Monday, February 26, 2018

चार बरस और चालीस बरस...



चार बरस की कोई बच्ची जब किसी फिल्म के कैमरे के सामने आ खड़ी होती है, तो उसकी आंखों में न तो स्टार बनने का कोई सपना होता है और न ही उसे अभिनय से कोई वास्ता होता है। उसके लिए तो कैमरा एक खेल भर होता है। 

चार बरस की उमर से शुरु हुआ श्रीदेवी का कैरिअर चालीस बरस से भी ज्यादा लंबे सफर में न जाने कितने पड़ाव पार करता चला गया। ये सफर एक ऐसे मोड़ पर आकर ठहरा, जब पिछले साल वे एक बेटी की मॉम बनकर परदे पर अवतरित हुईं और इस साल उनकी असली बेटी (जाह्नवी) फिल्मी परदे पर कदम रखने जा रही है।

श्रीदेवी के लंबे सफर में क्या पाया क्या खोया का आकलन जितना आसान लगता है, ये उतना ही मुश्किल भी है। आसान इसलिए हो जाता है कि उनके इस सफर में कामयाब फिल्मों की फेहरिस्त है। नाकाम फिल्मों की हकीकत है। बेशुमार कामयाबी वाला स्टारडम है, जिसने श्रीदेवी को सुपर सितारे का दर्जा दिया और फिल्मी कैरिअर से परे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का फर्ज निभाने वाली एक आदर्शमयी नारी। श्रीदेवी की जिंदगी की तस्वीर का दूसरा पहलू समझना उतना ही मुश्किल लगता है, जिसमें कैमरे के सामने खड़ा बेबस बचपन, आर्थिक तंगहाली के शिकार परिवार की जिम्मेदारियां, घरेलू कलह, मोहब्बत का अधूरापन और अपनेआप में सिमटा व्यक्तित्व, जिसके रहस्यों के ताने बाने को छेड़ने की इजाजत श्रीदेवी ने किसी को नहीं दी, ताकि उनकी घुटन की भनक किसी और को न लगे।

सफलता का क्रूरतम चेहरा यही होता है, जिसे कभी खामोशी के साथ ढांप दिया जाए, तो कभी एक मुस्कान के लबादे के पीछे धकेल दिया जाए। श्रीदेवी ने अगर इस कला में महारथ हासिल न की होती, तो उनकी कामयाबी के स्टारडम के साथ उनकी निजता में कैद रही एक महिला की बेबसी की आहट किसी ने तो सुनी होती। कोई तो एक स्टार की सूनी आंखों में झांककर उस वेदना को समझ पाता, जो उसे खुद में अकेला ही रहने की सजा भोगने को मजबूत करती है।

नहीं, ये नहीं कहा जा सकता कि श्रीदेवी की जिंदगी में सिर्फ उदासी थी। ये नहीं कहा जा सकता कि खुशियां उनसे रुठी रहीं। ये भी नहीं कहा जा सकता कि उनके पास हंसने-हंसाने के मौकों का अकाल-सा था। ये सब कुछ होने के बाद भी जब इंसान के चेहरे और आंखों में उदासी  और तन्हाई अपना घर बसा ले, तो स्टारडम की कामयाबी के किस्सों को सहजता नहीं मिलती। यही श्रीदेवी की जिंदगी और स्टारडम के बीच का वो सच था, जो एक कामयाब अदाकारा के आकलन का सबसे पीड़ादायक एहसास बन जाता है और स्टारडम की रोशन दुनिया के स्याहपन को जैसे बेपर्दा करता चला जाता है।

दर्द और कामयाबी के इन दो राहों का सफर तय करने वाले कलाकारों की लिस्ट खासी लंबी है। मधुबाला से लेकर मीना कुमारी, गुरुदत्त इस लिस्ट के चंद नाम हैं। मशहूर ये सितारे भी थे। परदे की कामयाबी ने इनको भी चमकता सितारा बनाया था। रिश्तों के दर्द और खामोशी ने उनकी असली जिंदगी को भी ग्रहण लगाया था। इन सितारों की श्रीदेवी के साथ तुलना अगर न हो, तो सिर्फ इसलिए कि एक बड़े फिल्मकार की पत्नी और दो बच्चियों की मां के तौर पर एक अदाकारा ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया और इसके लिए खुद के एहसास को  तिलांजलि देने में कोई संकोच नहीं किया।

