Thursday, April 20, 2017

सोनू निगम के इस शोर-शराबे के सियासी मायने......

सोनू निगम चांद की दुनिया के बाशिंदे कभी नहीं रहे। मुंबई से उनका पैदाइशी रिश्ता है, जहां हजारों-लाखों लोग फुटपाथ पर सोते हैं, जहां दौड़ती गाड़ियों का रेला कम शोर नहीं करता। रेलवे की लाइनों के करीब रहने वाले मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनों की धड़धड़ाहट के शोर के आदी हो जाते हैं, तो हवाई अड्डे के करीब रहने वाले दिन-रात उड़ने वाले हवाई जहाजों के शोर में खुद की नींद को जैसे डूबो लेते हैं। और तो और, बिल्डिंगों की सोसायटीज के जलसे भी नियमित रुप से कभी बीमार, बूढ़े लोग, तो कभी इम्तिहान की तैयारियां करने वाले छात्रों और नवजात बच्चों के बिलखने के बीच हर किसी को संदेश एक ही होता है कि आप एक आजाद देश में रह रहे हैं, जहां हर किसी को कानून की फिक्र करने की जरुरत भी नहीं रहती। सिर्फ मुंबई क्यों, हर महानगर से लेकर शहरों, छोटे कस्बों और गांवों में जहां तलक देखो, शोर-शराबा ही हमारे आसपास पसरा नजर आता है। 

सोनू निगम जानते हैं कि धर्म हर जगह शोर नहीं करता, लेकिन धर्म के नाम पर शोर करना और करवाना कोई मुश्किल नहीं। सोनू निगम ने बात शोर की और मुद्दा धर्म से जोड़ दिया। उनको ये भी जताना जरुरी था कि वे मुस्लिम विरोधी नहीं है, लिहाजा दबी जुबां में मस्जिद से आने वाली सुबह की पहली अजान वाली बात के साथ मंदिर और गुरुद्वारे के शब्दों को टांक भर दिया। मुमकिन है कि सोनू निगम को ये न पता हो कि ईसाईयों के चर्च भी घंटे घड़ियालों के शोर से गूंजाएमान रहते हैं, इसलिए उन्होंने इसका जिक्र करने से परहेज नहीं किया। 

सोनू निगम मुंबई में रहते हैं और आमची शिवसेना की धाक और धमकी वाले अंदाज से वे काफी करीब से परिचित हैं, इसलिए सलाना जलसों में शराब सेवन के साथ डांस की बातों को इशारों में उड़ा दिया। ऐसा करना उनके लिए बेहद जरुरी था, वरना लेने के देने पड़ने का डर बना रहता है। अजान के साथ गुंडागर्दी के शब्दों को जोड़ना उनके लिए इसलिए जरुरी था कि ऐसा न करते, तो असली मकसद कहीं अधूरा रह जाता। 

अगर कोई ये समझना चाहे कि सोनू निगम किसी मजहब का नहीं, सिर्फ शोर की बात कर रहे थे, तो ये उसकी समझदारी होगी, जिसका हकीकत से बहुत ज्यादा वास्ता नहीं। आने वाले वक्त में सोनू निगम के इस शोर-शराबे के तार सियासी गलियारे से जुडे दिखें, तो हैरान होने की गुंजाइश नहीं होगी। अदनान समी से लेकर स्वनाम धन्य अभिजीत भट्टाचार्य और कैलाश खेर तक लंबी फेहरिस्त है, जिसमें सियासी धुनों पर गायिकी के सुरों को चमकते और धमकते देखा गया। सोनू निगम भी जानते हैं कि मौजूदा निजाम में, दिल्ली दरबार के दरबारियों को वो ही आवाजें जल्दी सुनाई देती हैं, जिनमें उस मजहब के सुर लगे हों, जो सियासती आकाओं को सुनना पसंद है। अगर अभिजीत भट्टाचार्य जिस दरबार में सजे हों, वहां एक अदनी कुर्सी का इंतजाम सोनू के लिए भी हो जाए, तो हर्ज क्या है। 

सोनू निगम की गायिकी की सत्ता पर नई पीढ़ी के गायकों का दबदबा नजर आने लगे, तो क्या हुआ, उनके पास सालों की गायिकी की विरासत है और इस विरासत के तार अगर सियासत से जोड़ने हों, तो सत्ता विरोधी जमातों से हर कोई कोसों दूर रहता है और सत्ता की सियासत का सुख पाना हो, तो मजहब की आड़ लेना कौन सी बुरी बात हो गई और इस दौर में हर कोई जानता और समझता है कि किस महजब की तारीफ-बुराई से आप कहां से कहां आ-जा सकते हो। 

सबसे भयंकर तौर पर मजलूमों की जमात वो है, जो सोनू निगम को उनके शोरगुल वाले अंदाज को मुस्लिम विरोधी बनाने पर तुली हुई है। ऐसा लगता है कि ये जमात जल्दी से जल्दी सोनू निगम को दिल्ली पंहुचाने को बेताब है। उनके इस खेल में सबसे अक्लमंद तो वे मौलवी हैं, जिन्होंने सोनू का सर मुंडाने का फतवा जारी किया और सोनू निगम ने चंद घंटों में साबित कर दिया कि सियासत के मैदान में वे कितने ऊंचे सुर में गाने की महारथ रखते हैं। जितना सोनू को मुस्लिम विरोधी कहा जाएगा, सोनू जी उतनी ही जल्दी दिल्ली दरबार की सत्ता के मठाधीशों की अनुकंपा का पात्र बनेंगे। 

सियासत करना बुराई नहीं। सितारों का सियासत करना भी बुराई नहीं। सियासत की गली में एंट्री के लिए अब महजब की बैसाखी थामना भी बुरी बात नहीं रही। तो ऐसे में सोनू के लिए मैदान साफ है। 

लगे हाथों सोनू को शोरगुल से छुटकारा पाने की एक मुफीद नसीहत भी दी जा सकती है- किसी मकां की छत पर चढ़कर सोने का शौक बंद करके अगर वे अपने आलीशान घर के दरवाजे खिड़कियों को बंद करके सोएंगे, तो न मच्छरों का प्रकोप रहेगा, न चोरी चकारी का डर और न ही किसी शोर का झंझट। वैसे सोनू निगम ने टैरेस पर सोना कब शुरु किया, ये जानना भी कम दिलचस्प नहीं होता, लेकिन इसकी जरुरत नहीं,क्योंकि सुरों का नया साज सोनू के लिए सज चुका है, जिसमें शोर तो बोर नहीं करेगा। 

सियासी शोर को झेलने का माद्दा हिंदुस्तानी आवाम में सालों से रहा है और रहेगा। इसमें एक सोनू निगम की आवाज और सही......




3 comments:

Bhuvendra Tyagi said...

बहुत खूब।
सही मुद्दा पकड़ा।
मौसिकी के साथ सियासी सुरों की जुगलबन्दी ही है ये।

Vidyut Prakash Maurya said...

बेहतरीन लिखा

Vidyut Prakash Maurya said...

बेहतरीन लिखा

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