Saturday, June 24, 2017

ट्यूबलाइट जलेगी तो जरुर, मगर.....?




ट्यूब लाइट रिलीज हुई और सलमान खान के चाहने वालों के लिए ईद से पहले ईद हो गई। ये कई सालों से चली आ रही रस्म है, जब ईद के मौके पर सलमान की फिल्में रिलीज होती हैं और हिट भी हो जाती हैं। इसे लेकर बहस की गुंजाइश नहीं बचती। मीडिया में तो ट्यूब लाइट को स्विच आफ करार दे दिया गया। इससे सलमान के करोड़ों फैंस को शायद ही कोई फर्क पड़े। सोमवार को ईद मनाई जाएगी, तो इस फिल्म की कमाई के आंकड़ों की रफ्तार तेज होगी। 4300 से ज्यादा थिएटरों पर रिलीज हुई ये फिल्म आंकड़ों की कमाई में तो नुकसान का सौदा नहीं साबित होगी, मगर.....

इस मगर के साथ ये सवाल जुड़ता है कि क्या ट्यूब लाइट उम्मीदों पर खरी उतरती है? और अगर ये जवाब ना में सामने आता है, तो इसके कारण भी होंगे, जो कुछ परदे पर नजर आए और कुछ का ताल्लुक परदे के पीछे रहा। ट्यूब लाइट के निर्देशक कबीर खान और सलमान खान को ये समझना मुश्किल नहीं रहा होगा कि बजरंगी भाईजान के बाद वे ट्यूब लाइट लेकर आएंगे, तो दोनों फिल्मों में तुलना होगी। कबीर के साथ सलमान ने 2012 में पहली फिल्म एक था टाइगर की थी और इसके तीन साल के गैप के बाद बजरंगी 2015 में आई थी। बजरंगी के साथ ट्यूब लाइट की तुलना के और भी कारण बन जाते हैं। बजरंगी की तरह ट्यूब लाइट में सलमान एक भोलेभाले किरदार में है, जो सिर्फ अपने दिल की बात को मानता है। बजरंगी मे सलमान का किरदार एक बच्ची को घर छोड़ने के लिए सीमा पार जाता है। यहां मिशन चीन के साथ लडाई में गए अपने भाई को वापस लाने का है। बजरंगी में पवन के साथ एक बच्ची जुडती है, तो ट्यूब लाइट में लगभग उसी उम्र का बच्चा जुड़ता है। ये बात भी कम अहम नहीं हो जाती कि बजरंगी जैसा किरदार सलमान ने पहली बार किया था, जिसको हर किसी ने पसंद किया। यहां न चाहते हुए भी अगर ट्यूब लाइट से उसकी तुलना होती है, तो इसके लिए सलमान और कबीर खान की जोड़ी ही ज्यादा जिम्मेदार है। फिर भी ये तर्क माना जा सकता है कि दो फिल्मों और उनके किरदारों की तुलना न्यायसंगत न हो, मगर.....




इस मगर की गाथा को और आगे लिए चलते हैं। बात कबीर खान की करते हैं, जो इन दोनों फिल्मों के निर्देशक रहे हैं। ट्यूब लाइट का तो लेखन भी कबीर ने ही किया है और इसे ही फिल्म की बड़ी कमजोरी माना जा रहा है। क्या कबीर खान नहीं जानते थे कि सलमान के किरदार का भोलापन, पहले बच्ची और अब बच्चे से लगाव दोनों फिल्मों की तुलना का आधार बन जाएंगे। यहां तक कि फिल्म के गानों की धुनें और उनका फिल्मांकन भी जब बजरंगी की याद दिलाता है, तो इसके लिए देखने वाले तो कसूरवार नहीं हो सकते। कबीर खान ने अगर एक था टाइगर के किरदार से बजरंगी के किरदार को बिल्कुल अलग रखा था, तो बजरंगी से ट्यूब लाइट के किरदार को अलग रखने की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी, जिसे समझने में वे नाकाम रहे।

