखिल हुए, तो बड़े भाई राज कपूर, शम्मी कपूर, देव आनंद, दिलीप कुमार, बलराज साहनी और राजकुमार की तूती बोल रही थी। संजीव कुमार और धर्मेंद्र जैसे कलाकार भी जगह बना रहे थे। शशि कपूर इस फलसफे को बहुत बेहतर तरीके से समझ चुके थे कि अगर नंबर वन के चक्कर में पड़े, तो उनको लेने के देने पड़ जाएंगे। अगर राजकपूर की तरह उन्होंने शोमैनशिप की सोची, तो भी उनके हाथ कुछ नहीं आने वाला। इसलिए शशि कपूर ने विशुद्ध रुप से कमर्शियल फिल्मों के लिए मुफीद वो रास्ता पकड़ा, जहां कपूर खानदान का एक साधारण सा बंदा, साधारण तरीके से निर्देशकों की बात मानते हुए शूटिंग करके घर लौट जाता। फिल्म चल जाती, तो उनको चार और फिल्में मिल जातीं और फिल्म न चलती, तो दो फिल्मों से हाथ धोना पड़ता। शशि कपूर का कैरिअर इसी धूप-छांव से घिरा रहा और इस दौर ने उनको महान बनने का कोई मौका नहीं दिया। हां, नंबरों के खेल से बाहर वे कमर्शियल फिल्मों के ऐसे भरोसेमंद नाम जरुर बन चुके थे, जिनके फिल्म में होने से किसी को फिल्म बेचने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। भले ही फिल्म मल्टी स्टारकास्ट हो या सोलो हीरो वाली हो। शशि कपूर ने अगर महान कलाकार बनने की ललक में नामी फिल्मकारों की फिल्मों के लिए जोर लगाया होता, तो बहुत मुमकिन था कि उनको वो सब हासिल न हुआ होता, जो उनको कमर्शियल फिल्मों की दुनिया ने बगैर मांगे दिया और लगातार दिया। जरा गौर कीजिए, उस दौर में कमर्शियल फिल्मों की दुनिया के कितने कलाकार थे, जिन्होंने शशि कपूर बनकर इतनी लंबी पारी खेलने का माद्दा दिखाया हो, जो शशि कपूर ने किया। शशि कपूर उस खौफ से बहुत दूर रहे, जहां सुपर स्टारडम या महान कलाकार होने की छवि खोने का खतरा मंडराता रहता है। सुपर स्टारडम के कम होने या छिन जाने के डर ने बहुत सितारों की बलि ले ली, लेकिन शशि कपूर उस रास्ते पर आगे बढ़े ही नहीं, जहां ये खतरे उनको नुकसान पंहुचाते। वे गुड वन मैन की उस धारा के साथ बहते रहे, जहां माना जाता है कि बिना किसी को तकलीफ दिए आप अपना काम करके घर लौटकर गहरी और अच्छी नींद सोना जानते हैं। शशि कपूर ने कमर्शियल स्टार के तौर पर किसी एक दिन भी अपनी नींद खराब करने का अनुभव नहीं महसूस किया। दिग्गजों और सुपर सितारों की महफिल में यूं भी अपनी पारी खेलना क्या किसी महानता से कम है? शशि कपूर को इस मामले में महान मानने में कंजूसी बरती गई, ये भी मानने में भला क्या गुरेज।
एक दूसरी बात, शशि कपूर जानते थे कि वे सुपर स्टार नहीं है, इसलिए उनके लिए रोल लिखे जाने वाली फिल्में नहीं होंगी और सुपर स्टारों के भाइयों और दोस्तों के रोल वाला दौर एक वक्त आकर कमजोर पड़ जाएगा और एक दिन रुक भी जाएगा।
शशि कपूर इससे बेखबर नहीं थे। 80 के दशक के आधे में ही शशि कपूर ने इस हकीकत को पहचानते हुए जब फिल्में बनाने की राह पकड़ी, तो हर कोई मानता था कि वे उसी टाइप की फिल्में बनाएंगे, जिस टाइप की फिल्मों  के वे सितारे बने रहे। शशि कपूर ने यहां भी लोगों को गलत साबित किया। कलियुग से लेकर जुनून, उत्सव, विजेता जैसी फिल्मों का लाइन से निर्माण करके शशि कपूर ने न सिर्फ अपनी बिरादरी को चौंकाया, बल्कि सिनेमा के संतुलन का वो नजारा पेश किया, जिसमें एक कमर्शियल फिल्मों का स्टार सार्थक सिनेमा को एक मंच दे सकता है। याद नहीं आता, ये संतुलन उस दौर के किसी और सितारे ने सोचने की भी जेहमत दिखाई हो। इस बात से कौन मना कर सकता है कि इन फिल्मों में शशि कपूर को मुनाफा तो क्या होता, नुकसान भी जरुर हुआ होगा, लेकिन फायदा? फिर उनकी दूर की सोच का एहसास होता है। आज शशि कपूर को कमर्शियल सिनेमा के कामयाब सितारे के साथ साथ फिल्मकार के तौर पर जब याद किया जाता है, तो इन सार्थक सिनेमा की फिल्में ही उनको विशिष्ट फिल्मकार बनाती हैं। शुक्र है, अजूबा का प्रयोग शशि कपूर ने बाद में किया, वरना सार्थक सिनेमा के साथ उनकी ये जुगबंदी कहां नसीब होती, जिसने शशि कपूर को इतना बड़ा मकाम दिलाया।

