Friday, April 28, 2017

चार किस्से, चार यादें और एक विनोद खन्ना....


कोई कहता है कि वे हमेशा के लिए चले गए। 
कोई कहता है कि वे हमेशा दिलों में रहेंगे। 

पत्रकार के तौर पर विनोद खन्ना से जुड़ी यादों के पन्ने पलटे जाएं, तो समुदर-मंथन हो गया... इस मंथन में से चार यादें, चार किस्से, जो इस पंजाबी मुंडे की विराट कामयाबी को शब्दों में बांधने की ताकत तो नहीं रखते, मगर उनकी शख्सियत का आईना जरुर बन जाते हैं, जिसमें एक ऐसा इंसान नजर आता है, जिसने कामयाबी को अपनी मर्जी और मूड से ज्यादा तवज्जो देना मुनासिब नहीं समझा। 
आइए, यादों के एक ऐसे सफर में हमसफर बनिए, जो विनोद खन्ना के स्टारडम को महसूस करने का एक मौका जरुर बन जाते हैं-


सीन 1 
दिसंबर 1988 
(उस दौर में मोबाइल का इस्तेमाल नहीं होता था) 

मालाबार हिल स्थित विनोद खन्ना के फ्लैट में बजती घंटी......
उधर से- कौन बोल रहा है, किससे बात करनी है? 
इधर से- विनोद जी से एक इंटरव्यू के लिए बात करनी है
उधर से- विनोद जी तो अमेरिका चले गए कल रात.. एक महीने बाद लौटेंगे...
इधर से- सर, इंटरव्यू नहीं देना तो कोई बात नहीं, लेकिन नौकर तो मत बनिए.. आपकी आवाज को तो हजारों-लाखों में पहचाना जाता है.. 
उधर से- (एक जोरदार हंसी और फोन कट..)


सीन 2 
अप्रैल, 1990

निर्माता सत्ती शौरी (अर्जुन कपूर की नानी) की फिल्म फरिश्ते का सेट
मेकअप रुम में विनोद खन्ना-धर्मेंद्र

सवाल- बोलो, क्या चाहिए
पत्रकार- कैमरे पर आप दोनों का इंटरव्यू
धर्मेंद्र- (गुस्से से)- किसने बुलाया.. 
विनोद खन्ना (आंखों से घूरते हुए)- टीवी पर कोई इंटरव्यू नहीं.. 
पत्रकार- सत्ती मैडम ने कहा था आने को
विनोद खन्ना- तो उनका ही इंटरव्यू कर ले ना.. भाग यहां से
धर्मेंद्र- पैग लगाना हो तो कुर्सी लेकर बैठ जा
पत्रकार झेंपकर मेकरुम से बाहर. वापस जाने की तैयारी में
सत्ती शौरी का आगमन
सत्ती शौरी- क्या हुआ बेटा- इंटरव्यू हो गया
पत्रकार- नहीं जी, दोनों ने मना कर दिया और डांटकर भगा दिया
सत्ती शौरी- मेरे साथ आओ... 
सत्ती शौरी मेकरुम में घुसी, बाहर से आवाज सुनाई दी
धरम जी, विनोद जी, उस जर्नलिस्ट को मैंने बुलाया है। आप दोनों के इंटरव्यू के लिए। पांच मिनट में बाहर आइए.. 
बाहर आकर सत्ती पत्रकार से- बेटा कैमरा सेट कर.. अभी दोनों आ जाएंगे.. 
तीन मिनट बाद 
गर्दन लटकाए विनोद खन्ना और धर्मेंद्र मेकअप रुम से बाहर-
धर्मेंद्र- कहां करना है इंटरव्यू
विनोद खन्ना- अरे यार, तू मजाक भी नहीं समझता। हम क्यों मना करेंगे. जब तक चाहे इंटरव्यू कर... (फिर घूर कर).. कोई पर्सनल सवाल मत करना प्यारे... 
लगभग 20 मिनट का इंटरव्यू होने के बाद मेकअप रुम से विनोद खन्ना-धर्मेंद्र का पत्रकार को बुलावा
धर्मेंद्र- अगर कुछ भी उल्टा-सीधा दिखाया, तो देखना फिर...
विनोद खन्ना- (मुस्कराकर) क्यों भाई, प्रोडयूसर को कंप्लेन भी करता है हमारी...  थैंक यू 
धर्मेंद्र- पैग लेना है तो बोल.... (दोनों की जोरदार हंसी)



सीन 3
जनवरी 1997
दूरदर्शन पर  प्रसारित सीरियल महाराणा प्रताप का सेट

सवाल- बड़े फिल्मी सितारे तो टीवी पर आना पसंद नहीं करते। आप इस रोल के लिए कैसे मान गए?
जवाब- मुझे पसंद आया, इसलिए यहां आ गया (जोरदार हंसी)। इसमें प्राब्लम क्या है? मुझे तो कोई बुराई नजर नहीं आती। फिल्में हों या टीवी, आपका काम दर्शकों का मनोरंजन करना है। मैं खुश हूं कि मुझे ये रोल करने का मौका मिला.. 
सवाल- इससे आपके फिल्मी कैरिअर पर कोई असर हुआ तो.. 
जवाब- मैं ये सब कभी नहीं सोचता। जो दिल में आता है, वो करता हूं। डरकर न कभी जीया, न ही कभी ऐसा होगा। दिल की सुनों, हमेशा खुश रहोगे... 


सीन 4 
अप्रैल 2006

मुंबई के अंधेरी स्टेशन के पास में फिल्म रिस्क की शूटिंग
दो घंटे से भी ज्यादा वक्त से विनोद खन्ना के इंटरव्यू का इंतजार
विनोद खन्ना- मुझे अभी निकलना है। गीताजंलि (उनकी पहली पत्नी) अस्पताल में एडमीट है। इंटरव्यू फिर कभी... 
तेजी से अपनी कार की तरफ लपके.. फिर पलटे, इंतजार करने वाले पत्रकार को बुलाया। कुछ सोचने लगे...
विनोद खन्ना- सॉरी.. तुम भी तो यहां काम से ही आए हो। ऐसे वापस जाओगे, तो अच्छा नहीं लगेगा... एक काम करो, कार में साथ चलो, रास्ते में बातचीत हो जाएगी.. कोई परेशानी तो नहीं... 
कार में अंधेरी से दादर तक के बीच सवाल-जवाबों का दौर- 

