Saturday, May 27, 2017

तीन शब्दों का जादुई जाप- सचिन.. सचिन... सचिन...



प्रेम की गंगा बहाने वाला हिंदी सिनेेमा अंग्रेजियत के तरीकों से अब तक तीन जादुई शब्दों को आई लव यू के तौर पर प्रचारित और प्रसारित करता आया है। शुक्रवार, 26 मई को सिनेमा के परदे पर तीन शब्दों के जादू का नया इतिहास गढ़ा गया और ये शब्द थे- सचिन... सचिन.. सचिन....   

तीन शब्दों की ये गूंज कभी क्रिकेट के स्टेडियम को सचिनमय बनाती रही। पहली बार इन तीन शब्दों ने इस गूंज को सिनेमाई परदे के साथ सीधे तौर पर जोड़ा। क्रिकेट की दुनिया का मनोरंजन की दुनिया के साथ रिश्ता भले ही कितना पुराना हो, लेकिन 26 मई को तीन शब्दों की गूंज ने इस रिश्ते को अमरत्व दे दिया।


सिनेमा दर्शकों के जज्बातों के साथ जुड़ने की परंपरा रही है, जिसे तमाम किस्म की कहानियों के साथ एक सदी से भी ज्यादा वक्त के साथ निभाया जा रहा है। 26 मई को सिनेमा के परदे का सफर एक अलग मोड़ पर जा पंहुचा, जहां परदे पर कहानी भी थी, तमाम रंगों के जज्बात भी थे, फिर भी वो परंपरागत सिनेमा नहीं था। यहां कोई मसाला नहीं था। कोई नाच-गाना नहीं था। सिनेमा के दिग्गजों के लिए भी ये अनुभव अलग किस्म का था। यही वजह थी कि समीक्षाओं के नाम पर फिल्मों का पोस्टमार्टम करने वाले पत्रकारों की बिरादरी भी भौंचक्की थी। झटपट अंदाज में फिल्मों और सितारों को नापने-तोलने और हिट-फ्लाप का फरमान सुनाने वालों को यहां खासी दिक्कत थी कि समीक्षा के नाम पर खूबियों-खामियों और रेटिंग वाले फारमेट में सचिन की फिल्म को कैसे फिट किया जाए।


ये दिक्कत बेवजह नहीं थी। सचिन की फिल्म को डाक्यू ड्रामा का नाम दिया गया। डाक्यू ड्रामा देखना न तो हमारे दर्शकों की आदत में शुमार रहा है और न ही पत्रकार बिरादरी में इसे लेकर ज्यादा कोई तजुर्बा है। अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा की समझ रखने वाले गिने-चुने पत्रकारों को डाक्यु ड्रामा कहे जाने वाले इस माध्यम को समझने का तजुर्बा हो। लिहाजा समीक्षक बिरादरी के दिग्गजों को समझने और समझाने में दिक्कत हुई कि उन्होंने जो परदे पर देखा, उसे कैसे बयां किया जाए। ये कश्माकश इस बात का सबसे बड़ा सबब थी कि सचिन की फिल्म के नाम पर परदे ने जो दिखाया, वो एक नए युग की शुरुआत है और शुरुआत उस नाम से, जिसके लिए माना जाता है कि युग-युग में सचिन एक बार ही पैदा होता है।


फिल्म देखने वाली पब्लिक के लिए भी परदे का ये नजारा नया जरुर था, लेकिन उनको भौंचक्का इसलिए नहीं कर रहा था कि हमारी पब्लिक सालों से अपने फेवरेट सितारों को परदे पर देखकर खुश होने का हुनर जानती है। इस बार फर्क ये था कि परदे पर नजर आने वाला सितारा किसी लेखक की कल्पना का नतीजा नहीं था। इसके बावजूद परदा उन दर्शकों को अपने साथ बांध चुका था। कभी हंसी, कभी मुस्कान, कभी आंखों में नमी, कभी आंसू, कभी खुशी का ठहाका  कभी तालियों की गूंज, तो कभी उदासी भरी खामोशी.. क्या नहीं हो रहा था परदे पर। दर्शक हमेशा से परदे पर ये ही सब तो देखते आ रहे हैं, मगर ये फर्क कम बड़ा नहीं था।
आज परदा किसी काल्पनिक नायक के दायरे से बाहर निकलकर उस नायक की नायिकी को सलाम कर रहा था, जिसके लिए पब्लिक की दीवानगी का हर शब्द छोटा हो चुका है। एक और दिलचस्यप बात ये रही कि यहां सचिन और  क्रिकेट के  फैन होने या न होने का फर्क मिट गया। सचिन के फैंस के लिए उनके भगवान की गाथा परदे पर थी, तो क्रिकेट और सचिन के फैन न होने वाले भी छाती चौड़ी कर रहे थे कि ये वो बंदा है, जो हमारा है, सिर्फ हमारा सचिन।

फिल्में हर शुक्रवार को रिलीज होती हैं। नई फिल्मों के साथ हर शुक्रवार को नए नायक या तो गढ़े जाते हैं या मिट जाते हैं। कुछ लड़खड़ाते हैं, तो कुछ बिखर जाते हैं और कुछ नए चांद की मानिंद सिनेमा के आकाश को चमकीला करते हैं। धड़कनों को तेज करता सदी पुराने इस खेल का नायक रहा शुक्रवार 26 मई को दंडवत की मुद्रा में था। इस दिन सिनेमा का परदा उस दिन उस चमत्कार के अवतार से चकाचौंध था, जिसके आगे कामयाबी और नायिकी के शब्दों ने भी पनाह मांग ली हो। कोई यूं ही तो भगवान का दर्जा नहीं पा लेता। सचिन खुद को भगवान नहींं मानते, तो ताज्जुब नहीं। भगवान ने भी आखिर कब खुद को भगवान माना है। जो भगवान में विश्वास करता है, वो क्रिकेट के इस भगवान को नमन करने में संकोच नहीं करेगा।


सिनेमा का सफर आगे बढ़ेगा। फिर से किस्म किस्म की फिल्में आएंगी। नायकों का मेला लगेगा। सब कुछ होगा, जो 26 मई से पहले होता रहा है। 26 मई को सिनेमा का इतिहास करवट ले चुका है। अब जब भी परदे के नायकों की गाथा का जिक्र होगा, तो इसमें दो बातों को कोई अनदेखा नहीं कर पाएगा। पहली बात- क्रिकेट का भगवान हमारे सिनेमा के परदे को धन्य कर चुका है और दूसरी बात- इस भगवान की भक्ति तीन शब्दों में ही तो सिमट जाती है- वही तीन शब्दों का जादू- सचिन सचिन सचिन....!





