क्या बिना किसी लाग लपेट के मान लिया जाए कि बेगम जान का बाक्स आफिस पर न चलना एक मामूली सी बात है, जिसे तवज्जो देने की कतई जरुरत नहीं। हिंदुस्तान में हर साल सैकड़ों-हजारों की तादाद में फिल्में बनती हैं, चंद फिल्में ही तो हिट होती हैं, बाकी सब तो फ्लाप फिल्मों के रेले में बह जाती हैं। बेगम जान में ही ऐसी क्या बात है कि इसके न चलने को बड़ी बात मान ली जाए।
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| Begum Jaan |
बेगम जान को महेश भट्ट की कंपनी ने बनाया, जिनके लिए किसी फिल्म का न चलना पहला तजुर्बा नहीं है। इसके बंगाली डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी ही इसके मूल बंगाली वर्शन की कामयाबी का सुख पा चुके हैं। उनके लिए हिंदी वर्शन किसी बोनस जैसा था, जो मिला, वही बहुत। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह सहित एक से बढ़कर एक कलाकारों की फौज थी, जिनमें से एक नाम विद्या बालन का था।
फिल्म के रिलीज से पहले प्रमोशन में महेश भट्ट और विद्या बालन ही नजर आए, इसलिए कि महेश भट्ट ब्रैंड हैं, जो मीडिया को पसंद है और विद्या बालन फिल्म की मेन हीरोइन, इसी नाते उन्होंने फिल्म के प्रमोशन की जिम्मेदारी संभाली।
हिट-फ्लाप के नजरिए से देखा जाए, तो ये बात भी समझ में आती है कि बेगम जान विद्या बालन के लंबे कैरिअर में ये पहला मौका नहीं है, जब उनकी फिल्म उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। सवाल को दूसरे शब्दों के साथ वापस लाते हैं कि बेगमजान की नाकामयाबी का विद्या बालन के लिए आखिरकार क्या सबब है?
इस छोटे से सवाल के बड़े जवाब के पहले हिस्से में गणित की एक गिनती जुड़ती है और बात ये हो जाती है कि ये विद्या बालन की लगातार सातवीं फिल्म है, जिसने बाक्स आफिस पर दम तोड़ा हो और इस तरह से देखने पर बेगमजान की नाकामयाबी विद्या बालन के लिए कोई मामूली बात कतई नहीं रह जाती। ये कोई मैजिक फिगर नहीं है। अगर मौजूदा दौर में सात फिल्मों की कामयाबी किसी स्टार के रुतबे को कहीं से कहीं पंहुचा सकती है, तो लगातार सात फिल्मों की नाकामयाबी का आखिर कुछ तो अहमियत होती है। एक पल के लिए सोचिए कि अगर ये फिल्में हिट हो जातीं, तो मीडिया विद्या बालन की सुपर सफलता का जश्न खुद विद्या बालन से ज्यादा मना रहा होता। यहां स्थिति उलट है, इसीलिए इस पर चर्चा की जा सकती है।
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| Kahaani 2 |


कमर्शियल फिल्मों की दुनिया में हिट-फ्लाप को धूप-छांव कहने वालों की कमी नहीं। खुद विद्या बालन न जाने कितने मौकों पर फरमा चुकी हैं कि उनके लिए बाक्स आफिस के आंकड़े कोई मायने नहीं रखते। उनकी बात गलत भी तो नहीं। इतने सालों में विद्या बालन ने अपने कैरिअर को इतनी बुलंदी पर तो ला खड़ा किया है कि वे ऐसी बातों से अपना दिल बहला सकें। इससे इतर देखा जाए, तो इस अधूरे सच की पूरी हकीकत कम खौफनाक नहीं। जिस दुनिया में हर शुक्रवार को बाक्स आफिस के आंकड़ों की बाजीगरी किसी के स्टारडम को बनाने और बिगाड़ने का खेल खेलती हो, वहां सात फिल्मों के लगातार फ्लाप होने के सच को कोई बेफिक्रे के धुएं में उड़ाने की कोशिश भी करे, तो वो असलियत से कोसो दूर होती चली जाती है। सात फिल्मों के न चलने के दंश को विद्या बालन चाहकर भी अब खारिज नहीं कर सकतीं। यहीं आकर बेगमजान की नाकामयाबी विद्या बालन को एक ऐसे मकाम पर ले आई है, जिसे अब उनके कैरिअर के भविष्य के लिए खतरे की घंटी मानने वालों की गिनती लगातार बढ़ेगी।
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| Dirty Pic |
