Friday, October 20, 2023

संजय दत्त- केजीएफ 2 और लिओ में फर्क


साउथ के दिग्गज सितारे विजय थलापति की नई फिल्म लियो देश भर में आज रिलीज हुई। ये भी साउथ की पैन इंडिया फिल्मों में से एक रही, जिसे साउथ की भाषाओं के साथ हिंदी में भी बनाया गया। 

लिओ के हिंदी वर्शन की बात करें, तो हिंदी बेल्ट में इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण इसमें संजय दत्त का होना था। लिओ के रिलीज होने के बाद हिंदी बेल्ट के वे दर्शक निराश हुए, जो इसे मल्टीप्लेक्स में देखना चाहते थे। ये निराशा इसलिए रही, क्योंकि सभी प्रमुख मल्टीप्लेक्स ने इसे रिलीज न करने का फैसला कई दिनों पहले कर लिया था। इसके बाद हिंदी बेल्ट में लिओ को सिर्फ सिंगल थिएटरों में ही रिलीज किया गया।  जिस वक्त मल्टीप्लेक्स मालिकों का ये फैसला सामने आया था, तो ये माना जा रहा था कि लिओ की टीम किसी समाधान तक पंहुचने की पहल करेगी, ताकि फिल्म सहजता के साथ मल्टीप्लेक्स में रिलीज होगी, लेकिन कमाल की बात ये रही कि लिओ की टीम ने समाधान के लिए कोई पहल करने की जगह साफ कर दिया कि वे ऐसा कुछ नहीं करेंगे। 

चलिए, मल्टीप्लेक्स के इस मामले को समझने की कोशिश करते हैं। इन दिनों बड़े स्तर पर बनने वाली सभी फिल्मों के ओटीटी राइट्स एडवांस में ही बिक जाते हैं। ओटीटी राइटस के लिए होने वाले एग्रीमेंट में एक अहम क्लाज होता है कि फिल्म को थिएटरों के कितने दिनों के बाद ओटीटी प्लेटफार्म पर स्ट्रीम किया जाएगा। लिओ के ओटीटी राइट्स साउथ की एक ओटीटी कंपनी को बेचे गए, जिसमें ये तय हुआ कि इसे थिएटरों के चार सप्ताह बाद ओटीटी पर स्टीम किया जाएगा। इस फैसले से लिओ के हिंदी वर्शन को रिलीज करने जा रहे मल्टीप्लेक्स थिएटरों ने इरादा बदल दिया। मल्टीप्लेक्स दूसरी फिल्मों की तरह आठ सप्ताह बाद ओटीटी पर रिलीज करने की मांग कर रहे थे।, जिसे टीम लिओ ने खारिज कर दिया और इस वजह से हिंदी बेल्ट में लिओ का हिंदी वर्शन सिर्फ सिंगल थिएटरों में रिलीज हुई। 

अब इस मामले के दो पहलू हो जाते हैं कि लिओ के निर्माताओं ने हिंदी बेल्ट को इग्नोर क्यों किया। ये तो सामान्य सी बात है कि उनका फोकस साउथ और इंटरनेशनल में वो मार्केट था, जिसमें विजय थलापति का बहुत बड़ा इंपेक्ट है और उनका मानना है कि हिंदी बेल्ट वो इलाका नहीं है। यही वजह थी कि उन्होंने उस डील को प्राथमिकता दी, जिसमें उनको साउथ की मार्केट में ज्यादा फायदा नजर आ रहा था, वरना सामान्य तौर पर कौन सी फिल्म होगी, जिसे मल्टीप्लेक्स में रिलीज न होने की स्थिति को मान लिया जाए। 

यहां ताज्जुब की बात ये लगती है कि लिओ की टीम ने फिल्म में संजय दत्त की मौजूदगी के बाद भी हिंदी बेल्ट को इग्नोर किया। इससे कोई मना नहीं कर सकता कि डब फिल्मों की बदौलत हिंदी बेल्ट में पहचान कायम करने के बाद भी लिओ के लिए इस बेल्ट में सबसे बड़ा आकर्षण संजय दत्त था, जिसे स्पष्ट शब्दों में कहा जाए, तो लिओ की टीम ने न सिर्फ पूरी तरह से इग्नोर किया, बल्कि फिल्म के लिए एक बड़ा मौका भी खो दिया। लियो की टीम ने ये जानबूझकर किया या नहीं, इसे लेकर आगे चर्चा करेंगे। 

