वे हमारे बीच से जा चुके हैं। कोई कहता है कि कलाकार कभी नहीं मरता, तो कोई कहता है कि अपने काम के साथ जिंदा रहता है और कोई कहता है कि उनकी हमेशा याद आएगी। मौत का आखिरी सच हमेशा क्रूर बनकर ही सामने आता है। ओमपुरी के साथ अलग-सा कुछ नहीं हुआ। खबरों को माना जाए, 5 जनवरी के बाद वाली रात को उनको दिल का दौरा पड़ा। उस रात वे घर में अकेले थे, इसलिए साक्षी कोई नहीं। सुबह जब उनकी मृत देह पाई गई, तो यही मान लिया गया कि मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। वजह जो भी हो, अपनी जिंदगी के आखिरी पलों में ओमपुरी अकेले ही रह गए। मौत से जूझे या नहीं, ये सच उनके साथ ही हमेशा के लिए चला गया। दिल के दौरे के अलावा कुछ और होता, तो पोस्टमार्टम में सामने आ चुका होता। मान लेते हैं कि दिल का दौरा पड़ने से ही ओमपुरी का देहांत हुआ।
66 साल के जिस शख्स ने जिंदगी के 40 साल फिल्मों में गुजार दिए, उसका यूं अाखिरी पलों में अकेले रह जाना कोई मामूली बात नहीं रह जाती। इस चमक-दमक की दुनिया में ओमपुरी को कामयाबी के नाम पर क्या नहीं मिला। बड़े बड़े पुरस्कार, सम्मान मिले। बड़ी फिल्मों में काम करने का मौका मिला। दुनिया के सिनेमा में कामयाबी पाने वाले चंद भारतीय कलाकारों में उनकी गिनती हुई। किसी भी न्यूकमर के लिए इतना सब किसी ख्वाब से कम नहीं होता, जिसके साथ नए कलाकार मुंबई संघर्ष करने आते हैं।
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| Ghashiram Kotwal |
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| Aakrosh |
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| Ardhsatya |
ओमपुरी भी ऐसे ही ख्वाबों के साथ मुंबई आए थे, लेकिन अलग तरीके से। वे मुंबई से पहले दिल्ली के एनएसडी और पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट से कोर्स करके आए थे। दोनों जगह उनकी कलाकारी को भरपूर दाद मिली थी। ऐसे कोर्स नए कलाकारों का हौसला बढ़ाने में बेहद प्रभावशाली होते हैं। खास तौर पर बिना किसी ट्रेनिंग के फिल्मी परिवारों के स्टार किड की लांचिंग को लेकर अक्सर ये कंपेयर दिलचस्प होता है। ओम पुरी का किसी भी तरह से किसी फिल्मी परिवार से कोई कनेक्शन नहीं था। वे दिल्ली और पुणे से वाह वाही लूटकर मुंबई आए, लेकिन सिनेमा की दुनिया के स्याहपन ने उनको हकीकत की जमीं पर ला पटका कि यहां डिग्री, कोर्स से ज्यादा किस्मत के सितारों की बुलंदी की जरुरत पहले होती है। ऐसा नहीं होता, तो पहले ब्रेक (घासीराम कोतवाल 1976) से पहली पहचान (आक्रोश, 1980) और पहली कामयाबी (अर्धसत्य, 1983, राष्ट्रीय पुरस्कार) के बीच सालों का इतना फासला नहीं होता। ये हुआ, क्योंकि ये बालीवुड की चमकीली दुनिया का स्याहपन है। ये हुआ, क्योंकि ये बालीवुड की निर्ममता का कड़वा सच है। फिल्मी परिवारों के बच्चों को छोड़ दिया जाए, तो बड़े बड़े सूरमाओं को संघर्ष की इन गलियों में रहना पड़ा। धर्मेंद्र से लेकर राजेश खन्ना और मनोज वाजपेयी से लेकर नवाजुद्दीन तक के संघर्ष की दास्तानों वाली ये गिनती लंबी है।
धर्मेंद्र और राजेश खन्ना तो हीरो बनने ही आए थे। यही उनका ख्वाब था और यही उनके संघर्ष की मंजिल। ओमपुरी के नसीब में तो ये खवाब भी नहीं था। एनएसडी और पुणेे इंस्टिट्यूट के इस धुरंधर की तमन्ना और हसरत महज इतनी थी कि करने के लिए रोल मिले और एवज में इतने पैसे कि पेट भर जाए। कला की फिल्मों की दुनिया ने ओम पुरी को इतना भी नहीं दिया। रोल मिले, शोहरत मिली, लेकिन पैसों के लिए सालों तक उनको दोस्तों पर निर्भर रहना पड़ा। भूखे पेट एक्टिंग ही नहीं होती, परफारमेंस क्या होगी, इस बुनियादी सोच को झूठलाती कला फिल्मों की दुनिया को आखिर रोशन भी ओमपुरी जैसों ने ही रखा, जिनको सालों तक भूखा मारने में इन फिल्मों के सूरमाओं को तनिक संकोच नहीं हुआ होगा।