सवाल- आपको सुपर स्टार का दर्जा कभी नहीं मिला। कभी अफसोस होता है? 
जवाब- मैं ये सब सोचता, तो कभी अपने काम को एंज्वाय नहीं कर पाता। मुझे जो मिला, मैं उससे बहुत खुश हूं
सवाल- एक दौर था, आप अमिताभ बच्चन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थे?
जवाब- कैसी चुनौती? अमित बहुत अच्छे कलाकार हैं और दोस्त भी हैं। हमारे बीच ये कभी नहीं हुआ। पब्लिक ने हमारी जोड़ी को पसंद किया। हमें साथ काम करने का मौका मिला। इससे ज्यादा क्या सोचना और क्यों सोचना
सवाल- आप ओशो की तरफ न जाते, तो सुपर स्टार बन जाते
जवाब- न जाते तो पता नहीं क्या होता। मैं अपनी मर्जी से गया और मर्जी से वापस आ गया। मैंने उस फेस को भी एंज्वाय किया और बहुत कुछ सीखा। नहीं जाता, तो शायद अफसोस रह जाता। मैं कोई स्टार बनने नहीं आया था... मैं सिर्फ एक्टिंग करना  चाहता था। जब तक मौका मिलता रहेगा, एक्टिंग करता रहूंगा। बाकी सब दर्शक तय करेंगे। 
सवाल- आपके अफेयर्स?
जवाब- लाइफ को एंज्वाय करना कोई बुरी बात तो नहीं (हौले से मुस्कान)
सवाल- अमिताभ बच्चन राजनीति में असफल होकर वापस आ गए। आप सेंट्रल में मंत्री भी बन गए
जवाब- अमित के साथ क्या हुआ, ये वो जानें। ये कंपेयर का आधार नहीं हो सकता। मुझे राजनीति में जाना अच्छा लगा, सो चला गया। वहां अपनी पार्टी (भाजपा) ने जो जिम्मेदारी दी, वो निभाने की कोशिश की... 
सवाल- कभी राजनीति और फिल्मों में से एक चुनने का मौका हुआ, तो क्या चुनेंगे? 
जवाब- अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ। जो नहीं हुआ, उसके लिए क्या सोचना। अगर दोनों में बैलेंस हो सकता है, तो वो करना चाहिए।
आखिरी सवाल- एक एक्टर और स्टार में क्या फर्क होता है
जवाब- मानसिकता का। कैमरे के सामने तो बस एक कैरेक्टर होता है, जिसे ठीक से कर लो। बाकी कोई बात बड़ी नहीं। 
सवाल- कभी रिटायरमेंट की सोचते हैं? 
जवाब- जब जिंदगी रिटायर करेगी, तभी रिटायर होंगे। (जोरदार हंसी)



Thursday, April 27, 2017

सात फ्लाप फिल्मों के सच में घिरे विद्या बालन के सच...


क्या बिना किसी लाग लपेट के मान लिया जाए कि बेगम जान का बाक्स आफिस पर न चलना एक मामूली सी बात है, जिसे तवज्जो देने की कतई जरुरत नहीं। हिंदुस्तान में हर साल सैकड़ों-हजारों की तादाद में फिल्में बनती हैं, चंद फिल्में ही तो हिट होती हैं, बाकी सब तो फ्लाप फिल्मों के रेले में बह जाती हैं। बेगम जान में ही ऐसी क्या बात है कि इसके न चलने को बड़ी बात मान ली जाए। 
Begum Jaan

बेगम जान को महेश भट्ट की कंपनी ने बनाया, जिनके लिए किसी फिल्म का न चलना पहला तजुर्बा नहीं है। इसके बंगाली डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी  ही इसके मूल बंगाली वर्शन की कामयाबी का सुख पा चुके हैं। उनके लिए हिंदी वर्शन किसी बोनस जैसा था, जो मिला, वही बहुत। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह सहित एक से बढ़कर एक कलाकारों की फौज थी, जिनमें से एक नाम विद्या बालन का था।


फिल्म के रिलीज से पहले प्रमोशन में महेश भट्ट और विद्या बालन ही नजर आए, इसलिए कि महेश भट्ट ब्रैंड हैं, जो मीडिया को पसंद है और विद्या बालन फिल्म की मेन हीरोइन, इसी नाते उन्होंने फिल्म के प्रमोशन की जिम्मेदारी संभाली।
 हिट-फ्लाप के नजरिए से देखा जाए, तो ये बात भी समझ में आती है कि बेगम जान विद्या बालन के लंबे कैरिअर में ये पहला मौका नहीं है, जब उनकी फिल्म उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। सवाल को दूसरे शब्दों के साथ वापस लाते हैं कि बेगमजान की नाकामयाबी का विद्या बालन के लिए आखिरकार क्या सबब है? 

इस छोटे से सवाल के बड़े जवाब के पहले हिस्से में गणित की एक गिनती जुड़ती है और बात ये हो जाती है कि ये विद्या बालन की लगातार सातवीं फिल्म है, जिसने बाक्स आफिस पर दम तोड़ा हो और इस तरह से देखने पर बेगमजान की नाकामयाबी विद्या बालन के लिए कोई मामूली बात कतई नहीं रह जाती। ये कोई मैजिक फिगर नहीं है। अगर मौजूदा दौर में सात फिल्मों की कामयाबी किसी स्टार के रुतबे को कहीं से कहीं पंहुचा सकती है, तो लगातार सात फिल्मों की नाकामयाबी का आखिर कुछ तो अहमियत होती है। एक पल के लिए सोचिए कि अगर ये फिल्में हिट हो जातीं, तो मीडिया विद्या बालन की सुपर सफलता का जश्न खुद विद्या बालन से ज्यादा मना रहा होता। यहां स्थिति उलट है, इसीलिए इस पर चर्चा की जा सकती है। 

Kahaani 2



कमर्शियल फिल्मों की दुनिया में हिट-फ्लाप को धूप-छांव कहने वालों की कमी नहीं। खुद विद्या बालन न जाने कितने मौकों पर फरमा चुकी हैं कि उनके लिए बाक्स आफिस के आंकड़े कोई मायने नहीं रखते। उनकी बात गलत भी तो नहीं। इतने सालों में विद्या बालन ने अपने कैरिअर को इतनी बुलंदी पर तो ला खड़ा किया है कि वे ऐसी बातों से अपना दिल बहला सकें। इससे इतर देखा जाए, तो इस अधूरे सच की पूरी हकीकत कम खौफनाक नहीं। जिस दुनिया में हर शुक्रवार को बाक्स आफिस के आंकड़ों की बाजीगरी किसी के स्टारडम को बनाने और बिगाड़ने का खेल खेलती हो, वहां सात फिल्मों के लगातार फ्लाप होने के सच को कोई बेफिक्रे के धुएं में उड़ाने की कोशिश भी करे, तो वो असलियत से कोसो दूर होती चली जाती है। सात फिल्मों के न चलने के दंश को विद्या बालन चाहकर भी अब खारिज नहीं कर सकतीं। यहीं आकर बेगमजान की नाकामयाबी विद्या बालन को एक ऐसे मकाम पर ले आई है, जिसे अब उनके कैरिअर के भविष्य के लिए खतरे की घंटी मानने वालों की गिनती लगातार बढ़ेगी।
Dirty Pic