यहां साउथ की एक ही एक और फिल्म की चर्चा करते हैं, जिसने बाक्स आफिस पर रिकार्डतोड़ कामयाबी पाई। इस फिल्म ने साउथ के साथ ही हिंदी बेल्ट में कामयाबी के झंडे गाड़े। ये फिल्म थी केजीएफ 2, जिसमें मेन विलेन के रोल में थे संजय दत्त और केजीएफ की टीम ने अधीरा के रोल में संजय दत्त की मौजूदगी को प्रमोशन में इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2018 में जब केजीएफ रिलीज हुई थी, तो इस फिल्म की टीम को हिंदी बेल्ट में मिली कामयाबी के बाद ये तय किया गया था कि इसके पार्ट 2 में हिंदी फिल्मों के किसी बड़े चेहरे को शामिल किया जाएगा, जिससे हिंदी बेल्ट में फायदा मिले और इसी सोच के साथ केजीएफ-2 में अधीरा के रोल में संजय दत्त को कास्ट किया गया। 

संजय दत्त भले ही शाहरुख खान न हों, लेकिन इतना जरुर है कि हिंदी बेल्ट में उनकी पहचान को लेकर कोई संकट नहीं है। केजीएफ 2 की टीम ने न सिर्फ इन फिल्म अधीरा के कैरेक्टर को पालिश करने में जमकर मेहनत की, बल्कि रिलीज के मौके पर संजय दत्त को प्रमोशन का एक प्रमुख हिस्सा बनाया गया। हिंदी बेल्ट में केजीएफ के राकी भाई, यानी यश ने संजय दत्त के साथ मुंबई, दिल्ली के अलावा हिंदी राज्यों के कई मेट्रो शहरों का दौरा किया। नतीजा ये हुआ कि साउथ में यश का जादू चला, तो हिंदी बेल्ट में यश के साथ साथ अधीरा के किरदार में संजय दत्त का जलवा रहा और बाक्स आफिस पर फिल्म ने रिकार्ड्स की लाइन लगा दी। 

अब केजीएफ 2 के निर्माताओं की पालिसी को ध्यान में रखकर देखा जाए कि लिओ के निर्माताओं ने संजय दत्त के साथ क्या किया। अधीरा की कामयाबी के बाद साउथ की एक और बड़ी फिल्म में संजय दत्त की एंट्री को बड़े अवसर के तौर पर देखा गया। विजय थलापति जैसे दिग्गज सितारे के साथ संजय दत्त की फिल्म को हिंदी बेल्ट में अहमियत मिली। ये भी मान लिया गया था कि लिओ को पैन इंडिया के तौर पर कामयाबी के लिए संजय दत्त की कास्टिंग एक बड़ी भूमिका निभाएगी। ज्यादातर लोग मान रहे थे कि संजय दत्त-विजय का कांबिनेशन लिओ को केजीएफ 2 जैसी महासफलता दिला सकता है। लिओ की टीम ने ये मौका गंवाया और ये कहने में गुरेज नहीं हो सकता कि ऐसा उन्होंने अंजाने में नहीं किया। लिओ की टीम के कारनामों पर गौर कीजिए- 