सो एक स्टार चला गया। एक फिल्मकार चला गया। एक रंगकर्मी चला गया, जिसने अपने पिता की याद में पृथ्वी की स्थापना करके वो हासिल कर लिया, जो मील का पत्थर बन चुका है। पृथ्वी सिर्फ सभागार नहीं, बल्कि नाट्य मंच के आंदोलन की मशाल साबित हुआ। एकजुट और इप्टा के चरम दौर में पृथ्वी की मशाल वैसे ही जलती रही, जैसे शशि कपूर दिग्गजों के दौर में बतौर कलाकार अपनी जगह बनाए रखने में कामयाब हुए। पृथ्वी की स्थापना ने एक रंगकर्मी और बेटे के तौर पर अमरत्व के उस मकाम पर पंहुचा दिया था, जहां सिर्फ शशि कपूर और उनकी उपलब्धियां ही नजर आती हैं।

शशि कपूर उस सादगी का नाम रहा, जो रियल्टी से कभी दूर नहीं हुआ। जिसको हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े खानदान के होने का सुख था, लेकिन उन्होंने इसे गुरुर नहीं बनने दिया। शशि कपूर के साथ उनके बड़े भाई राज कपूर की तरह शोमैन का तमगा नहीं था। उनके पास शम्मी कपूर जैसे डांस स्टेप्स नहीं थे, लेकिन जो शशि कपूर के पास था, वो शम्मी कपूर और राजकपूर की उपलब्धियों से किसी तरह से कम नहीं था।

एक बात को लेकर सकून मिलता है कि शशि कपूर ने अपनी जिंदगी को भरपूर जिया। मौज मस्ती के साथ कमर्शियल सिनेमा की लंबी पारी, फिर सार्थक सिनेमा के फिल्मकार और फिर चारित्रिक भूमिकाएं। हर अंदाज में शशि कपूर ने अपनी सोच, अपने हुनर और अपनी कुव्वत का रंग भरा। शशि कपूर को कपूर खानदान का हिस्सा बनाना तो भगवान की देन था, लेकिन इतने बड़े खानदान का इतना साधारण सा शख्स जिस अंदाज में अपनी पारी खेलकर दुनिया से विदा हुआ, उसकी जीवटता, उसकी सहजता, उसकी सोच किसी भी तरह से शशि कपूर को किसी महान कलाकार से उन्नीस नहीं रखती। जहां तक रही इतिहास की बात, इतिहास का आकलन समय करता है और समय का आकलन इतिहास करता है। इतिहास रचने और इतिहास बनने की प्रक्रिया के बीच शशि कपूर उन यादों का हिस्सा जरुर बने रहेंगे, जहां आंखों से मुस्कराने वाला हंसोड़ कलाकार सिनेमाई परदे पर हरफनमौला अंदाज में दर्शकों का मनोरंजन करने में माहिर था।
जिस दौर में शशि कपूर आए, उसे सिनेमा का स्वर्णकाल कहा जाता था। इस दौर में शशि कपूर ने जिस अंदाज में खुद को ढाला, यही खूबी शशि कपूर को सिनेमा का हरफनमौला बना गई। शुक्रिया शशि साहब, ये विश्वास दिलाने के लिए कि बड़े खानदान से ताल्लुक रखने के बाद भी साधारण कलाकार कैसे असाधारण कामयाबी की मिसाल बन जाते हैं।

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