Sunday, April 9, 2017

अक्षय को नहीं, तो क्या किसी खान को मिलता सरकारी एवार्ड ?

इस साल के नेशनल एवार्डस में बेस्ट एक्टर के एवार्ड को लेकर अक्षय कुमार की (कनेडियन) नागरिकता को मुद्दा बनाना कहीं से भी सही नहीं माना जा सकता। अगर सरकारी नियमों के तहत किसी गैर भारतीय नागरिकता वाले भारतीय को इस पुरस्कार का हर नहीं है, तो इस नियम में तत्काल बदलाव करने की जरुरत है। महज नागरिकता के लिए अक्षय कुमार की राष्ट्रीयता पर कोई भी सवाल छोटी मानसिकता के अलावा कुछ नहीं है। इन मानसिकता का किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं हो सकता। अक्षय कुमार उतने ही भारतीय हैं, जितना हर कोई देशवासी। 
ये बात तो यहीं खत्म हो जाती है, लेकिन उनको बेस्ट एक्टर का पहली बार मिलने वाला पुरस्कार अगर विवादों के घेरे में आया है या इसे आलोचना का शिकार होना पड़ा है, तो इसे कहीं से भी आधारहीन कहकर खारिज नहीं कर सकते। इसे लेकर आलोचना चाहें जिस स्तर पर हो, हैरानी नहीं होती। 










पहली नजर में ये अक्षय कुमार की काबिलियत को सम्मानित करने से कहीं ज्यादा मामला उस सरकारी बंदरबांट का है, जो सत्ता में आसीन राजनैतिक पार्टियों के आका अपनी पसंद के मुताबिक बिना किसी तर्क के बांटना पसंद करते थे और इसी बंदरबाट को राजनैतिक पावर का शो करती हैं। 
इस वक्त दिल्ली के तख्त पर जो सत्ता सवार है, उसके आकाओं के बारे में किसी को भी शक नहीं है कि अक्षय कुमार उनके पसंदीदा और भरोसेमंद आदमी के तौर पर पहचाने जाते हैं। सरकारी गलियारों में कई मौकों पर अक्षय कुमार साहब को सत्तासीन पार्टी के बड़े नेताओं के दफ्तरों में भी देखा गया। ये न तो अक्षय का कसूर हुआ और न पार्टी का। पार्टी जब सत्ता में होती है, तो उसके अपने आदमी हर कहीं होते हैं। ये पहले भी होता था और अब भी हो रहा है। पहले भी अपने आदमियों को पुरस्कारों से नवाजा जाता था और अब भी हो रहा है। 
क्या हुआ अगर कहा जा रहा है कि रुस्तम के लिए अक्षय कुमार बेस्ट हीरो का सरकारी पुरस्कार डिजर्व नहीं करते। ज्यूरी के हेड प्रियदर्शन (जो अक्षय कुमार के साथ कई फिल्में बना चुके हैं) तो सरकारी नियमों को ताक पर रखकर बोल गए कि अक्षय को सिर्फ रुस्तम नहीं, एयरलिफ्ट के लिए भी यही पुरस्कार मिलेगा। यानी एक एक्टर को दो फिल्मों में एक्टिंग के लिए एक एवार्ड मिलेगा या दो अलग अलग एवार्ड मिलेंगे, ये तब देखा जाएगा, जब महामहिम राष्ट्रपति के सामने अक्षय कुमार ये पुरस्कार लेने जाएंगे। प्रियदर्शन को जो समझ में आया, वो कह चुके हैं। 
जो लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं कि अक्षय कुमार रुस्तम के लिए ये एवार्ड डिजर्व नहीं करते, उनको पहली फुर्सत में ये सोचना चाहिए कि क्या ये एवार्ड अक्षय के टेलेंट को दिया गया है। अक्षय पिछले दो साल से देशभक्ति के जिस छौंके को अपनी फिल्म का बैकड्राप बनाकर चल रहे थे, उसके लिए उनको इस सरकार से रिटर्न गिफ्ट में इससे बढ़िया कुछ और नहीं मिल सकता था। उनके लंबे कैरिअर में पहली बार राष्ट्रीय पुरस्कार पाने की ललक के लिए अक्षय कुमार की मेहनत रंग लाई। यकीन मानिए कि अगर रुस्तम की जगह उनकी कोई भी फिल्म होती, तो उनको यही एवार्ड मिलता। यहां तो अक्षय की देशभक्ति की फिल्मों की लाइन लगी हुई है। कहने वाली बात महज इतनी सी है कि ये एवार्ड किसी फिल्म या टेेलेंट को नहीं, बल्कि अक्षय कुमार की उस भक्ति को मिला है, जिसके सियासती तारों को जोडना किसी के लिए मुश्किल नहीं। 