जब फिल्म का टीजर आया, तो संजय दत्त को प्रमुखता नहीं दी गई। जब फिल्म का ट्रेलर आया, तो भी इसे दोहराया गया। ये उम्मीद की जा रही थी कि लिओ के मूल तमिल वर्शन के ट्रेलर लांच का समारोह चेन्नई में होगा और हिंदी बेल्ट के लिए संजय दत्त के साथ हिंदी वर्शन को लांच करने के लिए विजय थलापति मुंबई में इवेंट करेंगे और दिल्ली  सहित हिंदी बेल्ट के मेट्रो शहरों में प्रमोशन के लिए जाएंगे। लिओ की टीम ने सभी भाषाओं में फिल्म के ट्रेलर को सोशल मीडिया पर लांच किया और बाद में भी लिओ के प्रमोशन में विजय को प्रमुखता दी गई, जो लाजिमी था, लेकिन संजय दत्त को पूरी तरह से इग्नोर किया गया। इसके बाद ओटीटी राइट्स को लेकर लिए गए फैसलों ने हिंदी बेल्ट में लिओ के भविष्य को चौपट कर दिया। यहां केजीएफ2 और लिओ का फर्क देखिए कि संजय दत्त दोनों फिल्मों में विलेन के रोल में थे और दोनों फिल्मों की टीमों ने संजय दत्त का कैसे इस्तेमाल किया। लिओ की टीम से एक सीधा सवाल हो सकता है कि अगर आपको ये ही करना था तो संजय दत्त जैसे सितारे को कास्ट करने की जरुरत क्या थी। लिओ को लेकर संजय दत्त पर तो कोई फर्क नहीं होगा, लेकिन लिओ की टीम ने विजय थलपति को हिंदी बेल्ट में चमकाने के मौके का खुद कत्ल कर दिया। साथ ही इस पैन इंडिया फिल्म के हिंदी बेल्ट में नाकामयाबी के लिए भी लिओ की टीम ही जिम्मेदार रहेगी। 

जहां तक रहा सवाल संजय दत्त का, तो केजीएफ 2 के बाद उनके लिए साउथ की फिल्मों के दरवाजे खुल चुके हैं और वो इस वक्त वहां की कई फिल्मों में काम कर रहे हैं। हिंदी फिल्मों में भी संजय दत्त के पास फिल्मों की कमी नहीं है। जहां तक रही बात विजय थलपति की, तो वे साउथ, खास तौर पर तमिल सिनेमा के सबसे कामयाब और चमकीले सितारों में हैं और उनका जबरदस्त क्रेज है। लिओ के रिलीज के पहले ही दिन ये संकेत मिल गए कि साउथ के मार्केट में लिओ को बड़ी कामयाबी मिलने जा रही है। विजय थलापति को मिली  बेशुमार कामयाबी का मामला अपनी जगह और संजय दत्त का स्टारडम अपनी जगह। 
सवाल सिर्फ एक ही रह जाता है कि अगर पैन इंडिया मार्केट का मतलब समझना है, तो सिर्फ हिंदी फिल्मों के किसी बड़े चेहरे को कास्ट करने से काम नहीं होता। बाहुबली ने पैन इंडिया मार्केट के जो दरवाजे खोले, उस रास्ते पर  केजीएफ 2 ने कामयाबी का झंडा लहराया, तो लिओ की टीम ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। केजीएफ 2 और लिओ का फर्क साउथ के उन निर्माताओं की टीमों के लिए सबक है, जो पैन इंडिया मार्केट के लिए पहले हिंदी बेल्ट को समझा जाए, जहां केजीएफ 2 की टीम की समझदारी की जरुरत है, न कि टीम लिओ की मूर्खता की, जिसके पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं पड़ी, बल्कि टीम के दिग्गज  पैरों को ही कुल्हाड़ी पर मार आए। 

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Tuesday, October 10, 2023

बर्थ डे स्पेशल - काश अमिताभ-रेखा के साथ ये हो जाता...

Disclaimer- ये आलेख पूरी तरह से काल्पनिक है, लेकिन इसके पात्र काल्पनिक नहीं हैं

सत्तर के दशक का आखिरी दौर-

बंबई (आज का मुंबई) के एक फाइव स्टार होटल के एक हाल में राउंड टेबल लगा हुआ है। टेबल के चारों तरफ लगी चेयरों के एक-एक नेमप्लेट रखी हुई है। टेबल के फ्रंट साइड पर एक विचारक विराजमान है। हाथों में सिगरेट और प्याले से चाय सुड़कते हुए वो दीवार पर लगी घड़ी को घूर रहा है। घड़ी का घंटा दस बजने की सूचना देता है-

कमरे के अंदर यश चोपड़ा की एंट्री होती है। वो काला पत्थर की कामयाबी को लेकर डिस्टीब्यूटर्स के साथ मीटिंग करके आए हैं और काला पत्थर की चकाचक कामयाबी से गदगद हैं।

