Wednesday, May 17, 2017

रिश्तों की जंजीर में जकड़ा फिल्मकार


प्रकाश मेहरा की आज (17 मई, 2009) बरसी है। उनकी यादों को सिर्फ एक लाइन में समेट दिया गया है कि अमिताभ बच्चन को जंजीर से पहली कामयाबी देने वाला डायरेक्टर। बस, लगता है कि प्रकाश मेहरा का कैरिअर सिर्फ एक जंजीर और एक अमिताभ बच्चन के सुपर स्टारडम तक अगर सिमट जाता है, तो ये प्रकाश मेहरा की बदनसीबी से ज्यादा उस दौर का आईना है, जिसमें कुछ दिनों पहले इस बात को लेकर मातम मनाया गया कि विनोद खन्ना जैसी हस्ती को उनके आखिरी सफर में कांधा देने के लिए कितने सितारे पंहुचे।



8 साल पहले प्रकाश मेहरा के अंतिम सफर में भी उंगलियों पर गिनने लायक  सितारे पंहुचे थे। दिवंगत विनोद खन्ना की आत्मा इस बात के लिए कहीं न कहीं ऋषि कपूर के लिए थैंक यू महसूस करती होगी कि अंतिम सफर को लेकर उन्होंने इस दौर के सितारों को खरी-खोटी सुनाई। प्रकाश मेहरा की रुह को तो कभी कोई ऋषि कपूर जैसा बंदा मिला ही नहीं, जो रिश्तों की अहमियत को लेकर कुछ कह सके। उनको तो जीते जी ही रिश्तों के वे आईने नजर आने लगे थे, जिसमे स्याहपन के अलावा कुछ भी नहीं था।


बरसी के मौके पर किसी से जुड़ी मीठी यादो को ताजा करना सबसे आसान हो जाता है। प्रकाश मेहरा को बरसी के मौके पर इन यादों के साथ ताजा करना सबसे आसान होगा कि जंजीर से उन्होंने एक सुपर सितारे की सुपर यात्रा का पहला मौका बनाया और फिर बच्चन के साथ कई हिट फिल्में बनाईं। बात यहीं खत्म हो जाएगी। कोई दिलजला हो तो बच्चन जी के साथ मेहरा के रिश्तो में कड़वाहट और मेहरा की गैरबच्चन फिल्मों की नाकामयाबी का इतिहास बखान कर दे।


बरसी पर बायोग्राफी की रटंत ट्रिब्यूट के परंपरागत तरीकों से बाहर जाकर प्रकाश मेहरा का जिंदगीनामा सिर्फ अमिताभ बच्चन की फिल्मों के साथ न शुरु होता है और न खत्म हो जाता है। 13 जुलाई (1949) को जन्मे 13 साल के बच्चे ने बिजनौर (जहां उनका बचपन बीता) से उस वक्त की बंबई में कदम रखा, तो वो बालक अपने साथ एक टूटा दिल लााया था, जिसमें सिर्फ दर्द भरे नगमों की शायरी थी। प्रकाश मेहरा कोई निर्देशक बनने की ललक लेकर मायानगरी में नहीं आए थे। नामालूम मंजिल के सफर के साथ उस 10वीं पास बच्चे के पास बिना किसी डिग्री के पैसे कमाने का सिर्फ रास्ता था कि फिल्म इंडस्ट्री में कुछ कमाने का मौका मिल जाए। भागादौड़ी के बाद कहीं प्रोडक्शन में छोटा मोटा काम मिला, तो भूखे पेट की आग कम होने लगी। प्रोडक्शन के बाद किसी के साथ डायरेक्शन में मौका मिला, तो हालात बेहतर होने लगे। ये मौका था, जब प्रकाश मेहरा ने फिल्म बनाने के लिए सोचना शुरु किया, क्योकि अब उनके पास कुछ और करने का न तो मौका था, न जरुरत थी। जिन्होंने प्रकाश मेहरा की गाथा सिर्फ बच्चन की जंजीर से सुनी हो, उनके लिए ये भी न्यूज होगी कि जंजीर से पहले निर्देशक के तौर पर प्रकाश मेहरा तीन लगातार हिट फिल्में (हसीना मान जाएगी, मेला, समाधि) बना चुके थे, जबकि उस दौर में अमिताभ बच्चन फ्लाप फिल्मों के दंश से ग्रस्त थे। जंजीर की महागाथा हर कोई जानता है। ये भी जग जाहिर है कि बच्चन के साथ मेहरा की लाइन से फिल्में हिट रहीं और बच्चन को लेकर प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई के बीच कोल्डवार रहा, जो जादूगर और तूफान तक चला। बच्चन की कामयाबी को लेकर मेहरा और देसाई की रस्साकशी भी नाकामयाबी के साथ ही खत्म हुआ।


