Thursday, August 17, 2023

गदर 2 और पठान की सफलता में आग लगाने वाले कौन ?


हर किसी को खुश होना चाहिए कि इस साल फिल्म इंडस्ट्री को दो ब्लाकबस्टर फिल्में अब तक मिल चुकी हैं। साल के शुरु में (जनवरी) में यशराज की फिल्म पठान ने आंकड़ों की कामयाबी की एक नई इबारत लिखी, तो पिछले हफ्ते रिलीज हुई गदर 2 ने बाक्स आफिस पर गदर मचा दिया और कामयाबी के झंडे गाड़े। ऐसा मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं था कि इन दो फिल्मों की महासफलता से फिल्म वालों की दुनिया जगमगा जाएगी, लेकिन यहां फिलहाल कुछ और ही मंजर नजर आ रहा है। 

इंटरनेट की दुनिया में होड़ इस बात को लेकर मची हुई है कि बाक्स आफिस पर गदर बड़ी हिट हुई है या पठान। आंकड़ों की बाजीगरी दिखाने के लिए दोनों तरफ की फौज जमा हो गई है। सबसे ज्यादा अफसोस की बात ये है कि इस खेल में कुछ ऐसे विद्वान भी शामिल हो गए हैं, जो इस मुकाबलेबाजी को हिंदु-मुस्लिम बनाने पर तुले हुए हैं और इसे सनी देओल बनाम शाहरुख खान का अखाड़ा बनाया जा रहा है। आंकड़ेबाजी का तमाशा करने वालों में से हर कोई जानता है कि इस दौर में किसी के पास किसी भी फिल्म के सही आंकड़े नहीं होते। हर किसी फिल्म की  प्रोडक्शन कंपनी या फिर कारपोरेट हाउस की तरफ के जो आंकड़े दे दिए जाते हैं, उनको ही सच मान लिया जाता है। इन आंकड़ों की सच्चाई जानने का बैरोमीटर किसी के पास नहीं है। 

90 के दशक तक मामला अलग होता था, जब फिल्म इंडस्ट्री के कारोबार पर नजर रखने का काम ट्रेड मैग्जीन किया करती थीं। उस दौर में चार-पांच ऐसी ट्रेड मैग्जीन हुआ करती थीं, जिनके पास देश भर के हर सिनेमाघर से हर शो के आंकड़े सीधे पंहुच जाया करते थे। ये वो दौर था, जब सिंगल थिएटरों में फिल्मों की कमाई हुआ करती थी। सिनेमाघरों से आने वाले  टिकटों की कमाई के आंकड़ों से फिल्म की शुरुआती कमाई का अनुमान लगाया जाता था और अगले सप्ताह के अंत तक फिल्म की कमाई की स्थिति ज्यादा साफ हो जाया करती थी। उस वक्त सिनेमाघरों में सीटों की क्षमता (मान लीजिए, एक सिनेमाघर में 320 सीटें हैं) और हर शो में टिकटों की बिक्री के गुणा-भाग से प्रति शो से लेकर प्रति दिन और प्रति सप्ताह तक की कमाई को लेकर तस्वीर साफ हो जाया करती थी। उस वक्त एक और खुशनुमा तस्वीर सामने आया करती थी। उदाहरण के तौर पर समझिए, अगर जब उस दौर में गदर जैसी फिल्म को बड़ी कामयाबी मिलती थी, तो सनी देओल की आने वाली फिल्मों के निर्माताओं और निर्देशकों की ओर से ट्रेड पत्रिकाओं में विज्ञापनों के जरिए खुशी व्यक्ति की जाती थी और इस बात पर ताज्जुब नहीं होता था, जब पठान की टीम, यानी यशराज की ओर से भी ट्रेड पेपर में गदर की कामयाबी के लिए टीम को मुबारकबाद के विज्ञापन आते थे। ये एक ऐसा रिवाज था, जो दुनिया को संदेश दिया करता था कि किस तरह से इंडस्ट्री के लोग एक दूसरे के साथ मिलकर काम करते थे। हर शुक्रवार को नई फिल्म रिलीज होती थी और शनिवार को ट्रेड मैग्जीन मार्केट में आया करती थी, जिसके लिए फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों से लेकर स्पाट ब्वाय तक हर कोई इंतजार करता था। 90 के दशक तक हिंदी सिनेमा से जुड़े लोग याद कर सकते हैं कि कैसे मुंबई सिटी के ग्रांट रोड इलाके की नाज बिल्डिंग में ट्रेड मैग्जीनों के आने तक जश्न या मातम का माहौल बन जाया करता था और आंकड़ों का खेल बेपरदा हो जाता था। इन मैग्जीनों में प्रकाशित होने वाले आंकड़ों के आधार पर ही बाकी मीडिया भी फिल्मों की बाक्स आफिस परफारमेंस की खबरें तैयार किया करता था। 