वैसे इस बार दावेदारों में अक्षय कुमार के अलावा और भी ऐसे कई सितारे थे, जिनकी झोली में ये बंदरबांट आ सकती थी, लेकिन अजय देवगन को फिलहाल शिवाय के लिए स्पेशल इफेक्टस की लालीपॉप मिल गई है और सलमान खान को किसी एवार्ड की जरुरत नहीं। केंद्रीय सत्ता के पास ढाई साल का समय सुरक्षित है। आने वाले दो सालों में अपनी पसंद के कई दूसरों को इस किस्म के गिफ्ट दिए जाने बाकी हैं। 
1991 के एक ऐसे ही किस्से की याद ताजा हो गई, जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने थे और उस साल अग्निपथ के लिए अमिताभ बच्चन को ठीक इसी तरह की रेवड़ी का सरकारी एवार्ड मिला था। उस वक्त बच्चन को सीधा संदेश था कि सालों तक कांग्रेस पार्टी से रिश्ते रखने के बाद भी आपको कोई नेशनल एवार्ड नहीं मिला। आईए, हम आपको ये सम्मान दे देते हैं, क्योंकि अब सत्ता हमारी है। 
तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकटरमण से फिल्म अग्निपथ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार ग्रहण करते हुए अमिताभ बच्चन
याद आता है, तो वही दौर था, जब इलाहबाद के सांसद रहे बच्चन बोफोर्स कांड में फंसकर सियासत छोड़कर फिल्मों में लौटे थे और कांग्रेस से उनके रिश्ते बिगड़ चुके थे। याद कीजिए, उसके बाद बच्चन कभी कांग्रेस से पास नहीं फटके। वैसे तो बच्चन मौजूदा सत्ता के भी करीब माने जाते हैं और ये भी कम दिलचस्प नहीं कि वे खुद फिल्म पिंक के लिए इसी एवार्ड के दावेदारों में थे, जो अक्षय की झोली में गिर गया। वैसे पीकू के लिए बच्चन को ये सम्मान देकर उनको पिछले साल खुश किया जा चुका है। 
किसी को मायूस होने की जरुरत नहीं। कौन जाने, अगले दो सालों में अमिताभ बच्चन से लेकर सलमान खान, अजय देवगन और अनुपम खेर से लेकर मधुर भंडारकर तक न जाने किसे इस सम्मान से नवाज दिया जाए। अगर ये मुमकिन नहीं, तो पद्म सम्मानों से लेकर संसद की कुर्सी तक का विकल्प है। बस साहब का मूड होना चाहिए। 
मूल बात पर लौटते हैं। अक्षय को मुबारक, उनकी फिल्म, उनकी काबिलियत और ये सरकारी ईनाम भी। खिलाड़ी साहब को एक और मुबारकबाद एडवांस में। 11 अगस्त को देश के मुखिया के पसंदीदा स्वच्छ अभियान पर बनी अक्षय की फिल्म बाक्स आफिस पर बड़ी जीत हासिल करेगी। जब केंद्र की सत्ता की आंखों की किरकिरी बना कोई स्टार (शाहरुख खान) निशाने पर हो, तो भयंकर ईगो का शिकार देश का सर्वोच्च नेता अपने पसंदीदा खिलाड़ी को खेल में जीतने का बंदोबस्त जरुर करेगा। इससे देश, अक्षय कुमार, प्रधानमंत्री सबका सम्मान बढ़ेगा। 

आखिरी बात- देश के प्रधानमंत्री के गुणगान करने वाले एक शरीफ बंदे ने बहुत ठीक से समझा दिया कि इस सरकार में अक्षय को नहीं, तो क्या किसी खान को सरकारी एवार्ड मिलेगा... ? 

ये सवाल नहीं था, उस कड़वे सच का स्याहपन था, जिसका हिस्सा अब खिलाड़ी कुमार बन चुके हैं। मुबारक हो अक्षय कुमार साहब को.. 



No comments:

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...