Wednesday, May 24, 2017

बिहारी बाबू और गुजराती बापू होने का सियासी फर्क



चलिए, बगैर किसी लाग लपेट के बात शुरु करते हैं। परेश रावल चाहते हैं कि कश्मीर को लेकर अलग सुर में बोलने वाली अरुंधिति राय को फौजी जीप के आगे बांधकर उनको सजा दी जाए। शत्रुघ्न सिन्हा चाहते हैं कि उनकी पार्टी के नेता बिहार और देश में  विरोधियों पर बिना सबूतों के आरोप लगाने की सियासत बंद करें। परेश रावल और शत्रुघ्न सिन्हा दोनों भाजपा के सीनियर नेताओं में आते हैं। दोनों ने सियासी मैदान में आने से पहले फिल्मों की दुनिया में लंबी पारी खेली है। दोनों ने ही चुनावों के वक्त पार्टी के प्रचारक की हैसियत से अपनी सियासी पारी की शुरुआत की और दोनों को चुनावी मैदान में उतारा गया।


एक बिहारी बाबू हैं, तो दूसरे को दिल्ली के सियासी गलियारों में गुजराती बापू कहा जाता है। यहां बापू का मतलब महात्मा गांधी से नहीं, बल्कि गुजरात में अपने से बड़े को सम्मान माना जाता है। अभिनेता से नेता बने ये दोनों दिग्गजों इस वक्त जिन खबरों को लेकर चर्चा में हैं, उनका आपस में सीधे तौर पर कोई रिश्ता नहीं बैठता, मगर विरोध का तरीका और सलीका इसमें ऐसा
कामन फैक्टर है, जहां दोनों अलग अलग छोर पर खड़े हुए नजर आ रहे हैं। सियासत के मैदान में शत्रुघ्न सिन्हा के मुकाबले परेश रावल का अनुभव कम जरुर है, लेकिन दोनों की सियासी जमीं और सोच में सबसे बड़ा फर्क ये है कि शत्रुघ्न सिन्हा राजनीति के सिद्धांतों की वो डुगडुगी बजाते हैं, जो सिर्फ उनको भाती है, जबकि मौजूदा दौर में उनकी राजनीति गैरप्रासंगिक हो चुकी है। परेश रावल राजनीति की उस जमींन पर खड़े हैं, जो आज के दौर की जरुरत है। परेश रावल अपनी सियासत में वो सब कुछ करते हैं, जो उनकी पार्टी की लीडरशिप को अच्छा लगता है। शत्रुघ्न सिन्हा बीते जमाने की राजनीति से चिपके रहकर खुद को खुश और पार्टी को नाराज करने में संकोच नहीं करते, तो परेश रावल अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं को खुश रखने के गुर समझ चुके हैं और इसी मंत्र के बूते तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

सियासत में वैचारिक स्तर पर विरोध होता है, इसलिए शत्रु्घ्न सिन्हा और परेश रावल में से किसी की बात को अजूबा नहीं कहा जा सकता। विरोध की सियासत परेश रावल भी कर रहे हैं और शत्रुघ्न सिन्हा भी। फर्क इतना है कि दोनों ने विरोध का ऐसा तरीका अपनाया कि दोनों को लेकर बहसबंदी का दौर शुरु हो गया। इसमें कौन गलत है और कौन सही है, ये आकलन अलग बात है। वैसे भी सियासत का पहला सबक यही पढ़ा और पढ़ाया जाता है कि कोई नेता कभी अपनी बात को गलत नहीं मान सकता।


दोनों के विरोध की ताजा खबरों के आकलन को और आगे बढ़ाएं तो मामला और दिलचस्प हो जाता है। बिहारी बाबू के निशाने पर अपनी ही पार्टी के नेता हैं। भाजपा में नई लीडरशिप के सामने आने के बाद शत्रु अक्सर अपनी ही पार्टी और सरकार को झेंपने के लिए मजबूर करते आए हैं। सियासी तजुर्बे के बच्चे भी बता सकते हैं कि भाजपा में शत्रु के दोस्त और दिन लगातार कम होते जा रहे हैं। सिद्धांतवादी राजनीति से अपना सफर शुरु करने वाले शाटगन खुद को खुश करने के चक्कर में गलत मौके पर गलत तरीके से सही बात करने के शिकंजे में इतने जकड़े गए कि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व तो उनको अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शक मंडल में भी उनको जगह देने का जोखिम नहीं लेगा। देखने वाली बात सिर्फ इतनी है कि शत्रु खुद शहीद होंगे या पार्टी उनकी शहादत की औपचारिकता निभाएगी?


परेश रावल का मामला ज्यादा दिलचस्प है। उनके निशाने पर अंरुधिंति राय हैं, जो किसी सियासी जमात से नहीं है। अरुंधिति का विरोध परेश रावल को अपनी पार्टी के राष्ट्रवाद के उस कट्टरपन के साथ जोड़ता है, जहां पार्टी और सरकार का विरोध देशविरोधी मानने वालों में परेश रावल भी हैं और खुद ही सजा भी मुकर्रर करना नहीं भूलते। देशभक्ति के नाम पर देश की सत्ता के मुखर और मौन समर्थन ने जो स्थिति बना दी है, उसमें एक सांसद महोदय का किसी महिला के लिए सजा मुकर्रर करना हैरान नहीं करता, क्योंकि उस महिला के विचार परेश रावल की पार्टी की सोच से मेल नहीं खाते। जो लोग ये समझ रहे हों कि परेश रावल ने खालिश तैश में आकर अरुंधिती के लिए इस तरह की सजा मुकर्रर की है, वे न तो परेश रावल को जानते हैं और न उनकी सियासत को समझ पाएंगे। परेश रावल की सियासत का गुणा भाग जमाने से पहले एक बात समझना जरुरी हो जाता है कि परेश रावल किसी भी एंगल से शत्रुघ्न सिन्हा वाली भावुकता और संवेदनाओं से नहीं जुड़े हैं। ये गुजराती बाबू सियासत में बिहारी बाबू सरीखी बकबक वाली सियासत करने नहीं आए। शत्रुघ्न सिन्हा अगर अपनी पार्टी से बाहर होने के कगार पर हैं तो अरुंधिति वाले मामले में उनकी बहादुरी के लिए परेश रावल को उनकी पार्टी की लीडरशिप पार्टी या सरकार में उनको कोई बड़ा ओहदा देकर उनको नवाज सकती है।


दरअसल शत्रुघ्न सिन्हा जो बात सालों से सियासत के मैदान में रहकर नहीं समझ पाए, वो परेश रावल ने पहले दिन से समझ ली थी कि सियासत में वो मत कहो, जिसमें नैतिकता या  सिद्धांतों की गंध आती हो। परेश रावल उस सियासत का चेहरा हैं, जहां विरोध की चीख-पुकार का कोई नैतिक आधार तलाशने वाले मूर्ख साबित हो जाता है।
शत्रुघ्न सिन्हा ने सियासत के जिस रास्ते पर चलकर अपनी ही पार्टी के विरोधी होने का तमगा पहनकर खुद को अलग थलग होने की हालत में पंहुचाया, तो परेश रावल ने समझदारी दिखाते हुए राष्ट्रवाद का वो रास्ता चुना, जहां उनकी तरक्की के नए रास्ते खोलता है। याद रहे कि इस साल के आखिर में गुजरात के विधानसभा के चुनाव होने हैं। कौन जाने, आज के सम्मानित सांसद महोदय को इन चुनावों के बाद अपने गृहराज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने का मौका भी मिल जाए।

