महिला प्रधान किरदारों से सराबोर सिनेमाई परदा
पिछले दो सप्ताह से हिंदी सिनेमा का रुपहला परदा महिलाओं के किरदारों से जैसे जगमगा उठा है। एक के बाद एक ऐसी फिल्में, जिनमें महिला किरदारों को तरतीब से गढ़ा-रचा गया। भले ही इनको अजूबा न माना जाए, भले ही इनको भारतीय सिनेमा का सुनहरी दौर न माना जाए, लेकिन दो सप्ताहों से हिंदी सिनेमा के परदे पर महिला प्रधानों से लबरेज फिल्मों की छटां-कला को भला कौन अनदेखा कर सकता है। आने वाले दिनों में बेगम जान का किरदार इस सफर की खूबसूरती में और इजाफा करने जा रहा है।
यहां इन फिल्मों के बाक्स आफिस नतीजों को लेकर कोई बहस नहीं है, न ही इनके टाइमिंग को लेकर कोई सवाल है। सीधे, सरल शब्दों में कहा जाए, तो ये एक दौर है आज के सिनेमा के उस बहुआयामी सरोकारों से सजा नजर आ रहा है, जिसके बारे में कुछ सालों पहले तक कहा और माना जाता था कि हमारे समाज की तरह सिनेमा की दुनिया भी पुरुष प्रधान मानसिकता की शिकार है, जहां महिलाओं का इस्तेमाल मसालेदार फिल्मों में हीरो के साथ नाचने-गाने और ग्लैमरस नजर आने तक सीमित था। ये धारणा न तो पूरी तरह से गलत थी और न ही सही थी। लंबे समय से इसे लेकर हर स्तर पर बहस होती रही। हर किसी ने इसे अपने अपने नजरिए से परिभाषित किया और इस बहस को अंतहीन बनाकर छोड़ दिया।
एक बार फिर सिनेमा के उस चमत्कार पर लौटते हैं, जिसकी गूंज से इस वक्त रुपहला परदा गुंजायमान हो रहा है। पिछले सप्ताह स्वारा भा्स्कर ने अनारकली में बिहार की एक ऐसी ठेट लड़की के किरदार को जिया, जो अपने आसपास के समाज को चुनौती ही नहीं देती, बल्कि उसके दंभ को भी चूर कर देती है। इस हफ्ते की शबाना को देखें, तो ये आज के दौर के खुलेपन का चेहरा है, जो मुस्लिम परिवेश के दायरे से बाहर निकलकर अपनी हिफाजत के लिए जूडो कराटे सीखती है और भरे बाजार में जब कोई लड़का उससे टकराकर आगे बढ़ता है, तो उसको ईंट का जवाब पत्थर से देने में कोई संकोच नहीं करती। पूर्णा का किरदार झकझोर देने वाला है। तेलंगाना के एक मामूली गांव की 13 साल की बच्ची दुनिया के सबसे ऊंचे बर्फीले पहाड़ के कलेजे को चीरकर जब उसकी चोटी पर जा पंहुचती है, तो दुनिया की हर मजबूरी, हर लाचारी उसके आगे बौनी हो जाती है। ये तीन किरदार परदे पर आ चुके हैं और बेगम जान का किरदार अभी आना बाकी है, लेकिन बेगम जान का किरदार समाज की सत्ता को किस तरह से चुनौती देता है और कैसे इस समाज के लिए चुनौती बनता है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं। बात को आगे ले जाने से पहले भारतीय सिनेमा और भारतीय समाज के इस अभूतपूर्व मिलन को सलाम, जिसने एक बेहद दिलचस्प तस्वीर को सिनेमाई परदे से जोड़ दिया।
माना जा सकता है कि ये एक संयोग मात्र है, लेकिन बात को यहीं तक सीमित करना न्यायसंगत नहीं होगा। अगर ये संयोग भी है, तो एक सुखद संयोग है और इस संयोग को परदे पर उकेरने में भारतीय सिनेमाकारों के सफर और दर्शकों की बदलती सोच के संगम को कैसे अनदेखा किया जा सकता है। खास तौर पर नई सदी के साथ हिंदी सिनेमा ने जो करवट बदली, ये उस सफर की झांकी और आने वाले कल के आशावाद से तो कहीं कम नहीं हो जाता। एक ओर, बदलते दौर के बदलाव को पहचानते हुए हिंदी सिनेमा के युवा फिल्मकारों ने यथार्थवादी सिनेमा की ओर रुख न किया होता, तो मुमकिन नहीं था कि हम इस सुखद चमत्कार के साक्षी बने होते। घोर बाजारवाद के रास्तों पर बिकने और खरीदने की विरासत और त्रासदी के शिकार हिंदी सिनेमा में यथार्थवादी सिनेमा को इतना मौका और समर्थन मिलना मुमकिन नहीं होता, अगर इंटरनेट और सोशल मीडिया की क्रांति के सच के साथ युवा पीढ़ी ने सिनेमाघरों में जाकर इन बदलाव को अपना परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन न दिया होता। इसके बूते ही खालिश कारोबारी बनकर सिनेमा को जकड़ने वाले घरानों को भी अपना रुख बदलना पड़ा।
