Saturday, March 16, 2024

इलेक्टोरल बॉन्ड कांड- एक मसाला फिल्म की धांसू स्टोरी

राजनीति और मनोरंजन की दुनिया में रिश्तों को लेकर बहस होती रहती है। इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर मचे घमासान के बीच भी अनायास इन रिश्तों की बानगी एक बार फिर चर्चा में आ गई है। सोशल मीडिया में ऐसे मीम्स की बाढ़ आ गई है, जिसमें इलेक्ट्रोल बांडस के घटनाक्रम को किसी पाल्टिकल थ्रिलर फिल्म (या इस दौर में वेब सीरिज) के लिए एक दिलचस्प कहानी के तौर पर देखा जा रहा है। 



माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में इस थीम पर कुछ न कुछ जरुर बनेगा। हो सकता है कि आदित्य धर (आर्टिकल 370 के निर्माता) से लेकर विवेक अग्निहोत्री और विपुल शाह (केरल स्टोरी वाले गुजराती)  लेकर मधुर भंडारकर तक यहां प्रतिभाशाली निर्देशकों की कतार मौजूद है, जो अपने आका का एक  इशारा पाकर ऐसी कहानी तैयार करेगी, जिसमें इलेक्टोरल बॉन्ड को किस तरह से भारत ही नहीं, देश की सबसे बड़ी क्रांति साबित किया जाएगा और इस बात का डंका पिटा जाएगा कि सत्तर सालों में जो काम नेहरु और गांधी परिवार नहीं कर पाया, वो इस महामानव ने कर दिखाया। अमेठी की सांसद इस पर भी अपने प्रिय विषय (राहुल गांधी) को जोड़ने से संकोच नहीं करेंगी। 

लगे हाथों ये भी सोचिए कि अगर ये धुरंधर अगर भ्रष्टाचार के इस सबसे बड़े खुलासे को मोदी की महानता में बदलने की कवायद करें, तो इस बार प्रमुख भूमिका कौन निभाएगा।

जी हां, इस कतार में पहला नंबर तो उसी खिलाड़ी का लगेगा, जो पत्रकार का चोला पहनकर पीएम हाउस में आम काटकर खाने और आम चूसने की पत्रकारिता करने पंहुचा था। ये अलग बात है कि  इस वक्त उसके अपने सितारे गर्दिश में चल रहे हैं और फिल्में बाक्स आफिस पर नाकामयाबी की धूल फांक रही हैं। लेकिन बंदा अब भी मोदी भक्ति में लीन है और अपने भगवान को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी करेगा जैसी स्थिति में है। 

अगर इन सज्जन का पत्ता कटा, तो दूसरे नंबर पर हिंदी फिल्मों के गुटका किंग कहे जाने वाले देवगन भैया होंगे, लेकिन उनके लिए बात शायद इसलिए न बने, क्योंकि उनको महामानव के नजदीक जाने का कोई मौका नहीं मिला है। वे भी लंबे अरसे से मोदी भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्ति में लीन हैं। 

अगर उनका नंबर कैंसिल हुआ, तो कतार में लगे आएंगे वही विवेक, जो पहले भी परदे पर महामानव की आकृति में नजर आए थे, ये अलग बात है कि उनके उस अवतार को किसी ने देखना पसंद नहीं किया और इसके साथ ही पहले से बेहाल चल रहे उनके कैरिअर का पूर्ण विराम जैसा हो गया। अगर फिल्मों की दुनिया में कुछ नहीं बचा, तो उनके पास पार्टी (या कहें मोदी) की सेवा के अलावा क्या बचेगा। 

हो सकता है कि इस बार किसी नए अभिनेता को मौका देने की तर्ज पर उनको भी बैरंग कर दिया जाए और उम्रदराज हो चुके अनुपम खेर को ये मौका दिया जाए। लंबे समय से राज्यसभा की आस में टकटकी लगाए खेर को ये करने से भी गुरेज नहीं होगा। ये अलग बात है कि इतनी सेवा के बाद भी खेर को न राज्यसभा में भेजा गया और न लोकसभा में भेजने के लिए कोई टिकट मिला। खबरों में बनने के शौकीन और उस्ताद खेर को अपने भगवान को खुश करने के लिए ये भी करना पड़ा, तो मान जाएंगे।  

उनके साथ भी बात न बने,  तो अपने अनिल कपूर भी मौजूद हैं, जिनको चमचागिरी करने और कराने का लंबा अनुभव है और वे इसके लिए किसी मौके को हाथ से नहीं जाने देंगे। 
मान लीजिए कि डायरेक्टर और मेन हीरो की बात तय भी हो गई, लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि चुनाव सर पर आ गए हैं और अब फिल्म से कोई एडवांटेज मिलना मुमकिन नहीं है, तो फिर ये प्रस्ताव टाला जा सकता है। 

अब ये मई में ही पता चलेगा कि इसे लेकर अगला फैसला या तो मौजूदा प्रधानमंत्री करेंगे या नए प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल गांधी करेंगे। ये भी मान लीजिए कि ये गुजराती महापुरुष अगर भूतपूर्व प्रधानमंत्री हो गए, तो फिर इन  इलेक्टोरल बॉन्ड पर फिल्म बनाने में होड़ जरुर मचेगी और इस मुकाबले में निर्देशन के लिए अनुराग कश्यप से लेकर अनुभव सिन्हा और मुख्य भूमिका के लिए प्रकाश राज के नाम सामने आएंगे। 

एक जमाना था, जब सिनेमा में राजनीति की उठा-पटक को लेकर फिल्में बना करती थीं। सत्तर के दशक में गुलजार की आंधी से लेकर उसी दौर में आई किस्सा कुर्सी का हो या अस्सी में अमिताभ बच्चन को लेकर इंकलाब और सच या फिर नब्बे के दशक में मणिरत्नम की रोजा, बांबे और दिल से जैसी फिल्मों के बाद यहां राजनीतिक आधार वाली फिल्में बनना बंद हो गईं और 2014 के बाद इन फिल्मों की जगह सरकारी प्रोपेगंडा वाली फिल्मों का दौर शुरु हो गया, जिसमें टॉयलेट लव स्टोरी (अक्षय कुमार), ताना जी (अजय देवगन) से लेकर मोदी (विवेक ओबेराय), कश्मीरी फाइल, केरल स्टोरी और सावरकर (रणबीर हुड्डा) जैसी फिल्मों की बाढ़ आ गई और सिनेमा की दुनिया साफ तौर पर दो हिस्सों में बंटती चली गई। 

अतीत से निकलकर वर्तमान में लौटते हैं और सोचते हैं कि जब मौजूदा सत्ता ने देश को ही बर्बाद कर दिया, तो सिनेमा की दुनिया कहां से बचती। अब मनोरंजन की दुनिया में बदलाव की बात तो मई में चुनावों के नतीजों के बाद ही आगे बढ़ेगी, तब तक इलेक्टोरल बॉन्ड की घटनाओं से लेकर सिनेमा के लेखक तैयारियां कर सकते हैं। 

अब आप भी बता दीजिए कि क्या ये आजाद भारत में सरकारी करप्शन का सबसे बड़ा स्कैम है या इससे भी ज्यादा कुछ होने जा रहा है? जवाब के लिए कमेंट बाक्स ओपन है। 

ये लिंक भी देखिए-

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1 comment:

Anonymous said...

You composed it so well.. It contains a serious issue with a hint of comedy. Unfortunately I don't understand the 'P' of political stuff. So I wouldn't be able to say anything about the subject. Kudos for your powerful writing :)

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