असली मुद्दा वैचारिक मतभेदों का ही रह जाता है। मुमकिन है कि परेश रावल को अपनी पार्टी के वो भूतपूर्व प्रधानमंत्री याद हो, जिनके अभूतपूर्व राजनैतिक कौशल का लोहा उनके सियासी विरोधी निसंकोच मानते थे। परेश रावल नहीं जानते हों तो याद दिलाया जा सकता है कि विरोधियों का सम्मान करना माननीय अटल
बिहारी वाजपेयी की सियासत का मुख्य आधार रहा। परेश रावल सियासत में आए हैं, तो विरोधियों पर वार करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो जाता है, लेकिन परेश रावल जब विरोध के सुरों को अमर्यादित बनाने में कोताही नहीं करते, तो वे ऐसी मुद्रा में पंहुच जाते हैं, जहां एकमेव लक्ष्य अपने नेतागणों की कृपा पाने तक हो जाता है और यहां आकर जब उनकी गुजराती रंगमंच से लेकर बालीवुड के कद्दावर अभिनेता की लंबी पारी को याद किया जाए, तो नेता परेश रावल और अभिनेता परेश रावल के बीच जमीन-आसमान का अंतर साफ तौर पर दिखाई देता है।


परेश को दोषी ठहराने या शत्रुघ्न को निर्दोष बताने की यहां कतई कोशिश नहीं है। यहां सिर्फ बात हो रही है विरोध के स्तर की। दोनों ही फिल्मी दुनिया से राजनीति में गए हैं, तो वो दौर भी याद आता है, जब इन दोनों से पहले भी बालीवुड के तमाम सितारों ने सियासती गलियारों का सफर देखा। इतिहास बताता है कि फिल्मी सितारों ने सियासी मैदान में या तो मौनव्रत साधे रखा या तंग आकर खुद अपनी दुनिया में लौट आए। दो बातें खास तौर पर याद आती हैं। राजनीति के मैदान में लंबी पारी खेलने वाले सितारों ने कभी किसी के विरोध को लेकर वो रास्ता नहीं अपनाया, जिस पर आज की राजनीति के सिरमौर बने गुजराती महापुरुष और उनका अनुसरण कर रहे बापू परेश रावल सरपट दौड़ रहे हैं और बिहारी बाबू सिद्धांतवादी राजनीति के नाम पर लड़खड़ा रहे हैं।
इन दोनों की सोच, समझ और भविष्य को समझना कतई मुश्किल नहीं..,


Wednesday, May 17, 2017

रिश्तों की जंजीर में जकड़ा फिल्मकार


प्रकाश मेहरा की आज (17 मई, 2009) बरसी है। उनकी यादों को सिर्फ एक लाइन में समेट दिया गया है कि अमिताभ बच्चन को जंजीर से पहली कामयाबी देने वाला डायरेक्टर। बस, लगता है कि प्रकाश मेहरा का कैरिअर सिर्फ एक जंजीर और एक अमिताभ बच्चन के सुपर स्टारडम तक अगर सिमट जाता है, तो ये प्रकाश मेहरा की बदनसीबी से ज्यादा उस दौर का आईना है, जिसमें कुछ दिनों पहले इस बात को लेकर मातम मनाया गया कि विनोद खन्ना जैसी हस्ती को उनके आखिरी सफर में कांधा देने के लिए कितने सितारे पंहुचे।



8 साल पहले प्रकाश मेहरा के अंतिम सफर में भी उंगलियों पर गिनने लायक  सितारे पंहुचे थे। दिवंगत विनोद खन्ना की आत्मा इस बात के लिए कहीं न कहीं ऋषि कपूर के लिए थैंक यू महसूस करती होगी कि अंतिम सफर को लेकर उन्होंने इस दौर के सितारों को खरी-खोटी सुनाई। प्रकाश मेहरा की रुह को तो कभी कोई ऋषि कपूर जैसा बंदा मिला ही नहीं, जो रिश्तों की अहमियत को लेकर कुछ कह सके। उनको तो जीते जी ही रिश्तों के वे आईने नजर आने लगे थे, जिसमे स्याहपन के अलावा कुछ भी नहीं था।


बरसी के मौके पर किसी से जुड़ी मीठी यादो को ताजा करना सबसे आसान हो जाता है। प्रकाश मेहरा को बरसी के मौके पर इन यादों के साथ ताजा करना सबसे आसान होगा कि जंजीर से उन्होंने एक सुपर सितारे की सुपर यात्रा का पहला मौका बनाया और फिर बच्चन के साथ कई हिट फिल्में बनाईं। बात यहीं खत्म हो जाएगी। कोई दिलजला हो तो बच्चन जी के साथ मेहरा के रिश्तो में कड़वाहट और मेहरा की गैरबच्चन फिल्मों की नाकामयाबी का इतिहास बखान कर दे।


बरसी पर बायोग्राफी की रटंत ट्रिब्यूट के परंपरागत तरीकों से बाहर जाकर प्रकाश मेहरा का जिंदगीनामा सिर्फ अमिताभ बच्चन की फिल्मों के साथ न शुरु होता है और न खत्म हो जाता है। 13 जुलाई (1949) को जन्मे 13 साल के बच्चे ने बिजनौर (जहां उनका बचपन बीता) से उस वक्त की बंबई में कदम रखा, तो वो बालक अपने साथ एक टूटा दिल लााया था, जिसमें सिर्फ दर्द भरे नगमों की शायरी थी। प्रकाश मेहरा कोई निर्देशक बनने की ललक लेकर मायानगरी में नहीं आए थे। नामालूम मंजिल के सफर के साथ उस 10वीं पास बच्चे के पास बिना किसी डिग्री के पैसे कमाने का सिर्फ रास्ता था कि फिल्म इंडस्ट्री में कुछ कमाने का मौका मिल जाए। भागादौड़ी के बाद कहीं प्रोडक्शन में छोटा मोटा काम मिला, तो भूखे पेट की आग कम होने लगी। प्रोडक्शन के बाद किसी के साथ डायरेक्शन में मौका मिला, तो हालात बेहतर होने लगे। ये मौका था, जब प्रकाश मेहरा ने फिल्म बनाने के लिए सोचना शुरु किया, क्योकि अब उनके पास कुछ और करने का न तो मौका था, न जरुरत थी। जिन्होंने प्रकाश मेहरा की गाथा सिर्फ बच्चन की जंजीर से सुनी हो, उनके लिए ये भी न्यूज होगी कि जंजीर से पहले निर्देशक के तौर पर प्रकाश मेहरा तीन लगातार हिट फिल्में (हसीना मान जाएगी, मेला, समाधि) बना चुके थे, जबकि उस दौर में अमिताभ बच्चन फ्लाप फिल्मों के दंश से ग्रस्त थे। जंजीर की महागाथा हर कोई जानता है। ये भी जग जाहिर है कि बच्चन के साथ मेहरा की लाइन से फिल्में हिट रहीं और बच्चन को लेकर प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई के बीच कोल्डवार रहा, जो जादूगर और तूफान तक चला। बच्चन की कामयाबी को लेकर मेहरा और देसाई की रस्साकशी भी नाकामयाबी के साथ ही खत्म हुआ।


