Friday, January 12, 2024

राम तेरे कितने नाम

इन दिनों देश राममय हो चुका है। 22 जनवरी को अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन होने तक इस राममय माहौल में कितने और रंग देखने को मिलेंगे, ये देखने वाली बात होगी। सोशल मीडिया पर किसी ने सही कहा कि ऐसा लगता है कि अब से पहले कोई इस देश में राम को जानता ही नहीं था। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि रामनवमी का त्योहार 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद ही अस्तित्व में आया होगा। खैर, इस वक्त मुद्दा ये नहीं है। 

मुद्दा ये है कि जब देश भर में राम नाम की लहर चल रही हो, तो इससे हिंदी फिल्मों की दुनिया अछूती रहे, ये तो मुमकिन नहीं है। मुंबई की मनोरंजन की दुनिया भी तो आखिरकार इसी देश का हिस्सा है, जहां 2014 के बाद सबका साथ सबका विकास के नाम पर सत्ता का साथ या सत्ता का विरोध का कटु सत्य स्थापित होता चला गया और हिंदी फिल्मों की दुनिया में भी ये बंटवारा जमकर हुआ, जिसके बारे में कोई अनजान नहीं है। खैर, इस वक्त मुद्दा ये भी नहीं है। 

मुद्दा ये है कि देश भर में कुल मिलाकर बहस इस एक वाक्यांश में सिमट गई है कि किसे अयोध्या आने का न्यौता मिला और किसे नहीं मिला। जिसे मिला, वो सोशल मीडिया पर इतरा रहा है कि हमको रामजी ने बुलाया है और जिसे नहीं मिला, वो बतिया रहा है कि रामजी कण-कण में समाए हुए हैं। एक इंवाइट से क्या बनेगा और बिगड़ेगा जी। खैर, इस वक्त ये भी मुद्दा नहीं है। 

मुद्दा ये है कि रामजी के नाम की इस बारात में मनोरंजन की दुनिया से कौन कौन बराती बनने जा रहा है। किसे बुलावा आया है, कौन टुकुर टुकुर बुलावे के लिए दर निहार रहा है और कौन है, जिसको अच्छी तरह मालूम है कि उनको नहीं मिलने वाला। 

पहिला लिस्ट उनका, जिनको बराती बनाकर न्यौता गया है। इस लिस्ट में सिनेमा के चमत्कार रजनीकांत का नाम पहले पायदान पर है। वे गाहे-बगाहे मोदी सेना के सिपहसालार बन चुके हैं। अमिताभ बच्चन का नाम किसी को नहीं चौंकाता। मोदी के मुख्यमंत्री काल में गुजरात या कहें कि मोदी की सेवा में समर्पित हो चुके बच्चन दी ग्रेट ने उनको मौन समर्थन देने का कोई मौका नहीं छोड़ा। अभी सस्पेंस इस बात का है कि न्यौता सिर्फ बड़े बच्चन को मिला है या इसमें समूचे बच्चन परिवार को जोड़ा गया है। मसलन, समाजवादी पार्टी की नेत्री जया बच्चन को बुलाया है क्या, बड़े के साथ बाई वन गेट वन में छोटे बच्चन (अभिषेक), उनकी पत्नी ऐश्वर्या, उनकी बेटी अराध्या, उनके चाचा अजिताभ, अजिताभ की पत्नी रमोला बच्चन, रमोला-अजिताभ की बेटी नैना बच्चन, नैना बच्चन के पति कुणाल कपूर (रंग दे बसंती फेम) और नैना-कुणाल का बेटा। फिलहाल मान लो कि सिर्फ बड़े बच्चन को ही सत्ता की वफादारी का इनाम मिला है। 