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| अविनाश दास (अनारकली ऑफ आरा) |
इस बदलाव में एक और दिलचस्प तथ्य जुड़ जाता है कि जिन महिला प्रधान किरदारों वाली फिल्मों को कारपोरेट घरानों से समर्थन मिला, तो अपनी पहचान के लिए जूझ रहे नए दौर के युवा फिल्मकारों ने भी इस असंभव जैसे समझे जाने वाले मिथ्य को हकीकत से मिला दिया। बानगी देखिए- स्वारा भास्कर की अनारकली का निर्देशन अविनाश दास ने किया,
जो सिनेमा के लिए नएनवेले हैं, तो शबाना को परदे पर लानेे वाले शिवम नायर भी बतौर निर्देशक अपनी पहचान के लिए जूझते रहे हैं। ये भी सही है कि शिवम नायर के इस पराक्रम के पीछे नीरज पांडे और अक्षय कुमार की मजबूत टीम का सहारा मिला। इस कड़ी की चौथी फिल्म बेगमजान के निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी हिंदी सिनेमा के लिए बेहद नए हैं। यहां महेश भट्ट का जिक्र करना लाजिमी हो जाता है, जिन्होंने बेगम जान को हिंदी परदे पर लाने के लिए अपनी प्रोडक्शन कंपनी को आगे किया।
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| शिवम नायर (नाम शबाना) |
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| राहुल बोस (पूर्णा) |
इस संयोग को लेकर एक और दिलचस्प संयोग को कहा जाए, तो इन फिल्मों में बालीवुड के स्थापित चेहरे नजर नहीं आते। अनारकली का किरदार निभाने वाली स्वारा भास्कर अभी तक सहायक अभिनेत्री के टैग के साथ काम कर रही हैं, तो शबाना की तापसी पन्नू को पिंक के बाद एक बड़ा मौका मिला और युवा पीढ़ी की इस अभिनेत्री ने इसे गंवाया नहीं। पूर्णा का किरदार निभाने वाली 13 साल की अदिति ईमानदार
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| श्रीजीत मुखर्जी (बेगम जान) |
को तो कोई भी नहीं जानता और जहां तक रही बात बेगम जान, यानी विद्या बालन की, तो कमर्शियल और नान कमर्शियल फिल्मों के बीच वे झूलती रही हैं। ये जरुर कहा जाता है कि इन चारों किरदार को निभाने वाली अदाकाराओं में सबसे ज्यादा अनुभव और महिला किरदारों के साथ खेलने का शौक विद्या को रहा है।
दो सप्ताहों का ये सुखद एहसास हिंदी सिनेमा के उस इतिहास की ताकत और सामर्थ्य को अनदेखा नहीं कर सकता, जिसमें महिलाओं के दमदार किरदारों वाली फिल्मों और उनको निभाने वाली अदाकाराओं की लंबी फेहरिस्त है। भारतीय सिनेमा जन्म से लेकर शैशव काल में ही उन ताकतवर महिला किरदारों और उनको निभाने वाली महिला कलाकारों के साथ जुड़ा रहा, जिनके लिए कहा जाना ठीक रहेगा कि कोई दौर ऐसा नहीं रहा, जब महिला कलाकारों ने मजबूत किरदारों से पुरुष प्रधान सिनेमा और समाज को आईना दिखाने का काम नहीं किया हो। सिनेमा का ये रुप इतना व्यापक है कि यहां इस चर्चा में उसे समेटना मुमकिन नहीा इतना तो कहा जाता है कि देविका रानी से लेकर रानी मुखर्जी तक हर काल में भारतीय सिनेमा ने ऐसे महान महिला पात्रों और अदाकाराओं को देखा है, जिनके आगे हर कोई नतमस्तक रहा है।
फिर भी मान लेते हैं कि ये संयोग है। मान लेते हैं कि ये चमत्कार है। मान लेते हैं कि चमत्कारों के बूते दुनियादारी आगे नहीं बढ़ती। सब कुछ मान लिया। फिर भी क्या ये मान लेने से हमारे समाज की किसी अनारा, किसी शबाना, किसी पूर्णा और किसी बेगम जान को हमारे परदे ने समाज के साथ नहीं जोडा। हर अनारा, हर शबाना, हर पूर्णा और हर बेगम जान हमारे इसी समाज का हिस्सा है और आज सिनेमा का परदा इन सारी नायिकाओं को सलाम कर रहा है, तो इस सलामी के साथ इन किरदारों को लेकर बेहद मेहनत करने वाली अदाकाराओं और इन अदाकाराओं को इन किरदारों से जोड़ने का साहस करने वाले युवा निर्देशकों के साथ उन ताकतों को भी सलामी, जिन्होंने समाज और सिनेमा के इस अप्रतिम मिलन में अपनी भूमिका निभाई।
आइए, सिनेमाई परदे के इस करिश्मे के इन पलों को जीया जाए और नारी सशक्तिकरण के इस अवतार को नमन किया जाए।







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