किसी निर्देशक और कलाकार का रिश्ता मियां-बीवी की तरह माना जाता है। खास तौर पर जब लगातार काम किया जाए, तो इस रिश्ते के रंग बदलने लगते हैं। जंजीर के जादूगर तक के लंबे सफर के बाद अमिताभ बच्चन और प्रकाश मेहरा के रास्ते और मंजिल बदलते चले गए। बच्चन के पास उनके सुपर स्टारडम के सम्मोहन में बंधे निर्देशकों की नई फौज जमा थी, जबकि प्रकाश मेहरा दूसरा बच्चन खड़ा कर देने के आवेशिक जज्बे में ऐसे फंसे कि असफलता और हताशा की दलदल में हमेशा के लिए फंसते चले गए। बच्चन के दूर चले जाने का दर्द उनके तीखे शब्दों और सूनी आंखों में बस चुका था। प्रकाश मेहरा के भीतर का डायरेक्टर इस गम में अकाल मौत का शिकार बरसों पहले हो गया था कि जिस कलाकार को उसने कामयाबी का रास्ता दिखाया, उसने इस रास्ते पर उनको अकेला छो़ड़ दिया। बच्चन को अपने लल्ला (बच्चन का मेहरा के लिए संबोधन) के  पास लौटने का ख्याल कभी तो आएगा, इसी लाचारी और उम्मीद ने प्रकाश मेहरा को अधूरी हसरतों के हवाले कर दिया।
कश्मीर में लावारिस की शूटिंग 


बच्चन को न लौटना था, न लौटे। दिवंगत मुकुल आनंद की खुदागवाह को जब अमिताभ बच्चन ने मनमोहन देसाई (जो उस वक्त जिंदा थे) को समर्पित किया, तो ये प्रकाश मेहरा और बच्चन के रिश्तों के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। अनिल कपूर के साथ जिंदगी एक जुआ और पुरु राजकुमार (जानी राजकुमार का बेटा) को लांच करने के लिए बाल ब्रह्मचारी जैसी फिल्मे प्रकाश मेहरा की उस ललक का पैमाना थी, जो सिर्फ इस दंभ के साथ एक्शन कट बोलता था कि आज भी वो एक नया अमिताभ बच्चन क्रिएट कर सकता है। 6 फुट लंबे हर कलाकार में नया अमिताभ बच्चन तलाश करने की कोशिश ने प्रकाश मेहरा को अवसान से पहले अवसान की हालत में पंहुचा दिया।

अमिताभ बच्चन के लिए अपने किसी निर्देशक से किनारा करना उनकी पेशेवर कला का हिस्सा थी, तो प्रकाश मेहरा के लिए भावुकता का ऐसा जहर, जिसने उनको तेजी से खत्म करना शुरु किया। दोषी किसे माना जाए? एक सुपर स्टार, जिसके लिए प्रकाश मेहरा सिर्फ एक डायरेक्टर थे या एक फिल्मकार को, जिसके लिए अमिताभ बच्चन सिर्फ स्टार नहीं, उसके निर्देशन के जज्बातों का नाम था। जंजीर एक फिल्म का नाम जरुर था। बच्चन के लिए सिर्फ एक फिल्म और प्रकाश मेहरा के लिए रिश्तों की ऐसी जंजीर, जिससे उनका नाता आखिरी सांस तक नहीं टूटा।

सदी का महानायक ने जिस दिन अपने फिल्मी सफर के सबससे अहम निर्देशकों में ह्रषिकेश मुखर्जी, यश चोपड़ा और मनमोहन देसाई को अहम माना था, प्रकाश मेहरा की मौत उसी दिन हो गई थी। 17 मई, 2009 तक सांसो और यादों का बोझ उठाए प्रकाश मेहरा इस दुनिया से दूर चले गए, रिश्तों की इस गफलत को प्रकाश मेहरा अक्सर एक लाइन में बयां करते थे-

अंधों के शहर में आईने बेचता हूं....

Sunday, May 14, 2017

सरकार, ये किसकी हार ?

रामगोपाल वर्मा पहली फुर्सत में प्रलाप कर सकते हैं  कि कटप्पा और बाहुबली ने सरकार 3 का शिकार कर लिया। ये हैदराबादी शब्दों के साथ शातिराना जुगलबंदी करना जानता है। जिसे शक हो, उसके लिए सोशल मीडिया पर रामू के शब्दों के किस्सों की भरमार है।

रिलीज होने के बाद रामू सरकार 3 को लेकर कुछ कहें या न कहें या कब कहें, इन सवालों में उलझने की जगह बेहतर होगा कि रामू के इस सरकारी सफर के तीसरे पड़ाव पर गौर किया जाए, तो एक तरफ इस बात का एहसास होता है कि वक्त किस तरह से अच्छे भले डायरेक्टर को जंग लगा देता है और दूसरा ख्याल आता है कि अगर कोई स्टार फिल्म के एडीटिंग रुम में जा घुसे, इसका ये मतलब कतई नहीं होता कि चाय सुड़कने से फिल्म का स्वाद बदल जाए। परदे के सुभाष नागरे और परदे के पीछे के महाराज-अधिराज श्रीमान बच्चन की
फिल्म एडीटर बनने की ललक की पहली नाकामयाबी पर अफसोस हुआ।
सरकार 3
सरकार 3 के अनाधिकृत संपादक बने बड़़े बच्चन का किस्सा थोड़ा आगे जाकर। उससे पहले रामगोपाल वर्मा की बात हो जाए, जिनके लिए अब यहां से संकरी गली जैसा रास्ता बचा है, जिसके आगे नाकामयाबी और दोहराव के शिकार हो चुके एक निर्देशक के लिए आगे रास्ता बंद है जैसी तस्वीर बन जाती है। सत्या, कंपनी और सरकार की दो कड़ियों के साथ मुंबई के गैंगस्टर पर फिल्में बनाने वाले महारथी निर्देशक की छवि में बुरी तरह से जकड़े रामू अब अपनी इस विरासत को आगे बढ़ाना भी चाहें, तो सरकार 3 के बाद उनके लिए ये नामुमकिन जैसा सच है, जो बड़ी फिल्मों के खेल में उनको बहुत पीछे धकेल चुका है।