यश चोपड़ा के आने के चंद मिनटों बाद हाथों में सिगरेट और सिगरेट का पैकेट लिए प्रकाश मेहरा अवतरित होते हैं। मुकद्दर का सिकंदर के बाद वो जोरा और सिकंदर को लेकर एक और फिल्म बनाने के चक्कर में हैं, लेकिन उनको कोई स्टोरी नहीं मिल रही है।

प्रकाश मेहरा के बाद एंट्री होती है मनमोहन देसाई की। प्रकाश मेहरा के साथ उनकी नजरें लड़ती हैं, तो चेहरे पर एक स्माइल, लेकिन दिल में कड़वाहट के भाव भर जाते हैं। मनमोहन देसाई एक सिनेमा मैग्जीन के आर्टिकल से दुखी हैं, जिसमें लिखा गया कि उनका खोया-पाया फार्मूला अब ओवर होता जा रहा है।

प्रकाश मेहरा के बाजू में मनमोहन देसाई की चेयर लगी हुई थी, लेकिन अमिताभ बच्चन के नाम पर कहीं दोनों फिर से आपस में न भिड़ जाएं, इसलिए फटाफट उनकी कुर्सियों में फेरबदल किया जाता है और मनमोहन देसाई को वहां से हटाकर यश चोपड़ा के बाजू में बैठाया जाता है।

प्रकाश मेहरा के बाजू वाली चेयर पर बैठने के लिए एक और गेस्ट की एंट्री होती है। ये हैं बंगाली बाबू ह्रषिकेष मुखर्जी। दादा.. दादा... कहकर यश चोपड़ा, मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा अपनी अपनी चेयर से उठते हैं और दादा को कुछ वक्त पहले रिलीज हुई फिल्म गोलमाल की कामयाबी के लिए बधाई देते हैं। गोलमाल ने बाक्स आफिस पर रिकार्डतोड़ कामयाबी पाकर फिल्मों के कारोबारी पंडितों को चौंका दिया। 

इन चारों के आने के बाद एक चेयर अब भी खाली पड़ी हुई है। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता और कमरे में एंट्री होती है शोलेवान रमेश सिप्पी की। वे लगातार जम्हाई ले रहे हैं, क्योंकि पिछली दोपहर से लेकर लेट नाइट तक सलीम-जावेद के साथ उनकी एक नई फिल्म के लिए सीटिंग थी। सिप्पी की इस फिल्म के लिए मल्टीस्टार कास्ट होगी और इसका टाइटल होगा शान। भव्यता में रमेश सिप्पी इसे शोले से कहीं ज्यादा बड़े स्केल पर बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं। 

रमेश सिप्पी के साथ ही आने वाले मेहमान डायरेक्टरों की गिनती पूरी हो गई, लेकिन ये पांचों धुरंधर इस बात को लेकर अनजान थे कि उनको यहां क्यों बुलाया गया है। ये सस्पेंस तब पूरा हुआ, जब एक और सज्जन की एंट्री हुई। 12 घंटे से ज्यादा लंबे वक्त तक चली मैराथन मीट के अंत में जब ये डायरेक्टर बाहर निकले, तो उनके हाथ में एक-एक फाइल थी और इसमे उनकी नई फिल्मों के लिए फाइनल हो चुकी स्टोरियां थीं। सबको अपनी-अपनी पसंद से अपने लिए फाइल चुनने का मौका मिला था।

कुछ दिनों के बाद-

मुंबई के एक स्टूडियो में बिखरे हुए बालों और बेतरतीब दाढ़ी के गेटअप में अमिताभ बच्चन तैयार हो रहे थे। निर्देशक के तौर पर रमेश सिप्पी उनको समझा रहे थे कि किस स्टाइल में उनको डायलाग बोलना है। डायलाग था- पुष्पा को फ्लावर समझा क्या। फायर है मैं.. झुकेगा नहीं साला 


यश चोपड़ा की यूनिट एक नई फिल्म के लिए एक गाना शूट कर रही है। कैमरे के सामने राज मल्होत्रा, यानी अमिताभ बच्चन खड़े हैं और उनके साथ सिमरन यानी रेखा हैं। लाइटिंग की सैटिंग होने के बाद गाना शुरु हो जाता है और फिजां में गाने के शब्द गूंज रहे हैं- साजन जी घर आए...

