Sunday, January 29, 2017

भंसाली जी, पिक्चर अभी बाकी है.....






जयपुर में संजय लीला भंसाली और उनकी फिल्म के सेट पर जो फसाद किया, उसके एक नहीं, कई सारे पहलू हैं। राजपूती शान के नाम पर बनी किसी सेना के गुट को दोषी मानना उस केंद्र की सत्ता की अनदेखी करना होगा, जिसके मौन इशारे और समर्थन पर आए दिन बालीवुड के उन लोगों को निशाना बनाया जाता है, जिनको सत्तासीन पार्टी और उनके विचारक दल अपना दोस्त नहीं मानते। मामला कुछ ऐसा ही समझो, जैसे कि कश्मीर या कहीं भी कोई हमला कराने के बाद कोई बड़ा आतंकी संगठन जिम्मेदारी लेने के नाम पर किसी नौसखिया संगठन को आगे कर देता है। ये मामला इससे अलग नहीं है।


हमले की घटना सामने आने के बाद राजस्थानी सरकार के मंत्रियों से लेकर देश की सत्तासीन पार्टी के आला नेता खींसे निपोरकर राजपूती शान की यादों का मातम मना रहे थे, तो फिर शक कहां रह जाता है कि भंसाली को दिए गए पैगाम के कनेक्शन कहां कहां से जुड़ते हैं। देश के मुखिया से तो कतई उम्मीद मत कीजिए कि वे इस हमले की निंदा में एक शब्द भी खर्च करेंगे। साहेब के लिए बालीवुड का मतलब सलमान के साथ पतंग उड़ाने, उनको जेल जाने से बचाने की तरकीबें लड़ाना और सहनशीलता की बात करने के गुनाह कर चुके खान सितारों को बार बार जलील करने तक सीमित है। ये भी तो आखिरकार कोई छोटा-मोटा काम नहीं होता। हां, मधुर भंडारकर और अनुपम खेर की भक्ति की खुशी की खुराक का मामला अलग रह जाता है। उसका इस चर्चा से कोई सीधा या कैसा भी वास्ता नहीं बैठता। हैरानी की बात नहीं रही कि केंद्रीय सरकार की सत्ता का हर बात पर समर्थन करते आए अनुपम खेर को भंसाली वाले मामले पर चुप रहने को कहा गया। भंसाली को देशद्रोही करार देने वाली सेना में अनुपम खेरों की कोई कमी नहीं है।


यहां बात दूसरी हो जाती है। समझने वाली बात ये है कि ये चोट भंसाली को पंहुचाने की कोशिश थी या बालीवुड में अपने विरोधियों को कोई नया संदेश देने की कोशिश थी या फिर इस चुनावी माहौल में राजपूती वोटों के असर वाले इलाकों के लिए कोई सलीके से बनाया गया प्लान, जिसमें संदेश साफ रहे कि केंद्र की सत्ता राजपूती संवेदनाओं का सम्मान करती है और उसी पुराने जुमले को दोहराना कि किसी मुस्लिम शासक की तारीफ बर्दाश्त नहीं होगी। खुदा जाने, अगर 60 के दशक में ये सेना और मानसिकता होती, तो मुगले आजम कतई नहीं बनती। के. आसिफ को एक राजपूती रानी के सम्मान को ठेस पंहुचाने के इल्जाम में चपियाने का काम जरुर कर लिया जाता। बच गए आसिफ साहब और बच गई अकबर की प्रेम कथा।