90 के दशक में शिवा के साथ रामू ने जब हैदराबाद से मुंबई आकर दस्तक दी थी, जो उनकी पहचान प्रयोगधर्मी फिल्मकार के तौर पर बनी थी। वे हमेशा प्रयोगधर्मी रहे। यहां तक कि जब उन्होंने अपने नाम के साथ आग लगाकर रमेश सिप्पी वाली शोले को ट्रिब्यूट देनी चाही, तो इस भयावह प्रयोग ने उनके नाम ही ट्रिब्यूट का बंदोबस्त कर दिया। याद आता है कि अपनी शोले की खुद मजाक बनाते हुए रामू ने कहा था कि प्रयोग हमेशा कामयाब नहीं होते, नाकामयाबी का जोखिम हर प्रयोग का आंशिक सच होता है। सच तो ये है कि उस प्रयोग की भयावहता इतनी ज्यादा थी कि इसके असर से वे कभी बाहर नहीं आ सके। अगर शोले का प्रयोग एक युवा फिल्मकार के कौशल के ताबूत में पहली कील थी, तो सरकार 3 ने इसे कीलों से पाट दिया है। चलिए, मान लेना चाहिए कि 90 के दशक का एक और दिग्गज निर्देशक लंबी पारी खेलकर अब आउट हो चुका है।

यहां बस एक सवाल बचा रह जाता है कि क्या सरकार 3 की विफलता इतनी भयंकर है कि रामू के लिए आगे के सारे रास्ते अब बंद मान लिए जाएं। इस सवाल के दो जवाब होते हैं। अगर अब यहां से रामू सरकार 4 जैसी कोई फितरत का प्रयोग करने की सोचेंगे, तो रास्ते सचमुच बंद मिलेंगे। अगर गैंगस्टर के झमेले से बाहर जाकर रामू किसी छोटे बजट की फिल्म से वापसी की सोचें, तो बात अलहदा हो सकती है। शोले की आग के बाद भी रामू वापस आए थे, तो अब भी ये नामुमकिनं नहीं। वे अब सरकार और अंडरवर्ल्ड से बाहर की दुनिया में झांके। एक आखिरी मौके के हकदार वे इसी सूरत में हो सकते हैं। सरकार को लेकर तो उनका थका हुआ सफर अब खत्म हो चुका है। रामू की चुनौती अब सिर्फ खुद से है। फिल्मकार के तौर पर इस अपनी चुनौती से रामू को खुद ही जूझना होगा।
सरकार राज
अब बात हो जाए एडीटर साब की। बच्चन को सरकार 3 से कुछ खास फर्क इसलिए नहीं होगा, क्योंकि वे हिट-फ्लाप फिल्मों के दायरे से बाहर जा चुके हैं। अगर हिट की बात करें, तो शायद उनको खुद याद नहीं होगा कि उनकी पिछली कौन सी फिल्म हिट हुई थी। फिर भी बच्चन को देखने वाले प्यार करते हैं। इसी प्यार ने उनको फिल्मों के बाजार में बनाए रखा है। बच्चन नागरे बनें या सरकार बनें या कुछ और करें, इससे कोई खास नहीं
रह गया है। ये उनके उस सम्मान की पारी है, जो सालों की उनकी साख का पैमाना है।
सरकार 
सुपर स्टार से लेकर सदी के महानायक की पदवियों के बीच अमिताभ बच्चन अब फिल्मों की हिट-फ्लाप से ज्यादा अगर सिर्फ अपने किरदार की फिक्र करें, तो भी उनका सफर यू हीं चलता रहेगा। जहांं तक रही एडीटिंग की बात, ये सिर्फ उस पीड़ा का नतीजा है, जो एक अनुभवी सितारा अपनी कमजोर फिल्म को लेकर भांप लेता है। एडीटिंग से ज्यादा जरुरी था कि बच्चन कहानी लिखे जाने के वक्त अगर सजग होते, तो मुककिन था कि सरकार 3 ऐसी नहीं होती, जो हुई। बच्चन तकनीकी रुप से एडीटर नहीं, इस लिहाज से फिल्म की कमजोर एडीटिंग का दोष उनको नहीं जाता, लेकिन क्या ये कम बड़ी बात है कि सरकार 3 की तमाम कमजोरियों के बीच उनकी पुरजोर अदायगी को किसी ने दोष नहीं दिया। वे बड़े हैं। अनुभवी हैं। सत्तर की उम्र पार कर चुके हैं। ऐसे में एडीटिंग सीखने का शौक हो गया हो तो इसमें भी कोई बुरी बात नहीं, लेकिन एक्टर अमिताभ बच्चन के पास अब भी विरासत और कामयाबी का वो पैमाना है, जिसके आगे सरकार 3 जैसी फिल्मों की कोई बिसात नहीं है।
रामगोपाल वर्मा की आग में गब्बर सिंह के तेवर 
सरकार 3 बच्चन की नाकामयाबी नहीं है। ये रामगोपाल वर्मा नाम के उस प्राणी की घोर विफलता है, जो अपनी पारी खेल चुका है। बच्चन के साथ फिल्में बनाने वाले निर्देशकों की कमी नहीं। इन निर्देशकों के पास सिर्फ और सिर्फ बच्चन के लिए किरदारों की कोई कमी नहीं। बच्चन सरकार 3 के रास्ते से आगे बढ़ जाएंगे। सरकार 3 ने रामू के रास्ते बंद किए हैं। अमिताभ बच्चन आज भी जहां खड़े हो जाएं, वहां रास्ता खुदबखुद बन जाता है। एडीटिंग जैसी नादानी (सत्तर साल वाली नादानी) के प्रहसन के बाद भी वे अमिताभ बच्चन हैं और ऐसे ही रहेंगे।

अमिताभ नई फिल्म से फिर आगे बढ़ जाएंगे। सरकार 3 ने असली पटकनी तो उस रामू को दी है, जो अब सोशल मीडिया पर अपनी जुबां का खेल खेलेंगे और कोई मौका मिला, तो फिर से डायरेक्टर की कुर्सी तक पंहुचने की कोशिश कर सकते हैं। इस कोशिश में बस ख्याल इतना रखें कि सरकार जैसे विध्वंसक प्रयोग के लिए बच्चन तो अब मिलने से रहे। न एक्टर, न एडीटर.... इससे आगे की जहां तक बात है, तो रामू याद रख सकते हैं कि हर अंधेरे के आगे एक दिन की रोशनी जरुर होती है...

