Tuesday, May 2, 2017

कभी मुगले आजम, कभी शोले तो कभी बाहुबली- आम आदमी के सिनेमा का जश्न

सिनेमाई इतिहास में ऐसे पल बहुत कम होते हैं, जब एक इतिहास का निर्माण होने का साक्षी होने का मौका हर किसी को मिले। मानने में कोई गुरेज नहीं कि बाहुबली 2 एक ऐसा ही पल है, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा।
मौजूदा पीढ़ी अगर बाहुबली 2 की एतिहासिक कामयाबी का गवाह बनी, तो उस दौर को अब भी याद किया जाता है, जब 1975 में दो चोरों की मामूली सी कहानी पर बनी गैरमामूली फिल्म शोले मील का वो पत्थर साबित हुई थी, जिसे इसके बाद कामयाब होने वाली अमूमन हर फिल्म के साथ न सिर्फ याद किया गया, बल्कि सालों तक शोले की कामयाबी की तुलना में तमाम हिट फिल्में उन्नीस मानी जाती रहीं।
शोले के साथ बाहुबली 2 की एतिहासिकता की कोई तुलना नहीं हो सकती। इसका कोई आधार भी नहीं बनता। फिर भी देखा जाए, तो इन दोनों फिल्मों की कामयाबी के आधार में ही अंतर समाया हुआ है। रमेश सिप्पी ने शोले का निर्माण किसी तरह की कामयाबी का इतिहास रचने की गरज से नहीं किया था। शोले को तमाम फार्मूला मसालों के साथ उस वक्त की आम जनता के आम मनोरंजन के लिए बनाया गया था। शोले के रिलीज से पहले रमेश सिप्पी को गुमान तक नहीं था कि उनकी ये फिल्म किसी किस्म का इतिहास रचेगी। ये भी कहा जा सकता है कि शोले का इतिहास रमेश सिप्पी की टीम से ज्यादा उस वक्त की जनता ने रचा, जो शोले पर ऐसी लट्टू हुई कि फिल्म का एक एक किरदार, एक एक सीन, एक एक संवाद, नाच-गाना.. सब कुछ जनमानस का हिस्सा बनता चला गया। ये एक ऐसा चमत्कार था, जो न पहले कभी हुआ, न ही कभी बाद में।
बाहुबली 2 की कामयाबी अगर फौरी तौर पर किसी फिल्म की याद दिलाती है, तो मुगले आजम कही जा सकती है। कम से कम भव्यता और बजट इत्यादि ऐसे तथ्य हैं, जो इन दोनों फिल्मों को कहीं न कहीं एक प्लेटफार्म पर ले आते हैं। मुगले आजम किसी फिल्म से ज्यादा फिल्मकार की दीवानगी का सबब थी, जिसने सालों तक एक फिल्म के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाए रखा। मुगले आजम के निर्माण में कई ऐसे दौर आए, जब इसके पूरे होने को लेकर ही सवाल होने लगे। फिर भी मुगले आजम बनी और नयनाभिराम भव्यता पर जनता फिदा होती चली गई। मुगले आजम उस कालजयी सिनेमा का इतिहास थी, जिसे दोहराने की कोई सोच भी नहीं सकता था

शोले और मुगले आजम की इन बातों को ध्यान में रखकर अब अगर बाहुबली की एतिहासिकता का आकलन किया जाए, तो बेहद दिलचस्प तस्वीर बन जाती है। याद कीजिए, 2015 में जब बाहुबली का पहला हिस्सा रिलीज हुआ था, तो हिंदी राज्यों में मीडिया ने भी सिर्फ इतनी ही हवा बनाई थी कि इस फिल्म की मार्केटिंग करण जौहर की कंपनी कर रही है। करण जौहर अगर किसी फिल्म में हाथ डालते हैं, तो वो खुद भी बड़ी होती चली जाती है। उतना ही विस्तार बाहुबली के पहले हिस्से को रिलीज से पहले मिला। बाहुबली से पहले बाहुबली के नायक प्रबास की पहचान हिंदी दर्शकों में सिर्फ इतनी थी कि उनकी तेलुगू की फिल्में हिदी में डब होकर टीवी पर देखी जाती हैं। ये समझना भी मुश्किल नहीं कि बाहुबली की टीम ने हिंदी बेल्ट में फिल्म की मार्केटिंग का रिस्क सिर्फ इतना ही लिया था कि जो मिलेगा, वो बोनस होगा। ये समझना बेहद जरुरी हो जाता है कि बाहुबली को हिंदी मार्केट के लिए नहीं बनाया गया था। यहां तक कि करण जौहर की कंपनी की मार्केटिंग टीम भी उतना ही रिस्क ले रही थी कि इसमें लगे पैसे लौट आएं।