इस स्थिति का आकलन करने से पहले उस दौर का जिक्र करना जरुरी होगा, जब विदया बालन ने डर्टी पिक्चर, इश्किया और कहानी जैसी फिल्मों से सिर्फ बाक्स आफिस की कामयाबी ही नहीं पाई, बल्कि विद्या बालन ने सुपर स्टारों की उस सत्ता को सीधे तौर पर चुनौती दी, जो अपने सुपर स्टारडम के बूते किसी हीरोइन की इतनी ऊंची उड़ान की सोच भी नहीं सकते थे। ये कहना गलत नहीं होगा कि विद्या ने उस मुर्दा जैसे सिनेमा के आंदोलन में जान फूंक दी, जहां कभी महिला पात्रों के दबदबे वाली फिल्मों की दुनिया आबाद होती थी। इसी दुनिया ने सिनेमा की दुनिया को स्मिता पाटिल और शबाना आजमी सरीखे हीरो को तराशने का मौका दिया। विद्या बालन की फिल्मों की कामयाबी इस आंदोलन के लिए वरदान साबित हुई।

इसी मोड़ पर विद्या बालन के साथ वो हुआ, जिसने धीरे धीरे उनकी दुनिया की दशा और दिशा दोनों को बदलना शुरु किया। हीरो जैसी कामयाबी पाने वाली इस बेजोड़ हीरोइन की चमक से कमर्शियल फिल्मों की दुनिया ने सबसे पहले कन्नी काटनी शुरु की। बड़े सितारों ने विद्या बालन के साथ जोड़ी बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो सितारों के बूते कामयाबी का रास्ता तलाशने वाले कारपोरेट घराने में विद्या बालन का ग्रेड बदलते देर नहीं लगी। 
विद्या इस सच को न देख पा रही थीं, न समझ पा रही थीं। उनको बस इतना समझ में आया था कि हीरोइन ओरिएंटेड फिल्मों के लिए वे हीरो से कम नहीं। विद्या बालन के इस सच के असली सच से मुलाकात तब हुई, जब उनकी वो फिल्में बाक्स आफिस पर दम तोड़ने लगीं, जिनमें महिला प्रधान जैसा कुछ नहीं था। फरहान अख्तर के साथ शादी के साइड इफेक्टस और इमरान हाश्मी के साथ घनचक्कर विद्या की इस कोशिश का नतीजा था कि वे कमर्शियल फिल्मों में भी कम नहीं, लेकिन बाक्स आफिस पर इन कमजोर फिल्मों के हश्र ने उनकी कोशिश को बेरंग तो किया ही। दिया मिर्जा की प्रोडक्शन हाउस में बनी बॉबी जासूस ने उनके हीरोज्म को बड़ा झटका दिया। टेन, हमारी अधूरी कहानी और कहानी 2 के बाद बेगमजान उनको अगर करो या मरो वाली स्थिति में ले आई, तो भी विद्या इस भ्रम के साथ जीती रहीं कि बालीवुड में किसी हीरोइन को स्टारडम का लेबल मिल जाए, तो फ्लाप फिल्मों से उनका कुछ नहीं बिगड़ता। इस भ्रम ने  विद्या बालन को सात लगातार फ्लाप फिल्मों की ऐसी हीरोइन बना दिया, जिसके कैरिअर को लेकर अब कुछ नहीं कहा जा सकता। 
Tumhari Sulu ( to be released in December 2017)
विद्या बालन के लिए पहली दुआ कि इस साल आने वाली फिल्म  तुम्हारी सुलू (उनकी इस वक्त की इकलौती फिल्म) आठवीं फिल्म के तमगे से बचे। दूसरी दुआ, विद्या बालन हकीकत के आईने को देखें और पहचाने भीं। तीसरी दुआ, विद्या बालन अपने अतीत के स्टारडम की परछाई से बाहर निकलें, तो उनको अंधेरे का एहसास हो सकेगा कि किन कमजोर फिल्मों ने उनको इस हाल में पंहुचाया। 
सात फिल्मों की नाकामयाबी को खतरे की घंटी माना जाए, या करो या मरो की स्थिति कहा जाए। शब्दों की जुगाली से अलग एक और बात- 
विद्या बालन उस इलाके में रहती हैं, जहां समुंदर अठ्ठासे मारता है। कभी फुर्सत मिले, तो विद्या बालन समुंदर किनारे उस रेत को अपने हाथों में थामने की कोशिश करें, जिसके हथेलियों में होने का गुमान जरुर होता है, लेकिन हाथ से फिसलने का एहसास नहीं होता। विद्या बालन हाथों से फिसलने वाली रेत के एहसास को पहचानें या चट्टानों से टकराकर भी अपने वजूद की जद्दोजेहद में लगी लहरों के सच को पहचानें। ये लहरें काश हमारी उस हीरोइन को वापस ले आए, जो बाक्स आफिस के दायरों से बाहर फिर से कहें- जिंदगी एक बार मिलती है, तो दोबारा क्या सोचना।
उनके हर चाहने वाले के दिल की एक आहट को आवाज दे सकते हैं, जो यही कह सकती है-

लौट आओ विद्या..... 

Thursday, April 20, 2017

सोनू निगम के इस शोर-शराबे के सियासी मायने......