Friday, May 5, 2017

सिनेमा और समाज के रिश्तों के बीच निर्भया कांड का इंसाफ

2012 के दिसंबर में जब देश की राजधानी का विभत्स निर्भया कांड जब मीडिया में सुर्खियां बना था, तो सिनेमा की दुनिया न तो उस वक्त इससे अछूती रही थी और न ही अब जबकि इस कांड के आरोपियों को सर्वोच्च अदालत ने मौत की सजा सुनाई, तो भी सिनेमाई दुनिया के बाशिंदों ने भी देश की आवाज के साथ इस फैसले को न्याय माना। 
2012 से 2017 के बीच अदालतों में कानून की प्रक्रिया का हिस्सा बना ये खौफनाक कांड देखा जाए, तो कहीं न कहीं सिनेमा की दुनिया से जुड़ा ही रहा। जब ये हादसा हुआ था, तो फिल्मी सितारे भी अपनी खोल से बाहर निकलकर देश के आक्रोश के साथ कदमताल करते हुए आंदोलनों का हिस्सा बने थे। 


उस दौर में हिंदी सिनेमा को इस बात की तोहमत भी झेलनी पड़ी थी कि फिल्में बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों को मसालेदार बनाकर पेश करती हैं और इनको प्रोत्साहित करने का गुनाह करती हैं। इस तोहमत को लेकर लंबे दौर तक बहस भी होती रही, जो एक दिन चर्चाओं की दुनिया से दूर हो गई। मगर जब जब इस केस को लेकर मीडिया में कोई खबर आई, तो फिल्मी सितारों ने निर्भया के साथ न्याय की मांग को अपनी आवाज जरुर दी। 
कुछ दिनों पहले ही रवीना टंडन जब अपनी फिल्म मातृ का प्रमोशन कर रही थीं, तो उन्होंने मीडिया के सामने इस कांड का जिक्र किया, क्योंकि उनकी फिल्म की कहानी का विषय भी इससे मिलता-जुलता था। रवीना की फिल्म में एक मां का संघर्ष था, जिसको खुद बलात्कार की विभीषिका सहनी पड़ी और बलात्कारियों ने उसकी टीनेज बेटी को बलात्कार के बाद मार डाला था। चूंकि ये हिंदी फिल्म थी, इसलिए इस संवेदनशील विषय को उन मसालों के साथ बनाया गया, जिनके चलते बाक्स आफिस पर फिल्म को कोई खास रेस्पांस नहीं मिला। यहां आकर एक बार उस तोहमत की याद ताजी हो गई, जिसमें सिनेमा, खास तौर पर हिंदी सिनेमा बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दे के साथ असंवेदनशील नजर आता है।


इसे आधा-अधूरा सच कहा जा सकता है। अगर पूरी बात को समझने की कोशिश की जाए, तो जब 60 के दशक के बाद हिंदी सिनेमा प्रेम कहानियों से बाहर निकला, तो समाजिक सरोकारों पर बनने वाली फिल्मों ने इसे एक नया चेहरा दिया। खास तौर पर बीआर चोपड़ा जैसे फिल्मकारों ने जिन समाजिक मुद्दों के साथ हिंदी सिनेमा को जोड़ना शुरु किया, उनमें कई ऐसी फिल्में देखने को मिलीं, जहां बलात्कार की पीड़ित नायिका की ओर से इंसाफ के लिए लंबी जंग हुई और दोषियों को कभी अदालतों से सजा मिली, तो कभी नायिकाओं ने खुद सजा दी। इंसाफ का तराजू कौन भूल सकता है, जिसमें एक पीड़िता की लोमहर्षक दास्तान को अदालती ड्रामों के साथ कुछ इस तरह से पेश किया गया था कि हर कोई हतप्रभ रह गया था।
90 के दशक की एक और फिल्म याद आती है, जो राजकुमार संतोषी ने बनाई थी। दामिनी ने इस मुद्दे को सामाजिक सरोकारों के साथ सीधे तौर पर जोड़ा। कैसे घरेलू नौकरानी के साथ अमीर घर के
बिगड़े शहजादे द्वारा बलात्कार और फिर घर की बहू द्वारा परिवार की इज्जत के सवाल से बाहर जाकर इंसाफ की एक जंग ने समाजिक परंपराओं के खोखलेपन को बेपरदा किया था।
सिर्फ ये दो उदाहरण उस तोहमत के दाग नहीं मिटा सकते कि फिल्मों की दुनिया ऐसे जघन्य अपराधों को ग्लैमर के नाम पर कहीं न कहीं महामंडित करती है। सिनेमा की दुनिया से जुड़ा कोई भी बंदा इस तोहमत को आंखें मूंदकर खारिज नहीं कर सकता। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, अगर साल में सौ फिल्में बनती हैं, तो तीस से ज्यादा फिल्मों में कहीं न कहीं ये मुद्दा जुड़ा रहता है और ऐसे मुद्दे पर बनी फिल्में जब मनोरंजन केे मसालों के तड़के के साथ बनती हैं, तो न सिर्फ शर्मिंदगी का सबब बनती हैं, बल्कि बहुधा बाक्स आफिस पर ही खारिज हो जाती हैं। यहां बाक्स आफिस बड़ा मुद्दा नहीं बन सकता, सिवाय इसके कि कमाई की गरज से ही ऐसी फिल्मों में मसाले ठूंसे जाते हैं। 
इस विषय पर फिल्में बनती रही हैं और बनती रहेंगी। अभी दर्शकों ने रवीना टंडन की मातृ देखी, तो आने वाले समय में इसी तरह के सब्जेक्ट पर बनी श्रीदेवी की फिल्म मॉम आएगी, जिसमें भी एक मां का अपनी टीनेज बेटी (जो बलात्कार की शिकार हुई) के इंसाफ के लिए संघर्ष है। 
अब, जबकि निर्भया कांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सामने आ चुका है, तो मुमकिन है कि इस कांड पर फिल्में बनने का नया दौर शुरु हो जाए। 2013 से अब तक इस कांड पर कई फिल्मेंं बनीं और कईं फिल्में बनाने की घोषणा हुई, लेकिन लगभग सभी फिल्में आई-गई हो गईं। 
ये सच है कि फिल्मों की दुनिया मनोरंजक फिल्में बनाती है। ये भी सच है कि फिल्मों की दुनिया समाजिक विषयों पर भी फिल्में बनाती आई है। ये भी सच ही कहा जाएगा कि समाजिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों के लिए ये सबजेक्ट (बलात्कार) सबसे मुफीद माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस विषय से हर तरह का दर्शक वर्ग सीधे तौर पर जुड़ता है। 
ये तो नहीं कहा जा सकता कि सिनेमा कभी इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाना बंद कर देगा। शायद कम भी न करे। ये जरुर कहा जा सकता है कि 70-80 के दशक में बीआर चोपड़ा सरीखे फिल्मकार जब इन विषयों को लेकर फिल्में बनाते थे, तो वे समाज के साथ सिनेमा के सरोकार को परिभाषित और रेखांकित करने का महत्वपूर्ण काम करती थीं। 
सोशल मीडिया और इंटरनेट क्रांति के इस दौर में उस सिनेमा की कमी सबसे ज्यादा महसूस होती है, जिसने कभी समानांतर सिनेमा तो कभी कला फिल्मों के नाम से कमर्शियल सिनेमा के दबाव और दावे के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखी थी। आज उस सिनेमा की सिर्फ यादें रह जाती हैं और इन यादों में ही सिमटा ये सच आज फिर याद आया कि कभी सिनेमा का समाज के साथ गहरा रिश्ता होता था। अब सिर्फ और सिर्फ कमाई की गरज से इस रिश्ते को समझने वाले और समझाने वाले बहुत पीछे छूट चुके हैं। 
ऐसे में निर्भया कांड की गूंज इस रिश्ते की बातों और यादों को भी याद किया जा सकता है। 



