Wednesday, May 24, 2017

बिहारी बाबू और गुजराती बापू होने का सियासी फर्क



चलिए, बगैर किसी लाग लपेट के बात शुरु करते हैं। परेश रावल चाहते हैं कि कश्मीर को लेकर अलग सुर में बोलने वाली अरुंधिति राय को फौजी जीप के आगे बांधकर उनको सजा दी जाए। शत्रुघ्न सिन्हा चाहते हैं कि उनकी पार्टी के नेता बिहार और देश में  विरोधियों पर बिना सबूतों के आरोप लगाने की सियासत बंद करें। परेश रावल और शत्रुघ्न सिन्हा दोनों भाजपा के सीनियर नेताओं में आते हैं। दोनों ने सियासी मैदान में आने से पहले फिल्मों की दुनिया में लंबी पारी खेली है। दोनों ने ही चुनावों के वक्त पार्टी के प्रचारक की हैसियत से अपनी सियासी पारी की शुरुआत की और दोनों को चुनावी मैदान में उतारा गया।


एक बिहारी बाबू हैं, तो दूसरे को दिल्ली के सियासी गलियारों में गुजराती बापू कहा जाता है। यहां बापू का मतलब महात्मा गांधी से नहीं, बल्कि गुजरात में अपने से बड़े को सम्मान माना जाता है। अभिनेता से नेता बने ये दोनों दिग्गजों इस वक्त जिन खबरों को लेकर चर्चा में हैं, उनका आपस में सीधे तौर पर कोई रिश्ता नहीं बैठता, मगर विरोध का तरीका और सलीका इसमें ऐसा
कामन फैक्टर है, जहां दोनों अलग अलग छोर पर खड़े हुए नजर आ रहे हैं। सियासत के मैदान में शत्रुघ्न सिन्हा के मुकाबले परेश रावल का अनुभव कम जरुर है, लेकिन दोनों की सियासी जमीं और सोच में सबसे बड़ा फर्क ये है कि शत्रुघ्न सिन्हा राजनीति के सिद्धांतों की वो डुगडुगी बजाते हैं, जो सिर्फ उनको भाती है, जबकि मौजूदा दौर में उनकी राजनीति गैरप्रासंगिक हो चुकी है। परेश रावल राजनीति की उस जमींन पर खड़े हैं, जो आज के दौर की जरुरत है। परेश रावल अपनी सियासत में वो सब कुछ करते हैं, जो उनकी पार्टी की लीडरशिप को अच्छा लगता है। शत्रुघ्न सिन्हा बीते जमाने की राजनीति से चिपके रहकर खुद को खुश और पार्टी को नाराज करने में संकोच नहीं करते, तो परेश रावल अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं को खुश रखने के गुर समझ चुके हैं और इसी मंत्र के बूते तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

सियासत में वैचारिक स्तर पर विरोध होता है, इसलिए शत्रु्घ्न सिन्हा और परेश रावल में से किसी की बात को अजूबा नहीं कहा जा सकता। विरोध की सियासत परेश रावल भी कर रहे हैं और शत्रुघ्न सिन्हा भी। फर्क इतना है कि दोनों ने विरोध का ऐसा तरीका अपनाया कि दोनों को लेकर बहसबंदी का दौर शुरु हो गया। इसमें कौन गलत है और कौन सही है, ये आकलन अलग बात है। वैसे भी सियासत का पहला सबक यही पढ़ा और पढ़ाया जाता है कि कोई नेता कभी अपनी बात को गलत नहीं मान सकता।


दोनों के विरोध की ताजा खबरों के आकलन को और आगे बढ़ाएं तो मामला और दिलचस्प हो जाता है। बिहारी बाबू के निशाने पर अपनी ही पार्टी के नेता हैं। भाजपा में नई लीडरशिप के सामने आने के बाद शत्रु अक्सर अपनी ही पार्टी और सरकार को झेंपने के लिए मजबूर करते आए हैं। सियासी तजुर्बे के बच्चे भी बता सकते हैं कि भाजपा में शत्रु के दोस्त और दिन लगातार कम होते जा रहे हैं। सिद्धांतवादी राजनीति से अपना सफर शुरु करने वाले शाटगन खुद को खुश करने के चक्कर में गलत मौके पर गलत तरीके से सही बात करने के शिकंजे में इतने जकड़े गए कि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व तो उनको अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शक मंडल में भी उनको जगह देने का जोखिम नहीं लेगा। देखने वाली बात सिर्फ इतनी है कि शत्रु खुद शहीद होंगे या पार्टी उनकी शहादत की औपचारिकता निभाएगी?