सोनू निगम चांद की दुनिया के बाशिंदे कभी नहीं रहे। मुंबई से उनका पैदाइशी रिश्ता है, जहां हजारों-लाखों लोग फुटपाथ पर सोते हैं, जहां दौड़ती गाड़ियों का रेला कम शोर नहीं करता। रेलवे की लाइनों के करीब रहने वाले मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनों की धड़धड़ाहट के शोर के आदी हो जाते हैं, तो हवाई अड्डे के करीब रहने वाले दिन-रात उड़ने वाले हवाई जहाजों के शोर में खुद की नींद को जैसे डूबो लेते हैं। और तो और, बिल्डिंगों की सोसायटीज के जलसे भी नियमित रुप से कभी बीमार, बूढ़े लोग, तो कभी इम्तिहान की तैयारियां करने वाले छात्रों और नवजात बच्चों के बिलखने के बीच हर किसी को संदेश एक ही होता है कि आप एक आजाद देश में रह रहे हैं, जहां हर किसी को कानून की फिक्र करने की जरुरत भी नहीं रहती। सिर्फ मुंबई क्यों, हर महानगर से लेकर शहरों, छोटे कस्बों और गांवों में जहां तलक देखो, शोर-शराबा ही हमारे आसपास पसरा नजर आता है। 

सोनू निगम जानते हैं कि धर्म हर जगह शोर नहीं करता, लेकिन धर्म के नाम पर शोर करना और करवाना कोई मुश्किल नहीं। सोनू निगम ने बात शोर की और मुद्दा धर्म से जोड़ दिया। उनको ये भी जताना जरुरी था कि वे मुस्लिम विरोधी नहीं है, लिहाजा दबी जुबां में मस्जिद से आने वाली सुबह की पहली अजान वाली बात के साथ मंदिर और गुरुद्वारे के शब्दों को टांक भर दिया। मुमकिन है कि सोनू निगम को ये न पता हो कि ईसाईयों के चर्च भी घंटे घड़ियालों के शोर से गूंजाएमान रहते हैं, इसलिए उन्होंने इसका जिक्र करने से परहेज नहीं किया। 

सोनू निगम मुंबई में रहते हैं और आमची शिवसेना की धाक और धमकी वाले अंदाज से वे काफी करीब से परिचित हैं, इसलिए सलाना जलसों में शराब सेवन के साथ डांस की बातों को इशारों में उड़ा दिया। ऐसा करना उनके लिए बेहद जरुरी था, वरना लेने के देने पड़ने का डर बना रहता है। अजान के साथ गुंडागर्दी के शब्दों को जोड़ना उनके लिए इसलिए जरुरी था कि ऐसा न करते, तो असली मकसद कहीं अधूरा रह जाता। 

अगर कोई ये समझना चाहे कि सोनू निगम किसी मजहब का नहीं, सिर्फ शोर की बात कर रहे थे, तो ये उसकी समझदारी होगी, जिसका हकीकत से बहुत ज्यादा वास्ता नहीं। आने वाले वक्त में सोनू निगम के इस शोर-शराबे के तार सियासी गलियारे से जुडे दिखें, तो हैरान होने की गुंजाइश नहीं होगी। अदनान समी से लेकर स्वनाम धन्य अभिजीत भट्टाचार्य और कैलाश खेर तक लंबी फेहरिस्त है, जिसमें सियासी धुनों पर गायिकी के सुरों को चमकते और धमकते देखा गया। सोनू निगम भी जानते हैं कि मौजूदा निजाम में, दिल्ली दरबार के दरबारियों को वो ही आवाजें जल्दी सुनाई देती हैं, जिनमें उस मजहब के सुर लगे हों, जो सियासती आकाओं को सुनना पसंद है। अगर अभिजीत भट्टाचार्य जिस दरबार में सजे हों, वहां एक अदनी कुर्सी का इंतजाम सोनू के लिए भी हो जाए, तो हर्ज क्या है। 

सोनू निगम की गायिकी की सत्ता पर नई पीढ़ी के गायकों का दबदबा नजर आने लगे, तो क्या हुआ, उनके पास सालों की गायिकी की विरासत है और इस विरासत के तार अगर सियासत से जोड़ने हों, तो सत्ता विरोधी जमातों से हर कोई कोसों दूर रहता है और सत्ता की सियासत का सुख पाना हो, तो मजहब की आड़ लेना कौन सी बुरी बात हो गई और इस दौर में हर कोई जानता और समझता है कि किस महजब की तारीफ-बुराई से आप कहां से कहां आ-जा सकते हो। 

सबसे भयंकर तौर पर मजलूमों की जमात वो है, जो सोनू निगम को उनके शोरगुल वाले अंदाज को मुस्लिम विरोधी बनाने पर तुली हुई है। ऐसा लगता है कि ये जमात जल्दी से जल्दी सोनू निगम को दिल्ली पंहुचाने को बेताब है। उनके इस खेल में सबसे अक्लमंद तो वे मौलवी हैं, जिन्होंने सोनू का सर मुंडाने का फतवा जारी किया और सोनू निगम ने चंद घंटों में साबित कर दिया कि सियासत के मैदान में वे कितने ऊंचे सुर में गाने की महारथ रखते हैं। जितना सोनू को मुस्लिम विरोधी कहा जाएगा, सोनू जी उतनी ही जल्दी दिल्ली दरबार की सत्ता के मठाधीशों की अनुकंपा का पात्र बनेंगे। 

सियासत करना बुराई नहीं। सितारों का सियासत करना भी बुराई नहीं। सियासत की गली में एंट्री के लिए अब महजब की बैसाखी थामना भी बुरी बात नहीं रही। तो ऐसे में सोनू के लिए मैदान साफ है। 

लगे हाथों सोनू को शोरगुल से छुटकारा पाने की एक मुफीद नसीहत भी दी जा सकती है- किसी मकां की छत पर चढ़कर सोने का शौक बंद करके अगर वे अपने आलीशान घर के दरवाजे खिड़कियों को बंद करके सोएंगे, तो न मच्छरों का प्रकोप रहेगा, न चोरी चकारी का डर और न ही किसी शोर का झंझट। वैसे सोनू निगम ने टैरेस पर सोना कब शुरु किया, ये जानना भी कम दिलचस्प नहीं होता, लेकिन इसकी जरुरत नहीं,क्योंकि सुरों का नया साज सोनू के लिए सज चुका है, जिसमें शोर तो बोर नहीं करेगा। 

सियासी शोर को झेलने का माद्दा हिंदुस्तानी आवाम में सालों से रहा है और रहेगा। इसमें एक सोनू निगम की आवाज और सही......




