
इधर भारतीय जनता पार्टी ने हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से कंगना का टिकट तय किया और उधर, कुछ ही देर बाद एक टीवी चैनल पर कंगना द्वारा उर्मिला मातोंडकर को साफ्ट पार्न स्टार कहने को लेकर किए गए कमेंट से इतना हंगामा मचा कि इससे समझ में आता चला गया कि कंगना इसी मूड में इलेक्शन लड़ने आई हैं। भला हो कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का, जिन्होंने मंडी के रेट को लेकर ऐसा कमेंट कर डाला कि कंगना को यहां से बचने का साफ मौका मिल गया।
उर्मिला पर किए गए कंगना के कमेंट को कुछ यूं समझा जा सकता है कि कंगना ने किसी भी ऐसे इंसान को अपनी बदजुबानी का शिकार बनाया, जिनके साथ वो रिश्ते में रहीं। आदित्य पंचोली से लेकर अध्यायन सुमन (शेखर सुमन के बेटे) और रितिक रोशन तक जिसके साथ उनके अफेयर के किस्से रहे, उनको कंगना ने जमकर कोसा और किसी को ये बुरा भी नहीं लगा, क्योंकि इन्होंने कहीं न कहीं कंगना के साथ नाइंसाफी की थी।
कंगना यहीं तक नहीं रुकी थीं। महेश भट्ट, जिन्होंने फिल्म गैंगस्टर में उनको पहला चांस दिया, उनको तो कोसा ही, लेकिन उनकी बेटी आलिया भट्ट को भी नहीं बख्शा, जो गैंगस्टर के वक्त एक छोटी बच्ची थी। नेपोटिज्म के नाम पर कपूर खानदान को कोसा, तो मूवी माफिया के नाम पर करण जौहर को उनके ही शो में खरी खोटी सुनाईं और फिर उनके साथ एक शो में नजर भी आईं। कंगना के तेवर शीशे की तरह साफ हैं कि वे उसी अंदाज में इलेक्शन लड़ेंगी, जो उनको आता है। 2014 को भारत की असली आजादी से लेकर गुजरात के महापुरुष को भगवान का अवतार बताने जैसे जुमलों से मीडिया की लाड़ली बनीं कंगना को मंडी की जनता किस अंजाम तक पंहुचाएगी, उसके लिए 4 जून का इंतजार करना पड़ेगा, जब चुनावों के नतीजे सामने होंगे। कंगना के अलावा इसी लिस्ट में भाजपा ने अरुण गोविल को यूपी में मेरठ सीट से टिकट दे दिया। उनको इसलिए टिकट नहीं मिला कि 72 साल (भाजपा में 2014 के बाद 75 साल के नेताओं को मार्गदर्शक बनाने की रिवायत है) के श्रीमान गोविल 1977 से लेकर अब तक 47 साल में सिर्फ दस-बारह फिल्मों में एक्टिंग की होगी। उनको टिकट मिलने के कारणों में पहला ये कि उन्होंने एक टीवी सीरियल में दशरथ पुत्र का रोल किया। दूसरा अब तक भाजपा प्रत्याशियों का प्रचार किया।
अभी आई एक फिल्म (आर्टिकल 370) में प्रधानमंत्री का वैसा ही रोल निभाया, जैसा विकी कौशल की फिल्म ऊरी में रजित कपूर ने निभाया था। इस तरह से विवेक ओबेराय और रजित कपूर के बाद अरुण गोविल का नाम इतिहास की उस लिस्ट में दर्ज हो गया, जिसमें अब तक परदे पर गुजराती महापुरुष के अवतारों का जिक्र होगा। कंगना की तरह मेरठ की जनता को तय करना होगा कि टीवी पर एक किरदार को लेकर खुद को प्रभु श्रीराम कहलाने में गर्व महसूस करने वाले एक औसत दर्जे के अभिनेता को संसद में भेजना है या नहीं।

कंगना और अरुण गोविल को टिकटें देकर गोदी मीडिया में इसे मास्टर स्ट्रोक की वाहवाही लूटने के क्रम को ब्रेक लगाने का काम महाराष्ट्र में भाजपा के ही सहयोगी दल ने किया। सत्ता के लिए अपनी ही पार्टी को दोफाड़ करके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन शिंदे को न जाने कहां से उस गोविंदा की याद आ गई, जिसने 2004 में देश और सोनिया का आदेश के जुमले पर चुनाव जीता और फिर जनता के लिए कुछ नहीं किया। अगले चुनाव आने तक राजनीति में आना मेरी गलती थी जैसे जुमलों के साथ फिल्मों में लौटने वाले गोविंदा को इसी जगह पर लौटने के लिए शिंदे से ज्यादा इस सच्चाई ने मजबूर कर दिया कि हिंदी फिल्मों के सबसे शानदार और जानदार हीरो रहे गोविंदा ने अपने कैरिअर को खुद तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तो ऐसे में राजनीति के अलावा कहीं कोई और ठिकाना नहीं होना था। ये बात शिंदे नहीं समझेंगे और भाजपा के नेता बहुत पहले समझ गए कि गोविंदा के पास ऐसा क्या बचा है कि उनको इलेक्शन की टोपी पहनाई जाए। अब ये कारनामा शिंदे करने जा रहे हैं, तो मामले को भी वही समझेंगे। कयास है कि शिंदे सेना उनको उसी सीट से टिकट देगी, जिसको उन्होंने 2009 में त्याग दिया था। अब देखना होगा कि कभी कहीं न टिकने वाले चीची भैया (गोविंदा का पैटनेम) कब तक शिंदे के पाले में रह पाएंगे।