Tuesday, May 2, 2017

कभी मुगले आजम, कभी शोले तो कभी बाहुबली- आम आदमी के सिनेमा का जश्न

सिनेमाई इतिहास में ऐसे पल बहुत कम होते हैं, जब एक इतिहास का निर्माण होने का साक्षी होने का मौका हर किसी को मिले। मानने में कोई गुरेज नहीं कि बाहुबली 2 एक ऐसा ही पल है, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा।
मौजूदा पीढ़ी अगर बाहुबली 2 की एतिहासिक कामयाबी का गवाह बनी, तो उस दौर को अब भी याद किया जाता है, जब 1975 में दो चोरों की मामूली सी कहानी पर बनी गैरमामूली फिल्म शोले मील का वो पत्थर साबित हुई थी, जिसे इसके बाद कामयाब होने वाली अमूमन हर फिल्म के साथ न सिर्फ याद किया गया, बल्कि सालों तक शोले की कामयाबी की तुलना में तमाम हिट फिल्में उन्नीस मानी जाती रहीं।
शोले के साथ बाहुबली 2 की एतिहासिकता की कोई तुलना नहीं हो सकती। इसका कोई आधार भी नहीं बनता। फिर भी देखा जाए, तो इन दोनों फिल्मों की कामयाबी के आधार में ही अंतर समाया हुआ है। रमेश सिप्पी ने शोले का निर्माण किसी तरह की कामयाबी का इतिहास रचने की गरज से नहीं किया था। शोले को तमाम फार्मूला मसालों के साथ उस वक्त की आम जनता के आम मनोरंजन के लिए बनाया गया था। शोले के रिलीज से पहले रमेश सिप्पी को गुमान तक नहीं था कि उनकी ये फिल्म किसी किस्म का इतिहास रचेगी। ये भी कहा जा सकता है कि शोले का इतिहास रमेश सिप्पी की टीम से ज्यादा उस वक्त की जनता ने रचा, जो शोले पर ऐसी लट्टू हुई कि फिल्म का एक एक किरदार, एक एक सीन, एक एक संवाद, नाच-गाना.. सब कुछ जनमानस का हिस्सा बनता चला गया। ये एक ऐसा चमत्कार था, जो न पहले कभी हुआ, न ही कभी बाद में।
बाहुबली 2 की कामयाबी अगर फौरी तौर पर किसी फिल्म की याद दिलाती है, तो मुगले आजम कही जा सकती है। कम से कम भव्यता और बजट इत्यादि ऐसे तथ्य हैं, जो इन दोनों फिल्मों को कहीं न कहीं एक प्लेटफार्म पर ले आते हैं। मुगले आजम किसी फिल्म से ज्यादा फिल्मकार की दीवानगी का सबब थी, जिसने सालों तक एक फिल्म के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाए रखा। मुगले आजम के निर्माण में कई ऐसे दौर आए, जब इसके पूरे होने को लेकर ही सवाल होने लगे। फिर भी मुगले आजम बनी और नयनाभिराम भव्यता पर जनता फिदा होती चली गई। मुगले आजम उस कालजयी सिनेमा का इतिहास थी, जिसे दोहराने की कोई सोच भी नहीं सकता था

शोले और मुगले आजम की इन बातों को ध्यान में रखकर अब अगर बाहुबली की एतिहासिकता का आकलन किया जाए, तो बेहद दिलचस्प तस्वीर बन जाती है। याद कीजिए, 2015 में जब बाहुबली का पहला हिस्सा रिलीज हुआ था, तो हिंदी राज्यों में मीडिया ने भी सिर्फ इतनी ही हवा बनाई थी कि इस फिल्म की मार्केटिंग करण जौहर की कंपनी कर रही है। करण जौहर अगर किसी फिल्म में हाथ डालते हैं, तो वो खुद भी बड़ी होती चली जाती है। उतना ही विस्तार बाहुबली के पहले हिस्से को रिलीज से पहले मिला। बाहुबली से पहले बाहुबली के नायक प्रबास की पहचान हिंदी दर्शकों में सिर्फ इतनी थी कि उनकी तेलुगू की फिल्में हिदी में डब होकर टीवी पर देखी जाती हैं। ये समझना भी मुश्किल नहीं कि बाहुबली की टीम ने हिंदी बेल्ट में फिल्म की मार्केटिंग का रिस्क सिर्फ इतना ही लिया था कि जो मिलेगा, वो बोनस होगा। ये समझना बेहद जरुरी हो जाता है कि बाहुबली को हिंदी मार्केट के लिए नहीं बनाया गया था। यहां तक कि करण जौहर की कंपनी की मार्केटिंग टीम भी उतना ही रिस्क ले रही थी कि इसमें लगे पैसे लौट आएं।

करण जौहर की कंपनी के एक साहब दिलचस्प किस्सा बताते हैं कि करण जौहर आखिर बाहुबली के चक्कर में फंसे कैसे? बताया कुछ यूं कि करण जौहर को जब बाहुबली का पता चला, तो उनकी कारोबारी खोपड़ी में ये बात घुसी कि इस फिल्म को वे सलमान खान के साथ हिंदी में रीमेक करके करोड़ों कमा भी सकते हैं और सलमान को अपने कैंप तक ला सकते हैं। इस ललक के साथ करण जौहर ने बाहुबली की टीम के साथ हिंदी रीमेक राइटस का सौदा किया, जो तय है कि करोड़ों में रहा होगा। सलमान अपनी धुन के हैं। करण जौहर की सलमान सुन लेते, तो वे ही अपने चाहने वालों के बीच बाहुबली बनकर अवतरित हो जाते। सलमान खान सीधे तौर पर किसी को समझ नहीं आते, तो करण जौहर के भी पल्ले नहीं पड़े। करण जौहर ठहरे कारोबारी, जिनके लिए नफा-नुकसान सबसे पहले आता है। रीमेकिंग राइट्स में फंसे करोड़ों की वापसी के लिए जौहर ने बाहुबली की टीम से नया सौदा कर लिया कि वे इसकी हिंदी बेल्ट में मार्केटिंग कर लेंगे, इसके लिए रीमेकिंग राइटस के एवज में दी गई रकम को एडजेस्ट करने पर डील हो गई। बाहुबली की टीम के लिए भी ये परफेक्ट सौदा था। बाहुबली की टीम जानती थी कि करण जौहर की कंपनी के कंधों पर सवार होकर वे हिंदी बेल्ट में बड़ी एंट्री का रास्ता बना सकती है। लिहाजा बाहुबली और करण जौहर का विशुद्ध तौर पर ये कारोबारी गठबंधन अपने अपने मकसद को लेकर अपने रास्ते पर आगे बढ़ा।

