प्रेम की गंगा बहाने वाला हिंदी सिनेेमा अंग्रेजियत के तरीकों से अब तक तीन जादुई शब्दों को आई लव यू के तौर पर प्रचारित और प्रसारित करता आया है। शुक्रवार, 26 मई को सिनेमा के परदे पर तीन शब्दों के जादू का नया इतिहास गढ़ा गया और ये शब्द थे- सचिन... सचिन.. सचिन....
तीन शब्दों की ये गूंज कभी क्रिकेट के स्टेडियम को सचिनमय बनाती रही। पहली बार इन तीन शब्दों ने इस गूंज को सिनेमाई परदे के साथ सीधे तौर पर जोड़ा। क्रिकेट की दुनिया का मनोरंजन की दुनिया के साथ रिश्ता भले ही कितना पुराना हो, लेकिन 26 मई को तीन शब्दों की गूंज ने इस रिश्ते को अमरत्व दे दिया।
सिनेमा दर्शकों के जज्बातों के साथ जुड़ने की परंपरा रही है, जिसे तमाम किस्म की कहानियों के साथ एक सदी से भी ज्यादा वक्त के साथ निभाया जा रहा है। 26 मई को सिनेमा के परदे का सफर एक अलग मोड़ पर जा पंहुचा, जहां परदे पर कहानी भी थी, तमाम रंगों के जज्बात भी थे, फिर भी वो परंपरागत सिनेमा नहीं था। यहां कोई मसाला नहीं था। कोई नाच-गाना नहीं था। सिनेमा के दिग्गजों के लिए भी ये अनुभव अलग किस्म का था। यही वजह थी कि समीक्षाओं के नाम पर फिल्मों का पोस्टमार्टम करने वाले पत्रकारों की बिरादरी भी भौंचक्की थी। झटपट अंदाज में फिल्मों और सितारों को नापने-तोलने और हिट-फ्लाप का फरमान सुनाने वालों को यहां खासी दिक्कत थी कि समीक्षा के नाम पर खूबियों-खामियों और रेटिंग वाले फारमेट में सचिन की फिल्म को कैसे फिट किया जाए।
ये दिक्कत बेवजह नहीं थी। सचिन की फिल्म को डाक्यू ड्रामा का नाम दिया गया। डाक्यू ड्रामा देखना न तो हमारे दर्शकों की आदत में शुमार रहा है और न ही पत्रकार बिरादरी में इसे लेकर ज्यादा कोई तजुर्बा है। अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा की समझ रखने वाले गिने-चुने पत्रकारों को डाक्यु ड्रामा कहे जाने वाले इस माध्यम को समझने का तजुर्बा हो। लिहाजा समीक्षक बिरादरी के दिग्गजों को समझने और समझाने में दिक्कत हुई कि उन्होंने जो परदे पर देखा, उसे कैसे बयां किया जाए। ये कश्माकश इस बात का सबसे बड़ा सबब थी कि सचिन की फिल्म के नाम पर परदे ने जो दिखाया, वो एक नए युग की शुरुआत है और शुरुआत उस नाम से, जिसके लिए माना जाता है कि युग-युग में सचिन एक बार ही पैदा होता है।
फिल्म देखने वाली पब्लिक के लिए भी परदे का ये नजारा नया जरुर था, लेकिन उनको भौंचक्का इसलिए नहीं कर रहा था कि हमारी पब्लिक सालों से अपने फेवरेट सितारों को परदे पर देखकर खुश होने का हुनर जानती है। इस बार फर्क ये था कि परदे पर नजर आने वाला सितारा किसी लेखक की कल्पना का नतीजा नहीं था। इसके बावजूद परदा उन दर्शकों को अपने साथ बांध चुका था। कभी हंसी, कभी मुस्कान, कभी आंखों में नमी, कभी आंसू, कभी खुशी का ठहाका कभी तालियों की गूंज, तो कभी उदासी भरी खामोशी.. क्या नहीं हो रहा था परदे पर। दर्शक हमेशा से परदे पर ये ही सब तो देखते आ रहे हैं, मगर ये फर्क कम बड़ा नहीं था।
आज परदा किसी काल्पनिक नायक के दायरे से बाहर निकलकर उस नायक की नायिकी को सलाम कर रहा था, जिसके लिए पब्लिक की दीवानगी का हर शब्द छोटा हो चुका है। एक और दिलचस्यप बात ये रही कि यहां सचिन और क्रिकेट के फैन होने या न होने का फर्क मिट गया। सचिन के फैंस के लिए उनके भगवान की गाथा परदे पर थी, तो क्रिकेट और सचिन के फैन न होने वाले भी छाती चौड़ी कर रहे थे कि ये वो बंदा है, जो हमारा है, सिर्फ हमारा सचिन।
फिल्में हर शुक्रवार को रिलीज होती हैं। नई फिल्मों के साथ हर शुक्रवार को नए नायक या तो गढ़े जाते हैं या मिट जाते हैं। कुछ लड़खड़ाते हैं, तो कुछ बिखर जाते हैं और कुछ नए चांद की मानिंद सिनेमा के आकाश को चमकीला करते हैं। धड़कनों को तेज करता सदी पुराने इस खेल का नायक रहा शुक्रवार 26 मई को दंडवत की मुद्रा में था। इस दिन सिनेमा का परदा उस दिन उस चमत्कार के अवतार से चकाचौंध था, जिसके आगे कामयाबी और नायिकी के शब्दों ने भी पनाह मांग ली हो। कोई यूं ही तो भगवान का दर्जा नहीं पा लेता। सचिन खुद को भगवान नहींं मानते, तो ताज्जुब नहीं। भगवान ने भी आखिर कब खुद को भगवान माना है। जो भगवान में विश्वास करता है, वो क्रिकेट के इस भगवान को नमन करने में संकोच नहीं करेगा।
सिनेमा का सफर आगे बढ़ेगा। फिर से किस्म किस्म की फिल्में आएंगी। नायकों का मेला लगेगा। सब कुछ होगा, जो 26 मई से पहले होता रहा है। 26 मई को सिनेमा का इतिहास करवट ले चुका है। अब जब भी परदे के नायकों की गाथा का जिक्र होगा, तो इसमें दो बातों को कोई अनदेखा नहीं कर पाएगा। पहली बात- क्रिकेट का भगवान हमारे सिनेमा के परदे को धन्य कर चुका है और दूसरी बात- इस भगवान की भक्ति तीन शब्दों में ही तो सिमट जाती है- वही तीन शब्दों का जादू- सचिन सचिन सचिन....!






