इस स्थिति का आकलन करने से पहले उस दौर का जिक्र करना जरुरी होगा, जब विदया बालन ने डर्टी पिक्चर, इश्किया और कहानी जैसी फिल्मों से सिर्फ बाक्स आफिस की कामयाबी ही नहीं पाई, बल्कि विद्या बालन ने सुपर स्टारों की उस सत्ता को सीधे तौर पर चुनौती दी, जो अपने सुपर स्टारडम के बूते किसी हीरोइन की इतनी ऊंची उड़ान की सोच भी नहीं सकते थे। ये कहना गलत नहीं होगा कि विद्या ने उस मुर्दा जैसे सिनेमा के आंदोलन में जान फूंक दी, जहां कभी महिला पात्रों के दबदबे वाली फिल्मों की दुनिया आबाद होती थी। इसी दुनिया ने सिनेमा की दुनिया को स्मिता पाटिल और शबाना आजमी सरीखे हीरो को तराशने का मौका दिया। विद्या बालन की फिल्मों की कामयाबी इस आंदोलन के लिए वरदान साबित हुई।
इसी मोड़ पर विद्या बालन के साथ वो हुआ, जिसने धीरे धीरे उनकी दुनिया की दशा और दिशा दोनों को बदलना शुरु किया। हीरो जैसी कामयाबी पाने वाली इस बेजोड़ हीरोइन की चमक से कमर्शियल फिल्मों की दुनिया ने सबसे पहले कन्नी काटनी शुरु की। बड़े सितारों ने विद्या बालन के साथ जोड़ी बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो सितारों के बूते कामयाबी का रास्ता तलाशने वाले कारपोरेट घराने में विद्या बालन का ग्रेड बदलते देर नहीं लगी।
विद्या इस सच को न देख पा रही थीं, न समझ पा रही थीं। उनको बस इतना समझ में आया था कि हीरोइन ओरिएंटेड फिल्मों के लिए वे हीरो से कम नहीं। विद्या बालन के इस सच के असली सच से मुलाकात तब हुई, जब उनकी वो फिल्में बाक्स आफिस पर दम तोड़ने लगीं, जिनमें महिला प्रधान जैसा कुछ नहीं था। फरहान अख्तर के साथ शादी के साइड इफेक्टस और इमरान हाश्मी के साथ घनचक्कर विद्या की इस कोशिश का नतीजा था कि वे कमर्शियल फिल्मों में भी कम नहीं, लेकिन बाक्स आफिस पर इन कमजोर फिल्मों के हश्र ने उनकी कोशिश को बेरंग तो किया ही। दिया मिर्जा की प्रोडक्शन हाउस में बनी बॉबी जासूस ने उनके हीरोज्म को बड़ा झटका दिया। टेन, हमारी अधूरी कहानी और कहानी 2 के बाद बेगमजान उनको अगर करो या मरो वाली स्थिति में ले आई, तो भी विद्या इस भ्रम के साथ जीती रहीं कि बालीवुड में किसी हीरोइन को स्टारडम का लेबल मिल जाए, तो फ्लाप फिल्मों से उनका कुछ नहीं बिगड़ता। इस भ्रम ने विद्या बालन को सात लगातार फ्लाप फिल्मों की ऐसी हीरोइन बना दिया, जिसके कैरिअर को लेकर अब कुछ नहीं कहा जा सकता।
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| Tumhari Sulu ( to be released in December 2017) |
विद्या बालन के लिए पहली दुआ कि इस साल आने वाली फिल्म तुम्हारी सुलू (उनकी इस वक्त की इकलौती फिल्म) आठवीं फिल्म के तमगे से बचे। दूसरी दुआ, विद्या बालन हकीकत के आईने को देखें और पहचाने भीं। तीसरी दुआ, विद्या बालन अपने अतीत के स्टारडम की परछाई से बाहर निकलें, तो उनको अंधेरे का एहसास हो सकेगा कि किन कमजोर फिल्मों ने उनको इस हाल में पंहुचाया।
सात फिल्मों की नाकामयाबी को खतरे की घंटी माना जाए, या करो या मरो की स्थिति कहा जाए। शब्दों की जुगाली से अलग एक और बात-
विद्या बालन उस इलाके में रहती हैं, जहां समुंदर अठ्ठासे मारता है। कभी फुर्सत मिले, तो विद्या बालन समुंदर किनारे उस रेत को अपने हाथों में थामने की कोशिश करें, जिसके हथेलियों में होने का गुमान जरुर होता है, लेकिन हाथ से फिसलने का एहसास नहीं होता। विद्या बालन हाथों से फिसलने वाली रेत के एहसास को पहचानें या चट्टानों से टकराकर भी अपने वजूद की जद्दोजेहद में लगी लहरों के सच को पहचानें। ये लहरें काश हमारी उस हीरोइन को वापस ले आए, जो बाक्स आफिस के दायरों से बाहर फिर से कहें- जिंदगी एक बार मिलती है, तो दोबारा क्या सोचना।
उनके हर चाहने वाले के दिल की एक आहट को आवाज दे सकते हैं, जो यही कह सकती है-
लौट आओ विद्या.....















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