बाहुबली की पहली कड़ी 2015 में उस वक्त रिलीज हुई थी, जब सलमान खान बजरंगी भाईजान की कामयाबी का सुख भोगने ही वाले थे कि अचानक भरभराहट जैसे कंपन के साथ हिंदी बेल्ट के सिनेमाघरों में बाहुबली के इस तूफान ने सलमान खान को ये कहने पर मजबूर कर दिया कि बाहुबली ने हमारी फिल्म की कामयाबी को आधा कर दिया। मतलब, बजरंगी भाईजान के आधे कारोबार को बाहुबली ने चौपट कर दिया। क्या त्रासदी थी कि करण जौहर जिस सलमान को लेकर बाहुबली के चक्रव्यूह में घुसे थे, उसी सलमान खान की फिल्म के कारोबार को आधा लील गए। सलमान के पास छटपटाने के लिए कुछ नहीं था और करण जौहर के पास खुश होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। सच तो ये है कि करण जौहर और उनकी टीम को दूर दूर तलक बाहुबली की इतनी विराट कामयाबी का गुमान नहीं था और ये भी इतना बड़ा सत्य है कि अगर हिंदी बेल्ट ने 2015 में बाहुबली को सर-आंखों पर नहीं बैठाया होता, तो बाहुबली का दूसरा भाग बनता जरुर, लेकिन इस पैमाने पर नहीं, जिस पैमाने पर उसे बनाया गया, क्योंकि इस बार हिंदी बाजार पर छा जाने के लिए बाहुबली और करण जौहर की टीम के पास हर तरह का मौका था, जिसे भुनाने के लिए किसी ने कोई कमी नहीं छोड़ी। इस बात को लेकर बहस की गुंजाइश नहीं है कि बाहुबली 2 को इतने विशालकाय कद में लाने के लिए करण जौहर और बाहुबली की टीम का गठजोड़ काम कर गया, जिसके लिए इस बार हर तरह से दौलत बंटोरने का गोल्डन मौका था। बाहुबली 2 को हर तरह से बड़ा बनाया गया। सिर्फ बजट नहीं, मीडिया, मार्केटिंग से लेकर हर मुमकिन तरह से इसे भारतीय इतिहास के नए अध्याय की फिल्म के तौर पर ही लाया गया। इस बार कोई जोखिम का खेल नहीं था, बल्कि मुनाफे के खेल को बड़ा, और बड़ा, सबसे बड़ा बनाने का वो दांव था, जिसे चलने के अलावा करण-बाहुबली की टीम के पास कोई रास्ता नहीं बचा था।

यहां आकर फिर से अगर मुगले आजम और शोले जैसी फिल्मों की कामयाबियों को याद किया जाए, तो कितना कुछ फर्क महसूस होता है। काश, के आसिफ के पास करण जौहर जैसा जौहरी होता। काश कोई रमेश सिप्पी को एहसास दिलाने वाला होता कि शोले का आने वाला कल कैसा होगा। काश उस दौर में भी मीडिया दो सालों के लंबे वक्त तक कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा जैसे सवाल को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कवायद करना जानता। काश.....

बाहुबली की कामयाबी को किसी सूरत में नहीं नकारा जा सकता। 2015 से 2017 के बीच इस फिल्म के दूसरे पड़ाव ने सिर्फ एक फिल्म नहीं बनाई, बल्कि इतिहास के एक पन्ने को अपने नाम से लिखा, जिसके लिए करण जौहर से लेकर बाहुबली की टीम के हर बंदे को क्रेडिट जाता है। इसे सिर्फ एक फिल्म की बाक्स आफिस पर बड़ी कामयाबी मानने तक सीमित करना भारी भूल होगा। सिनेमा के परदे पर भव्यता की वापसी के साथ साथ अपने इतिहास से मिलवाने और उससे भी बड़ी बात कि बाहुबली के पहले हिस्से  को मिली कामयाबी की चुनौती को कामयाबी के साथ स्वीकारने के चमत्कार के अलावा बाहुबली 2 ने दो बड़े काम किए हैं। देश को कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा के सवाल से निजात दिला दी और दूसरी बात कि हिंदी और साउथ की फिल्मों की दुनिया के बीच एक ऐसा पुल कायम कर दिया, जो सिनेमा की राष्ट्रीयता को भाषाओं की दीवारों से आगे ले जाएगा। जिस दौर में इंटरनेट और सोशल मीडिया की क्रांति ने फिल्मों की कामयाबी को बहुत छोटा कर दिया था। इस युग में बाहुबली 2 का संदेश बहुत साफ है कि सिनेमा से बडा मनोरंजन कोई और नहीं। भव्यता को परदे पर पसंद करने वालों की आज भी कमी नहीं। इससे भी बड़ा संदेश- महानायकों की इस गाथा में एक ऐसी फिल्म के ऐसे किरदार (बाहुबली) ने इतिहास रचा, जिसे परदे पर लाने वाले कलाकार (प्रबास) को दो साल पहले तक हिंदी दर्शकों में न कोई जानता था, न कोई पहचानता था। परदे के नायकों की नायिकी कैसे एक कलाकार को स्टार का रुतबा देती है, प्रबास और बाहुबली इसका जीता-जागता सबब बन चुके हैं।



बाक्स आफिस की कामयाबी से जुड़ी फिल्में अक्सर इतिहास का हिस्सा बनती हैं और बाहुबली की विराटता इतिहास रचती है। इतिहास मुगले आजम ने भी रचा था। इतिहास शोले ने भी रचा था और इतिहास बाहुबली ने भी रचा। इससे बड़ी कामयाबी बाहुबली के लिए और क्या होगी कि इस पड़ाव पर ये फिल्म हिंदी सिनेमा की दो फिल्मों की एतिहासिकता के साथ आकर खड़ी हो गई।


सिनेमा चमत्कार करता है। सिनेमा बनाने वाले चमत्कार करते हैं। सिनेमा को अपने दिल से लगाने वाला वो आम आदमी सबसे बड़ा चमत्कार करता है, जो कभी मुगले आजम, तो कभी शोले और कभी बाहुबली को ये इतिहास रचने का मौका देता है। ऐसे चमत्कार को नमस्कार किए बिना बाहुबली की कामयाबी का सच अधूरा रह जाएगा।


कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...