Monday, December 4, 2023

स्वर्णकाल का हरफनमौला

शशि कपूर का दुनिया से रुखसत होना अगर किसी को हैरान नहीं कर सका, तो इसलिए वे सालों से जिस दर्द से जूझ रहे थे, उस दर्द से मुक्ति का कोई और रास्ता भी नहीं था। दो साल पहले जब मुंबई में दादा साहेब फाल्के उनको दिया गया, तो उस समारोह में शून्य में खोए शशि कपूर को देखना भी किसी त्रासदी से कम नहीं था।
शुक्र है कि फिल्म इंडस्ट्री में शशि कपूर की शख्सियत के साथ इंसाफ न हुआ हो, मगर सरकारी तंत्र पर ये तोहमत नहीं लग सकती। सरकार इस भले इंसान के सम्मान में सिनेमा का सर्वोच्च पुरस्कार दे सकती थी और ये जिम्मेदारी पूरी कर ली गई।
दो सवाल सीधे तौर पर बनते हैं। शशि कपूर को इतिहास किस तौर पर याद रखेगा? कमर्शियल सिनेमा का एक ऐसा चेहरा, जिसकी कामयाबी को उनके ही भाई (राज कपूर) ने टैक्सीवाला कहकर बहुत छोटा बनाने की कोशिश की थी या फिर एक ऐसा सितारा, जिसने बहुत आगे की सोच रखते हुए अपने पिता की याद में एक ऐसा स्मारक (पृथ्वी थिएटर) स्थापित कर दिया, जो कपूर खानदान के दिग्गजों को आईना दिखाता रहा या ऐसा कलाकार, जिसने कमर्शियल सिनेमा के स्टारडम की पारी खेलते हुए फिल्मकार के तौर पर उस सिनेमा के रास्ते को चुना, जिसे कला या समांतर सिनेमा कहा जाता है और विडंबना ये रही कि जब कमर्शियल सिनेमा के इस दिग्गज सितारे ने कमर्शियल सिनेमा के निर्माण का फैसला किया, तो अनुभव इतना पीड़ादायक रहा कि शशि कपूर ने फिल्म निर्माण से ही तौबा कर ली और कभी पलटकर नहीं देखा।
शशि कपूर बहुआयामी माने नहीं जाते थे, लेकिन उनकी शख्सियत का ये एक ऐसा रुप था, जो कभी न तो मीडिया में सुर्खी बना और न ही इसे गंभीरता से लिया गया और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसकी सबसे बड़ी वहज खुद शशि कपूर थे, जो खुद को कभी संपूर्ण व्यक्तित्व के साथ सार्वजनिक होने की जद्दोजेहद से दूर ही रहे। जिसने उनको जैसा समझा, शशि कपूर ने उसको वैसा ही समझने की पूरी आजादी दी, लेकिन खुद के अंदर वे बहुआयामी व्यक्तित्व के साथ जीते रहे।
शशि कपूर के फिल्मी सफर के इन तीनों पड़ाव को अगर एक नजर से देखा जाए, तो समझना मुश्किल नहीं होता कि कपूर खानदान के आभामंडल के आगे खुद को नतमस्तक न होने देने की उनकी अपनी जीविषा उनके व्यक्तित्व का पहला आभास दिलाती रही। शशि कपूर एक बड़े खानदान से होने के बाद भी संघर्ष की जमीन पर आगे आए। वे फिल्मकारों से मिलते और घर लौट जाते। उनको जिन फिल्मों में जिस तरह के रोल मिलते, वे उनको अपनी शिद्दत से निभाते रहे और कैरिअर की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। शशि कपूर के साथ काम करने वाले जानते और मानते हैं कि उनके अंदर सिर्फ उम्दा रोल करने की कोई जिद्द जैसी बात नहीं थी। वे जानते थे कि कमर्शियल सिनेमा की दुनिया में अपने लिए रास्ते और मकाम बनाने के लिए कुछ भी आसान नहीं था। तिस पर कपूर खानदान से होने का लेवल उनकी मुश्किलों को और बढ़ाता चला गया, लेकिन शशि कपूर ने अपने रास्ते बदलने के लिए हाथ-पांव नहीं पटके। शशि कपूर जब सिनेमा की दुनिया में दाखिल हुए, तो बड़े भाई राज कपूर, शम्मी कपूर, देव आनंद, दिलीप कुमार, बलराज साहनी और राजकुमार की तूती बोल रही थी। संजीव कुमार और धर्मेंद्र जैसे कलाकार भी जगह बना रहे थे। शशि कपूर इस फलसफे को बहुत बेहतर तरीके से समझ चुके थे कि अगर नंबर वन के चक्कर में पड़े, तो उनको लेने के देने पड़ जाएंगे। अगर राजकपूर की तरह उन्होंने शोमैनशिप की सोची, तो भी उनके हाथ कुछ नहीं आने