एेसे में पेट भरने की जरुरत ने ओमपुरी को उसी कमर्शियल दुनिया में भेजा, जहां रोल अच्छे मिलें या न मिलें, लेकिन पैसे जरुर मिल जाते हैं। ओमपुरी को अगर कमर्शियल फिल्मों की दुनिया ने मौके न दिए होते, तो न जाने कला फिल्मों की दुनिया उनका क्या हाल करती। सोचकर भी अजीब लगता है। कला फिल्मों की दुनिया ने उनको पहचान दी, पुरस्कार दिए, सम्मान दिलाया, लेकिन ओमपुरी को उनका अपना घर और कार कमर्शियल फिल्मों की उसी दुनिया से मिली, जिस पर अक्सर कलाकारों के टेलेंट के साथ इंसाफ न करने की तोहमत लगती है। इस मुद्दे पर बहस फिर कभी
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| with first wife Seema |
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| With Second wife Nandita and Son Ishan Puri |
यहां असली मुद्दा ये नहीं है कि कमर्शियल और नान कमर्शियल सिनेमा में से किसने ओम पुरी को क्या दिया और क्या नहीं। यहां असली मुद्दा ये है कि कैसे 40 साल गुजारने वाला 66 साल का अदाकार अकेले रहने को मजबूर हो जाता है। इसे अोमपुरी का प्राइवेट मामला कहकर नहीं टाला जा सकता। अकेलापन जिस कलाकार को लील गया, वो प्राइवेट मामला नहीं हो सकता। ओम पुरी को अगर ओमपुरी बनाने वाले लोग आम हैं, तो उनकी जिंदगी के इस स्याहपन पर बात करने में आम लोगों के लिए कोई प्राइवेट का बोर्ड नहीं लग सकता। ओम पुरी 40 साल की फिल्मी जिंदगी के बाद गरीब नहीं रहे थे। घर-दौलत, बैंक बैलेंस वगैरहा में वे अच्छी पोजीशन में पंहुच चुके थे। यहां आर्थिक संकट का मामला नहीं जुड़ता। बस एक ही बात रह जाती है कि अपनी कमाई से बनाए आलीशान मकान (घर कहना ठीक नहीं) में हर शाम, हर रात शराब में डूबोने वाला कलाकार अगर अकेला रह जाता है, तो इस अकेलेपन को बालीवुड की वही चमक स्याहपन में बदलती जाती है, जहां औपचारिकताओं से परे कोई किसी का साथ देने को तैयार नहीं होता। न तो इसके लिए किसी के पास वक्त है और न ही जरुरत। ओमपुरी इस अकेलेपन के अकेले शिकार नहीं है। परवीन बाबी से लेकर जिया खान तक न जाने कितनी जिंदगियां इसी अकेलेपन की शिकार होकर गुमनामी और अाखिरकार मौत की दहलीज पर धकेल दी जाती हैं।
ओमपुरी शादीशुदा थे। दो दो बार उन्होंंने शादी की। उनकी शादीशुदा जिंदगी अर्धसत्य की कालिमा बनकर रह गई, जिसमें बिखराव का सच ही रिश्तों के मलबे में दबकर रह गया था। इस अर्धसत्य का पूर्ण सच आज हकीकत बन गया, जब एक कलाकार हमेशा के लिए यादों में सिमट गया। ओमपुरी की फिल्मों की लिस्ट लंबी है,जिसके लिए उनको याद कीजिए। कुछ पल, उसी इंसान की तन्हाई के लिए, जिसके पास कैमरे के सामने रोने-हंसने का काम था, जो एक्शन और कट की आवाज के साथ पूरा हो जाता था। कौन जाने, अपनी जिंदगी की आखिरी रात में उस कलाकार की हंसी-आंसू न कोई देखने वाला, न कोई रोकने वाला। ऐसी तन्हाई और ऐसे स्टारडम की चमक दो सत्यों के फासले रेखांकित करती है, जिसमें एक अर्धसत्य बना रहा और दूसरा अब पूर्ण सत्य बन गया









4 comments:
Really heart touching..
touched by some unheard stories of a great actor.
He was truly a gem. Very well written.
A true gem. Very well written
He was a true legend...may he rest in peace 🙏
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