करण जौहर की कंपनी के एक साहब दिलचस्प किस्सा बताते हैं कि करण जौहर आखिर बाहुबली के चक्कर में फंसे कैसे? बताया कुछ यूं कि करण जौहर को जब बाहुबली का पता चला, तो उनकी कारोबारी खोपड़ी में ये बात घुसी कि इस फिल्म को वे सलमान खान के साथ हिंदी में रीमेक करके करोड़ों कमा भी सकते हैं और सलमान को अपने कैंप तक ला सकते हैं। इस ललक के साथ करण जौहर ने बाहुबली की टीम के साथ हिंदी रीमेक राइटस का सौदा किया, जो तय है कि करोड़ों में रहा होगा। सलमान अपनी धुन के हैं। करण जौहर की सलमान सुन लेते, तो वे ही अपने चाहने वालों के बीच बाहुबली बनकर अवतरित हो जाते। सलमान खान सीधे तौर पर किसी को समझ नहीं आते, तो करण जौहर के भी पल्ले नहीं पड़े। करण जौहर ठहरे कारोबारी, जिनके लिए नफा-नुकसान सबसे पहले आता है। रीमेकिंग राइट्स में फंसे करोड़ों की वापसी के लिए जौहर ने बाहुबली की टीम से नया सौदा कर लिया कि वे इसकी हिंदी बेल्ट में मार्केटिंग कर लेंगे, इसके लिए रीमेकिंग राइटस के एवज में दी गई रकम को एडजेस्ट करने पर डील हो गई। बाहुबली की टीम के लिए भी ये परफेक्ट सौदा था। बाहुबली की टीम जानती थी कि करण जौहर की कंपनी के कंधों पर सवार होकर वे हिंदी बेल्ट में बड़ी एंट्री का रास्ता बना सकती है। लिहाजा बाहुबली और करण जौहर का विशुद्ध तौर पर ये कारोबारी गठबंधन अपने अपने मकसद को लेकर अपने रास्ते पर आगे बढ़ा।

बाहुबली की पहली कड़ी 2015 में उस वक्त रिलीज हुई थी, जब सलमान खान बजरंगी भाईजान की कामयाबी का सुख भोगने ही वाले थे कि अचानक भरभराहट जैसे कंपन के साथ हिंदी बेल्ट के सिनेमाघरों में बाहुबली के इस तूफान ने सलमान खान को ये कहने पर मजबूर कर दिया कि बाहुबली ने हमारी फिल्म की कामयाबी को आधा कर दिया। मतलब, बजरंगी भाईजान के आधे कारोबार को बाहुबली ने चौपट कर दिया। क्या त्रासदी थी कि करण जौहर जिस सलमान को लेकर बाहुबली के चक्रव्यूह में घुसे थे, उसी सलमान खान की फिल्म के कारोबार को आधा लील गए। सलमान के पास छटपटाने के लिए कुछ नहीं था और करण जौहर के पास खुश होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। सच तो ये है कि करण जौहर और उनकी टीम को दूर दूर तलक बाहुबली की इतनी विराट कामयाबी का गुमान नहीं था और ये भी इतना बड़ा सत्य है कि अगर हिंदी बेल्ट ने 2015 में बाहुबली को सर-आंखों पर नहीं बैठाया होता, तो बाहुबली का दूसरा भाग बनता जरुर, लेकिन इस पैमाने पर नहीं, जिस पैमाने पर उसे बनाया गया, क्योंकि इस बार हिंदी बाजार पर छा जाने के लिए बाहुबली और करण जौहर की टीम के पास हर तरह का मौका था, जिसे भुनाने के लिए किसी ने कोई कमी नहीं छोड़ी। इस बात को लेकर बहस की गुंजाइश नहीं है कि बाहुबली 2 को इतने विशालकाय कद में लाने के लिए करण जौहर और बाहुबली की टीम का गठजोड़ काम कर गया, जिसके लिए इस बार हर तरह से दौलत बंटोरने का गोल्डन मौका था। बाहुबली 2 को हर तरह से बड़ा बनाया गया। सिर्फ बजट नहीं, मीडिया, मार्केटिंग से लेकर हर मुमकिन तरह से इसे भारतीय इतिहास के नए अध्याय की फिल्म के तौर पर ही लाया गया। इस बार कोई जोखिम का खेल नहीं था, बल्कि मुनाफे के खेल को बड़ा, और बड़ा, सबसे बड़ा बनाने का वो दांव था, जिसे चलने के अलावा करण-बाहुबली की टीम के पास कोई रास्ता नहीं बचा था।

