रामगोपाल वर्मा पहली फुर्सत में प्रलाप कर सकते हैं कि कटप्पा और बाहुबली ने सरकार 3 का शिकार कर लिया। ये हैदराबादी शब्दों के साथ शातिराना जुगलबंदी करना जानता है। जिसे शक हो, उसके लिए सोशल मीडिया पर रामू के शब्दों के किस्सों की भरमार है।
रिलीज होने के बाद रामू सरकार 3 को लेकर कुछ कहें या न कहें या कब कहें, इन सवालों में उलझने की जगह बेहतर होगा कि रामू के इस सरकारी सफर के तीसरे पड़ाव पर गौर किया जाए, तो एक तरफ इस बात का एहसास होता है कि वक्त किस तरह से अच्छे भले डायरेक्टर को जंग लगा देता है और दूसरा ख्याल आता है कि अगर कोई स्टार फिल्म के एडीटिंग रुम में जा घुसे, इसका ये मतलब कतई नहीं होता कि चाय सुड़कने से फिल्म का स्वाद बदल जाए। परदे के सुभाष नागरे और परदे के पीछे के महाराज-अधिराज श्रीमान बच्चन की
फिल्म एडीटर बनने की ललक की पहली नाकामयाबी पर अफसोस हुआ।
 |
| सरकार 3 |
सरकार 3 के अनाधिकृत संपादक बने बड़़े बच्चन का किस्सा थोड़ा आगे जाकर। उससे पहले रामगोपाल वर्मा की बात हो जाए, जिनके लिए अब यहां से संकरी गली जैसा रास्ता बचा है, जिसके आगे नाकामयाबी और दोहराव के शिकार हो चुके एक निर्देशक के लिए आगे रास्ता बंद है जैसी तस्वीर बन जाती है। सत्या, कंपनी और सरकार की दो कड़ियों के साथ मुंबई के गैंगस्टर पर फिल्में बनाने वाले महारथी निर्देशक की छवि में बुरी तरह से जकड़े रामू अब अपनी इस विरासत को आगे बढ़ाना भी चाहें, तो सरकार 3 के बाद उनके लिए ये नामुमकिन जैसा सच है, जो बड़ी फिल्मों के खेल में उनको बहुत पीछे धकेल चुका है।
90 के दशक में शिवा के साथ रामू ने जब हैदराबाद से मुंबई आकर दस्तक दी थी, जो उनकी पहचान प्रयोगधर्मी फिल्मकार के तौर पर बनी थी। वे हमेशा प्रयोगधर्मी रहे। यहां तक कि जब उन्होंने अपने नाम के साथ आग लगाकर रमेश सिप्पी वाली शोले को ट्रिब्यूट देनी चाही, तो इस भयावह प्रयोग ने उनके नाम ही ट्रिब्यूट का बंदोबस्त कर दिया। याद आता है कि अपनी शोले की खुद मजाक बनाते हुए रामू ने कहा था कि प्रयोग हमेशा कामयाब नहीं होते, नाकामयाबी का जोखिम हर प्रयोग का आंशिक सच होता है। सच तो ये है कि उस प्रयोग की भयावहता इतनी ज्यादा थी कि इसके असर से वे कभी बाहर नहीं आ सके। अगर शोले का प्रयोग एक युवा फिल्मकार के कौशल के ताबूत में पहली कील थी, तो सरकार 3 ने इसे कीलों से पाट दिया है। चलिए, मान लेना चाहिए कि 90 के दशक का एक और दिग्गज निर्देशक लंबी पारी खेलकर अब आउट हो चुका है।
यहां बस एक सवाल बचा रह जाता है कि क्या सरकार 3 की विफलता इतनी भयंकर है कि रामू के लिए आगे के सारे रास्ते अब बंद मान लिए जाएं। इस सवाल के दो जवाब होते हैं। अगर अब यहां से रामू सरकार 4 जैसी कोई फितरत का प्रयोग करने की सोचेंगे, तो रास्ते सचमुच बंद मिलेंगे। अगर गैंगस्टर के झमेले से बाहर जाकर रामू किसी छोटे बजट की फिल्म से वापसी की सोचें, तो बात अलहदा हो सकती है। शोले की आग के बाद भी रामू वापस आए थे, तो अब भी ये नामुमकिनं नहीं। वे अब सरकार और अंडरवर्ल्ड से बाहर की दुनिया में झांके। एक आखिरी मौके के हकदार वे इसी सूरत में हो सकते हैं। सरकार को लेकर तो उनका थका हुआ सफर अब खत्म हो चुका है। रामू की चुनौती अब सिर्फ खुद से है। फिल्मकार के तौर पर इस अपनी चुनौती से रामू को खुद ही जूझना होगा।