सीधे तौर पर भंसाली के साथ जो भी किया गया, उसके लिए कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। भंसाली अपनी फिल्म की कहानी को सात तालों में बंद रखना जानते हैं। किसी को नहीं पता कि उनकी फिल्म में पद्मावती का किरदार क्या है, खिलजी के साथ उसका रिश्ता क्या है। तर्क वाली बात ये होती कि जब फिल्म बनकर तैयार हो जाती, तो इस कथित सेना के कप्तान साहब अपने अंदेशों को लेकर कोर्ट में अर्जी लगा सकते थे। मुमकिन था कि भंसाली को रिलीज से पहले अपनी फिल्म दिखा देते। मामला क्लीयर हो जाता, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि ऐसा करने की कोई मंशा नहीं थी। ये भी नहीं है कि इस तरह से किसी निर्माणाधीन फिल्म के सेट पर इस तरह का हल्ला गुल्ला पहली बार किया गया हो। बनारस काफी लोगों को याद होगा, जहां दीपा मेहता की फिल्म वाटर की शूटिंग पर कल्चर के पहरेदारों का झुंड इसी तरह से टूटा था। दीपा मेहता इंटरनेशनल स्टंडर्ड की मेकर हैं, इसलिए दुनिया भर में हमारे कल्चर का तमाशा बना। दीपा मेहता ने श्रीलंका में शूटिंग करके फिल्म को रिलीज कर दिया। कल्चर के पहरेदार शांत रहे। चलिए, बात को आगे बढ़ाते हैं।
दीपा मेहता का तो कुछ नहीं बिगड़ा, भंसाली का कुछ बिगड़ेगा, ये भी नहीं कहा जा सकता। इलेक्शन में अगर राजपूती वोट मिल गए, तो इस छोटी-मोटी बात को कोई याद भी नहीं करेगा। जो लोग कह रहे हैं कि भंसाली ने अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए अपनी फिल्म के सेट पर खुद को रुसवा कराया, वो निरे मूर्खों की दुनिया के बाशिंदे हैं। अगर भंसाली की फिल्म के रिलीज में एक-दो महीने बचते, तो इस तर्क का आधार बनता था। भंसाली मूर्ख नहीं है कि पब्लिसिटी के इस बेहतरीन मौके को फिल्म बनने से पहले यूं जाया करे। भंसाली खासे अनुभवी हैं। बाजीराव मस्तानी के रिलीज के वक्त विरोध को अपनी फिल्म के लिए इस्तेमाल करने के गुरों की नुमाइश कर चुके हैं। वे पद्मावती के लिए कोई स्टंट नहीं करेंगे, ये कोई नहीं कह सकता, लेकिन जब आधी फिल्म बननी बाकी हो, तो एेसे में भंसाली जैसा घाघ इंसान ये ओच्छी चोट करने की हिमाकत नहीं करेगा।


चुनावी समर में राजपूती वोटों की खातिर ये खेलना इस पार्टी को जंचता भी है और फबता भी है और इसके लिए उनके पास धुरंधरों की टीम है, जो इस तरह के कारनामों को अंजाम देना जानती है। सियासी गुणाभाग वाले बताते हैं कि यूपी, पंजाब के कई इलाकों में राजपूती वोटों की तादाद काफी असरकारक है। ये सियासी दांव है, तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे कि अपने ही गुजराती भाई (जी हां, भंसाली गुजरात से ही आते हैं) को ऐसे पिटवाकर गुजरात के महापुरुष ने फिर साबित कर दिया कि सियासत मतलबपरस्ती का कोई और मतलब नहीं रह जाता।



अब इस मसले का एक और पहलू कि क्या ये बालीवुड को कोई नया सिगनल है, तो ये कमजोर पहलू लगता है। पूरे बालीवुड को सिग्नल देने के लिए उनके पास सलमान खान से लेकर उनके अब्बा हुजूर, अनुपम खेर से लेकर मधुर भंडारकर तक की खासी फौज है। शाहरुख और आमिर सरीखों का गुनाह समझ में आता है कि उन्होंने सहनशीलता के मुद्दे पर मुंह खोलने की गुस्ताखी की थी। उनको लपेटना सत्ताधीशों के अनुायायियों का हक बनता है। इसीलिेए तो रईस के वक्त भी देश द्रोही कहकर शाहरुख खान को नमन करना बदस्तूर जारी है। भंसाली ने तो कभी न तो इस पार्टी के खिलाफ कुछ कहा, न ही देश के मुखिया के लिए कुछ बोला। जाने-अनजाने में कोई पाप उनसे हुआ, तो बात अलहदा हो जाती है। समझ में नहीं आता कि एक गैर राजनैतिक दिलचस्पी रखने वाले एक फिल्मकार को, जो अपनेअाप में मस्त रहता है और बालीवुडवालों से ही भिड़ता रहता है, उसे सियासत के इस घिनौनेपन का शिकार क्यों बनाया गया, जिसका किसी चुनावी कसरत से कोई वास्ता ही नहीं है।