लिस्ट में अगला नाम वही खिलाड़ी हैं, जो आम काटकर खाने या चूसकर खाने को पत्रकारिता का सवाल समझकर पत्रकार बने थे। उनको 2014 के बाद सत्ता की चाकरी करने और मोदी की जयजयकार करने वाली फिल्मों का पैकेज बनाने की बहादुरी के लिए ये इनाम मिलना तय था। इसी लाइन में लगी मोदी को इस युग का अवतार बताने वाली वन एन ओनली कंगना का नाम भी आना था। पत्नी किरण खेर के बाद राज्यसभा की सीट की बाट जोह रहे अनुपम खेर को भी अयोध्या पंहुचकर जयश्री राम करना ही था। गदर मचाने वाले सनी देओल को भी बुलावा आ गया। मधुर भंडारकर अब फिर से कह सकते हैं कि उनकी पीएमओ तक पंहुच है, क्योंकि उनको अयोध्या का टिकट मिल गया है। सावरकर पर फिल्म बना रहे नएनवेले दुल्हे रणदीप हुड्डा के नाम ने नहीं चौंकाया, लेकिन रणबीर कपूर (साथ में आलिया भट्ट) और आयुष्मान खुराना और जैकी श्राफ को खुद भी चौंकना पड़ा होगा कि अरे हम कैसे. इसी तरह माधुरी का नाम भी नहीं चौंकाता, क्योंकि वे सत्ता को सुखी रखने को जरुरी मानती हैं। मामला राम-सीता का है, चुनांचे 80 के दशक में रामानंद सागर की रामायण में राम-सीता के किरदार में आम जनता का आदर-सम्मान पा चुके अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया को बुलाना बनता था। अगर उनकी रामायण के रावण अरविंद त्रिवेदी भी राम नाम के लिए अयोध्या जाने वालों की लिस्ट में जरुर होते। साउथ से रजनीकांत के अलावा  बाहुबली फेम प्रभास, केजीएफ वाले यश और रजनीकांत के एक्स जवांई राजा धनुष के अलावा चिरंजीवी, कांटारा वाले ऋषभ शेट्टी को भी अयोध्या बुलाया गया है।सरसरी निगाह में फिल्मों की दुनिया से बनी मेहमानों की लिस्ट में तकरीबन बीस नाम शुमार हैं। इस लिस्ट में नामांकित सितारों में से ज्यादातर को उनकी वफादारी का इनाम मिल गया, लेकिन बात यहीं पूरी नहीं होती। 

फिल्मों की दुनिया में एक लिस्ट उन लोगों की भी है, जिनकी भक्तिवाला इतिहास देखकर लग रहा था कि उनको जयश्री राम करने का मौका मिलेगा ही मिलेगा, लेकिन पता नहीं उनकी भक्ति में कहां कैसी कमी रह गई होगी। इस लिस्ट में  पहला नाम अजय देवगन का रहा, जिन्होंने धर्मपत्नी काजोल के साथ मोदी भक्तों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराया था। परेश रावल, मनोज जोशी, कपिल शर्मा, कैलाश खेर, अशोक पंडित, पहलाज निहलानी, सेंसर बोर्ड चीफ प्रसून जोशी, फिल्मी परदे पर नरेंद्र मोदी बनकर धन्य हुए विवेक ओबेराय और उनके पिताश्री सुरेश ओबेराय, नाना पाटेकर, महेश मांजरेकर, एकता कपूर (जिनकी खास सहेली का सेत्ता में दबदबा है), अनु कपूर को सब्र और इंतजार करने के अलावा रास्ता नहीं है। रामायण के राम-सीता को बुला लिया, लेकिन मोदीभक्ति में सराबोर बीआर चोपड़ा की महाभारत के द्रोणाचार्य मुकेश खन्ना, द्रौपदी रुपा गांगुली और युधिष्ठर गजेंद्र सिंह चौहान (जिनको पुणे इंस्टिट्यूट का चेयरमैन बनाने पर बवाल कटा था) को इग्नोर मार दिया गया। हमेशा पाल्टिकल करैक्ट रहने वाले रितेश देशमुख को न्यौता मिलता, तो उनका चार्टेड जहाज अयोध्या के नए एयरपोर्ट पर जरुर मिलता।
अजय देवगन, प्रियंका चोपड़ा, मनोज कुमार, करण जौहर, एकता कपूर, परेश रावल, कपिल शर्मा, विवेक ओबेराय, कैलाश खेर, प्रसून जोशी, मनोज जोशी, मिठुन चक्रवर्ती, मुकेश खन्ना, असित मोदी, जेडी मजिठिया, गजेंद्र चौहान, अशोक पंडित और पायल रोहातगी