प्रकाश मेहरा की टीम खामोशी से बैठे आदित्य कश्यप का सीन शूट कर रही है। सीन के मुताबिक, अपने सामने बैठी पंजाब की सिख़ड़ी की बक बक से आदित्य कश्यप परेशान हो चुका है। शाट होने के बाद अमिताभ बच्चन मेकअप रुम में आते हैं, जहां फिल्म में गीत ढिल्लों का रोल कर रही रेखा पहले से बैठी हैं। अगला शॉट उनका होना है। 

ह्रषिकेश मुखर्जी ने पंजाब की एक हवेली फाइनल कर दी है। इस हवेली में सुरिंदर साहनी और उनकी बीवी बनी तानी की मैरिड लाइफ वाले सीन फिल्माए जाएंगे। सुरिंदर साहनी को चश्मा फिट नहीं हो रहा था, तो तानी को पंजाबी सलवार सूट में प्राब्लम हो रही थी। लो जी, एक दिन में प्राब्लम साल्व। ह्रषि दा ने सुरिंदर की आंखों से चश्मा ही छिन लिया और सुरिंदर का  सीन शूट होने लगा। अपनी बंगाली भाषा के साथ  ह्रषि दा गुनगुना रहे थे- तुझमें रब दिखता है... यारां मैं क्या करुं... उनको गाता देखकर हर कोई हंस पड़ा। 
मनमोहन देसाई के दफ्तर में एक इमरजेंसी मीटिंग चल रही है। मीटिंग में अमिताभ हैं। रेखा का मीटिंग के लिए आने का इंतजार हो रहा है। ये मीटिंग इसलिए बुलाई गई है कि एक सीन को लेकर मनमोहन देसाई उलझ गए हैं। उस सीन में जैनी (रेखा) को इंप्रेस करने के लिए फ्रेंड्स क्लब के प्रेसीडेंट प्रेम (अमिताभ बच्चन) को चिकन-मटन और मच्छी खाना है। मसला ये है कि मनमोहन देसाई शुद्ध शाहकारी हैं और इन चीजों से बहुत दूर रहते हैं। उनका असिस्टेंट आइडिया देता है कि चिकन-मटन, मच्छी की जगह इनके प्लास्टिक टॉय वहां रख दिए जाएं। नानवेज के शौकीन बच्चन और कई लोग उसे घूरते हैं, लेकिन मनमोहन देसाई को आइडिया जम जाता है। अगले दिन कैमरे के सामने प्रेम बाबू, यानी अमिताभ प्लास्टिक का चिकन-मटन खाते हैं और अपनी लाइफ के ऐसे ये पहले एक्सपीरिएंस पर कतई खुश नहीं होते। 

अगली नींद टूटी, तो सत्तर के दशक का ये ख्याल दफन हो गया। कौन जानता था कि चालीस साल बाद नई सदी में इन फिल्मों की हकीकत सामने होगी। स्क्रीन पर क्या तहलका मच जाता।

बाय बाय करने से पहले चंद बातें और-

नीचे दी गई तस्वीरों पर गौर फरमाइए- 

दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे, पुष्पा 

जब वी मीट, रब ने बना दी जोड़ी, अजब प्रेम की गजब कहानी 

आप कमेंट बाक्स में बताइए कि आप इन फिल्मों में से किस फिल्म में अमिताभ-रेखा की जोड़ी को देखना चाहते। अगर आपके विचार में इस दौर की किसी और फिल्म को अमिताभ-रेखा की जोड़ी के साथ बनाया जा सकता था, 
तो उसके लिए डायरेक्टर के नाम का चयन कीजिए और जल्दी से उस फिल्म और डायरेक्टर का नाम कामेंट बाक्स में बता दीजिए। इसके अलावा आप कमेंट बाक्स में ये भी बता सकते हैं कि क्या मौजूदा दौर में आप अमिताभ-रेखा को एक साथ देखना चाहते हैं और अगर ऐसा है, तो आपकी नजर में उनकी फिल्म के लिए बेस्ट डायरेक्टर कौन होगा? 

इस सोच के साथ इस जादुई जोड़ी को हैप्पी बर्थ डे कहिए- काश...