साफगोई से तीन-चार बातें- अगर सिर्फ विधानसभा चुनावों में चंद राजपूती वोटों की खातिर अगर ये चिंगारी दिखाई गई, तो एक दिन इसी आग में इस पार्टी के सत्ता से जुड़े सपने स्वाहा होंगे। अगर बालीवुड को संदेश था, तो थैंक यू। बालीवुड की विचित्र नगरी के प्राणी अगर अब भी सियासती झंझावत में फंसकर अलग अलग राग और ढपली बजाते रहे, तो याद रखिए कि हर वो शख्स अपना गाल बचाकर रखे, जो मोदी की स्तुति करना नहीं जानता। अपने आका को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तैयार और वोटों की खातिर कुछ भी करने को तैयार इन आकाओं से निपटने के लिए बालीवुड को एकजुट होना जरुरी नहीं, मजबूरी समझी जाए या लाचारी, लेकिन अब कोई रास्ता नहीं। सत्ता के लालच में सियासी मैदान में घोड़े दौड़ाने वाले बालीवुड के सितारों ने अगर अपने समुदाय का साथ नहीं दिया, तो उनको भी याद रखना होगा कि सियायत की जमीन पर किसी को अपनी मर्जी से फसल  की पैदावर नहीं दी जाती, वहां रहमोकरम पर रहना होता है। बालीवुड को जो संदेश दिया जा रहा है, उसे समझे। खामोश न रहे। एकजुट होकर इन सियासी खेलों को समझा जाए और रेस्पांस दिया जाए।


बालीवुड के बंदे भी याद रखते हैं कि 2019 का आधा सफर ही बचा है। असली खेल उस वक्त होगा, तब तक इन मोहरों को समझकर उनकी ही चाल से दांव खेलना होगा। भंसाली इस थप्पड़ की गूंज को याद रखें, तो पूरा बालीवुड बहुत कुछ समझ सकता है। आखिरी संदेश- सियासत में शर्म नहीं होती और शर्म करने वालों को कभी सियासत करनी नहीं आती। वे अपना खेल आगे भी खेलेंगे। साफ्ट टारगेट होने का मातम मनाने की जगह सही समय पर सही चोट करने के मौके का इंतजार किया जाए और संदेश दिया जाए, कि संयम और मौका, सियासती दावों में उलटफेर करते आए हैं।


भंसाली जी, पिक्चर अभी बाकी है....
 


Sunday, January 22, 2017

रईस बनाम काबिल : इस कारोबार को कानूनों के दायरे में लाने की जरुरत

                                        बनाम       


दिल्ली की फिजां ही कुछ ऐसी है कि वहां जाकर हर कोई सियासी जुबां बोलने लगता है। अगले बुद्धवार से शाहरुख खान की रईस से मुकाबला करने जा रही काबिल के नायक रितिक रोशन ने कहा कि वे चाहते थे कि ये टकराव न हो। रईस के रईस शाहरुख खान भी फरमा चुके हैं कि उनको इस टकराव का अफसोस है। दोनों एक दूसरे की फिल्मों के लिेए गुड-लक भी कह चुके हैं। इन दोनों भले मानुसों को हम भी लगे हाथों गुडलक कहने की रस्म निभा देते हैं।


यहां ये बात बहुत अहम नहीं रह जाती कि दोनों में से कौन सी फिल्म किस फिल्म को बाक्स आफिस के मैदान में पटकनी देगी और कौन सी इस मुकाबले को जीतेगी। वैसे भी इस तरह के मुकाबले में ऐसा कम ही होता है, जबकि हार-जीत जैसा कुछ हो। सबसे ज्यादा संभावना इसी बात को लेकर है कि मुकाबला बराबरी पर रहेगा और दोनों को अच्छी खासी कमाई होगी। हिट या फ्लाप जैसा इन दोनों फिल्मों के साथ होने की संभावना नजर नहीं आती। शाहरुख और रितिक, दोनों को बड़ी फिल्मों के साथ मुकाबले का अच्छा खासा अनुभव रहा है। दिलचस्प ये है कि दोनों ही बाक्स आफिस के ऐसे मुकाबलों में हार और जीत देख चुके हैं। इससे पहले एक मुकाबला इन दोनों के बीच भी हुआ, जब मिशन कश्मीर और मोहब्बतें एक साथ रिलीज हुई थी। उस मुकाबले में मोहब्बतें मिशन कश्मीर पर भारी पड़ी थी।