बजरंगी और ट्यूब लाइट के निर्माण के दौरान परदे के पीछे भी तमाम ऐसी बातें हुईं, जो ट्यूब लाइट की निराशा के साथ जुड़ जाती हैं। एक था टाइगर की सिक्वल (टाइगर जिंदा है) का निर्देशन सुलतान वाले अली अब्बास जाफर को मिलना भी कम अहम बात नहीं थी। इस खबर ने कबीर और सलमान के बीच बढ़ते मनमुटाव की खबरों को हवा दी। आम तौर पर सिक्वल का निर्देशन पहली फिल्म के निर्देशक को ही मिलता है। ट्यूब लाइट के शुरु होने से पहले जब एक था टाइगर की सिक्वल की खबर पहली बार चर्चा में आई थी, तो बजरंगी भाईजान के बाद अपनी अगली फिल्म फैंटम (सैफ अली खान-कैटरीना कैफ) के प्रमोशन के दौरान कबीर खान संकेत दे रहे थे कि सिक्वल वही बनाएंगे। मगर ट्यूब लाइट की शुरुआत होने के बाद एक था टाइगर की सिक्वल का मामला खबरों में लौटा, तो कबीर खान का पत्ता कट चुका था। यहां तक कि ट्यूब लाइट के पहले शेड्यूल के दौरान सलमान और कबीर खान के बीच मतभेदों के संगीन होने की खबरों के बीच ये हवा भी हो गई थी कि सलमान कबीर की जगह ट्यूब लाइट को पूरा करने की जिम्मेदारी अली अब्बास जाफर को सौंपना चाहते हैं। चर्चा रही कि सलमान के पापा सलीम की दखल अंदाजी से मामला सुलझा और कबीर खान ही फिल्म के निर्देशक बने रहे, लेकिन कबीर और सलमान के बीच लड़ाई की खबरों का आना जारी रहा। सोचना और समझना मुश्किल नहीं होता कि जब किसी फिल्म के बीच डायरेक्टर और हीरो के बीच लड़ाईयां बढ़ जाएं, तो इसका बुरा असर फिल्म पर होता है और यहां से बस किसी तरह से फिल्म को पूरा करने की औपचारिकता मात्र रह जाती है। इसे भी संयोग नहीं माना जा सकता कि ट्यूब लाइट की शूटिंग पूरी होने के फौरन बाद से कबीर खान की अगली फिल्म के लिए रितिक रोशन के नाम की चर्चा होने लगी। इसका ये भी मतलब लगाया गया कि अब कबीर खान और सलमान किसी फिल्म में साथ नहीं होगे। सलमान की आने वाली फिल्मों की लिस्ट भी इसी बात का इशारा करती है। कबीर खान भी इसे लेकर चुप हो जाते हैं, मगर....

मगर की इस गाथा के तीसरे पड़ाव पर नजर आते हैं सोहेल खान, जिनको ट्यूब लाइट की एक कमजोर कड़ी माना जा रहा है। सोहेल को सलमान ने अगर सिर्फ इसलिए अपने भाई का रोल दिया कि वे सगे भाई है, तो कहा जा सकता है कि सलमान की ये भाईगिरी फिल्म को भारी पड़ी। सोहेल खान ने बतौर एक्टर पहले भी बहुत कोशिश की है और पब्लिक ने ही उनकी फिल्मों को खारिज कर दिया है। कौन भूल सकता है कि वांटेड से शुरु हुई सलमान की कामयाबी के दौर में इकलौती बड़ी नाकामयाबी जय हो रही, जिसका निर्देशन सोहेल खान ने किया था। सोहेल के लिए इससे पहले सलमान ने किसान भी बनाई थी, उसमें बतौर कलाकार और बतौर निर्देशक सोहेल खान दोनों रुप में फेल हुए थे। भाई के साथ ऐसा लगाव हैरान नहीं करता, लेकिन फिल्म की वाट लगती है, तो ये बड़ा मुद्दा बन जाता है, जिसे सलमान तो मानने से रहे, मगर.....


अगर-मगर के इस खेल के अगले मोहरे बने शाहरुख खान, जिनका ट्यूब लाइट में गेस्ट एपीरिएंस है। ये समझना मुश्किल नहीं कि सलमान के साथ दोस्ती के टूटे रिश्तों के फिर से जुड़ने के बाद शाहरुख इस फिल्म का हिस्सा बने। दो दिग्गज खान सितारों की कैमिस्ट्री को लेकर जो उम्मीदें की जा रही थीं, इस मामले में भी ट्यूब लाइट फुस्स हो गई।
फिल्म में शाहरुख खान की मौजूदगी असरदार नहीं रही। दोनो के फिर से दोस्त बन जाने के बाद  पहली बार  दोनों के एक साथ बड़े परदे पर आने को लेकर उम्मीदें तो बहुत थीं, मगर....

