2012 के दिसंबर में जब देश की राजधानी का विभत्स निर्भया कांड जब मीडिया में सुर्खियां बना था, तो सिनेमा की दुनिया न तो उस वक्त इससे अछूती रही थी और न ही अब जबकि इस कांड के आरोपियों को सर्वोच्च अदालत ने मौत की सजा सुनाई, तो भी सिनेमाई दुनिया के बाशिंदों ने भी देश की आवाज के साथ इस फैसले को न्याय माना।
2012 से 2017 के बीच अदालतों में कानून की प्रक्रिया का हिस्सा बना ये खौफनाक कांड देखा जाए, तो कहीं न कहीं सिनेमा की दुनिया से जुड़ा ही रहा। जब ये हादसा हुआ था, तो फिल्मी सितारे भी अपनी खोल से बाहर निकलकर देश के आक्रोश के साथ कदमताल करते हुए आंदोलनों का हिस्सा बने थे।
उस दौर में हिंदी सिनेमा को इस बात की तोहमत भी झेलनी पड़ी थी कि फिल्में बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों को मसालेदार बनाकर पेश करती हैं और इनको प्रोत्साहित करने का गुनाह करती हैं। इस तोहमत को लेकर लंबे दौर तक बहस भी होती रही, जो एक दिन चर्चाओं की दुनिया से दूर हो गई। मगर जब जब इस केस को लेकर मीडिया में कोई खबर आई, तो फिल्मी सितारों ने निर्भया के साथ न्याय की मांग को अपनी आवाज जरुर दी।
कुछ दिनों पहले ही रवीना टंडन जब अपनी फिल्म मातृ का प्रमोशन कर रही थीं, तो उन्होंने मीडिया के सामने इस कांड का जिक्र किया, क्योंकि उनकी फिल्म की कहानी का विषय भी इससे मिलता-जुलता था। रवीना की फिल्म में एक मां का संघर्ष था, जिसको खुद बलात्कार की विभीषिका सहनी पड़ी और बलात्कारियों ने उसकी टीनेज बेटी को बलात्कार के बाद मार डाला था। चूंकि ये हिंदी फिल्म थी, इसलिए इस संवेदनशील विषय को उन मसालों के साथ बनाया गया, जिनके चलते बाक्स आफिस पर फिल्म को कोई खास रेस्पांस नहीं मिला। यहां आकर एक बार उस तोहमत की याद ताजी हो गई, जिसमें सिनेमा, खास तौर पर हिंदी सिनेमा बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दे के साथ असंवेदनशील नजर आता है।
इसे आधा-अधूरा सच कहा जा सकता है। अगर पूरी बात को समझने की कोशिश की जाए, तो जब 60 के दशक के बाद हिंदी सिनेमा प्रेम कहानियों से बाहर निकला, तो समाजिक सरोकारों पर बनने वाली फिल्मों ने इसे एक नया चेहरा दिया। खास तौर पर बीआर चोपड़ा जैसे फिल्मकारों ने जिन समाजिक मुद्दों के साथ हिंदी सिनेमा को जोड़ना शुरु किया, उनमें कई ऐसी फिल्में देखने को मिलीं, जहां बलात्कार की पीड़ित नायिका की ओर से इंसाफ के लिए लंबी जंग हुई और दोषियों को कभी अदालतों से सजा मिली, तो कभी नायिकाओं ने खुद सजा दी। इंसाफ का तराजू कौन भूल सकता है, जिसमें एक पीड़िता की लोमहर्षक दास्तान को अदालती ड्रामों के साथ कुछ इस तरह से पेश किया गया था कि हर कोई हतप्रभ रह गया था।
90 के दशक की एक और फिल्म याद आती है, जो राजकुमार संतोषी ने बनाई थी। दामिनी ने इस मुद्दे को सामाजिक सरोकारों के साथ सीधे तौर पर जोड़ा। कैसे घरेलू नौकरानी के साथ अमीर घर के
बिगड़े शहजादे द्वारा बलात्कार और फिर घर की बहू द्वारा परिवार की इज्जत के सवाल से बाहर जाकर इंसाफ की एक जंग ने समाजिक परंपराओं के खोखलेपन को बेपरदा किया था।
सिर्फ ये दो उदाहरण उस तोहमत के दाग नहीं मिटा सकते कि फिल्मों की दुनिया ऐसे जघन्य अपराधों को ग्लैमर के नाम पर कहीं न कहीं महामंडित करती है। सिनेमा की दुनिया से जुड़ा कोई भी बंदा इस तोहमत को आंखें मूंदकर खारिज नहीं कर सकता। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, अगर साल में सौ फिल्में बनती हैं, तो तीस से ज्यादा फिल्मों में कहीं न कहीं ये मुद्दा जुड़ा रहता है और ऐसे मुद्दे पर बनी फिल्में जब मनोरंजन केे मसालों के तड़के के साथ बनती हैं, तो न सिर्फ शर्मिंदगी का सबब बनती हैं, बल्कि बहुधा बाक्स आफिस पर ही खारिज हो जाती हैं। यहां बाक्स आफिस बड़ा मुद्दा नहीं बन सकता, सिवाय इसके कि कमाई की गरज से ही ऐसी फिल्मों में मसाले ठूंसे जाते हैं।