इससे पहले पठान बनाम गदर 2 के मामले पर लौटा जाए, फिल्म के बिजनेस के एक और एंगल को समझने की जरुरत है। पहले जहां सिनेमाघरों से ट्रेड मैग्जीनों तक सीधे आंकड़े आया करते थे, लेकिन देखते ही देखते ये मामला पूरी तरह से बदलता चला गया। फिल्मों को दिखाने के लिए सिंगल थिएटरों की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले ली और फिल्म मेकिंग में प्रााइवेट प्रोड्यूसरों और फाइनेंसरों की जगह कारपोरेट हाउसेस ने ले ली। मल्टीप्लेक्स पर उन कारपोरेट घरानों का ही दबदबा कायम हो गया, जो फिल्मों के लिए फाइनेंस भी देते थे और इन घरानों के पास पैसों की कोई कमी नहीं होती थी, जबकि पहले के दौर में निर्माता को अपने फाइनेंसरों को उनकी रकम लौटाने के साथ भी बड़ी रकम सूद में देनी होती थी। यहां उदाहरण दिया जाए, तो एक करोड़ की रकम के फाइनेंस में बीस प्रतिश्त तक ब्याज देना होता था और अगर फिल्म किसी वजह से वक्त पर बनकर रिलीज नहीं हुई, तो प्रोड्यूसर को ये अतिरिक्त ब्याज चुकाना पड़ता था। 

हां, एक बात जरुर माननी होगी कि उस दौर में भी ट्रेड मैग्जीनों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते थे और कई बार बिजनेस के आधार पर उनके पक्षपाती होने के मामले भी सामने आया करते थे, लेकिन ये सब आटे में नमक के बराबर माना जाता था। अगर ऐसा नहीं होता, तो उस दौर में शोले के रिव्यू में इसे वाहियात फिल्म कहने की हिम्मत नहीं दिखाई जाती और उससे भी बढ़कर, जब शोले सफलता के आसमान में बुलंद हुई, तो उसे वाहियात कहने वाली ट्रेड मैग्जीन ने अपनी गलती मानते हुए माफी मांगी और शोले का फिर से रिव्यू किया। सोचिए, क्या मौजूदा दौर में ये मुमकिन है। 

इस दौर के कारपोरेट घराने फिल्मों की मेकिंग में सीधी भागेदारी करते हैं। वे निर्माता को फिल्म बनाने के लिए बजट के मुताबिक पैसे देते हैं और मेकिंग में एक्टिव रहते हैं। फिल्म के लिए स्टोरी से लेकर सितारों की महंगी फीस और मार्केटिंग से लेकर प्रमोशन तक हर फील्ड की प्लानिंग पर काम करते हैं। एक तरह से देखा जाए, तो हालीवुड की तर्ज पर अब बड़ी फिल्म कंपनियां कारपोरेट घरानों के लिए कमिशन पर फिल्में बनाती हैं और इसके एवज में उनको बड़ी रकम मिल जाती है। फिल्म की सफलता और असफलता से उनका डायरेक्ट कोई लेना देना नहीं होता। इस बात को पठान और गदर 2 के मामले से समझा जा सकता है। इन दोनों फिल्मों के आंकड़े कुछ भी कहें, लेकिन पठान यशराज की फिल्म है, तो इसके आंकड़ों से शाहरुख खान को कोई नुकसान या फायदा नहीं होने वाला। इसी तरह से सनी देओल ने गदर 2 में काम किया है, जिसके लिए उनकी फीस तय हुई। अब फिल्म के बाक्स आफिस पर आंकड़ों से सनी देओल का भी कोई कनेक्ट नहीं। अगर पठान का निर्माण शाहरुख खान की कंपनी रेड चिल्ली एंटरटेनमेंट ने किया होता और गदर 2 को सनी देओल ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी विजेयता फिल्म्स में बनाया होता, तो उस हालत में ये तय था कि बाक्स आफिस के आंकड़ों से उनकी कंपनियों का सीधा कनेक्शन होता। 