करण जौहर से कहा जाता, तो वो अपने साथ जहान्वी कपूर से लेकर अनन्या पांडे, क्यारा आडवाणी, यामी गौतम, तारा सुतारिया, वाणी कपूर और कृति सेनन जैसी सुंदरियों का लश्कर लेकर पधारते। इस लिस्ट में दो गुजराती नामों का जिक्र जरुरी है, जो केम छो मोदी के नाम रटकर नहीं थके। एक थे खिचड़ी वाले जेडी मजीठिया और दूसरे उल्टा चश्मा वाले असित मोदी। दोनों का ही पत्ता साफ हो गया। मथुरा की सांसद (हेमा मालिनी) हो सकता है कि पाल्टिकल कोटे से कुछ जुगाड़ कर लें, लेकिन गुजरात जाकर मोदी के साथ पतंगबाजी करने वाले सलमान खान को भी नहीं बुलाया गया। भाजपा के लिए अपनी इज्जत गंवाने वाले मिठुन चक्रवर्ती को भी टाटा कर दिया गया। मिठुन की तरह चुनावी मौसम में भाजपा का छाता ओड़ने वाले साउथ के सुदीप को भी नो बोल दिया गया। एक और बात कहें,  गले में भाजपा का पट्टा पहनने वाले भारत कुमार, उर्फ मनोज कुमार को फिल्म इंडस्ट्री का आडवाणी समझकर छोड़ दिया गया होगा। 

अब राम राम (जाने) से पहले एक और लिस्ट ऐसी, जिसमें ऐसे भयंकर नाम थे कि इनको तो अयोध्या पंहुचने पर बैरंग लौटा दिया जाता। इस लिस्ट पर भी गौर करें। कभी भाजपा के केंद्र रहे शत्रुघ्न सिन्हा के अलावा,  स्वरा भास्कर, अनुभव सिन्हा, सुशांत सिंह, मोहम्मद जीशान अय्युब, अनुराग कश्यप, अश्विनी चौधरी, शबाना आजमी और जावेद अख्तर के साथ साउथ से कमल हासन, प्रकाश राज को न बुलाना था, न बुलाया जाएगा और आइंदा भी नही बुलाया जाएगा। 

भारत की फिल्मी नगरी में करोड़ों वासी हैं। इनमें से सबको बुलाना और न बुलाना दोनों ही मुमकिन नहीं था। मुमकिन ये था कि दिल्ली की सत्ता अपने वफादारों को राममय करती, सो ये किया गया। जिनको ये सम्मान नहीं मिला, उनके कारणों के लिए कोई जांच आयोग तो नहीं बैठेगा और आखिरी वाली लिस्ट में शामिल हस्तियों के लिए न बुलाया जाना ही सम्मान से कम नहीं होगा। 

इससे आगे कुछ लिखना बाकी रह गया क्या ? मंदिर को जाने वालों से प्रार्थना कि देश की भलाई के लिए प्रार्थना करें और 22 जनवरी को म्हारी तरफ से सभी को-

जय राम जी की 

जय सीता मैया 

जय हनुमान जी 

कमेंट बाक्स में तनिक बताइए कि राम लला के दर्शन के लिए क्या कीजिएगा, कब जाइएगा ??

ब्लाग के ये लिंक भी देखिए- 

ये कैसी नानागिरी ?

2023-2024 : घूमता आईना



मामला रश्मिका का नहीं, लड़कियों की इज्जत का है




 


Saturday, January 6, 2024

ओमपुरी- अर्धसत्य की कालिमा, पूर्ण सत्य की लालिमा




वे हमारे बीच से जा चुके हैं। कोई कहता है कि कलाकार कभी नहीं मरता, तो कोई कहता है कि अपने काम के साथ जिंदा रहता है और कोई कहता है कि उनकी हमेशा याद आएगी। मौत का आखिरी सच हमेशा क्रूर बनकर ही सामने आता है। ओमपुरी के साथ अलग-सा कुछ नहीं हुआ। खबरों को माना जाए, 5 जनवरी के बाद वाली रात को उनको दिल का दौरा पड़ा। उस रात वे घर में अकेले थे, इसलिए साक्षी कोई नहीं। सुबह जब उनकी मृत देह पाई गई, तो यही मान लिया गया कि मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। वजह जो भी हो, अपनी जिंदगी के आखिरी पलों में ओमपुरी अकेले ही रह गए। मौत से जूझे या नहीं, ये सच उनके साथ ही हमेशा के लिए चला गया। दिल के दौरे के अलावा कुछ और होता, तो पोस्टमार्टम में सामने आ चुका होता। मान लेते हैं कि दिल का दौरा पड़ने से ही ओमपुरी का देहांत हुआ।