श्रीदेवी की फिल्में उनके स्टारडम की इस कहानी को जहां छोड़ देती हैं, उसके आगे जाने की इजाजत अगर किसी को मिलती, तो कोई समझ पाता कि श्रीदेवी को अपने कैरिअर के साथ कभी प्यार क्यों नहीं हुआ? इस सवाल के जवाब का हर रास्ता एक सुपर स्टार की चमक और एक खामोश जिंदगी के अंतर को भेदता है। इस सवाल को तीन रुप में देखा जा सकता है। क्या किसी ने सोचा होगा कि श्रीदेवी फिल्मों में क्या करने आई थीं? क्या उनका मकसद अभिनय के आसमान में झंडे गाढ़ना था? क्या किसी ने सोचा होगा कि एक ही साल में सदमा और हिम्मतवाला (१९८३) के बाद श्रीदेवी ने मसाला फिल्मों का रास्ता क्यों चुना? क्या किसी ने सोचा होगा कि श्रीदेवी ने स्टारडम की शर्तों को न मानकर स्टारडम की दुनिया को अपनी शर्तों के साथ क्यों बांधा? इन तीनों सवालों के जवाब पाने की एक कोशिश, मुमकिन है कि श्रीदेवी की उस किलेबंदी में एक सुराख कर जाए, जहां एक महिला तन्हाईयों के साथ रहने की आदी हो चुकी थी।
पहला सवाल- श्रीदेवी फिल्मों में क्या करने आई थीं?
जवाब बहुत सीधा है कि वे अपने लिए इस दुनिया में कुछ हासिल करने नहीं आई थीं। यहां आने का या कहा जाए कि यहां धकेलने का एक मात्र मकसद एक परिवार की आर्थिक जरुरतों को पूरा करना मात्र था। इसके लिए लगातार फिल्मों में काम करने की अनिवार्यता को पूरा करने में श्रीदेवी ने कोताही नहीं बरती।
दूसरा सवाल- क्या श्रीदेवी का मकसद अभिनय के आसमान में झंडे गाढ़ना था? इसका जवाब भी कमोबश ना में ही मिलता है। चार बरस की उमर से शुरु हए उनका कैरिअर जब उस मकाम पर पंहुचा, जहां वे अभिनय के बारे में गंभीरता से सोचतीं, तो कमर्शियल सिनेमा की मायावी दुनिया ने फिर उनको पारिवारिक जिम्मेदारी की याद दिला दी। श्रीदेवी के लिए फिल्मों में काम करना शौक भी नहीं था। जब शौक ही न हो, तो क्या कोई मंजिल तय कर सकता है या फिर सफर की बागडोर को वक्त के हाथों में सौपकर आगे बढ़ जाता है। श्रीदेवी ने यही किया। अगर उनका मकसद अभिनय के आसमान में झंडे गाढ़ना होता, तो वे १९८३ में आगे बढ़ने के लिए सदमा के बाद उस सिनेमा के रास्तों को चुनतीं, लेकिन हिम्मतवाला जैसी मसाला फिल्मों का रास्ता उनके लिए बड़ी जरुरत था, क्योंकि मसाला फिल्मो की दुनिया में एक्टिंग नहीं, सौंदर्य कला की बोली लगती है और इसके लिए तिजोरियों के मुह खोल दिए जाते हैं। हिम्मतवाला के इसी रास्ते ने श्रीदेवी