वाला। इसलिए शशि कपूर ने विशुद्ध रुप से कमर्शियल फिल्मों के लिए मुफीद वो रास्ता पकड़ा, जहां कपूर खानदान का एक साधारण सा बंदा, साधारण तरीके से निर्देशकों की बात मानते हुए शूटिंग करके घर लौट जाता। फिल्म चल जाती, तो उनको चार और फिल्में मिल जातीं और फिल्म न चलती, तो दो फिल्मों से हाथ धोना पड़ता। शशि कपूर का कैरिअर इसी धूप-छांव से घिरा रहा और इस दौर ने उनको महान बनने का कोई मौका नहीं दिया। हां, नंबरों के खेल से बाहर वे कमर्शियल फिल्मों के ऐसे भरोसेमंद नाम जरुर बन चुके थे, जिनके फिल्म में होने से किसी को फिल्म बेचने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। भले ही फिल्म मल्टी स्टारकास्ट हो या सोलो हीरो वाली हो। शशि कपूर ने अगर महान कलाकार बनने की ललक में नामी फिल्मकारों की फिल्मों के लिए जोर लगाया होता, तो बहुत मुमकिन था कि उनको वो सब हासिल न हुआ होता, जो उनको कमर्शियल फिल्मों की दुनिया ने बगैर मांगे दिया और लगातार दिया। जरा गौर कीजिए, उस दौर में कमर्शियल फिल्मों की दुनिया के कितने कलाकार थे, जिन्होंने शशि कपूर बनकर इतनी लंबी पारी खेलने का माद्दा दिखाया हो, जो शशि कपूर ने किया। शशि कपूर उस खौफ से बहुत दूर रहे, जहां सुपर स्टारडम या महान कलाकार होने की छवि खोने का खतरा मंडराता रहता है। सुपर स्टारडम के कम होने या छिन जाने के डर ने बहुत सितारों की बलि ले ली, लेकिन शशि कपूर उस रास्ते पर आगे बढ़े ही नहीं, जहां ये खतरे उनको नुकसान पंहुचाते। वे गुड वन मैन की उस धारा के साथ बहते रहे, जहां माना जाता है कि बिना किसी को तकलीफ दिए आप अपना काम करके घर लौटकर गहरी और अच्छी नींद सोना जानते हैं। शशि कपूर ने कमर्शियल स्टार के तौर पर किसी एक दिन भी अपनी नींद खराब करने का अनुभव नहीं महसूस किया। दिग्गजों और सुपर सितारों की महफिल में यूं भी अपनी पारी खेलना क्या किसी महानता से कम है? शशि कपूर को इस मामले में महान मानने में कंजूसी बरती गई, ये भी मानने में भला क्या गुरेज।
एक दूसरी बात, शशि कपूर जानते थे कि वे सुपर स्टार नहीं है, इसलिए उनके लिए रोल लिखे जाने वाली फिल्में नहीं होंगी और सुपर स्टारों के भाइयों और दोस्तों के रोल वाला दौर एक वक्त आकर कमजोर पड़ जाएगा और एक दिन रुक भी जाएगा।
शशि कपूर इससे बेखबर नहीं थे। 80 के दशक के आधे में ही शशि कपूर ने इस हकीकत को पहचानते हुए जब फिल्में बनाने की राह पकड़ी, तो हर कोई मानता था कि वे उसी टाइप की फिल्में बनाएंगे, जिस टाइप की फिल्मों  के वे सितारे बने रहे। शशि कपूर ने यहां भी लोगों को गलत साबित किया। कलियुग से लेकर जुनून, उत्सव, विजेता जैसी फिल्मों का लाइन से निर्माण करके शशि कपूर ने न सिर्फ अपनी बिरादरी को चौंकाया, बल्कि सिनेमा के संतुलन का वो नजारा पेश किया, जिसमें एक कमर्शियल फिल्मों का स्टार सार्थक सिनेमा को एक मंच दे सकता है। याद नहीं आता, ये संतुलन उस दौर के किसी और सितारे ने सोचने की भी जेहमत दिखाई हो। इस बात से कौन मना कर सकता है कि इन फिल्मों में शशि कपूर को मुनाफा तो क्या होता, नुकसान भी जरुर हुआ होगा, लेकिन फायदा? फिर उनकी दूर की सोच का एहसास होता है। आज शशि कपूर को कमर्शियल सिनेमा के कामयाब सितारे के साथ साथ फिल्मकार के तौर पर जब याद किया जाता है, तो इन सार्थक सिनेमा की फिल्में ही उनको विशिष्ट फिल्मकार बनाती हैं। शुक्र है, अजूबा का प्रयोग शशि कपूर ने बाद में किया, वरना सार्थक सिनेमा के साथ उनकी ये जुगबंदी कहां नसीब होती, जिसने शशि कपूर को इतना बड़ा मकाम दिलाया।