ये सब कुछ अतीत का हिस्सा है। मौजूदा सच ये है कि दोनों की फिल्में मुकाबले के लिेए तैयार हैं। हां, ये बात भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि न तो बालीवुड का ये पहला मुकाबला है और न आखिरी। यही इस चर्चा का मूल आधार है कि क्यों बालीवुड में दो बड़ी फिल्मों के एक साथ रिलीज होने को लेकर इतना बवाल काहे होता है। क्या ये जरुरी है। क्या ये कानून है कि एक शुक्रवार को एक फिल्म को सिर्फ इसलिए बाकी फिल्मों का रास्ता रोकने की इजाजत दे दी जाए कि उसमें कोई बड़ा स्टार है या ये बड़े बजट की फिल्म है। कानूनन तो ये मुमकिन नहीं, फिर दो ही रास्ते बचते हैं कि या तो इस बिजनेस को हर किसी के लिए ओपन रखा जाए या फिर कोई रास्ता निकाला जाए, जिससे फिल्म रिलीज करने को लेकर बाक्स आफिस को किसी की जायदाद बनाने का हक न दिया जाए। 


ये आसान नहीं है, लेकिन अब इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक ऐसी दुनिया, जिसमें हर किसी को अपनी मर्जी से, अपनी पसंद से फिल्म बनाने की आजादी है, लेकिन हर धंधे के कुछ तो कायदे-कानून होते हैं। सत्तर हजार करोड़ का सालाना कारोबार करने वाली इस इंडस्ट्री को कैसे चंद बड़े लोगों के रहमोकरम पर छोड़ा जा सकता है। अगर अब तक यही रहा है, तो अब जरुरी हो गया है कि इस गलती को सुधारा जाए और फिल्म मेकिंग से लेकर रिलीज तक को लेकर चंद ऐसे कानून बनाए जाएं, जिनको सख्ती से लागू किया जाए, ताकि इस मुकाबले में हर किसी को बराबरी का मौका मिले। खास तौर पर इन बड़ी फिल्मों के चक्कर में छोटी फिल्मों और प्रादेशिक भाषाओं की फिल्मों को थिएटरों के लिए भटकना पड़ता है। सिर्फ इसलिए कि बड़ी फिल्में रिलीज होती हैं, तो सारे थिएटरों पर एक तरह से कब्जा जैसा हो जाता है।

इसके लिए कोई एक नहीं, बल्कि बहुत सारे खलनायक हैं। बड़े सितारे, बड़े प्रोड्यूसर और साथ में सबसे गंदा खेल सिनेमाघरों के प्रशासक करते हैं, जो बड़ी कमाई के लालच में अपने सिनेमाघरों को बड़ी फिल्मों के हवाले कर देते हैं और छोटे निर्माताओं को कोई मौका नहीं होता। राकेश रोशन हों या शाहरुख खान या कोई और, अब वक्त आ गया है कि रिलीज होने वाली फिल्मों को लेकर कायदे-कानून तय किए जाएं कि किस फिल्म को कितने थिएटरों में रिलीज करने की अनुमति दी जाए और अनुमति देने का काम संगठन के स्तर पर हो। इसके लिए निर्माताओं से लेकर सिनेमाघरों के मालिक मिलकर कोई नीति बनाएं और तय करें कि बिना कायदे कानूनों के सिनेमाघरों को किसी की बपौती नहीं बनने दी जाएगी।