की कमर्शियल सफलता के लिए रास्ते और मंजिल तय कर दीं। सदमा इस रास्ते में एक इत्तेफाक था, जिसको दोहराने की कोई जरुरत या मौका श्रीदेवी को फिर कभी नहीं मिला। इसलिए श्रीदेवी की कमर्शियल फिल्मों की कामयाबी का ढेर एक तरफ और सदमा का सच दूसरी तरफ। ये अलहदा बात है कि सिनेमा के प्रेमियों ने स्टार श्रीदेवी के सदमे वाले इत्तेफाक को कभी यादों से ओझल नहीं होने दिया।
कैरिअर को लेकर श्रीदेवी की बेरुखी का एक और दिलचस्प पड़ाव देखने को मिलता है, जब ९० के दौर में उन्होंने लेडी अमिताभ की इमेज हासिल कर ली और वो वक्त आया, जब एंग्री यंगमैन की इमेज से बिखरे अमिताभ बच्चन की फिल्मों की नायिका बनने का मौका श्रीदेवी को मिला। इंकलाब इस जो़ड़ी की पहली फिल्म थी, जिसमें श्रीदेवी का रोल मामूली रहा, तो बच्चन के साथ अगली फिल्म आखिरी रास्ता में श्रीदेवी ने अपनी शर्तों को आगे किया और जब खुदा गवाह बनी, तो उनकी हर शर्त को माना गया। खुदा गवाह इसलिए श्रीदेवी के शिखर का सरमाया बनी, क्योंकि वे सुपर स्टार की फिल्म में सुपर स्टार की हैसियत से अपनी हर शर्त को मनवाने में कामयाब थीं।
श्रीदेवी ये भी जानती होंगी कि शिखर पर इंसान अकेला होता है और आगे का रास्ता छोटा होता चला जाता है। इसलिए खुदा गवाह की शर्तों की जीत ने भी श्रीदेवी को ज्यादा आगे नहीं बढ़ने दिया और ऐसा कतई नहीं लगता कि श्रीदेवी को इसका कोई अफसोस रहा होगा। खुदा गवाह के बाद १९९७ में जुदाई तक श्रीदेवी की फिल्मों की दुनिया इसी वजह से सिमटती चली गई।
इसी दौर में श्रीदेवी की जिंदगी में रिश्तों की दुनिया में दो बड़े बदलाव हुए। बहुत मुश्किल से मिठुन चक्रवर्ती से लगाव और अलगाव के झंझावट से बाहर आकर श्रीदेवी ने पहले से शादीशुदा बोनी कपूर का हाथ थामने में गुरेज नहीं किया, क्योंकि मिठुन के बाद बोनी कपूर ही उनकी भावनात्मक दुनिया के किले में दाखिल होने की हिम्मत कर पाए थे। तमाम हंगामों के बीच बोनी के साथ घर बसाने का उनका फैसला सही साबित हुआ और यहां उनकी जिंदगी उस मोड़ पर पंहुच गई, जहां पारिवारिक जिंदगी के लिए फिल्मों का मोह छोड़ना उनके लिए मुश्किल नहीं था। २०११ में इंग्लिश विंग्लिश और पिछले साल की मॉम एक बोनस से ज्यादा कुछ नहीं था, जहां श्रीदेवी के पास न तो स्टारडम की कोई ललक थी और न ही कुछ खोने का खौफ था। अब श्रीदेवी की जिंदगी अपनी दोनों बेटियों के नाम हो चुकी थी।