गोविंदा का मामला शिंदे तय करेंगे, लेकिन कंगना के हाथों उर्मिला की फजीहत को वो शिवसेना कैसे हजम करेगी, जो मराठी माणुस के नाम पर राजनीति करती आई है। कंगना को अगर भाजपा ने मुंबई की किसी सीट का टिकट दिया होता, तो ये मुकाबला उर्मिला बनाम कंगना हो जाता, लेकिन कंगना से मुकाबला करने के लिए उर्मिला मुंबई छोड़कर मंडी नहीं जाएंगी। ये मुमकिन है कि इंडिया अलाइंस की पार्टनर के तौर पर ठाकरे की सेना महाराष्ट्र में किसी सीट से उर्मिला को लड़ाए और जीताकर संसद भेजे, ताकि अगर कंगना भी जीत जाएं तो मुकाबला संसद में हो और कंगना का भला न हो, तो उर्मिला की जीत के मायने हजार गुना बढ़ जाएंगे। अंदरखाने तो बहुत कुछ चल रहा है। इंतजार कीजिए कि मीडिया के कैमरों के सामने संजय राउत या उद्धव का कोई और सेनापति उर्मिला के नाम का टिकट अनाउंस करता है या नहीं।

उर्मिला का मामला लटका हुआ है, तो एक और परिवार में ऐसा ही मामला होने वाला था। कहा जा रहा था कि सुनील दत्त की सीट पर जीतने वाली प्रिया दत्त कांग्रेस छोड़कर शिंदे की शिवसेना का झंडा उठाएंगी, जहां उनके करीबी बाबा सिद्दीकी पहले ही पधार चुके हैं। कुछेक हवाबाजों ने गासिप चला दिया कि प्रिया अगर शिंदे के पाले में गईं, तो कांग्रेस उनके मुकाबले संजय दत्त को मैदान में उतारकर इसे फैमिली मैटर बना देगी। संजय का वैसे तो राजनीति से कोई वास्ता नहीं रहा, लेकिन दिवंगत अमर सिंह के बहकावे में आकर वे समाजवादी की तरफ से लखनऊ सीट पर इलेक्शन लड़ने जा पंहुचे थे। भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जिसने गैरकानूनी हथियार रखने के केस के हवाले से संजू बाबा को ऐसी फटकार लगाई कि वे चुनाव और राजनीति से तौबा कर बैठे। अब प्रिया दत्त को कहीं से भी टिकट मिलने के चांस न के बराबर बचे हैं।

इन चुनावों में सही मायने में लाटरी खुली हेमा मालिनी के नाम की। ड्रीम गर्ल के लिए माना जा रहा था कि दस साल के बाद मथुरा के हालात को देखते हुए इस बार उनको टिकट नहीं मिलेगा। हेमा मालिनी भी यही मानकर चल रही थीं। राजनीति में उन्होंने परिवारवाद का सही मतलब समझकर इस बात का जुगाड़ लगाना शुरु कर दिया था कि इस सीट से उनकी बेटी ईशा देओल को पार्टी मैदान में उतरे। यहां तक कहा जाने लगा था कि राजनीति में आने के मामले को लेकर ही ईशा का अपने पति (भरत) से मनमुटाव हुआ, जो उनके अलगाव की एक बड़ी वजह बना। जब मथुरा सीट से भाजपा उम्मीदवारी सामने आई, तो अपना नाम सुनकर सबसे ज्यादा हेमा मालिनी चौंकी। अब मथुरा की जनता उनके लिए क्या सोचती है, ये भी 4 जून को मालूम होगा।