Saturday, April 15, 2017

अभय देओल- गंभीर मुद्दा, तीखे बोल


अभय देओल किसी परिपाटी में यकीन नहीं रखते। सोशल मीडिया पर उनकी चंद पोस्ट ने जैसी उथल-पुथल मचाई है, वही ये साबित करने के लिए काफी है कि ये देओल किस तरह की सोच रखता है। 

कुछ दिनों पहले अपनी नई पोस्ट में अभय देओल ने एक ऐसा मुद्दा उठा दिया, जो हमारे समाज से लेकर सिनेमा की दुनिया के चमकते सितारों तक को प्रभावित करने वाला रहा। अभय देओल ने जिस तरह से चमड़ी का रंग गोरा करने वाली क्रीमों के प्रोडेक्ट का एड करने वाले सितारों को लताड़ा, इससे एक हड़कंप मच गया, क्योंकि उनके निशाने पर शाहरुख खान से लेकर विद्या बालन और दीपिका से लेकर सोनम तक रहे। अभय पर पलटवार करने के लिए सोनम कपूर आगे जरुर आईं, लेकिन उनका तरीका इतना बचकाना था कि उन्होंने खुद ही अपने कदमों को पीछे खींच लिया। बाकी सितारे अभय की खरी-खोटी खामोशी से क्यों सुनते रहे, ये भी कम दिलचस्प नहीं है। 

बात को आगे बढ़ाने से पहले उस मुद्दे की बात करते हैं, जो अभय देओल उठाना चाह रहे हैं। ये एक लंबे समय से मुद्दा बना हुआ है, जो सामाजिक भी है और सीधे तौर पर सिनेमा के बड़े कलाकारों की कमाई से जुड़ता है। मुद्दा असल में ये है कि क्या सितारों को किसी प्रोडेक्ट का विज्ञापन करने से पहले उनके किन सामाजिक पहलूओं को ध्यान में रखना चाहिए। अभय देओल ने जिस मुद्दे को उठाया है, वो सीधे तौर पर रंगभेद की नीति से जुड़ जाता है। कोई क्रीम आखिरकार किस आधार पर ये दावा कर सकती है कि उसके इस्तेमाल से किसी की चमड़ी गोरी हो सकती है और मुद्दा असली ये रह जाता है कि क्या एक क्रीम का प्रोडेक्ट समाज में गोरे और सांवले रंग के अंतर को प्रोत्साहित कर सकता है और जब कोई स्टार किसी क्रीम के प्रोडेक्ट का एड करता है, तो सीधे तौर पर वो भी इस रंगभेद की नीति को बढ़ाने के इल्जाम में धरा जाता है। अभय देओल ने जो मुद्दा उठाया है, वो बेहद संवेदनशील है। खास तौर पर महिलाओं के गोरी होने या न होने की संवेदना से जुड़ता है, जो समाजिक तौर पर बेहद अहम हो जाता है। 
अभय देओल द्वारा उठाया गया मुद्दा संवेदनशील है और पहली नजर में सोनम सहित वे सारे सितारे सवालों के कठघरे में खड़े नजर आते हैं, जिन पर अभय ने निशाना साधा है। 


ये मामला यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि कहा जाए, तो यहां से ये मुद्दा जड़ों तक में जानेे का रास्ता खोज लेता है। सिर्फ क्रीम ही क्यों, क्या याद नहीं कि खाने के एक प्रोडेक्ट का एड करने को लेकर अमिताभ बच्चन से लेकर माधुरी दीक्षित तक के खिलाफ केस हो गए थे। यहां तक कि केंद्रीय सरकार के मंत्री भी इन सितारों को एड करने के लिए कसूरवार ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। इसी तरह के कोल्ड ड्रिंक के एड करने को लेकर शाहरुख खान पर जमकर निशाना साधा गया था, क्योंकि इस कोल्ड ड्रिंक में कुछ ऐसे तत्व थे, जिनको हेल्थ के लिए नुकसानदायक माना जाता है। 

जब शाहरुख खान को लेकर विवाद बढ़ा था, तो उन्होंने अपने बचाव में एक दिलचस्प बात कही थी कि किसी भी प्रोडेक्ट को बिक्री के लिए सरकार की ओर से अनुमति दी जाती है। अगर किसी प्रोडेक्ट में कुछ भी ऐसा है, जो सेहत के लिए हानिकारक है, तो ये सरकार की जिम्मेदारी होती है कि उस प्रोडेक्ट की बिक्री पर रोक लगाए। शाहरुख का कहना था कि वे किसी ऐसे प्रोडेक्ट का एड नहीं करते, जिसकी बिक्री की अनुमति नहीं हो। दूसरे शब्दों में शाहरुख की दलील थी कि अगर सरकार किसी प्रोडेक्ट को बेचने में कोई गलती नहीं मानती, तो उनके एड को किस आधार पर गलत कहा जा सकता है। 

देखा जाए, तो जो तर्क शाहरुख खान दे रहे हैं, वही तर्क अभय देओल के मुद्दे पर सटीक बैठता है। यहां अभय देओल से सवाल हो सकता है कि अगर वे सितारों से नैतिकता की उम्मीद कर रहे हैं, तो क्या उनको सरकार से सवाल नहीं करना चाहिए, जो इन क्रीम के प्रोडेक्ट को बिक्री के लिए इजाजत देती है। ये गणित समझना मुश्किल नहीं है। ये प्रोडेक्ट बहुराष्ट्रीय कंपनियां बनाती हैं और सरकार को इनसे भारी कमाई होती है। सरकारी कमाई के अलावा परमीशन देने को लेकर इन बड़ी कंपनियों की ओर से नेताओं और सरकारी बाबूओं को भी भारी रिश्वत दी जाती है। ये ही कंपनियां दिग्गज सितारों को अपने प्रोडेक्ट का एड करने के लिए बड़ी रकम देती हैं। जिस सितारे के पास ज्यादा प्रोडेक्ट होते हैं, फिल्मों के बाजार में उस सितारे का रुतबा बड़ा होता है, जिसक फायदा उसके कैरिअर को मिलता है। 

देखा जाए, तो इस गंगा में हर कोई हाथ धोने में संकोच नहीं करता। न सरकार, न बहुराष्ट्रीय कंपनियां, न सितारे और न ही हमारी पब्लिक। हर कोई एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अभय देओल एक ऐसे मुद्दे को हवा देने की कोशिश करते हैं, जिसका सरोकार समाज के साथ तो सीधे तौर पर जुड़ा नजर आता है, लेकिन अभय देओल को इस मुद्दे को अपनी आवाज देने के साथ साथ तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना होगा। किसी भी समस्या का समाजिक पहलू अपनी जगह अहम होता है। अगर सितारों की नैतिकता को लेकर सवाल हो सकते हैं, जो कहीं से गलत नहीं हैं, तो फिर सवालों के घेरे में फिल्मी सितारों से पहले सरकारी तंत्र, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जाल और जनता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। 
विशुद्ध तौर पर पैसे के इस खेल में जब हर कोई हमाम में नंगा है, तो किसी एक को कपड़ों की नसीहत देने वाली बात हुई। अभय देओल ने सही मुद्दा उठाया, लेकिन..... इसके आगे ही इस मुद्दे की असली राम कहानी शुरु होती है, जिसका अधूरापन अगर अभय समझ जाएं, तो मुमकिन है कि वे भागीरथी को जमीन पर लाने का पराक्रम कर लें, जो किसी चमत्कार से कम नहीं होगा 

और एक आखिरी सच- दुनिया और दुनियादारी चमत्कारों के बूते नहीं चलती। 


Sunday, April 9, 2017

अक्षय को नहीं, तो क्या किसी खान को मिलता सरकारी एवार्ड ?