अतीत अपनी जगह है। लेकिन जब वर्तमान और भविष्य की बात होती है, तो सोच भी बदलनी पड़ती है और कायदे भी। अब तक सिनेमाघर सिंगल हुआ करते थे और आमदनी सीमित हुआ करती थी। ये मल्टीप्लेक्स का दौर है, जहां से करोड़ों की कमाई होती है। न्याय का तकाजा ये है कि हर रिलीज होने वाली फिल्म का आखिरी फैसला कोई और नहीं, बल्कि वो आम आदमी करे, जिसके नाम पर करोड़ों का ये कारोबार चल रहा है। आम आदमी फैसला करे, इसके लिए उसे हक मिलना ही चाहिए कि वो सभी फिल्मों में से अपनी पसंद की फिल्म चुन सके। इस फैसले को छिनने का हक न किसी रितिक रोशन को मिलना चाहिए और न ही किसी शाहरुख खान को। अगर दर्शक सिनेमा की दुनिया का भगवान है, तो उसे सबसे बड़ा सम्मान और पदवी मिलनी ही चाहिए। हर शुक्रवार को सितारों की तकदीर के सितारों को तय करने वाले सिनेमा के इस भगवान (आम दर्शक) ने जिस दिन अपना रुख मोड़ लिया, उस दिन कथित तौर पर भगवान की तरह अपने स्टारडम को एंज्वाय करने वालों की सत्ता के महल भरभराकर गिर जाएंगे।

आसान कुछ नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। अगर सिनेमा कारोबार है, तो इसके लिए नियमों का बनाया जाना और सख्ती से उनका पालन करने की जरुरत को अगर अब भी अनदेखा नहीं किया गया, तो आने वाले समय में सिनेमा का खेल बिगड़ता चला जाएगा। अब तक कहा जाता रहा है कि सिनेमा का कारोबार दो और दो पांच की संवेदनाओं से जुड़ा होता है, जिसमें लाजिक काफी पीछे रह जाता है। ये अतीत था। अब लाजिक को पहले लाना होगा और इसे सीधे तौर पर दर्शकों के साथ जोड़ना होगा।

Sunday, January 15, 2017

बिग बास क्या चाहते हैं....

ये तो होना ही था। स्वामी के नाम से एक बंदा बिग बास के घर में आया और भस्मासुर की कहानी को याद कराते हुए अगर थोड़ा सा असभ्य होकर कहा जाए, तो बिग बास नहीं, इसे टेलीकास्ट करने वाले चैनल के बॉस लोगों की बैंड बजा गया। जो हो सकता था, वही हुआ। बिग बास से बाहर निकला कथित स्वामी न्यूज चैनलों के कैमरों के आगे वही करतूतें कर रहा है, जो वो करना चाहता है। उसे अपने चैनलों पर बुलाने वाले मीडिया के महानुभवों के चेहरों पर भी उसने दनादन थप्पड़बाजी की है और साबित किया है कि नकारात्मकता को लेकर हमारे देसी चैनल किस हद तक गिर सकते हैं।
 
 यहां चर्चा उस धूर्त की नहीं है, न ही उसके महिमामंडित में लगे चैनलों की है। यहां घेरे में है कलर्स चैनल, जिसने टीआरपी के खेल में खुद को इतना छोटा कर लिया कि इस छोटेपन का मुकाबला शायद किसी और दूसरे चैनल से हो सके। टीआरपी का खेल भारत का हर चैनल खेलता है। भारत ही नहीं, दुनिया के हर चैनल पर यही खेल होता होगा। हर चैनल को टीआरपी चाहिए, क्योंकि इसके नाम ही धंधा मिलता है। करोड़ों का वारा-न्यारा होता है। इसकी अच्छाई-बुराई अपनी जगह।
जहां तक बात है बिग बास की, तो इसका कांसेप्ट बहुत ही शानदार है। दीन-दुनिया से बेखबर, अनजाने लोगों के बीच 100 से ज्यादा कैमरों के बीच रहने का ये खेल आसान नहीं है। यही वजह है कि पहले सीजन से ये खेल भारतीय दर्शकों को भा गया। ऐसा न होता, तो इसको लेकर इतना बड़ा दांव नहीं खेला जाता। शो का कांसेप्ट ये था कि अलग अलग मिजाज के लोग एक अजनबी दुनिया में एक साथ रहें। जाहिर है, उनके बीच मतभेद भी होंगे और विवाद भी। दोस्ती के रिश्ते भी बनेंगे और टूटेंगे भी। यही इस खेल का रोमांच है और कामयाबी भी।
टीआरपी के लिए उल्टी सीधी हरकतें करने के माहिर चैनलों को निगेटिव किरदार ही नजर आते हैं, जिनको हमारा समाज भौंचक्का होकर देखता है और चैनलों का काम हो जाता है। यही तो होता रहा बिग बास में। जान बूझकर चैनल बिग बास के घर में ऐसे लोगों को भर्ती करता रहा, जिनकी पहचान सिर्फ यही थी कि उन्होंने कुछ ऐसा किया, जो विवादों में रहा। विवाद मतलब नकारात्मकता। इन लोगों की बदौलत चैनल को बिग बास के घर की टीआरपी मिलती चली गई। नतीजा ये रहा कि बिग बास के घर में ऐसे लोगों का जमावाड़ा हर साल ब़ता चला गया, जिनका नाम सिर्फ लड़ना-भिड़ना और गाली गलौच करके चैनल के लिए टीआरपी जुटाना था। खेल ब़ढ़ता गया। शो पर स्क्रिप्टेड होने के इल्जाम लगते रहे। इल्जाम आते-जाते रहे। कलर्स के मुंह में बिग बास को लेकर निगेटिव लोगों को भर्ती करने का खून इसकदर मुंह लग चुका था कि देखते ही देखते बिग बास ऐसे लोगों का घर नहीं, अड्डा बनता चला गया।