हेमा मालिनी के टिकट को लेकर धर्मेंद्र का खुश होना बनता था, लेकिन ये भी पक्का समझो कि पिछले चुनाव में पंजाब के गुरदासपुर में पंप उखाड़कर सीट जीतने का मैजिक दिखाने वाले सनी देओल के लिए बाद में उसी इलाके की जनता ने गुमशुदा की तलाश के पोस्टर लगाए। इसी माहौल को भांपकर सनी देओल ने इस बार आलाकमान से चुनावों को लेकर हाथ लिए। अब इस सीट पर उनकी जगह दावा करने के लिए दिवंगत विनोद खन्ना की पत्नी कविता का नाम चर्चा में है, क्योंकि विनोद खन्ना तीन बार इस सीट से जीते थे। ये मामला उन सितारों का था, जिनको भाजपा से टिकटें मिल गईं।
यहां भोजपुरी कोटे वाले मनोज तिवारी (दिल्ली), रवि किशन (जौनपुर) और दिनेश निरहुआ (आजमगढ़) को पार्टी ने फिर से मैदान में उतारा है। भाजपा वालों की मानें तो तीनों जीतेंगे और तटस्थ रहने वालों की मानें, तो इन तीनों में से दो की स्थिति तारारारारा वाली है। अब वे दो कौन हैं, इस बारे में हम कछु नाहीं बतावेंगे।
अब बात कुछ ऐसे सितारों की, जो अब तक आस के झूले में झूल रहे हैं। इस लिस्ट में एक नाम तो अपने उसी कुमार का है, जिन्होंने पत्रकार का लबादा ओड़कर पीएम से आम काटकर खाने या चूसकर खाने जैसे मैजिकल सवाल किए थे। हमेशा से भाजपा के पक्के वाले समर्थकों में से रहे अक्षय कुमार के लिए पहले कहा गया कि दिल्ली में चादनी चौक की सीट से कुमार की टिकट पक्की है, क्योंकि वो इसी इलाके की पराठें वाली गली के बंदे रहे। इस सीट पर मामला नहीं जमा, तो अब कहा जा रहा है कि पंजाब में सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही भाजपा किसी एक सीट पर अक्षय कुमार को उतारेगी, क्योंकि वे सिंह इज किंग के बाद पंजाबी किरदारों के मास्टर बन गए हैं। ये भी मुमकिन है कि गुरदासपुर में इस बार सनी की जगह हैंडपंप उखाढ़ने के लिए अक्षय कुमार पंहुच जाए।

पंजाब में अक्षय कुमार तो चंडी़गढ़ की सीट पर पेंच हैं। इस सीट से अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर एमपी हैं। इस बार उनकी हेल्थ का इश्यू बताया जा रहा है, तो सीट पर अनुपम खेर आजमाइश चाहते हैं। इससे पहले अपनी होम सीट शिमला का टिकट मिलने के लिए भी खेर ने पार्टी और नेताओं की जमकर सेवा की। लंबे समय तक पार्टी के राज्यसभा भेजने के भरोसे को सच मानकर थक चुके अनुपम खेर के लिए इस बार यहीं या कभी नहीं की पोजीशन बन गई है। एक जमाना था, जब विवेक ओबेराय टिकट पाकर सांसद विवेक बनने के सपने देखते थे। अब पार्टी उनको अगर कैंपेन के लिए बुला ले, तो वे इस पर ही सब्र कर लेते हैं।

भाजपा के पास फिल्मी सितारों की लंबी लिस्ट है। कभी भाजपा में रहे शत्रुघ्न सिन्हा गैरभाजपाई दलों में अकेले ऐसे सितारे हैं, जिनका चुनावी टिकट पक्का हो गया है। ममता की पार्टी ने आसनसोल (प. बंगाल) से उनको मैदान में उतारा है। कांग्रेस की लिस्ट में अभी तक कोई सितारा नहीं है। राज बब्बर आगरा या फतेहपुर से टिकट की आस लगाए हुए हैं। अमर सिंह के जमाने में सितारों की फौज जमा करने की शौकीन समाजवादी पार्टी का दामन सूना है। उनके पास दो जया थीं। जयाबच्चन ने राज्यसभा पक्की कर ली और जयाप्रदा भाजपा के पाले में चली गईं, जहां उनके लिए फिलहाल टिकट वाली बात नहीं है।
इस बार सात चरणों में वोटिंग होगी और हर चरण के हिसाब से पार्टियां उम्मीदवारों के टिकट तय करेंगी। इस आधार पर भाजपा या किसी और पार्टी से जुड़े वे सितारे मुस्करा सकते हैं, जो अब तक हां या ना के बीच झूल रहे हैं।
चुनावी मैदान से ये दूसरा ब्लाग हाजिर है। कुछ दिनों बाद नई लिस्टें सामने आने के बाद हमारे ब्लाग का नया पार्ट आएगा। तक तक कमेंट बाक्स में आप ये बता सकते हैं कि आपकी निगाह में फिल्मी दुनिया के कौन-कौन से सितारों को आप संसद की सीट पर देखना पसंद करेंगे।
ब्लाग के ये लिंक भी देखें
केजरीवाल का फिल्मी कुनबा- कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा
इलेक्टोरल बॉन्ड कांड- एक मसाला फिल्म की धांसू स्टोरी
एक ही किस्सा एक ही कहानी, हे अंबानी हे अंबानी
मौत के नाम पर तमाशा
राम तेरे कितने नाम
ओमपुरी- अर्धसत्य की कालिमा, पूर्ण सत्य की लालिमा
ये कैसी नानागिरी ?
2023-2024 : घूमता आईना
मामला रश्मिका का नहीं, लड़कियों की इज्जत का है
1 comment:
अच्छा ब्लॉग लिखा लेकिन शीर्षक नही जमा। शीर्षक फिल्मी महानुभाव बनाम चुनाव हो सकता था।
Post a Comment