Disclaimer- ये आलेख पूरी तरह से काल्पनिक है, लेकिन इसके पात्र काल्पनिक नहीं हैं
सत्तर के दशक का आखिरी दौर-बंबई (आज का मुंबई) के एक फाइव स्टार होटल के एक हाल में राउंड टेबल लगा हुआ है। टेबल के चारों तरफ लगी चेयरों के एक-एक नेमप्लेट रखी हुई है। टेबल के फ्रंट साइड पर एक विचारक विराजमान है। हाथों में सिगरेट और प्याले से चाय सुड़कते हुए वो दीवार पर लगी घड़ी को घूर रहा है। घड़ी का घंटा दस बजने की सूचना देता है-
कमरे के अंदर यश चोपड़ा
की एंट्री होती है। वो काला पत्थर की कामयाबी को लेकर डिस्टीब्यूटर्स के साथ
मीटिंग करके आए हैं और काला पत्थर की चकाचक कामयाबी से गदगद हैं।
यश चोपड़ा के आने के
चंद मिनटों बाद हाथों में सिगरेट और सिगरेट का पैकेट लिए प्रकाश मेहरा अवतरित होते
हैं। मुकद्दर का सिकंदर के बाद वो जोरा और सिकंदर को लेकर एक और फिल्म बनाने के
चक्कर में हैं, लेकिन उनको कोई स्टोरी नहीं मिल रही है।
प्रकाश मेहरा के बाजू
में मनमोहन देसाई की चेयर लगी हुई थी, लेकिन अमिताभ बच्चन के नाम पर कहीं दोनों फिर से आपस में न भिड़ जाएं, इसलिए फटाफट उनकी कुर्सियों में फेरबदल किया जाता है और
मनमोहन देसाई को वहां से हटाकर यश चोपड़ा के बाजू में बैठाया जाता है।
प्रकाश मेहरा के बाजू वाली चेयर पर बैठने के लिए एक और गेस्ट की एंट्री होती है। ये हैं बंगाली बाबू ह्रषिकेष मुखर्जी। दादा.. दादा... कहकर यश चोपड़ा, मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा अपनी अपनी चेयर से उठते हैं और दादा को कुछ वक्त पहले रिलीज हुई फिल्म गोलमाल की कामयाबी के लिए बधाई देते हैं। गोलमाल ने बाक्स आफिस पर रिकार्डतोड़ कामयाबी पाकर फिल्मों के कारोबारी पंडितों को चौंका दिया।
इन चारों के आने के बाद एक चेयर अब भी खाली पड़ी हुई है। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता और कमरे में एंट्री होती है शोलेवान रमेश सिप्पी की। वे लगातार जम्हाई ले रहे हैं, क्योंकि पिछली दोपहर से लेकर लेट नाइट तक सलीम-जावेद के साथ उनकी एक नई फिल्म के लिए सीटिंग थी। सिप्पी की इस फिल्म के लिए मल्टीस्टार कास्ट होगी और इसका टाइटल होगा शान। भव्यता में रमेश सिप्पी इसे शोले से कहीं ज्यादा बड़े स्केल पर बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं।
कुछ दिनों के बाद-
मुंबई के एक स्टूडियो में बिखरे हुए बालों और बेतरतीब दाढ़ी के गेटअप में अमिताभ बच्चन तैयार हो रहे थे। निर्देशक के तौर पर रमेश सिप्पी उनको समझा रहे थे कि किस स्टाइल में उनको डायलाग बोलना है। डायलाग था- पुष्पा को फ्लावर समझा क्या। फायर है मैं.. झुकेगा नहीं साला
प्रकाश मेहरा की टीम खामोशी से बैठे आदित्य कश्यप का सीन शूट कर रही है। सीन के मुताबिक, अपने सामने बैठी पंजाब की सिख़ड़ी की बक बक से आदित्य कश्यप परेशान हो चुका है। शाट होने के बाद अमिताभ बच्चन मेकअप रुम में आते हैं, जहां फिल्म में गीत ढिल्लों का रोल कर रही रेखा पहले से बैठी हैं। अगला शॉट उनका होना है।
ह्रषिकेश मुखर्जी ने पंजाब की एक हवेली फाइनल कर दी है। इस हवेली में सुरिंदर साहनी और उनकी बीवी बनी तानी की मैरिड लाइफ वाले सीन फिल्माए जाएंगे। सुरिंदर साहनी को चश्मा फिट नहीं हो रहा था, तो तानी को पंजाबी सलवार सूट में प्राब्लम हो रही थी। लो जी, एक दिन में प्राब्लम साल्व। ह्रषि दा ने सुरिंदर की आंखों से चश्मा ही छिन लिया और सुरिंदर का सीन शूट होने लगा। अपनी बंगाली भाषा के साथ ह्रषि दा गुनगुना रहे थे- तुझमें रब दिखता है... यारां मैं क्या करुं... उनको गाता देखकर हर कोई हंस पड़ा।
बाय बाय करने से पहले
चंद बातें और-
नीचे दी गई तस्वीरों पर गौर फरमाइए-
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| दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे, पुष्पा |
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| जब वी मीट, रब ने बना दी जोड़ी, अजब प्रेम की गजब कहानी |
आप कमेंट बाक्स में बताइए कि आप इन फिल्मों में से किस फिल्म में अमिताभ-रेखा की जोड़ी को देखना चाहते। अगर आपके विचार में इस दौर की किसी और फिल्म को अमिताभ-रेखा की जोड़ी के साथ बनाया जा सकता था,











5 comments:
वाह सर क्या लिखा है लाजवाब
वैसे जब वी मेट में ये जोड़ी वाकई जमती।
Zabardast
Thanks for comments
बेहतरीन लिखा है आपने । मेरे ख्याल से जब वी मेट में दोनों की जोड़ी जबरदस्त जमती। रेखा का चुलबुलापन और अमिताभ का धीर गंभीर रूप फिल्म को चार चांद लगा देता।
Nice
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