66 साल के जिस शख्स ने जिंदगी के 40 साल फिल्मों में गुजार दिए, उसका यूं अाखिरी पलों में अकेले रह जाना कोई मामूली बात नहीं रह जाती। इस चमक-दमक की दुनिया में ओमपुरी को कामयाबी के नाम पर क्या नहीं मिला। बड़े बड़े पुरस्कार, सम्मान मिले। बड़ी फिल्मों में काम करने का मौका मिला। दुनिया के सिनेमा में कामयाबी पाने वाले चंद भारतीय कलाकारों में उनकी गिनती हुई। किसी भी न्यूकमर के लिए इतना सब किसी ख्वाब से कम नहीं होता, जिसके साथ नए कलाकार मुंबई संघर्ष करने आते हैं।
Ghashiram Kotwal

Aakrosh
Ardhsatya




ओमपुरी भी ऐसे ही ख्वाबों के साथ मुंबई आए थे, लेकिन अलग तरीके से। वे मुंबई से पहले दिल्ली के एनएसडी और पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट से कोर्स करके आए थे। दोनों जगह उनकी कलाकारी को भरपूर दाद मिली थी। ऐसे कोर्स नए कलाकारों का हौसला बढ़ाने में बेहद प्रभावशाली होते हैं। खास तौर पर बिना किसी ट्रेनिंग के फिल्मी परिवारों के स्टार किड की लांचिंग को लेकर अक्सर ये कंपेयर दिलचस्प होता है। ओम पुरी का किसी भी तरह से किसी फिल्मी परिवार से कोई कनेक्शन नहीं था। वे दिल्ली और पुणे से वाह वाही लूटकर मुंबई आए, लेकिन सिनेमा की दुनिया के स्याहपन ने उनको हकीकत की जमीं पर ला पटका कि यहां डिग्री, कोर्स से ज्यादा किस्मत के सितारों की बुलंदी की जरुरत पहले होती है। ऐसा नहीं होता, तो पहले ब्रेक (घासीराम कोतवाल 1976) से पहली पहचान (आक्रोश, 1980) और पहली कामयाबी (अर्धसत्य, 1983, राष्ट्रीय पुरस्कार) के बीच सालों का इतना फासला नहीं होता। ये हुआ, क्योंकि ये बालीवुड की चमकीली दुनिया का स्याहपन है। ये हुआ, क्योंकि ये बालीवुड की निर्ममता का कड़वा सच है। फिल्मी परिवारों के बच्चों को छोड़ दिया जाए, तो बड़े बड़े सूरमाओं को संघर्ष की इन गलियों में रहना पड़ा। धर्मेंद्र से लेकर राजेश खन्ना और मनोज वाजपेयी से लेकर नवाजुद्दीन तक के संघर्ष की दास्तानों वाली ये गिनती लंबी है।

धर्मेंद्र और राजेश खन्ना तो हीरो बनने ही आए थे। यही उनका ख्वाब था और यही उनके संघर्ष की मंजिल। ओमपुरी के नसीब में तो ये खवाब भी नहीं था। एनएसडी और पुणेे इंस्टिट्यूट के इस धुरंधर की तमन्ना और हसरत महज इतनी थी कि करने के लिए रोल मिले और एवज में इतने पैसे कि पेट भर जाए। कला की फिल्मों की दुनिया ने ओम पुरी को इतना भी नहीं दिया। रोल मिले, शोहरत मिली, लेकिन पैसों के लिए सालों तक उनको दोस्तों पर निर्भर रहना पड़ा। भूखे पेट एक्टिंग ही नहीं होती, परफारमेंस क्या होगी, इस बुनियादी सोच को झूठलाती कला फिल्मों की दुनिया को आखिर रोशन भी ओमपुरी जैसों ने ही रखा, जिनको सालों तक भूखा मारने में इन फिल्मों के सूरमाओं को तनिक संकोच नहीं हुआ होगा।

एेसे में पेट भरने की जरुरत ने ओमपुरी को उसी कमर्शियल दुनिया में भेजा, जहां रोल अच्छे मिलें या न मिलें, लेकिन पैसे जरुर मिल जाते हैं। ओमपुरी को अगर कमर्शियल फिल्मों की दुनिया ने मौके न दिए होते, तो न जाने कला फिल्मों की दुनिया उनका क्या हाल करती। सोचकर भी अजीब लगता है। कला फिल्मों की दुनिया ने उनको पहचान दी, पुरस्कार दिए, सम्मान दिलाया, लेकिन ओमपुरी को उनका अपना घर और कार कमर्शियल फिल्मों की उसी दुनिया से मिली, जिस पर अक्सर कलाकारों के टेलेंट के साथ इंसाफ न करने की तोहमत लगती है। इस मुद्दे पर बहस फिर कभी