मगर की अगली कड़ी में खुद सलमान के किरदार की कमजोरियां हैं। सलमान बहुत गंभीर किस्म के एक्टर नहीं माने जाते। सलमान स्टाइलिश स्टार हैं, जो परदे पर एक्शन करता है, तो पब्लिक खुशी से ताली बजाकर झूमती है। वे रोमांस करते हैं, तो कन्याओं के दिलों की धड़कन बढ़ जाती है। एक था टाइगर में कैटरीना हों या बजरंगी में करीना हों, सलमान रोमांस का रंग जमाने में मास्टर माने जाते हैं।

ट्यूब लाइट में इन दोनों ही मामलों में वे कमजोर हैं। एक्शन करने की बारी आती है, तो वे एक अदने से किरदार से थप्पड़ खाते रहते हैं, जो उनके फैंस को कभी हजम नहीं होगा और रोमांस करने के लिए इस बार कोई स्कोप ही नहीं दिया गया। चीनी अभिनेत्री जु जू अपने बेटे के साथ हैं, जिनका सलमान के साथ कोई रोमांटिक एंगल नहीं है।
एक्शन का चैंपियन एक के बदले चार थप्पड़ मारे और अपने पति को खो चुकी चीनी अभिनेत्री से रोमांस का रिश्ता जमाता, तो भी बात जम जाती, मगर....

मगर के आखिरी पड़ाव में जिक्र होगा उनकी शर्ट का, जो ट्यूब लाइट में उनके शरीर पर ही जमी रही। बजरंगी भाईजान में पाकिस्तानी जेल में वे जब उस एक शाट में बिना शर्ट के नजर आते हैं, तो ही थिएटर सीटियों से गूंज उठा था।
ट्यूब लाइट में तो उनकी शर्ट भी ऐसी, जिसके बटन गले तक बंद रहे। सलमान की इस शर्ट लैस अदा पर कुवांरियों के दिल धड़कते हैं, तो उनकी मसल देखकर उनके फैंस अपने सिंगल पसली होने का गम भूल जाते हैं।
ट्यूब लाइट में सलमान ने एक सीन में भी शर्ट को निकाल फेंका होता, तो कुछ बात बन सकती थी, मगर....

अगर-मगर  की इस गाथा से ट्यूब लाइट की बाक्स आफिस पर होने वाली कमाई पर कोई असर नहीं होगा। शाय बजंरगी भाईजान जैसी लाजवाब फिल्म न आई होती, तो सलमान की फार्मूला फिल्मों की सफलता के इतिहास में ट्यूब लाइट भी कहीं न कहीं फिट हो जाती। ट्यूब लाइट ने उन लोगों को ज्यादा निराश किया, जो बजरंगी भाईजान के बाद इस जोड़ी से एक और बेहतर फिल्म की उम्मीद कर रहे थे। ट्यूब लाइट जलेगी, जरुर जलेगी, मगर....


एक अच्छी फिल्म की कसौटी पर निराश करने वाली ट्यूब लाइट यहां आकर अटक जाती है कि फ्यूज बल्ब हो या ट्यूब लाइट,,, जल जा जल जा सुनकर दिल को ही जलाती है और अगर-मगर की गाथा भी इस मायूसी के सामने फीकी पड़ जाती है। इस ईद की बात तो मुकम्मल हो गई, अगले साल फिर से ईद होगी। फिर से भाई अपनी फिल्म से ईदी देंगे, मगर.......


Wednesday, June 14, 2017

तुम कौन हो कृतिका चौधरी, कुछ भी तो नहीं...