यहां आकर फिर से अगर मुगले आजम और शोले जैसी फिल्मों की कामयाबियों को याद किया जाए, तो कितना कुछ फर्क महसूस होता है। काश, के आसिफ के पास करण जौहर जैसा जौहरी होता। काश कोई रमेश सिप्पी को एहसास दिलाने वाला होता कि शोले का आने वाला कल कैसा होगा। काश उस दौर में भी मीडिया दो सालों के लंबे वक्त तक कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा जैसे सवाल को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कवायद करना जानता। काश.....

बाहुबली की कामयाबी को किसी सूरत में नहीं नकारा जा सकता। 2015 से 2017 के बीच इस फिल्म के दूसरे पड़ाव ने सिर्फ एक फिल्म नहीं बनाई, बल्कि इतिहास के एक पन्ने को अपने नाम से लिखा, जिसके लिए करण जौहर से लेकर बाहुबली की टीम के हर बंदे को क्रेडिट जाता है। इसे सिर्फ एक फिल्म की बाक्स आफिस पर बड़ी कामयाबी मानने तक सीमित करना भारी भूल होगा। सिनेमा के परदे पर भव्यता की वापसी के साथ साथ अपने इतिहास से मिलवाने और उससे भी बड़ी बात कि बाहुबली के पहले हिस्से  को मिली कामयाबी की चुनौती को कामयाबी के साथ स्वीकारने के चमत्कार के अलावा बाहुबली 2 ने दो बड़े काम किए हैं। देश को कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा के सवाल से निजात दिला दी और दूसरी बात कि हिंदी और साउथ की फिल्मों की दुनिया के बीच एक ऐसा पुल कायम कर दिया, जो सिनेमा की राष्ट्रीयता को भाषाओं की दीवारों से आगे ले जाएगा। जिस दौर में इंटरनेट और सोशल मीडिया की क्रांति ने फिल्मों की कामयाबी को बहुत छोटा कर दिया था। इस युग में बाहुबली 2 का संदेश बहुत साफ है कि सिनेमा से बडा मनोरंजन कोई और नहीं। भव्यता को परदे पर पसंद करने वालों की आज भी कमी नहीं। इससे भी बड़ा संदेश- महानायकों की इस गाथा में एक ऐसी फिल्म के ऐसे किरदार (बाहुबली) ने इतिहास रचा, जिसे परदे पर लाने वाले कलाकार (प्रबास) को दो साल पहले तक हिंदी दर्शकों में न कोई जानता था, न कोई पहचानता था। परदे के नायकों की नायिकी कैसे एक कलाकार को स्टार का रुतबा देती है, प्रबास और बाहुबली इसका जीता-जागता सबब बन चुके हैं।



बाक्स आफिस की कामयाबी से जुड़ी फिल्में अक्सर इतिहास का हिस्सा बनती हैं और बाहुबली की विराटता इतिहास रचती है। इतिहास मुगले आजम ने भी रचा था। इतिहास शोले ने भी रचा था और इतिहास बाहुबली ने भी रचा। इससे बड़ी कामयाबी बाहुबली के लिए और क्या होगी कि इस पड़ाव पर ये फिल्म हिंदी सिनेमा की दो फिल्मों की एतिहासिकता के साथ आकर खड़ी हो गई।


सिनेमा चमत्कार करता है। सिनेमा बनाने वाले चमत्कार करते हैं। सिनेमा को अपने दिल से लगाने वाला वो आम आदमी सबसे बड़ा चमत्कार करता है, जो कभी मुगले आजम, तो कभी शोले और कभी बाहुबली को ये इतिहास रचने का मौका देता है। ऐसे चमत्कार को नमस्कार किए बिना बाहुबली की कामयाबी का सच अधूरा रह जाएगा।


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