with first wife Seema
With Second wife Nandita and Son Ishan Puri

यहां असली मुद्दा ये नहीं है कि कमर्शियल और नान कमर्शियल सिनेमा में से किसने ओम पुरी को क्या दिया और क्या नहीं। यहां असली मुद्दा ये है कि कैसे 40 साल गुजारने वाला 66 साल का अदाकार अकेले रहने को मजबूर हो जाता है। इसे अोमपुरी का प्राइवेट मामला कहकर नहीं टाला जा सकता। अकेलापन जिस कलाकार को लील गया, वो प्राइवेट मामला नहीं हो सकता। ओम पुरी को अगर ओमपुरी बनाने वाले लोग आम हैं, तो उनकी जिंदगी के इस स्याहपन पर बात करने में आम लोगों के लिए कोई प्राइवेट का बोर्ड नहीं लग सकता। ओम पुरी 40 साल की फिल्मी जिंदगी के बाद गरीब नहीं रहे थे। घर-दौलत, बैंक बैलेंस वगैरहा में वे अच्छी पोजीशन में पंहुच चुके थे। यहां आर्थिक संकट का मामला नहीं जुड़ता। बस एक ही बात रह जाती है कि अपनी कमाई से बनाए आलीशान मकान (घर कहना ठीक नहीं) में हर शाम, हर रात शराब में डूबोने वाला कलाकार अगर अकेला रह जाता है, तो इस अकेलेपन को बालीवुड की वही चमक स्याहपन में बदलती जाती है, जहां औपचारिकताओं से परे कोई किसी का साथ देने को तैयार नहीं होता। न तो इसके लिए किसी के पास वक्त है और न ही जरुरत। ओमपुरी इस अकेलेपन के अकेले शिकार नहीं है। परवीन बाबी से लेकर जिया खान तक न जाने कितनी जिंदगियां इसी अकेलेपन की शिकार होकर गुमनामी और अाखिरकार मौत की दहलीज पर धकेल दी जाती हैं।

ओमपुरी शादीशुदा थे। दो दो बार उन्होंंने शादी की। उनकी शादीशुदा जिंदगी अर्धसत्य की कालिमा बनकर रह गई, जिसमें बिखराव का सच ही रिश्तों के मलबे में दबकर रह गया था। इस अर्धसत्य का पूर्ण सच आज हकीकत बन गया, जब एक कलाकार हमेशा के लिए यादों में सिमट गया। ओमपुरी की फिल्मों की लिस्ट लंबी है,जिसके लिए उनको याद कीजिए। कुछ पल, उसी इंसान की तन्हाई के लिए, जिसके पास कैमरे के सामने रोने-हंसने का काम था, जो एक्शन और कट की आवाज के साथ पूरा हो जाता था। कौन जाने, अपनी जिंदगी की आखिरी रात में उस कलाकार की हंसी-आंसू न कोई देखने वाला, न कोई रोकने वाला। ऐसी तन्हाई और ऐसे स्टारडम की चमक दो सत्यों के फासले रेखांकित करती है, जिसमें एक अर्धसत्य बना रहा और दूसरा अब पूर्ण सत्य बन गया

Tuesday, January 2, 2024

ये कैसी नानागिरी ?

लो जी, नए साल की शुरुआत में नाना पाटेकर से जुड़े उस ब्लाग का नंबर आ ही गया, जो पिछले काफी वक्त से किसी न किसी वजह से टलता जा रहा था। संयोग देखिए कि आज साल का दूसरा दिन है, जबकि पूरी दुनिया ने एक दिन पहले, यानी नए साल के पहले दिन के जश्न में नाना का बर्थ डे भी सेलिब्रेट किया। ख्याल दो बातों का रखा जाए। ब्लाग का फोकस उन दो खास बातों को लेकर है, जिसे लेकर वे पिछले साल सुर्खियों में रहे।  कभी इलेक्शन, तो कभी क्रिकेट वर्ल्ड कप तो कभी अयोध्या में राम मंदिर का मामला। वक्त का पहिया आगे बढ़ता रहा और नाना वाला ब्लाग अपनी बारी का इंतजार करता रहा। अब सीधे मुद्दे पर आते हैं। 