श्रीदेवी को अब सदमा के लिए याद करें या उनकी कमर्शियल कामयाबी के स्टारडम के लिए याद करें। इन दो छोर के बीच एक ऐसी शख्सियत है, जिसके पास स्टारडम की चमक और खामोशी भरी तन्हाई का सच ठहर चुका है। चार बरस की बच्ची और चालीस बरस तक सितारों की सफलता के बीच का फासला ही एक अदाकारा और एक स्टार की दुनिया के बीच का अधूरा सच बनकर रह गया, वो भी हमेशा के लिए।





Thursday, January 25, 2018

पद्मावती के गुनाहगार...




अपने धर्म के नाम पर जौहर करके इतिहास में अमरत्व पाने वाली महारानी पद्मावती के नाम पर चल रहे प्रहसन का अंतिम परदा उठ रहा है।
आम तौर पर जब कोई प्रहसन अपने अंतिम पड़ाव पर पंहुचता है, तो उसकी टीम के सदस्य एक साथ मंच पर आकर उन दर्शकों का शुक्रिया अदा करते हैं, जो तालियों की गूंज से प्रहसन की तारीफ में अपनी कुर्सियां छोड़ खड़े हो जाते हैं। पद्मावती के नाम पर हुए इस प्रहसन में तो ये मुमकिन ही नहीं है कि इसके सारे किरदार कभी एक मंच पर आते और अपने अपने गुनाहों के लिए उन दर्शकों से माफी की गुहार लगाते, जिनके जज्बातों को जमकर छला गया।
पद्मावत का असली गुनाहगार किसे माना जाए? संजय लीला भंसाली, जो इतिहास के पन्नों में सिमटी एक गाथा को परदे पर लाने के नाम पर ये मजमा इकट्ठा कर बैठे, जहां सिनेमा से ज्यादा एक समुदाय के जज्बातों के साथ जी भरकर खेलने की कवायद की गई। क्या असली गुनाहगार सेना के नाम से जुड़े उस संगठन के आकाओं को माना जाए, जो अपनी ही महारानी के सम्मान के नाम पर देश के सम्मान को पैरों तले कुचलने में तनिक भी संकोच नहीं कर पाए। क्या पद्मावती के असली गुनाहगारों का असली चेहरा देश की सियासत का वो खौफनाक चेहरा माना जाए, जिसके लिए एक सिनेमा और एक महारानी के सम्मान से ज्यादा वोटों की लालसा नजर आती है या असली गुनाहगार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला वो माध्यम है, जिसके लिए हिंसा और क्रूरता का हर मंजर टीआरपी के खेल से ज्यादा कुछ नहीं होता।
सवाल बहुत सीधा है कि कौन है पद्मावती का असली गुनाहगार? गुनाहगारों की फेहरिस्त में आए ये सभी तंत्र अपने अपने तर्कों के साथ खुद को बेगुनाह ठहराने की कोई कोशिश भी नहीं करेंगे। गुनाहों की इस दलदल में इन सबने अपना अपना खेल खेला है और खेल इतना खौफनाक, जहां भीड़तंत्र उस लोकतंत्र के चेहरे को रौंदे चला गया। इस भीड़तंत्र को कभी एक फिल्मकार १७० करोड़ के तमाशे के नाम पर हांकने की कोशिश करता है, तो कभी इस तमाशे में साझेदार एक कारोबारी घराना दौलत कमाने की लालसा में इतिहास के नाम पर देश की मान मर्यादा का हनन करने में गुरेज नहीं करता। इस भीड़तंत्र को समाज की अस्मिता के नाम से डराने धमकाने वाले ये निजी संगठन, जिनकी ठेकेदारी सियासत के गलियारों से होकर गुजरती है और सियासत की सत्ता की कमान थामने वालों की वो मानसिकता, जो वोट के लालच के आगे सब कुछ स्वाहा करने पर आमादा हो जाती है।
कितनी विचित्र बात है कि देश की सबसे बड़ी अदालत को फरमान जारी करना पड़ता है कि सरकारी मशीनरी एक फिल्म को रिलीज करने का इंतजाम करे और सरकारी मशीनरी का हर पुर्जा अदालती आदेश के परखच्चे उड़ाने के लिए रास्ते निकालता है। जिस किसी ने भी सोचा होगा कि पद्मावती के नाम पर हो रहा तमाशा एक अदालती आदेश का मोहताज बनेगा, उसकी समझ तो किसी चुटकले से ज्यादा अहमियत नहीं रह जाती। अगर कोई मान बैठा था कि सेंसर बोर्ड के एक परचे (सार्टिफिकेट) मात्र से एक फिल्म के सिनेमाघरों तक पंहुचने का रास्ता साफ हो जाएगा, तो ये एक और चुटकला बनकर रह जाता है।