इस साल के नेशनल एवार्डस में बेस्ट एक्टर के एवार्ड को लेकर अक्षय कुमार की (कनेडियन) नागरिकता को मुद्दा बनाना कहीं से भी सही नहीं माना जा सकता। अगर सरकारी नियमों के तहत किसी गैर भारतीय नागरिकता वाले भारतीय को इस पुरस्कार का हर नहीं है, तो इस नियम में तत्काल बदलाव करने की जरुरत है। महज नागरिकता के लिए अक्षय कुमार की राष्ट्रीयता पर कोई भी सवाल छोटी मानसिकता के अलावा कुछ नहीं है। इन मानसिकता का किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं हो सकता। अक्षय कुमार उतने ही भारतीय हैं, जितना हर कोई देशवासी। 
ये बात तो यहीं खत्म हो जाती है, लेकिन उनको बेस्ट एक्टर का पहली बार मिलने वाला पुरस्कार अगर विवादों के घेरे में आया है या इसे आलोचना का शिकार होना पड़ा है, तो इसे कहीं से भी आधारहीन कहकर खारिज नहीं कर सकते। इसे लेकर आलोचना चाहें जिस स्तर पर हो, हैरानी नहीं होती। 










पहली नजर में ये अक्षय कुमार की काबिलियत को सम्मानित करने से कहीं ज्यादा मामला उस सरकारी बंदरबांट का है, जो सत्ता में आसीन राजनैतिक पार्टियों के आका अपनी पसंद के मुताबिक बिना किसी तर्क के बांटना पसंद करते थे और इसी बंदरबाट को राजनैतिक पावर का शो करती हैं। 
इस वक्त दिल्ली के तख्त पर जो सत्ता सवार है, उसके आकाओं के बारे में किसी को भी शक नहीं है कि अक्षय कुमार उनके पसंदीदा और भरोसेमंद आदमी के तौर पर पहचाने जाते हैं। सरकारी गलियारों में कई मौकों पर अक्षय कुमार साहब को सत्तासीन पार्टी के बड़े नेताओं के दफ्तरों में भी देखा गया। ये न तो अक्षय का कसूर हुआ और न पार्टी का। पार्टी जब सत्ता में होती है, तो उसके अपने आदमी हर कहीं होते हैं। ये पहले भी होता था और अब भी हो रहा है। पहले भी अपने आदमियों को पुरस्कारों से नवाजा जाता था और अब भी हो रहा है। 
क्या हुआ अगर कहा जा रहा है कि रुस्तम के लिए अक्षय कुमार बेस्ट हीरो का सरकारी पुरस्कार डिजर्व नहीं करते। ज्यूरी के हेड प्रियदर्शन (जो अक्षय कुमार के साथ कई फिल्में बना चुके हैं) तो सरकारी नियमों को ताक पर रखकर बोल गए कि अक्षय को सिर्फ रुस्तम नहीं, एयरलिफ्ट के लिए भी यही पुरस्कार मिलेगा। यानी एक एक्टर को दो फिल्मों में एक्टिंग के लिए एक एवार्ड मिलेगा या दो अलग अलग एवार्ड मिलेंगे, ये तब देखा जाएगा, जब महामहिम राष्ट्रपति के सामने अक्षय कुमार ये पुरस्कार लेने जाएंगे। प्रियदर्शन को जो समझ में आया, वो कह चुके हैं। 
जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं कि अक्षय कुमार रुस्तम के लिए ये एवार्ड डिजर्व नहीं करते, उनको पहली फुर्सत में ये सोचना चाहिए कि क्या ये एवार्ड अक्षय के टेलेंट को दिया गया है। अक्षय पिछले दो साल से देशभक्ति के जिस छौंके को अपनी फिल्म का बैकड्राप बनाकर चल रहे थे, उसके लिए उनको इस सरकार से रिटर्न गिफ्ट में इससे बढ़िया कुछ और नहीं मिल सकता था। उनके लंबे कैरिअर में पहली बार राष्ट्रीय पुरस्कार पाने की ललक के लिए अक्षय कुमार की मेहनत रंग लाई। यकीन मानिए कि अगर रुस्तम की जगह उनकी कोई भी फिल्म होती, तो उनको यही एवार्ड मिलता। यहां तो अक्षय की देशभक्ति की फिल्मों की लाइन लगी हुई है। कहने वाली बात महज इतनी सी है कि ये एवार्ड किसी फिल्म या टेेलेंट को नहीं, बल्कि अक्षय कुमार की उस भक्ति को मिला है, जिसके सियासती तारों को जोडना किसी के लिए मुश्किल नहीं। 