तुमको न कोई जानता था, न पहचानता था, फिर कोई कैसे तुम्हारी मौत पर मातम मनाता? किसी को क्या गरज पड़ी थी कि एक स्ट्र्गलर आर्टिस्ट की मौत पर, किसी का मन एक पल के लिए भी इंसानियत का एहसास करता। तुम एक स्ट्रगलर थीं, जिनको हिराकत से देखना बड़े लोगो का जन्मसिद्ध अधिकार होता है।

तुम अगर किसी बड़े परिवार से कोई ताल्लुक रखतीं, तो 12 जून की शाम को खबरों की दुनिया में एक धमाका होता। चैनलों पर गाय और इंसानों से लेकर मोदी और राहुल की राजनीति पर उबलने वाले चैनलों के लिए तुम्हारी मौत ब्रेकिंग न्यूज बनती। नाचते-गाते विज्ञापनों के बीच खबर के नाम पर कृतिका चौधरी नहीं रहीं की ब्रेकिंग न्यूज चलाने वाली एंकर की आंखें भर आतीं, तो पुरुष एंकर अपने दिल पर पत्थर रखते। देखते ही देखते पुलिस स्टेशन के बाहर न्यूज चैनलों की ब्रेकिंग ब्रिग्रेड की गाड़ियों से निकलते कैमरों की लपलपाहट में पुलिस स्टेशन के अंदर जाने वाला और बाहर आने वाला कोई सिपाही भी ब्रेकिंग न्यूज बन सकता था। पुलिस के बड़े साहब लोगों को कैमरे के सामने आकर बताना पड़ता कि पुलिस ने इंक्वायरी शुरु कर दी है। प्रेस-मीडिया की भीड़ को संभालने के लिए पुलिस को अपनी हिफाजत के लिए बंदोबस्त करना पड़ता।

अस्पताल के गेट के बााहर लगे कैमरों के पीछे खींसे निपोरने वालों को इंतजार होता कि डैडबाडी की एक झलक मिल जाए और इसके लिए वे मरीजों और आने जाने वाले डाक्टर-नर्सों को रोकने-टोकने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते पाए जाते। अस्पताल में अगर कोई तुमसे दोस्ती निभाने के नाम पर रात को काले चश्मे पहनकर आता, तो दोस्त के हवाले से मिलने वाली न्यूज कितने चैनलों का भला करती। तुम्हारी यादों का मातम मना रहे दोस्तों को अस्पताल में कैमरों के आगे आने के बाद घर जाकर टीवी न्यूज चैक करना जरुरी होता कि कमबख्तों ने मुझे कितनी फुटेज दी...

भला तुम्हारा घर कैमरों से दूर कैसे रहता। जितना जल्दी यमराज नहीं पंहुचा होगा,  उससे भी जल्दी से फटाफट और तेज खबरों के उस्ताद तुम्हारी जिंदगी की कुंडली निकालने के साथ साथ, आस पड़ोस के उन चेहरों की उदासी को भी कवर करते, जो शायद तुम्हारा नाम भी न जानते हों। कैमरे ऐसे में हर किसी के दुख को एक लाइन में बताने की कला में माहिर होते हैं- आपको कैसा महसूस हुआ? कोई पड़ोसी सिंगर होता, तो चैनल के कैमरों पर तुम्हारी याद में कोई गाना गुनगुनाने की फरमाइश भी जरुर होती।

तुम बड़े, अमीर घराने से नहीं थी, वरना पुलिस स्टेशन से लेकर अस्पताल और घर.. कहां कहां चैनलों के कैमरे नहीं पंहुचते। सुबह सवेरे का मंजर तुम्हारी मौत के मातम को अलग ही रंग देता। बहनों से भी ज्यादा प्यार करने वाली हीरोइनों और तुम्हारे सदमे में हर कोई सफेद पोशाक और काला चश्मा लगाए आता और साथ में टायर जैसी शक्ल में फूलों की माला के साथ वहां रुकना न भूलता, जहां कैमरे तुम्हारे दोस्तों से तुम्हारे साथ बिताए पलों को याद करने के लिए कहते और तुम्हारे दोस्तों की आंखें छलक आतीं। आपको कैसा लगा वाले सवाल पर कोई दोस्त बुरा नहीं मानता।

शमशान में कैमरो और फोटोग्राफरों की भीड़ इसलिए धक्कामुक्का करती कि तुम्हारे अंतिम सफर का चेहरा उनके लिए गुड पोज बन जाए। शमशान से निकलने वाले सितारों का मजमा फिर से आपको कैसा लगा का जवाब देते हुए आंसू बहाने लगता। और अपने फेवरेट सितारों के दर्शन पाकर शमशान घाट पर उमड़ी भीड़ स्टारों को देखकर तालियां और सीटी बजाकर खुशी जाहिर करने की रस्म भी निभा देती।