तमाम खबरों के बीच इस खबर ने बहुत ज्यादा रंग नहीं दिखाया कि बनारस में किसी फिल्म की शूटिंग करने गए नाना पाटेकर ने एक बच्चे को इस वजह से चांटा जड़ दिया कि वो गरीब उनकी परमीशन के बिना सेल्फी लेने की हिमाकत कर रहा था। नाना ने किसी को थप्पड़ मारा, ये दरअसल न्यूज नहीं बनी थी, क्योंकि कुत्ता इंसान को काटे, तो न्यूज ब्रेक नहीं होती, बल्कि इंसान किसी कुत्ते को दांत गाड़े तो खबर जरुर बन जाती है। 

नाना के हाथों की कला के दो दिन बाद असली खबर आई कि नाना ने थप्पड़ हजम करने वाले बालक से माफी मांग ली। क्या कहा, नाना ने सॉरी कहा। ये मिजाज तो उनकी इमेज से मेल नहीं खाता। वे कैमरे के सामने आकर हम काहे तो माफी मांगेगा का स्टाइल दिखाते, तो ज्यादा मजेदार होता। थप्पड़वीर  बालक नाना के पास पंहुचा या नहीं, माफी नामा हुआ या नहीं इसकी कोई खबर नहीं बनी। किसी ने बढ़िया कहा कि नाना को याद दिलाया गया कि गुरु, ये बनारस है। पीएम का इलाका। कुछ ऐसा-वैसा करोगे, तो कसम भोले भंडारी की, पब्लिक मुंबई तक दौड़ाएगी और बनारस की संकीर गलियों में खाटी मराठियों की बड़ी जमात रहती है। ये भी मुमकिन था कि थप्पड़ वीर बालक का कोई कनेक्शन बीजेपी के किसी नेता से हो और उस नेता का कनेक्शन प्रदेश के बाबा से हो। ऐसे में नाना ने माफी के लिए हां हां कहने में भी भलाई समझी हो। 

क्या कहा, मामले को राजनीति से जोड़ने की जरुरत नहीं है। क्या कहा, नाना का राजनीति से कोई कनेक्शन नहीं। महाराष्ट्र के हिंदी भाषी लोगों को मार-पीट कर दौड़ाने वाले राज ठाकरे के लोगों ने हंगामा मचाया, तो पूरे देश में बेजोड़ कलाकार से एक प्रांतवादी होने तक अपना कद घटाने वाले नाना ने राजनैतिक स्टाइल में खुद ही स्टेटमेंट कर दिया कि राज ठाकरे कुछ गलत तो नहीं कर रहे हैं। 

तनुश्री दत्ता वाले कांड तो जाने दो, उसका सच तो कभी सामने आएगा नहीं, लेकिन जानता हर कोई है। नाना के राजनैतिक दर्शन शास्त्र के एक बार फिर दर्शन हो गए, जब उन्होंने हिंदु मुस्लिम के बीच नफरत फैलाने वाले विवेक अग्निहोत्री की सरकारी प्रोपगंडा फिल्म में काम करने से गुरेज नहीं किया और प्रमोशन को चोचलेबाजी करार देने वाले नाना ने इस फिल्म के प्रमोशन के लिए देश भर में  दौड़ लगाई और अग्निहोत्री के स्टैंड को लेकर हां में गर्दन भी हिला दी। 

नाना वही हैं, जिन्होंने गैरकानूनी हथियार रखने के मामले में सजा काटने वाले संजय दत्त के लिए ऐलान कर दिया था कि वे कभी उनके साथ काम नहीं करेंगे। मत करो भई, संजय दत्त के पास फिल्मों की कमी नहीं है। याद आया, वेलकम सीरिज की दो फिल्मों में नाना रहे और अब वेलकम तीन में संजय दत्त आ गए। नाना किसके साथ काम करें या न करें, इसमें उनकी मर्जी को कौन रोके और क्यों रोके। 

पता नहीं, थप्पड़-कांड से नाना को क्या मिला। उन्होंने माफी मांगी, माफी हुई या नहीं, ये भी आई-गई है। बस एक ही बात, एक मच्छर ने जिस तरह से आदमी की पहचान बदल देता है (नाना का कालजयी डायलाग), उसी तरह से जब अव्वल दर्जे का अदाकार जब एक अदने से फिल्म वाले की घटिया सोच के  साथ सुर मिलाता है, तो उसकी पहचान का क्या होता है, ये भी नाना वही जानें. 

जय हिंद, जय महाराष्ट !


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2023-2024 : घूमता आईना



मामला रश्मिका का नहीं, लड़कियों की इज्जत का है




 


कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...