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Thursday, October 5, 2023

रिश्ते में तो हम तुम्हारे 'बाप' लगते हैं


अमिताभ बच्चन की फिल्म शहंशाह में बोला गया उनका डायलॉग अभी तक याद किया जाता है, जिसमें वे अपनी दमदार आवाज में कहते हुए पाए जाते हैं- रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं, नाम है-

इस शहंशाही डायलाग के मामले को यहीं विराम देकर आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं, इस साल की दो ऐसी फिल्मों की, जिन्होंने बाक्स आफिस को रौंद डाला। एक फिल्म थी गदर 2, जिसमें तारा सिंह 22 साल के बाद बार्डर पार करता है और अपने बेटे की सलामती के लिए गदर मचाता है। दूसरी फिल्म थी जवान। पठान की कामयाबी के बाद पठान ने फिर से अपनी बादशाहत का परचम लहरा दिया। फिल्म में डबल रोल निभाने वाले शाहरुख अपने बेटे को बचाने आते हैं, तो परदे पर उनकी रौबिली आवाज गूंजती है- बेटे पर हाथ डालने से पहले बाप से बात कर, इस डायलाग को शाहरुख की निजी जिंदगी से जोड़कर देखा गया, जब उनके बेटे आर्यन को ड्रग्स के मामले में गिरफ्तार किया गया था और ये माना गया था कि शाहरुख खान को परेशान करने के लिए उनके बेटे को टारगेट किया गया था और इस डायलाग से शाहरुख ने उनके बेटे को फंसाने वालों को चैलेंज किया। 

ये थी इस साल की दो ब्लाकबस्टर फिल्मों की बात। अब बात आने वाली एक फिल्म की। एक दिसंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म एनिमल में रणबीर कपूर मेन लीड में हैं और अनिल कपूर उनके पिता का रोल कर रहे हैं। ये फिल्म भी बाप-बेटे के रिश्तों को लेकर है। याद नहीं आता कि एक ही साल में बाप-बेटे की कहानी वाली तीन बड़ी फिल्में रिलीज हुई हों। 

इंसानी रिश्तों की कहानियां हमारे फिल्मकारों को इसलिए पसंद आती हैं, क्योंकि ये हमारे जनमानस से जुड़ी होती हैं। हां, पिछले काफी समय से बाप-बेटे के रिश्तों की फिल्मों का बनना कम हो गया था। एक बड़े फिल्मकार ने इसकी वजह रमेश सिप्पी की फिल्म शक्ति को बताया था कि बाप-बेटे के रिश्ते की हर कहानी को शक्ति से कंपेयर किया जाता है। शक्ति में  दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने पहली बार काम किया था और इस वजह से फिल्म की हाइप बहुत थी, फिर भी बाक्स आफिस पर ये फिल्म ठंडी रही। इसके बावजूद इस फिल्म का इंपेक्ट इतना रहा कि बाप-बेटे को लेकर बनी तमाम फिल्मों को शक्ति से कंपेयर किया गया। 

ये भी नहीं माना जा सकता कि इस साल की तीन फिल्मों के बाद बाप-बेटे के रिश्तों की फिल्मों के लिए निर्माताओं में होड़ लग जाएगी, हालांकि भेड़ चाल के लिए कुख्यात बालीवुड में इस संभावना से कोई मना नहीं कर सकता।

बाप-बेटे की इस गाथा को लेकर एक और आने वाली फिल्म की याद आ गई। इस फिल्म का नाम है बाप, जिसमें 90 के दशक के चार सितारों को साथ लाया गया है। सनी देओल, संजय दत्त, मिठुन चक्रवर्ती और जैकी श्राफ की मुख्य भूमिकाओं वाली फिल्म बाप-बेटे नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड के बाप की कहानी बताई जा रही है। इसकी रिलीज डेट अभी तय नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि अगले साल के पहले हाफ में ये परदे पर होगी। 


बाप-बेटे की इस बात को यहीं विराम देने से पहले एक नजर हिंदी की चंद ऐसी फिल्मों पर, जिनमें कहानियों का आधार पिता-पुत्र की रिश्तेदारी रही। इन फिल्मों की सूची में आप अपनी पसंदीदा फिल्म को कमेंट बाक्स में मेंशन कर सकते हैं। 

मुगले आजम, शक्ति, इंडियन, अपने 

102 नॉट आउट, उड़ान, गर्दिश, आखिरी रास्ता 

पा, घातक 





कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...