 |
| सरकार राज |
अब बात हो जाए एडीटर साब की। बच्चन को सरकार 3 से कुछ खास फर्क इसलिए नहीं होगा, क्योंकि वे हिट-फ्लाप फिल्मों के दायरे से बाहर जा चुके हैं। अगर हिट की बात करें, तो शायद उनको खुद याद नहीं होगा कि उनकी पिछली कौन सी फिल्म हिट हुई थी। फिर भी बच्चन को देखने वाले प्यार करते हैं। इसी प्यार ने उनको फिल्मों के बाजार में बनाए रखा है। बच्चन नागरे बनें या सरकार बनें या कुछ और करें, इससे कोई खास नहीं
रह गया है। ये उनके उस सम्मान की पारी है, जो सालों की उनकी साख का पैमाना है।
 |
| सरकार |
सुपर स्टार से लेकर सदी के महानायक की पदवियों के बीच अमिताभ बच्चन अब फिल्मों की हिट-फ्लाप से ज्यादा अगर सिर्फ अपने किरदार की फिक्र करें, तो भी उनका सफर यू हीं चलता रहेगा। जहांं तक रही एडीटिंग की बात, ये सिर्फ उस पीड़ा का नतीजा है, जो एक अनुभवी सितारा अपनी कमजोर फिल्म को लेकर भांप लेता है। एडीटिंग से ज्यादा जरुरी था कि बच्चन कहानी लिखे जाने के वक्त अगर सजग होते, तो मुककिन था कि सरकार 3 ऐसी नहीं होती, जो हुई। बच्चन तकनीकी रुप से एडीटर नहीं, इस लिहाज से फिल्म की कमजोर एडीटिंग का दोष उनको नहीं जाता, लेकिन क्या ये कम बड़ी बात है कि सरकार 3 की तमाम कमजोरियों के बीच उनकी पुरजोर अदायगी को किसी ने दोष नहीं दिया। वे बड़े हैं। अनुभवी हैं। सत्तर की उम्र पार कर चुके हैं। ऐसे में एडीटिंग सीखने का शौक हो गया हो तो इसमें भी कोई बुरी बात नहीं, लेकिन एक्टर अमिताभ बच्चन के पास अब भी विरासत और कामयाबी का वो पैमाना है, जिसके आगे सरकार 3 जैसी फिल्मों की कोई बिसात नहीं है।
 |
| रामगोपाल वर्मा की आग में गब्बर सिंह के तेवर |
सरकार 3 बच्चन की नाकामयाबी नहीं है। ये रामगोपाल वर्मा नाम के उस प्राणी की घोर विफलता है, जो अपनी पारी खेल चुका है। बच्चन के साथ फिल्में बनाने वाले निर्देशकों की कमी नहीं। इन निर्देशकों के पास सिर्फ और सिर्फ बच्चन के लिए किरदारों की कोई कमी नहीं। बच्चन सरकार 3 के रास्ते से आगे बढ़ जाएंगे। सरकार 3 ने रामू के रास्ते बंद किए हैं। अमिताभ बच्चन आज भी जहां खड़े हो जाएं, वहां रास्ता खुदबखुद बन जाता है। एडीटिंग जैसी नादानी (सत्तर साल वाली नादानी) के प्रहसन के बाद भी वे अमिताभ बच्चन हैं और ऐसे ही रहेंगे।
अमिताभ नई फिल्म से फिर आगे बढ़ जाएंगे। सरकार 3 ने असली पटकनी तो उस रामू को दी है, जो अब सोशल मीडिया पर अपनी जुबां का खेल खेलेंगे और कोई मौका मिला, तो फिर से डायरेक्टर की कुर्सी तक पंहुचने की कोशिश कर सकते हैं। इस कोशिश में बस ख्याल इतना रखें कि सरकार जैसे विध्वंसक प्रयोग के लिए बच्चन तो अब मिलने से रहे। न एक्टर, न एडीटर.... इससे आगे की जहां तक बात है, तो रामू याद रख सकते हैं कि हर अंधेरे के आगे एक दिन की रोशनी जरुर होती है...
1 comment:
वाह।
लाजवाब विश्लेषण।
रामू अपने फितूर के कैदी होकर रह गए हैं।
Post a Comment