परेश रावल का मामला ज्यादा दिलचस्प है। उनके निशाने पर अंरुधिंति राय हैं, जो किसी सियासी जमात से नहीं है। अरुंधिति का विरोध परेश रावल को अपनी पार्टी के राष्ट्रवाद के उस कट्टरपन के साथ जोड़ता है, जहां पार्टी और सरकार का विरोध देशविरोधी मानने वालों में परेश रावल भी हैं और खुद ही सजा भी मुकर्रर करना नहीं भूलते। देशभक्ति के नाम पर देश की सत्ता के मुखर और मौन समर्थन ने जो स्थिति बना दी है, उसमें एक सांसद महोदय का किसी महिला के लिए सजा मुकर्रर करना हैरान नहीं करता, क्योंकि उस महिला के विचार परेश रावल की पार्टी की सोच से मेल नहीं खाते। जो लोग ये समझ रहे हों कि परेश रावल ने खालिश तैश में आकर अरुंधिती के लिए इस तरह की सजा मुकर्रर की है, वे न तो परेश रावल को जानते हैं और न उनकी सियासत को समझ पाएंगे। परेश रावल की सियासत का गुणा भाग जमाने से पहले एक बात समझना जरुरी हो जाता है कि परेश रावल किसी भी एंगल से शत्रुघ्न सिन्हा वाली भावुकता और संवेदनाओं से नहीं जुड़े हैं। ये गुजराती बाबू सियासत में बिहारी बाबू सरीखी बकबक वाली सियासत करने नहीं आए। शत्रुघ्न सिन्हा अगर अपनी पार्टी से बाहर होने के कगार पर हैं तो अरुंधिति वाले मामले में उनकी बहादुरी के लिए परेश रावल को उनकी पार्टी की लीडरशिप पार्टी या सरकार में उनको कोई बड़ा ओहदा देकर उनको नवाज सकती है।


दरअसल शत्रुघ्न सिन्हा जो बात सालों से सियासत के मैदान में रहकर नहीं समझ पाए, वो परेश रावल ने पहले दिन से समझ ली थी कि सियासत में वो मत कहो, जिसमें नैतिकता या  सिद्धांतों की गंध आती हो। परेश रावल उस सियासत का चेहरा हैं, जहां विरोध की चीख-पुकार का कोई नैतिक आधार तलाशने वाले मूर्ख साबित हो जाता है।
शत्रुघ्न सिन्हा ने सियासत के जिस रास्ते पर चलकर अपनी ही पार्टी के विरोधी होने का तमगा पहनकर खुद को अलग थलग होने की हालत में पंहुचाया, तो परेश रावल ने समझदारी दिखाते हुए राष्ट्रवाद का वो रास्ता चुना, जहां उनकी तरक्की के नए रास्ते खोलता है। याद रहे कि इस साल के आखिर में गुजरात के विधानसभा के चुनाव होने हैं। कौन जाने, आज के सम्मानित सांसद महोदय को इन चुनावों के बाद अपने गृहराज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने का मौका भी मिल जाए।

असली मुद्दा वैचारिक मतभेदों का ही रह जाता है। मुमकिन है कि परेश रावल को अपनी पार्टी के वो भूतपूर्व प्रधानमंत्री याद हो, जिनके अभूतपूर्व राजनैतिक कौशल का लोहा उनके सियासी विरोधी निसंकोच मानते थे। परेश रावल नहीं जानते हों तो याद दिलाया जा सकता है कि विरोधियों का सम्मान करना माननीय अटल
बिहारी वाजपेयी की सियासत का मुख्य आधार रहा। परेश रावल सियासत में आए हैं, तो विरोधियों पर वार करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो जाता है, लेकिन परेश रावल जब विरोध के सुरों को अमर्यादित बनाने में कोताही नहीं करते, तो वे ऐसी मुद्रा में पंहुच जाते हैं, जहां एकमेव लक्ष्य अपने नेतागणों की कृपा पाने तक हो जाता है और यहां आकर जब उनकी गुजराती रंगमंच से लेकर बालीवुड के कद्दावर अभिनेता की लंबी पारी को याद किया जाए, तो नेता परेश रावल और अभिनेता परेश रावल के बीच जमीन-आसमान का अंतर साफ तौर पर दिखाई देता है।


परेश को दोषी ठहराने या शत्रुघ्न को निर्दोष बताने की यहां कतई कोशिश नहीं है। यहां सिर्फ बात हो रही है विरोध के स्तर की। दोनों ही फिल्मी दुनिया से राजनीति में गए हैं, तो वो दौर भी याद आता है, जब इन दोनों से पहले भी बालीवुड के तमाम सितारों ने सियासती गलियारों का सफर देखा। इतिहास बताता है कि फिल्मी सितारों ने सियासी मैदान में या तो मौनव्रत साधे रखा या तंग आकर खुद अपनी दुनिया में लौट आए। दो बातें खास तौर पर याद आती हैं। राजनीति के मैदान में लंबी पारी खेलने वाले सितारों ने कभी किसी के विरोध को लेकर वो रास्ता नहीं अपनाया, जिस पर आज की राजनीति के सिरमौर बने गुजराती महापुरुष और उनका अनुसरण कर रहे बापू परेश रावल सरपट दौड़ रहे हैं और बिहारी बाबू सिद्धांतवादी राजनीति के नाम पर लड़खड़ा रहे हैं।
इन दोनों की सोच, समझ और भविष्य को समझना कतई मुश्किल नहीं..,


1 comment:

ओमप्रकाश तिवारी said...

अच्छी तुलना की है

कंगना मतलब...

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