दरअसल पद्मावती के नाम पर हुए इस तमाशे के दो छोर बहुत साफ तौर पर एक घराने के मुखिया से शुरु होकर देश के मुखिया की सियासत पर जाकर जुड़ जाते हैं। दुनिया के सबसे अमीर घरानों में नाम दर्ज कराने वाली शख्सियत के लिए १७० करोड़ की रकम देश के सम्मान से ज्यादा अहम नही होती, अगर इसके तार सियासी खेल के सबसे दूसरे सबसे बड़े खिलाड़ी के दरबार तक नही पंहुचते। क्या किसी ने गौर किया कि पद्मावती के नाम पर हुए तमाशे में ये दोनों छोर खामोशी के साथ अपना अपना दांव चलते रहे। एक मामूली निजी संगठन को आगे करके इस शतरंज की बिसात पर हर वो चाल खेली गई, जो अपने अपने फायदे के लिए चली जाती है। देश की सर्वोच्च सत्ता के मुखिया का मुंह खुलता, तो ये खेल चौपट हो जाता। धर्म और समाज के नाम पर रातोंरात चमकने वाले ये संगठन यूं ही आगे नहीं किए जाते। इनकी बागडोर संभालने वाले बखूबी जानते हैं कि कब किसे क्या चाल चलनी है और कैसे शह और मात के नाम पर उस आम आदमी को ठगा जाता है, जो इन सत्ताधीशों के खेल को कभी समझने की कोशिश नहीं करता।
वरना कैसे मुमकिन होता है कि एक निजी सेना के लोग संसद और सर्वोच्च अदालत को आग लगाने की धमकी दें और सत्ताधारी दलों के नेताओं की फौज इसे मामूली बात कहकर खारिज कर दें और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिंसा का वो तांडव करने की छूट दे दे, जहां विश्व का सबसे पुराना और ताकतवर लोकतंत्र शर्मसार होता रहे और तमाशा होता रहे।
गलती किसी एक की नहीं मानी जा सकती। किसी एक को गुनाहगार ठहराने से दूसरे के गुनाहों को कमत्तर नहीं किया जा सकता। पद्मावती के नाम पर इस घिनौने खेल में हर मोहरा उतना ही बड़ा गुनाहगार है, जितना गुनाह देश के सियासती मुखिया की खामोशी है। जितनी गुनाहगार एक फिल्मकार की वो हसरत है, जो इतिहास के साथ जुड़े सामाजिक सरोकारों को सिनेमैटिक लिबर्टी के नाम पर ठगने और बिगाड़ने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान ले। खबरों की दुनिया के सूरमाओं की गुनाहगारी को कैसे कम करके आंका जा सकता है, जो आगे के हवाले हो चुके सिनेमाघरों की खाक से लेकर बच्चों की स्कूली बसों को निशाना बनाने की हरकतों को सिर्फ अपनी टीआरपी के खेल के आगे कुछ नहीं समझ पाए।
जिस इतिहास और धार्मिक जज्बातों के नाम पर ये तमाशा हुआ, उसी इतिहास में ये भी दर्ज है कि जब जब भीड़तंत्र को लोकतंत्र के नाम पर आगे लाया गया, उसने इतिहास को शर्मसार किया और इंसानियत के मुंह पर अधर्म की कालिख पोती। ये पहले भी होता रहा है और आगे नहीं होगा, ऐसा ख्याल भी मत लाइए। सत्ता के गलियारों के मठाधीश इसी खेल में तो वोटों की सियासत का इंतजाम करते हैं। चुनाव जीतने की ललक और सत्ता पर काबिज रहने की सनक के आगे पद्मावती के सम्मान के नाम पर अपमान की आग में धकेलने का काम ही सियासतदारों का असली खेल बन जाता है और ये बना रहेगा।
महारानी पद्मावती ने अपने धर्म के नाम पर खुद को आग के हवाले किया था और यहां उनके सम्मान के नाम पर सिनेमाघरों को आग के हवाले किया जा रहा है। कौन किसको रोके और सबसे बड़ा सवाल कि क्यों रोके। अगर रोकना ही होता, तो सियासत के गलियारों का असली खेल कैसे आगे बढ़ता।

माफ करना महारानी। आपका गुनाहगार न तो एक फिल्मकार है, न ही कोई कारोबारी घराना। न मीडिया और न ही ये निजी संगठन। आपके सम्मान के साथ छलावा करने का गुनाह उस भीड़तंत्र और लोकतंत्र का वो घालमेल है, जिसने सियासत के मैदान में देश के सम्मान को हर बार छला है। सत्ता और समाज का ये बदनुमा चेहरा एक महारानी के त्याग और कुर्बानी को समझने की ताकत नहीं रखता। ये मुखौटा किसी फिल्म के नाम पर सिनेमाघरों को आग के हवाले कर सकता है। बच्चों की स्कूली बसों पर पत्थर बरसाने में शर्म महसूस नहीं करता।
लोकतंत्र के नाम पर भी़ड़तंत्र का ये स्वांग जिस आग में सिनेमाघरों के परदों को खाक में मिलाने को अपनी जीत मानता है, उस आग में ही महारानी पद्मावती का सम्मान भी स्वाहा हो गया और  इस तमाशे को बेबसी से देखने वाला हर शख्स अपनी हार महसूस करेगा और मन ही मन इतना ही कह पाएगा- माफ करना महारानी, हम सब आपके गुनाहगार हैं....













  

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...