ये बात इसलिए अहम हो जाती है कि सोशल मीडिया पर फैंस होने का दावा करने वालों को तो रहने दीजिए, सालों से खुद को फिल्म के ट्रेड एक्सपर्ट होने का दावा करने वाले भी दिन रात इस प्रोपगंडा को फैलाने में लगे हुए हैं कि कैसे सनी ने बाक्स आफिस के मैदान में शाहरुख खान को पटक दिया, मतलब उन साहब के हिसाब से गदर 2 ने पठान से ज्यादा बिजनेस किया है, इसलिए वे गदर 2 को सुपर हिट कहते हैं और पठान के आंकड़ों के लिए शाहरुख खान को कोसते हुए उनको कोई शर्म भी नहीं आती, जबकि असलियत ये है कि पठान का कारोबार पूरा हो चुका है। फिल्म थिएटरों की स्क्रीन से लेकर ओटीटी तक का सफर कर चुकी है, जबकि गदर 2 को रिलीज हुए अभी एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ है। (ब्लाग लिखे जाने तक गुरुवारकी सुबह) बात साफ तौर पर समझ में आ सकती है कि ये साहब, जो खुद को ट्रेड एक्सपर्ट का तमगा देते हैं, वे सनी देओल और उनकी फिल्म गदर 2 के प्रमोशन की कमान थामे हुए हैं, लेकिन इससे भी ज्यादा उनकी खुन्नस शाहरुख खान से है। खुन्नस की वजह वे ही जानते होंगे। ट्रेड को समझने वाला क्या ये बात नजर अंदाज कर सकता है कि पठान का निर्माण शाहरुख खान ने नहीं, यशराज ने किया है और इस फिल्म को लेकर हुई कमाई पर शाहरुख खान नहीं, यशराज का हक है। अगर फिल्म को हुए मुनाफे में से कुछ हिस्सा शाहरुख खान को मिला हो, जैसा कि अमूमन हर बड़े सितारे का प्रोडक्शन कंपनी और कारपोरेट के साथ करार में दर्ज होता है, तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं। फिर भी ये ट्रेड एक्सपर्ट साहब सुबह सवेरे से देर रात तक न जाने कितनी बार गदर 2 के गाने गाते हैं और उतनी ही बार पठान के आंकड़ों के लिए शाहरुख खान को कोसकर खुश होते हैं। कुछ दिनों पहले तक ये साहब शाहरुख खान के स्टारडम की तारीफों में दिन-रात एक कर देते थे, इसलिए ये शाहरुख खान से खुन्नस का मामला ज्यादा लगता है। सबसे बड़ी अफसोस की बात ये है कि शाहरुख खान से खुन्नस में ये लोग इतने अंधे हो चुके हैं कि दो फिल्मों की बड़ी कामयाबी को हिंदु-मुस्लिम के नैरेटिव देने की कोशिश कर रहे हैं और इसे जबरदस्ती सनी बनाम शाहरुख मुकाबला बनाने पर तुले हुए हैं। अच्छी बात तो ये है कि गदर 2 और पठान एक दिन रिलीज नहीं हुई, वरना ये मुकाबला शाहरुख खान और सनी से ज्यादा हिंदु बनाम मुस्लिम का हो जाता। मजे की बात ये है कि सनी की फिल्म के साथ बाक्स आफिस पर उसी दिन अक्षय कुमार की फिल्म ओमाई गॉड 2 रिलीज हुई, लेकिन कहीं से भी इसे सनी बनाम अक्षय का मुकाबला नहीं माना गया। 