चौथे दिन तुम्हारी प्रार्थना सभा में भी यही मंजर होता। वही कैमरों की फ्लैश, वही न्यूज चैनलों के कैमरों की लपलपाहट होती। वही महंगी कारों से सफेद ड्रेस और काले चश्मेधारी दोस्तों की फौज चैनलों के साथ तुम्हारे दूर जाने का मातम मनाती। तुम्हारे विशालकाय फ्रेम वाले फोटो में तुम्हारे हंसते चेहरे पर फूलों की माला होती। मोमबत्तियां होतीं। तुम्हारी शांति के लिए मंत्रों का उच्चारण होता। एक दूसरे के गले लगकर सितारे धीमी आवाज में व्हेयर यू आर बेबी जैसी शिकायत धीमी आवाज में करते और तुम्हारी आत्मा को शांति पंहुचाकर उसी मीटिंग में नई फिल्मों के सेटअप भी तैयार होते और बमुश्किल कुछ मिनट रुककर सितारों का कारवां गला तर करने के इंतजामों में लग जाता।

क्या क्या नहीं हो सकता था। कौन जाने, तुम्हारी हैसियत बड़ी होती, तो मुल्क के प्रधानमंत्री से लेकर सियासी जमात भी तुम्हारे गम में शरीक होने के लिए सोशल मीडिया को आरआईपी के संदेशों से लबालब कर देती। न्यूज चैनलों के धुरंधरों की टीम तुम्हारी अंतिम यात्रा से लेकर प्रार्थना सभाा में आने और न आने वालों का बहीखाता निकालकर देश की सबसे बड़ी समस्या का हल निकालने की कोशिश करते नजर आते। अगर और बड़ी हीरोइन होतीं, तो म्यूजिक चैनलों पर फैंस की  डिमांड पर तुम्हारे हिट गानों की परेड होती। मूवीज चैनलों पर सारा शेड्यूल होता और तुम्हारी एक सीन वाली फिल्म को भी ट्रिब्यूट टू ए ग्रेट स्टार की तख्ती के साथ चलाया जाता, जिसके लिए स्पांसरों की लाइन तो लगनी ही थी।

कितना कुछ और हो सकता था,.. कोई तुम्हारे लिए शहर में स्टेचू लगवाने की सोचता, तो कोई तुम्हारे नाम पर गली का नाम रखने की मुहिम चलाने की सोचता, तो कोई सरकार से तुम्हारे लिए बड़ा सम्मान दिलाने की खातिर आंदोलन शुरु करने की बात भी करता।

तुमने कितना कुछ मिस कर दिया। काश तुम इस सच को समझ पातीं कि एक स्ट्रलगर हीरोइन की मौत की यहां कोई कीमत नहीं होती। चैनलों की भाषा में ऐसी मामूली खबरों से उनको टीआरपी नहीं मिलती, इसलिए एक स्ट्गलर की मौत की खबर की कोई कीमत होनी ही नहीं थी।

मौत सबको आनी है। जीते जी मौत को महबूबा समझने वालों को भी आती है। 12 जून को कृतिका चौधरी की मौत से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। किसी ने जानने की कोशिश भी नहीं की कि उसका बेजान जिस्म अगर किसी बंद फ्लैट में सड़ांध मारता रहा, तो कुछ तो ऐसा हुआ होगा, जिसने जिंदगी को ऐसे छला...  तुम्हारी जिंदगी ने तुम्हारे सपनों को छीन  लिया, तो मौत ने जिंदगी को खामोश कर दिया।

तुम्हारी जिंदगी का सच तुम्हारे साथ चला गया। तुम्हारे जाने का गम तुम्हारे माता-पिता को होगा। तुम्हारे बहन-भाइयों को होगा। तुम्हारे गांव के दोस्तों-सहेलियों को होगा। मुंबई की चकाचौंध भरी फिल्मी दुनिया में किसी स्ट्रगलर की मौत की अहमियत नहीं होती। मीडिया से कोई गिला शिकवा करने का हक तुमको नहीं हो सकता। सितारों के रोमांस, अफेयर से लेकर दो बड़ी हीरोइनों की कैटफाइट से लेकर नंबर वन के लिए हीरो और हीरोइनों के नाम तय करने में बिजी मीडिया को एक स्ट्गलर की मौत की वजह तलाशने की फुर्सत नहीं होती।