पिछले नौ सीजनों में कब किसने क्या करतूत की, क्या गुल खिलाए, इसका बखान करने की जरुरत नहीं है। सवाल छोटा सा है और बिना लाग लपेट के कलर्स चैनल के महानुभवों से है। क्या भस्मासुर टाइप के नमूनों की बिग बास जैसे घर में एंट्री बंद होगी या नहीं। क्या कलर्स चैनल के आका इस भस्मासुर की हरकतों से कोई सबक लेंगे, जिसकी हर शरारत की जिम्मेदारी से ये चैनल बच नहीं सकता। अगर पहले ही दिन इस शैतानी सोच को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता, तो आज कहानी दूसरी होती। कम से कम चैनल की इज्जत बच गई होती। चैनल के लिए इस बंदे ने अपनी हरकतों से सीधा संदेश दिया है कि अगर आइंदा ऐसे किसी और प्राणी को लाया गया, तो चैनल को टीआरपी का खेल बहुत महंगा पड़ेगा।
ये एक खेल है, इसे खेल की तरह खेलने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। चैनल को कम से कम एक बार कोशिश करनी चाहिए कि शो को उस भावना के साथ रखें कि परिवार के साथ देखने वाले दर्शकों को भी टीआरपी देनी आती है। टीआरपी चाहिए, तो जरुर मिलेगी, बस इस घर से बुरी आत्माओं को दूर रखें। चैनल याद रखे कि भस्मासुर पैदा करोगे, तो नुकसान शो को होगा। क्या अब भी चैनल की नींद नहीं टूटेगी

Friday, January 6, 2017

देसी फिल्म की अंग्रेजी सोच का आईना




सोशल मीडिया पर आमिर खान की दंगल को जब इस दौर की मदर इंडिया कहा गया, तो पहली नजर में ये अतिशियोक्ति का मामला लगा, लेकिन थोड़ा सोचने पर लगा कि कुछ बातों को लेकर इस तुलना का कुछ आधार तो तय हो सकता है। मसलन, दोनों फिल्मों का आधार गांव की जिंदगी, गांव की सोच और गांव की परंपराएं हैं, जिनमें अक्सर औरतों को रसोई के लायक ही माना गया। दोनों में महिला सशक्तिकरण को कहानी के साथ सीधे तौर पर जोड़ा गया। जो बात अलग रही, वो ये कि मदर इंडिया का किसी खेल से कोई वास्ता नहीं था।
टीम दंगल और खास तौर पर आमिर खान के साथ निर्देशक नितेश तिवारी इस बात पर फख्र कर सकते हैं कि उनकी फिल्म को इतनी महान फिल्म के साथ कंपेयर किया गया। बात को यूं भी कहा जा सकता है कि दोनों देसी ठेठपना समेटे हुए फिल्में रहीं। कुछ लोग ये भी मान रहे हैं कि दंगल के बाद हिंदी सिनेमा का रुख गांव की ओर मुड़ सकता है, तो मुमकिन है कि देसीपन के साथ हिंदी सिनेमा के टूटे रिश्तों के तार फिर से जुड़ जाएं। ये जब होगा, तब होगा, अभी तो ये बात उम्मीद से ज्यादा कहीं नहीं ठहरती।