किसी निर्देशक और कलाकार का रिश्ता मियां-बीवी की तरह माना जाता है। खास तौर पर जब लगातार काम किया जाए, तो इस रिश्ते के रंग बदलने लगते हैं। जंजीर के जादूगर तक के लंबे सफर के बाद अमिताभ बच्चन और प्रकाश मेहरा के रास्ते और मंजिल बदलते चले गए। बच्चन के पास उनके सुपर स्टारडम के सम्मोहन में बंधे निर्देशकों की नई फौज जमा थी, जबकि प्रकाश मेहरा दूसरा बच्चन खड़ा कर देने के आवेशिक जज्बे में ऐसे फंसे कि असफलता और हताशा की दलदल में हमेशा के लिए फंसते चले गए। बच्चन के दूर चले जाने का दर्द उनके तीखे शब्दों और सूनी आंखों में बस चुका था। प्रकाश मेहरा के भीतर का डायरेक्टर इस गम में अकाल मौत का शिकार बरसों पहले हो गया था कि जिस कलाकार को उसने कामयाबी का रास्ता दिखाया, उसने इस रास्ते पर उनको अकेला छो़ड़ दिया। बच्चन को अपने लल्ला (बच्चन का मेहरा के लिए संबोधन) के  पास लौटने का ख्याल कभी तो आएगा, इसी लाचारी और उम्मीद ने प्रकाश मेहरा को अधूरी हसरतों के हवाले कर दिया।
कश्मीर में लावारिस की शूटिंग 


बच्चन को न लौटना था, न लौटे। दिवंगत मुकुल आनंद की खुदागवाह को जब अमिताभ बच्चन ने मनमोहन देसाई (जो उस वक्त जिंदा थे) को समर्पित किया, तो ये प्रकाश मेहरा और बच्चन के रिश्तों के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। अनिल कपूर के साथ जिंदगी एक जुआ और पुरु राजकुमार (जानी राजकुमार का बेटा) को लांच करने के लिए बाल ब्रह्मचारी जैसी फिल्मे प्रकाश मेहरा की उस ललक का पैमाना थी, जो सिर्फ इस दंभ के साथ एक्शन कट बोलता था कि आज भी वो एक नया अमिताभ बच्चन क्रिएट कर सकता है। 6 फुट लंबे हर कलाकार में नया अमिताभ बच्चन तलाश करने की कोशिश ने प्रकाश मेहरा को अवसान से पहले अवसान की हालत में पंहुचा दिया।

अमिताभ बच्चन के लिए अपने किसी निर्देशक से किनारा करना उनकी पेशेवर कला का हिस्सा थी, तो प्रकाश मेहरा के लिए भावुकता का ऐसा जहर, जिसने उनको तेजी से खत्म करना शुरु किया। दोषी किसे माना जाए? एक सुपर स्टार, जिसके लिए प्रकाश मेहरा सिर्फ एक डायरेक्टर थे या एक फिल्मकार को, जिसके लिए अमिताभ बच्चन सिर्फ स्टार नहीं, उसके निर्देशन के जज्बातों का नाम था। जंजीर एक फिल्म का नाम जरुर था। बच्चन के लिए सिर्फ एक फिल्म और प्रकाश मेहरा के लिए रिश्तों की ऐसी जंजीर, जिससे उनका नाता आखिरी सांस तक नहीं टूटा।

सदी का महानायक ने जिस दिन अपने फिल्मी सफर के सबससे अहम निर्देशकों में ह्रषिकेश मुखर्जी, यश चोपड़ा और मनमोहन देसाई को अहम माना था, प्रकाश मेहरा की मौत उसी दिन हो गई थी। 17 मई, 2009 तक सांसो और यादों का बोझ उठाए प्रकाश मेहरा इस दुनिया से दूर चले गए, रिश्तों की इस गफलत को प्रकाश मेहरा अक्सर एक लाइन में बयां करते थे-

अंधों के शहर में आईने बेचता हूं....

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