सो एक स्टार चला गया। एक फिल्मकार चला गया। एक रंगकर्मी चला गया, जिसने अपने पिता की याद में पृथ्वी की स्थापना करके वो हासिल कर लिया, जो मील का पत्थर बन चुका है। पृथ्वी सिर्फ सभागार नहीं, बल्कि नाट्य मंच के आंदोलन की मशाल साबित हुआ। एकजुट और इप्टा के चरम दौर में पृथ्वी की मशाल वैसे ही जलती रही, जैसे शशि कपूर दिग्गजों के दौर में बतौर कलाकार अपनी जगह बनाए रखने में कामयाब हुए। पृथ्वी की स्थापना ने एक रंगकर्मी और बेटे के तौर पर अमरत्व के उस मकाम पर पंहुचा दिया था, जहां सिर्फ शशि कपूर और उनकी उपलब्धियां ही नजर आती हैं।

शशि कपूर उस सादगी का नाम रहा, जो रियल्टी से कभी दूर नहीं हुआ। जिसको हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े खानदान के होने का सुख था, लेकिन उन्होंने इसे गुरुर नहीं बनने दिया। शशि कपूर के साथ उनके बड़े भाई राज कपूर की तरह शोमैन का तमगा नहीं था। उनके पास शम्मी कपूर जैसे डांस स्टेप्स नहीं थे, लेकिन जो शशि कपूर के पास था, वो शम्मी कपूर और राजकपूर की उपलब्धियों से किसी तरह से कम नहीं था।

एक बात को लेकर सकून मिलता है कि शशि कपूर ने अपनी जिंदगी को भरपूर जिया। मौज मस्ती के साथ कमर्शियल सिनेमा की लंबी पारी, फिर सार्थक सिनेमा के फिल्मकार और फिर चारित्रिक भूमिकाएं। हर अंदाज में शशि कपूर ने अपनी सोच, अपने हुनर और अपनी कुव्वत का रंग भरा। शशि कपूर को कपूर खानदान का हिस्सा बनाना तो भगवान की देन था, लेकिन इतने बड़े खानदान का इतना साधारण सा शख्स जिस अंदाज में अपनी पारी खेलकर दुनिया से विदा हुआ, उसकी जीवटता, उसकी सहजता, उसकी सोच किसी भी तरह से शशि कपूर को किसी महान कलाकार से उन्नीस नहीं रखती। जहां तक रही इतिहास की बात, इतिहास का आकलन समय करता है और समय का आकलन इतिहास करता है। इतिहास रचने और इतिहास बनने की प्रक्रिया के बीच शशि कपूर उन यादों का हिस्सा जरुर बने रहेंगे, जहां आंखों से मुस्कराने वाला हंसोड़ कलाकार सिनेमाई परदे पर हरफनमौला अंदाज में दर्शकों का मनोरंजन करने में माहिर था।
जिस दौर में शशि कपूर आए, उसे सिनेमा का स्वर्णकाल कहा जाता था। इस दौर में शशि कपूर ने जिस अंदाज में खुद को ढाला, यही खूबी शशि कपूर को सिनेमा का हरफनमौला बना गई। शुक्रिया शशि साहब, ये विश्वास दिलाने के लिए कि बड़े खानदान से ताल्लुक रखने के बाद भी साधारण कलाकार कैसे असाधारण कामयाबी की मिसाल बन जाते हैं।

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अब 'नागिन' जैसी 'धूम' नहीं

मामला रश्मिका का नहीं, लड़कियों की इज्जत का है










2 comments:

Unknown said...

Badhai ho anuj! Kafi samay baad tumhari qalam se kisi kalakaar ke prati imaandaar shradhanjali padhne ko mili. Abhi bhi main lambe vakyansh ki tumhari shaili ke virudh hi hun kintu is baar ka flow tumhare anya lekhon se kam bojhil tha. Yaddapi vinod khanna par likha gaya aalekh tumhari lekhan pratibha ka ek ananya udaharan tha par shahi ke saral filmi jeevan par likhe is blog ne bhi niraash nahi kiya. Mera haath prashansha mein thoda tang hai kintu tumhara alochak hone ke bawajood tumhare taaza prayaas ki sarahna kiye bagair reh nahi paaya. Punah ek baar vichitra nagri ke pathakon ko shashi ki cinemaai yatra ke kuch alag pehluonon se parichit karwane par hardik badhaai aur bhavishya mein aisi hi prastuti ke liye meri shubhkamnaayein!

Prakash Madhukar
prakashmadhukar@gmail.com

atul sharma said...

अपनी तरह की अकेली शख्सियत.. शशि कपूर

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