एक बात जरुर ठहरती है, जो दंगल को मदर इंडिया से जोड़ी जाए, तो इसकी सार्थकता बढ़ेगी। फर्ज कीजिए कि महबूब खान ने 2016 में अगर मदर इंडिया फिल्म बनाई होती, तो उनको अंग्रेजी दां मीडिया से दो-चार होना पड़ता और बहुत मुमकिन होता कि महबूब खान को रिलीज के बाद मदर इंडिया के लिए प्रमोशन की खातिर अंग्रेजी मीडिया को ही थैंक यू कहना होता।

दंगल के साथ भी ऐसा ही कुछ होता नजर आया। फिल्म रिलीज हुई, तो देसीपन के मिजाज को लेकर तारीफ बंटोरने वाली दंगल से जुड़ी आमिर खान की मार्केटिंग टीम के धुरंधरों को यही सही लगा होगा कि रिलीज के बाद सिर्फ अंग्रेजी अखबारों, चैनलों और डिजिटल के धाकड़ों के कमेंटस को ही प्रमोशन में इस्तेमाल किया जाए। मुमकिन ये भी है कि दंगल की मार्केटिंग टीम को ये लगता होगा कि अंग्रेजी के अलावा किसी और भाषा के मीडिया में तो दंगल की तारीफ में एक शब्द भी न कहा गया होगा, न लिखा गया होगा।

यहां भाषा को लेकर विवाद का मुद्दा नहीं है। हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी सोच के असर को लेकर काफी कुछ लिखा गया है और लिखा जाता रहेगा। यहां आमिर के अंग्रेजी लगाव को चुनौती नहीं है, न ही किसी तर्क से इसे गलत ठहराने की कोई कोशिश। कुल जमा बात इतनी सी है, जो अगर हरियाणवी स्टाइल में ही कही जाए, तो कुछ यूं होगी कि अगर तैने अंगरेजी के साथ दूसरी जबानों को भी थोड़ी अहमियत दे दी होती, तो क्या तेरी भैंस की बावली पूंछ निकल जाती के

बात मजाक की नहीं है, अफसोस इसीलिए हुआ कि आमिर ने इसे मजाक बना दिया। आमिर ने इसलिए कि अगर दंगल के सारे देसीपन का क्रेडिट आमिर को जाता है, तो इस अंग्रेजीपन के लिेए भी वही जिम्मेदार हैं। आमिर खान अंग्रेजी में बतियाएं, इससे किसको क्या तकलीफ। उनकी टीम अंग्रेजी मीडिया की तारीफ में शीर्षासन करे, इससे भी किसी को गुरेज नहीं। ये भी कोई नहीं कह रहा है कि अंग्रेजी मीडिया ने दंगल को लेकर कोई निगेटिव काम किया। जी नहीं, अंग्रेजी मीडिया ने भी दंगल की तारीफ की, लेकिन ये तो नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ अंग्रेजी के दस मीडिया पब्लिकेशन ही दंगल की तारीफ में जुटे थे।

सारे विलाप का जड़ सिर्फ इतना है कि दंगल ठेठ देसी फिल्म बनी, तो लगा कि आमिर खान की टीम हिंदी और साथ ही रिजनल मीडिया को भी इसका थोड़ा सा क्रेडिट देगी। ऐसा होता, तो ये आमिर का बड़प्पन होता। ऐसा होता, तो दंगल के देसीपन को और मजबूती मिलती। ऐसा होता, तो लगता कि आमिर खान सही वक्त पर सही फैसला करना जानते हैं। अफसोस, हकीकत कहीं और किसी और शक्ल में नजर आई, जो खुशनुमा नहीं थी। दंगल को मदर इंडिया से कंपेयर करने वालों को ये पोस्टर सामने रखकर फिर से अपनी अक्ल के घोड़ों को थोड़ा और दौड़ाना पड़ेगा।

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...