वैसे इस बार दावेदारों में अक्षय कुमार के अलावा और भी ऐसे कई सितारे थे, जिनकी झोली में ये बंदरबांट आ सकती थी, लेकिन अजय देवगन को फिलहाल शिवाय के लिए स्पेशल इफेक्टस की लालीपॉप मिल गई है और सलमान खान को किसी एवार्ड की जरुरत नहीं। केंद्रीय सत्ता के पास ढाई साल का समय सुरक्षित है। आने वाले दो सालों में अपनी पसंद के कई दूसरों को इस किस्म के गिफ्ट दिए जाने बाकी हैं। 
1991 के एक ऐसे ही किस्से की याद ताजा हो गई, जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने थे और उस साल अग्निपथ के लिए अमिताभ बच्चन को ठीक इसी तरह की रेवड़ी का सरकारी एवार्ड मिला था। उस वक्त बच्चन को सीधा संदेश था कि सालों तक कांग्रेस पार्टी से रिश्ते रखने के बाद भी आपको कोई नेशनल एवार्ड नहीं मिला। आईए, हम आपको ये सम्मान दे देते हैं, क्योंकि अब सत्ता हमारी है। 
तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकटरमण से फिल्म अग्निपथ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार ग्रहण करते हुए अमिताभ बच्चन
याद आता है, तो वही दौर था, जब इलाहबाद के सांसद रहे बच्चन बोफोर्स कांड में फंसकर सियासत छोड़कर फिल्मों में लौटे थे और कांग्रेस से उनके रिश्ते बिगड़ चुके थे। याद कीजिए, उसके बाद बच्चन कभी कांग्रेस से पास नहीं फटके। वैसे तो बच्चन मौजूदा सत्ता के भी करीब माने जाते हैं और ये भी कम दिलचस्प नहीं कि वे खुद फिल्म पिंक के लिए इसी एवार्ड के दावेदारों में थे, जो अक्षय की झोली में गिर गया। वैसे पीकू के लिए बच्चन को ये सम्मान देकर उनको पिछले साल खुश किया जा चुका है। 
किसी को मायूस होने की जरुरत नहीं। कौन जाने, अगले दो सालों में अमिताभ बच्चन से लेकर सलमान खान, अजय देवगन और अनुपम खेर से लेकर मधुर भंडारकर तक न जाने किसे इस सम्मान से नवाज दिया जाए। अगर ये मुमकिन नहीं, तो पद्म सम्मानों से लेकर संसद की कुर्सी तक का विकल्प है। बस साहब का मूड होना चाहिए। 
मूल बात पर लौटते हैं। अक्षय को मुबारक, उनकी फिल्म, उनकी काबिलियत और ये सरकारी ईनाम भी। खिलाड़ी साहब को एक और मुबारकबाद एडवांस में। 11 अगस्त को देश के मुखिया के पसंदीदा स्वच्छ अभियान पर बनी अक्षय की फिल्म बाक्स आफिस पर बड़ी जीत हासिल करेगी। जब केंद्र की सत्ता की आंखों की किरकिरी बना कोई स्टार (शाहरुख खान) निशाने पर हो, तो भयंकर ईगो का शिकार देश का सर्वोच्च नेता अपने पसंदीदा खिलाड़ी को खेल में जीतने का बंदोबस्त जरुर करेगा। इससे देश, अक्षय कुमार, प्रधानमंत्री सबका सम्मान बढ़ेगा। 

आखिरी बात- देश के प्रधानमंत्री के गुणगान करने वाले एक शरीफ बंदे ने बहुत ठीक से समझा दिया कि इस सरकार में अक्षय को नहीं, तो क्या किसी खान को सरकारी एवार्ड मिलेगा... ? 

ये सवाल नहीं था, उस कड़वे सच का स्याहपन था, जिसका हिस्सा अब खिलाड़ी कुमार बन चुके हैं। मुबारक हो अक्षय कुमार साहब को.. 



Sunday, April 2, 2017

अनारा, शबाना, पूर्णा और बेगम जान

महिला प्रधान किरदारों से सराबोर सिनेमाई परदा
पिछले दो सप्ताह से हिंदी सिनेमा का रुपहला परदा महिलाओं के किरदारों से जैसे जगमगा उठा है। एक के बाद एक ऐसी फिल्में, जिनमें महिला किरदारों को तरतीब से गढ़ा-रचा गया। भले ही इनको अजूबा न माना जाए, भले ही इनको भारतीय सिनेमा का सुनहरी दौर न माना जाए, लेकिन दो सप्ताहों से हिंदी सिनेमा के परदे पर महिला प्रधानों से लबरेज फिल्मों की छटां-कला  को भला कौन अनदेखा कर सकता है। आने वाले दिनों में बेगम जान का किरदार इस सफर की खूबसूरती में और इजाफा करने जा रहा है।


यहां इन फिल्मों के बाक्स आफिस नतीजों को लेकर कोई बहस नहीं है, न ही इनके टाइमिंग को लेकर कोई सवाल है। सीधे, सरल शब्दों में कहा जाए, तो ये एक दौर है आज के सिनेमा के उस बहुआयामी सरोकारों से सजा नजर आ रहा है, जिसके बारे में कुछ सालों पहले तक कहा और माना जाता था कि हमारे समाज की तरह सिनेमा की दुनिया भी पुरुष प्रधान मानसिकता की शिकार है, जहां महिलाओं का इस्तेमाल मसालेदार फिल्मों में हीरो के साथ नाचने-गाने और ग्लैमरस नजर आने तक सीमित था। ये धारणा न तो पूरी तरह से गलत थी और न ही सही थी। लंबे समय से इसे लेकर हर स्तर पर बहस होती रही। हर किसी ने इसे अपने अपने नजरिए से परिभाषित किया और इस बहस को अंतहीन बनाकर छोड़ दिया। 


एक बार फिर सिनेमा के उस चमत्कार पर लौटते हैं, जिसकी गूंज से इस वक्त रुपहला परदा गुंजायमान हो रहा है। पिछले सप्ताह स्वारा भा्स्कर ने अनारकली में बिहार की एक ऐसी ठेट लड़की के किरदार को जिया, जो अपने आसपास के समाज को चुनौती ही नहीं देती, बल्कि उसके दंभ को भी चूर कर देती है। इस हफ्ते की शबाना को देखें, तो ये आज के दौर के खुलेपन का चेहरा है, जो मुस्लिम परिवेश के दायरे से बाहर निकलकर अपनी हिफाजत के लिए जूडो कराटे सीखती है और भरे बाजार में जब कोई लड़का उससे टकराकर आगे बढ़ता है, तो उसको ईंट का जवाब पत्थर से देने में कोई संकोच नहीं करती। पूर्णा का किरदार झकझोर देने वाला है। तेलंगाना के एक मामूली गांव की 13 साल की बच्ची दुनिया के सबसे ऊंचे बर्फीले पहाड़ के कलेजे को चीरकर जब उसकी चोटी पर जा पंहुचती है, तो दुनिया की हर मजबूरी, हर लाचारी उसके आगे बौनी हो जाती है। ये तीन किरदार परदे पर आ चुके हैं और बेगम जान का किरदार अभी आना बाकी है, लेकिन बेगम जान का किरदार समाज की सत्ता को किस तरह से चुनौती देता है और कैसे इस समाज के लिए चुनौती बनता है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं। बात को आगे ले जाने से पहले भारतीय सिनेमा और भारतीय समाज के इस अभूतपूर्व मिलन को सलाम, जिसने एक बेहद दिलचस्प तस्वीर को सिनेमाई परदे से जोड़ दिया। 