इस विषय पर फिल्में बनती रही हैं और बनती रहेंगी। अभी दर्शकों ने रवीना टंडन की मातृ देखी, तो आने वाले समय में इसी तरह के सब्जेक्ट पर बनी श्रीदेवी की फिल्म मॉम आएगी, जिसमें भी एक मां का अपनी टीनेज बेटी (जो बलात्कार की शिकार हुई) के इंसाफ के लिए संघर्ष है।
अब, जबकि निर्भया कांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सामने आ चुका है, तो मुमकिन है कि इस कांड पर फिल्में बनने का नया दौर शुरु हो जाए। 2013 से अब तक इस कांड पर कई फिल्मेंं बनीं और कईं फिल्में बनाने की घोषणा हुई, लेकिन लगभग सभी फिल्में आई-गई हो गईं।
ये सच है कि फिल्मों की दुनिया मनोरंजक फिल्में बनाती है। ये भी सच है कि फिल्मों की दुनिया समाजिक विषयों पर भी फिल्में बनाती आई है। ये भी सच ही कहा जाएगा कि समाजिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों के लिए ये सबजेक्ट (बलात्कार) सबसे मुफीद माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस विषय से हर तरह का दर्शक वर्ग सीधे तौर पर जुड़ता है।
ये तो नहीं कहा जा सकता कि सिनेमा कभी इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाना बंद कर देगा। शायद कम भी न करे। ये जरुर कहा जा सकता है कि 70-80 के दशक में बीआर चोपड़ा सरीखे फिल्मकार जब इन विषयों को लेकर फिल्में बनाते थे, तो वे समाज के साथ सिनेमा के सरोकार को परिभाषित और रेखांकित करने का महत्वपूर्ण काम करती थीं।
सोशल मीडिया और इंटरनेट क्रांति के इस दौर में उस सिनेमा की कमी सबसे ज्यादा महसूस होती है, जिसने कभी समानांतर सिनेमा तो कभी कला फिल्मों के नाम से कमर्शियल सिनेमा के दबाव और दावे के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखी थी। आज उस सिनेमा की सिर्फ यादें रह जाती हैं और इन यादों में ही सिमटा ये सच आज फिर याद आया कि कभी सिनेमा का समाज के साथ गहरा रिश्ता होता था। अब सिर्फ और सिर्फ कमाई की गरज से इस रिश्ते को समझने वाले और समझाने वाले बहुत पीछे छूट चुके हैं।
ऐसे में निर्भया कांड की गूंज इस रिश्ते की बातों और यादों को भी याद किया जा सकता है।
2012 से 2017 के बीच अदालतों में कानून की प्रक्रिया का हिस्सा बना ये खौफनाक कांड देखा जाए, तो कहीं न कहीं सिनेमा की दुनिया से जुड़ा ही रहा। जब ये हादसा हुआ था, तो फिल्मी सितारे भी अपनी खोल से बाहर निकलकर देश के आक्रोश के साथ कदमताल करते हुए आंदोलनों का हिस्सा बने थे।
उस दौर में हिंदी सिनेमा को इस बात की तोहमत भी झेलनी पड़ी थी कि फिल्में बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों को मसालेदार बनाकर पेश करती हैं और इनको प्रोत्साहित करने का गुनाह करती हैं। इस तोहमत को लेकर लंबे दौर तक बहस भी होती रही, जो एक दिन चर्चाओं की दुनिया से दूर हो गई। मगर जब जब इस केस को लेकर मीडिया में कोई खबर आई, तो फिल्मी सितारों ने निर्भया के साथ न्याय की मांग को अपनी आवाज जरुर दी।
कुछ दिनों पहले ही रवीना टंडन जब अपनी फिल्म मातृ का प्रमोशन कर रही थीं, तो उन्होंने मीडिया के सामने इस कांड का जिक्र किया, क्योंकि उनकी फिल्म की कहानी का विषय भी इससे मिलता-जुलता था। रवीना की फिल्म में एक मां का संघर्ष था, जिसको खुद बलात्कार की विभीषिका सहनी पड़ी और बलात्कारियों ने उसकी टीनेज बेटी को बलात्कार के बाद मार डाला था। चूंकि ये हिंदी फिल्म थी, इसलिए इस संवेदनशील विषय को उन मसालों के साथ बनाया गया, जिनके चलते बाक्स आफिस पर फिल्म को कोई खास रेस्पांस नहीं मिला। यहां आकर एक बार उस तोहमत की याद ताजी हो गई, जिसमें सिनेमा, खास तौर पर हिंदी सिनेमा बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दे के साथ असंवेदनशील नजर आता है।