यहां फैंस की बात समझ में आ सकती है। अक्सर हर बड़ी फिल्म के रिलीज के मौके पर बड़ी फिल्मों के सितारे इस तरह की आजमाइश में लग जाते हैं कि सलमान बड़े सितारे हैं या शाहरुख या आमिर या उनके मुकाबले अक्षय कुमार, अजय देवगन और रितिक रोशन बड़े स्टार हैं। ये आपसी फुटव्वल इंटरनेट तक ही रहती है और इनके फैंस व्यूज और लाइक से होने वाली कमाई में लग जाते हैं, तो थोड़े दिनों बाद सब शांत हो जाता है। यहां सबको आजादी है कि वो किसी फिल्म या किसी स्टार को अच्छा या बुरा कहें। ये आजादी इन जनाब ट्रेड एक्सपर्ट को भी है, जो किसी पेंदी के लोटे की तरह पैंडलुम हो रहे हैं, लेकिन अफसोस की एक ही बात है कि अपनी खुन्नस में एक इंसान इस बेमेल मुकाबले को इस हद तक घसीट रहा है, जिसे अब शाहरुख खान के मुस्लिम होने या सनी के हिंदु होने को लेकर आपस में गाली गलौज होने लगे।

फिल्म इंडस्ट्री कोई आइडियल जगह कभी नहीं रही। हर दौर में स्टार हुए और उनका स्टारडम रहा, तो इस को लेकर उनके आपसी विवाद भी हुए। फिल्मों के हिट-फ्लाप के गेम भी अपने अपने तरह से खेले गए। बालीवुड के किंग कहे जाने वाले शाहरुख खान की फ्लाप फिल्मों की कमी नहीं रही है, तो सनी देओल की फ्लाप फिल्मों की लिस्ट भी कम बड़ी नहीं है। कहने वाली बात ये है कि शाहरुख खान और उनके फैंस ने पठान की कामयाबी को एंज्वाय किया। अब सनी का वक्त आया है। उनको और गदर 2 की पूरी टीम को कामयाबी एंज्वाय करने दी जाए और साथ में अक्षय कुमार की फिल्म को मिली सफलता के हिसाब से उनकी टीम को भी सेलिब्रेशन का मौका मिले। फिल्म लाइन बहुत बड़ी है। यहां हर किसी को मौका मिलता है। हर किसी को कामयाबी और नाकामयाबी के दौर से गुजरना पड़ता है। रही जहां तक इन कथित ट्रेड एक्सपर्ट की, तो ये उस मौसमी वैज्ञानिक की तरह होते हैं, जो सिर्फ कामयाबी को सलाम करते हैं। ऐसे लोग आज सनी के साथ हैं, तो पलटी मारकर फिर से शाहरुख खान जिंदाबाद के नारे लगाने में इनको वक्त नहीं लगेगा। इनसे एक ही गुजारिश है- जो तमाशा करना है, फैन बनकर कीजिए। ये ज्यादा मजेदार होता है, क्योंकि फैंस के पास आंकड़ों की गिनती नहीं होती और खुद को ट्रेड एक्सपर्ट कहलाने का मौका भी नहीं होता। आखिरी बात- ऐसे लोग न तो पठान बना सकते हैं और न ही गदर 2 बनाने में कोई योगदान दे सकते हैं। विशुद्द तौर पर चढ़ते सूरज की तरह आज सनी तो कल शाहरुख और परसों कोई और की सोच पर इनकी कलाबाजियां चलती रहेंगी। ये तमाशा भी एक तरह से एंटरटेनमेंट है, जिसे कोई शाहरुख या सनी जैसे लोग कभी सीरियस नहीं लेते और न ही ऐसे ट्रेड के जानकारों को। 

बात खत्म करने से पहले गदर 2 की कामयाबी के लिए सनी और फिल्म की टीम को बधाई और पठान के लिए शाहरुख खान और यशराज की टीम को बधाई और ओमाईगॉड2 के लिए अक्षय और उनकी टीम को बधाई। जश्न मनाने का मौका है, जश्न मनाया जाए। 



1 comment:

neha verma said...

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