कोई नहीं जानता कि तुम कैसी जिंदगी जी रही थीं। कोई नहीं जानता कि कौन तुम्हारा दोस्त था और कौन यहां तुम्हारा रिश्तेदार था। कोई नहीं जानता कि हर महीने किराए के लिए पैसों का इंतजाम कैसे होता होगा। कौन नहीं जानता था कि हर शाम तुमको किसी कोर्डिनेटर के काल का इंतजार होता होगा, जिसमें कोई कहे कि मैडम आपको इस रोल के लिए सिलेक्ट कर लिया है। कितने पल ये शब्द सुनने के इंतजार में कटे होंगे और सपनों की हत्याओं का सिलसिला चलता रहा होगा।

तुम अब इस दुनिया में नहीं हो। जाओ, अगर फिर से एक्ट्रेस बनने की ललक लेकर दुनिया में वापस आना हो, तो भगवान जी से सिर्फ इतना वरदान मांगना कि तुमको स्ट्रगलर कभी न बनाए। एक स्ट्रलगर की तो न जिंदगी होती है और न मौत।

शु्क्रिया कृतिका चौधरी, तुम्हारी मौत के नाम मीडिया और स्टारडम की एक दिन की अघोषित मौत की खामोशी को तुम्हारी दिवंगत आत्मा ही समझे तो समझे, धड़कते दिल, चलती सांसे और रिश्तों की राख और खाक पर जमे इंसानों के  लिए ये समझना न तो मुश्किल है और न ही जरुरी।

ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे।


Saturday, June 3, 2017

बालीवुड और हालीवुड में कामयाबी का बुनियादी फर्क


चमत्कार हमारे देश में होते रहते हैं और हमारी फिल्मी दुनिया में भी। चमत्कार को अमूमन तब नमस्कार किया जाता है, जब किसी को अप्रत्याशित कामयाबी मिले। ये मामला उल्ट समझा जा सकता है। उम्मीदों के टूटने को चमत्कार कहना शायद सही न हो, लेकिन चमत्कार कहने से ये बात जल्दी समझ में आएगी, जिसके एक छोर पर दीपिका पादुकोण और दूसरे छोर पर प्रियंका चोपड़ा और ठीक बीच में वो एक शब्द, जिसने इन दोनों देसी देवियों के अरमानों का जनाजा निकाल दिया। इस शब्द को हालीवुड की दुनिया कहा जाता है।

बालीवुड में स्टारडम को जीने के बाद प्रियंका और दीपिका ने जब हालीवुड का रुख करने का फैसला किया, तो इन दो फैसलों की वजह अलग अलग मानी गई। कौन जानता था कि अलग अलग वक्त पर रिलीज हुईं उनकी हालीवुड की पहली फिल्मों के नतीजे दोनों को एक ही कश्ती का सवार बना देगा। हमारी देसी जनता ने अपनी देसी देवियों की इन विदेशी फिल्मों को क्यों खारिज कर दिया, ये कहीं से भी न तो शोध का मामला बैठता है और न ही चौंकाने वाला लगता है। अगर दोनों में से किसी भी फिल्म को कामयाबी मिल जाती, तो मुमकिन था कि इसे चमत्कार ही मान लिया जाता।

शब्दों की बाजीगरी से थोड़ा आगे जाकर अगर बात को सीधे तौर पर समझने की कोशिश करें, तो मामला बेहद सपाट है। दीपिका और प्रियंका की फिल्मों में कामन बात ये रही कि दोनों को कमजोर रोल मिले और सिवाय एक्सपोजर के दोनों को कुछ खास करने को नहीं मिला। ये बात भी उन लोगों को कतई नहीं चौंकाती, जो बालीवुड और हालीवुड के बुनियादी अंतर को मानते हैं। अंतर बहुत साफ है। बालीवुड की फिल्में हमारे परिवेश में बनती हैं और हालीवुड की फिल्में वहां के परिवेश में। हालीवुड में भारतीय कलाकारों को भारतीय किरदारों में ही काम मिल सकता है और वहां की फिल्मों में भारतीय किरदार बहुत ज्यादा नहीं होते। अगर दीपिका या प्रियंका ये मानकर हालीवुड गई थीं कि वो दुनिया उनके बालीवुड के स्टारडम से प्रभावित हो सकती है, तो ये गलतफहमी आज इन दोनों की फिल्मों की नाकामयाबी के साथ सामने आ चुकी है। हमारी फिल्मों में भी कभी कबार कोई अंग्रेज या कोई विदेशी किरदार होता है, तो हम उनको कितनी अहमियत देते हैं? बाब क्रिस्टो (आस्ट्रेलियाई कलाकार)  जिंदगी भर हमारी फिल्मों में जूनियर कलाकार के रोल करते रहे।