90 के दशक की एक और फिल्म याद आती है, जो राजकुमार संतोषी ने बनाई थी। दामिनी ने इस मुद्दे को सामाजिक सरोकारों के साथ सीधे तौर पर जोड़ा। कैसे घरेलू नौकरानी के साथ अमीर घर के
बिगड़े शहजादे द्वारा बलात्कार और फिर घर की बहू द्वारा परिवार की इज्जत के सवाल से बाहर जाकर इंसाफ की एक जंग ने समाजिक परंपराओं के खोखलेपन को बेपरदा किया था।
सिर्फ ये दो उदाहरण उस तोहमत के दाग नहीं मिटा सकते कि फिल्मों की दुनिया ऐसे जघन्य अपराधों को ग्लैमर के नाम पर कहीं न कहीं महामंडित करती है। सिनेमा की दुनिया से जुड़ा कोई भी बंदा इस तोहमत को आंखें मूंदकर खारिज नहीं कर सकता। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, अगर साल में सौ फिल्में बनती हैं, तो तीस से ज्यादा फिल्मों में कहीं न कहीं ये मुद्दा जुड़ा रहता है और ऐसे मुद्दे पर बनी फिल्में जब मनोरंजन केे मसालों के तड़के के साथ बनती हैं, तो न सिर्फ शर्मिंदगी का सबब बनती हैं, बल्कि बहुधा बाक्स आफिस पर ही खारिज हो जाती हैं। यहां बाक्स आफिस बड़ा मुद्दा नहीं बन सकता, सिवाय इसके कि कमाई की गरज से ही ऐसी फिल्मों में मसाले ठूंसे जाते हैं।
इस विषय पर फिल्में बनती रही हैं और बनती रहेंगी। अभी दर्शकों ने रवीना टंडन की मातृ देखी, तो आने वाले समय में इसी तरह के सब्जेक्ट पर बनी श्रीदेवी की फिल्म मॉम आएगी, जिसमें भी एक मां का अपनी टीनेज बेटी (जो बलात्कार की शिकार हुई) के इंसाफ के लिए संघर्ष है।
अब, जबकि निर्भया कांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सामने आ चुका है, तो मुमकिन है कि इस कांड पर फिल्में बनने का नया दौर शुरु हो जाए। 2013 से अब तक इस कांड पर कई फिल्मेंं बनीं और कईं फिल्में बनाने की घोषणा हुई, लेकिन लगभग सभी फिल्में आई-गई हो गईं।
ये सच है कि फिल्मों की दुनिया मनोरंजक फिल्में बनाती है। ये भी सच है कि फिल्मों की दुनिया समाजिक विषयों पर भी फिल्में बनाती आई है। ये भी सच ही कहा जाएगा कि समाजिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों के लिए ये सबजेक्ट (बलात्कार) सबसे मुफीद माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस विषय से हर तरह का दर्शक वर्ग सीधे तौर पर जुड़ता है।
ये तो नहीं कहा जा सकता कि सिनेमा कभी इस तरह के विषयों पर फिल्में बनाना बंद कर देगा। शायद कम भी न करे। ये जरुर कहा जा सकता है कि 70-80 के दशक में बीआर चोपड़ा सरीखे फिल्मकार जब इन विषयों को लेकर फिल्में बनाते थे, तो वे समाज के साथ सिनेमा के सरोकार को परिभाषित और रेखांकित करने का महत्वपूर्ण काम करती थीं।
सोशल मीडिया और इंटरनेट क्रांति के इस दौर में उस सिनेमा की कमी सबसे ज्यादा महसूस होती है, जिसने कभी समानांतर सिनेमा तो कभी कला फिल्मों के नाम से कमर्शियल सिनेमा के दबाव और दावे के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखी थी। आज उस सिनेमा की सिर्फ यादें रह जाती हैं और इन यादों में ही सिमटा ये सच आज फिर याद आया कि कभी सिनेमा का समाज के साथ गहरा रिश्ता होता था। अब सिर्फ और सिर्फ कमाई की गरज से इस रिश्ते को समझने वाले और समझाने वाले बहुत पीछे छूट चुके हैं।
ऐसे में निर्भया कांड की गूंज इस रिश्ते की बातों और यादों को भी याद किया जा सकता है।





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