माना जा सकता है कि ये एक संयोग मात्र है, लेकिन बात को यहीं तक सीमित करना न्यायसंगत नहीं होगा। अगर ये संयोग भी है, तो एक सुखद संयोग है और इस संयोग को परदे पर उकेरने में भारतीय सिनेमाकारों के सफर और दर्शकों की बदलती सोच के संगम को कैसे अनदेखा किया जा सकता है। खास तौर पर नई सदी के साथ हिंदी सिनेमा ने जो करवट बदली, ये उस सफर की झांकी और आने वाले कल के आशावाद से तो कहीं कम नहीं हो जाता। एक ओर, बदलते दौर के बदलाव को पहचानते हुए हिंदी सिनेमा के युवा फिल्मकारों ने यथार्थवादी सिनेमा की ओर रुख न किया होता, तो मुमकिन नहीं था कि हम इस सुखद चमत्कार के साक्षी बने होते। घोर बाजारवाद के रास्तों पर बिकने और खरीदने की विरासत और त्रासदी के शिकार हिंदी सिनेमा में यथार्थवादी सिनेमा को इतना मौका और समर्थन मिलना मुमकिन नहीं होता, अगर इंटरनेट और सोशल मीडिया की क्रांति के सच के साथ युवा पीढ़ी ने सिनेमाघरों में जाकर इन बदलाव को अपना परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन न दिया होता। इसके बूते ही खालिश कारोबारी बनकर सिनेमा को जकड़ने वाले घरानों को भी अपना रुख बदलना पड़ा। 
अविनाश दास (अनारकली ऑफ आरा)


इस बदलाव में एक और दिलचस्प तथ्य जुड़ जाता है कि जिन महिला प्रधान किरदारों वाली फिल्मों को कारपोरेट घरानों से समर्थन मिला, तो अपनी पहचान के लिए जूझ रहे नए दौर के युवा फिल्मकारों ने भी इस असंभव जैसे समझे जाने वाले मिथ्य को हकीकत से मिला दिया। बानगी देखिए- स्वारा भास्कर की अनारकली का निर्देशन अविनाश दास ने किया,
शिवम नायर (नाम शबाना)
जो सिनेमा के लिए नएनवेले हैं, तो शबाना को परदे पर लानेे वाले शिवम नायर भी बतौर निर्देशक अपनी पहचान के लिए जूझते रहे हैं। ये भी सही है कि शिवम नायर के इस पराक्रम के पीछे नीरज पांडे और अक्षय कुमार की मजबूत टीम का सहारा मिला। इस कड़ी की चौथी फिल्म बेगमजान के निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी हिंदी सिनेमा के लिए बेहद नए हैं। यहां महेश भट्ट का जिक्र करना लाजिमी हो जाता है, जिन्होंने बेगम जान को हिंदी परदे पर लाने के लिए अपनी प्रोडक्शन कंपनी को आगे किया। 
राहुल बोस (पूर्णा) 

इस संयोग को लेकर एक और दिलचस्प संयोग को कहा जाए, तो इन फिल्मों में बालीवुड के स्थापित चेहरे नजर नहीं आते। अनारकली का किरदार निभाने वाली स्वारा भास्कर अभी तक सहायक अभिनेत्री के टैग के साथ काम कर रही हैं, तो शबाना की तापसी पन्नू को पिंक के बाद एक बड़ा मौका मिला और युवा पीढ़ी की इस अभिनेत्री ने इसे गंवाया नहीं। पूर्णा का किरदार निभाने वाली 13 साल की अदिति ईमानदार
 श्रीजीत मुखर्जी (बेगम जान)
को तो कोई भी नहीं जानता और जहां तक रही बात बेगम जान, यानी विद्या बालन की, तो कमर्शियल और नान कमर्शियल फिल्मों के बीच वे झूलती रही हैं। ये जरुर कहा जाता है कि इन चारों किरदार को निभाने वाली अदाकाराओं में सबसे ज्यादा अनुभव और महिला किरदारों के साथ खेलने का शौक विद्या को रहा है। 

दो सप्ताहों का ये सुखद एहसास हिंदी सिनेमा के उस इतिहास की ताकत और सामर्थ्य को अनदेखा नहीं कर सकता, जिसमें महिलाओं के दमदार किरदारों वाली फिल्मों और उनको निभाने वाली अदाकाराओं की लंबी फेहरिस्त है। भारतीय सिनेमा जन्म से लेकर शैशव काल में ही उन ताकतवर महिला किरदारों और उनको निभाने वाली महिला कलाकारों के साथ जुड़ा रहा, जिनके लिए कहा जाना ठीक रहेगा कि कोई दौर ऐसा नहीं रहा, जब महिला कलाकारों ने मजबूत किरदारों से पुरुष प्रधान सिनेमा और समाज को आईना दिखाने का काम नहीं किया हो। सिनेमा का ये रुप इतना व्यापक है कि यहां इस चर्चा में उसे समेटना मुमकिन नहीा इतना तो कहा जाता है कि देविका रानी से लेकर रानी मुखर्जी तक हर काल में भारतीय सिनेमा ने ऐसे महान महिला पात्रों और अदाकाराओं को देखा है, जिनके आगे हर कोई नतमस्तक रहा है। 

फिर भी मान लेते हैं कि ये संयोग है। मान लेते हैं कि ये चमत्कार है। मान लेते हैं कि चमत्कारों के बूते दुनियादारी आगे नहीं बढ़ती। सब कुछ मान लिया। फिर भी क्या ये मान लेने से हमारे समाज की किसी अनारा, किसी शबाना, किसी पूर्णा और किसी बेगम जान को हमारे परदे ने समाज के साथ नहीं जोडा। हर अनारा, हर शबाना, हर पूर्णा और हर बेगम जान हमारे इसी समाज का हिस्सा है और आज सिनेमा का परदा इन सारी नायिकाओं को सलाम कर रहा है, तो इस सलामी के साथ इन किरदारों को लेकर बेहद मेहनत करने वाली अदाकाराओं और इन अदाकाराओं को इन किरदारों से जोड़ने का साहस करने वाले युवा निर्देशकों के साथ उन ताकतों को भी सलामी, जिन्होंने समाज और सिनेमा के इस अप्रतिम मिलन में अपनी भूमिका निभाई। 

आइए, सिनेमाई परदे के इस करिश्मे के इन पलों को जीया जाए और नारी सशक्तिकरण के इस अवतार को नमन किया जाए। 

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...