इसका मतलब ये नहीं कि पूरा मामला ही निराश करने वाला रहा हो। हालीवुड में हमारे कई कलाकारों ने अपनी जगह बनाई है और अच्छा काम किया है। इरफान से लेकर नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर और दिवंगत ओमपुरी ने हालीवुड की फिल्मों में अपना रुतबा कायम किया और कामयाबी तथा सम्मान दोनों को हासिल किया, जो कम बड़ी बात नहीं कही जा सकती। कुछ दिनों पहले ही आस्कर के मंच से ओमपुरी को जिस तरह से याद किया, वो भारतीय कलाकार के तौर पर ओमपुरी का सम्मान है।

हालीवुड जाने की बात सोचने में कोई बुराई नहीं है। बड़ी बात ये है कि हमारे कलाकार क्या सोचकर वहां जाते हैं।प्रियंका और दीपिका के मामलों में सबसे बड़ी कमजोरी ये रही कि ये दोनों इस सोच के साथ वहां पंहुची कि वे बालीवुड की बड़ी स्टार हैं, तो उनके स्टारडम पर मंत्रमुग्ध होकर वहां उनको बड़ी फिल्मों में मजबूत रोल मिलेंगे। ये खोखलापन इन दोनों को भारी पड़ा। अगर हालीवुड को ग्लैमर के पीछे भागना हो, तो वहां ऐसी सुंदरता की कमी नहीं, जो उनकी फिल्मों की जरुरत को आसानी से पूरा कर सकती हैं। उनको अपनी फिल्मों के लिए भारतीय सुंदरता की जरुरत नहीं होती।

कहते हैं कि वक्त से बड़ा सबक कोई नहीं होता। दीपिका और प्रियंका के पास भी अपनी अपनी गलतियों से सबक सीखने का मौका है। बालीवुड ने उनको स्टार बनाया। भारतीय जनता ने उनको स्टारडम दिया। प्रियंका और दीपिका सिर्फ सुंदर नहीं, अभिनय के मामले में भी वे अपनी काबिलियत को साबित कर चुकी हैं। हालीवुड कभी भी उनकी क्षमताओं का पैमाना न था, न ही हो सकता है। वक्त का तकाजा तो यही है कि बालीवुड का इंटरनेशनल फेस बनने की ललक की हकीकत को पहचानकर अगर ये दोनों अपनी अपनी हालीवुड की फिल्मों के नतीजों के प्रति ईमानदारी से सोचें, तो जवाब बहुत सहज रहेगा कि कहीं जाने की जरुरत नहीं है।

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में कमर्शियल सिनेमा के बाजार के विस्तार में अगर हालीवुड की दुनिया हमारी दुनिया का हिस्सा बनना चाहती है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। आखिरकार दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाली भारतीय फिल्म इंडस्ट्री मौजूदा वक्त में इतनी मजबूत तो बन चुकी है कि हालीवुड को अपनी शर्तों पर यहां कारोबार करने का मौका दे। इन शर्तों में पहली और एकमात्र शर्त यही हो सकती है कि हमारे कलाकारों के सम्मान और काबिलियत को लेकर कोई समझौता नहीं होगा। अगर हम अपने रुख को लेकर स्पष्ट और मजबूती से खड़े रहें, तो हालीवुड को हमारी शर्तों पर काम करना होगा।
प्रियंका और दीपिका की फिल्मों का नतीजा अगर किसी को नहीं चौंकाता, तो इसलिए कि ये होना ही था। बहुत ज्यादा मायूसी की जगह अगर हकीकत के ठोस धरातल को पहचान कर दीपिका और प्रियंका पहले बालीवुड की उस जमीन को मजबूत करें, जिनके बूते वे स्टारडम के शिखर पर पंहुची हैं, तो आने वाले कल में मुमकिन है कि हालीवुड का पेशेवर बाजार उनके साथ हमारी दुनिया, हमारी जमीन पर हमारी शर्तों के साथ काम करे और वो दिन जब आएगा, तो चमत्कार को नमस्कार करने की जरुरत नहीं होगी।

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...