Saturday, April 15, 2017

अभय देओल- गंभीर मुद्दा, तीखे बोल


अभय देओल किसी परिपाटी में यकीन नहीं रखते। सोशल मीडिया पर उनकी चंद पोस्ट ने जैसी उथल-पुथल मचाई है, वही ये साबित करने के लिए काफी है कि ये देओल किस तरह की सोच रखता है। 

कुछ दिनों पहले अपनी नई पोस्ट में अभय देओल ने एक ऐसा मुद्दा उठा दिया, जो हमारे समाज से लेकर सिनेमा की दुनिया के चमकते सितारों तक को प्रभावित करने वाला रहा। अभय देओल ने जिस तरह से चमड़ी का रंग गोरा करने वाली क्रीमों के प्रोडेक्ट का एड करने वाले सितारों को लताड़ा, इससे एक हड़कंप मच गया, क्योंकि उनके निशाने पर शाहरुख खान से लेकर विद्या बालन और दीपिका से लेकर सोनम तक रहे। अभय पर पलटवार करने के लिए सोनम कपूर आगे जरुर आईं, लेकिन उनका तरीका इतना बचकाना था कि उन्होंने खुद ही अपने कदमों को पीछे खींच लिया। बाकी सितारे अभय की खरी-खोटी खामोशी से क्यों सुनते रहे, ये भी कम दिलचस्प नहीं है। 

बात को आगे बढ़ाने से पहले उस मुद्दे की बात करते हैं, जो अभय देओल उठाना चाह रहे हैं। ये एक लंबे समय से मुद्दा बना हुआ है, जो सामाजिक भी है और सीधे तौर पर सिनेमा के बड़े कलाकारों की कमाई से जुड़ता है। मुद्दा असल में ये है कि क्या सितारों को किसी प्रोडेक्ट का विज्ञापन करने से पहले उनके किन सामाजिक पहलूओं को ध्यान में रखना चाहिए। अभय देओल ने जिस मुद्दे को उठाया है, वो सीधे तौर पर रंगभेद की नीति से जुड़ जाता है। कोई क्रीम आखिरकार किस आधार पर ये दावा कर सकती है कि उसके इस्तेमाल से किसी की चमड़ी गोरी हो सकती है और मुद्दा असली ये रह जाता है कि क्या एक क्रीम का प्रोडेक्ट समाज में गोरे और सांवले रंग के अंतर को प्रोत्साहित कर सकता है और जब कोई स्टार किसी क्रीम के प्रोडेक्ट का एड करता है, तो सीधे तौर पर वो भी इस रंगभेद की नीति को बढ़ाने के इल्जाम में धरा जाता है। अभय देओल ने जो मुद्दा उठाया है, वो बेहद संवेदनशील है। खास तौर पर महिलाओं के गोरी होने या न होने की संवेदना से जुड़ता है, जो समाजिक तौर पर बेहद अहम हो जाता है। 
अभय देओल द्वारा उठाया गया मुद्दा संवेदनशील है और पहली नजर में सोनम सहित वे सारे सितारे सवालों के कठघरे में खड़े नजर आते हैं, जिन पर अभय ने निशाना साधा है। 


ये मामला यहीं खत्म नहीं होता, बल्कि कहा जाए, तो यहां से ये मुद्दा जड़ों तक में जानेे का रास्ता खोज लेता है। सिर्फ क्रीम ही क्यों, क्या याद नहीं कि खाने के एक प्रोडेक्ट का एड करने को लेकर अमिताभ बच्चन से लेकर माधुरी दीक्षित तक के खिलाफ केस हो गए थे। यहां तक कि केंद्रीय सरकार के मंत्री भी इन सितारों को एड करने के लिए कसूरवार ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। इसी तरह के कोल्ड ड्रिंक के एड करने को लेकर शाहरुख खान पर जमकर निशाना साधा गया था, क्योंकि इस कोल्ड ड्रिंक में कुछ ऐसे तत्व थे, जिनको हेल्थ के लिए नुकसानदायक माना जाता है। 

जब शाहरुख खान को लेकर विवाद बढ़ा था, तो उन्होंने अपने बचाव में एक दिलचस्प बात कही थी कि किसी भी प्रोडेक्ट को बिक्री के लिए सरकार की ओर से अनुमति दी जाती है। अगर किसी प्रोडेक्ट में कुछ भी ऐसा है, जो सेहत के लिए हानिकारक है, तो ये सरकार की जिम्मेदारी होती है कि उस प्रोडेक्ट की बिक्री पर रोक लगाए। शाहरुख का कहना था कि वे किसी ऐसे प्रोडेक्ट का एड नहीं करते, जिसकी बिक्री की अनुमति नहीं हो। दूसरे शब्दों में शाहरुख की दलील थी कि अगर सरकार किसी प्रोडेक्ट को बेचने में कोई गलती नहीं मानती, तो उनके एड को किस आधार पर गलत कहा जा सकता है। 

देखा जाए, तो जो तर्क शाहरुख खान दे रहे हैं, वही तर्क अभय देओल के मुद्दे पर सटीक बैठता है। यहां अभय देओल से सवाल हो सकता है कि अगर वे सितारों से नैतिकता की उम्मीद कर रहे हैं, तो क्या उनको सरकार से सवाल नहीं करना चाहिए, जो इन क्रीम के प्रोडेक्ट को बिक्री के लिए इजाजत देती है। ये गणित समझना मुश्किल नहीं है। ये प्रोडेक्ट बहुराष्ट्रीय कंपनियां बनाती हैं और सरकार को इनसे भारी कमाई होती है। सरकारी कमाई के अलावा परमीशन देने को लेकर इन बड़ी कंपनियों की ओर से नेताओं और सरकारी बाबूओं को भी भारी रिश्वत दी जाती है। ये ही कंपनियां दिग्गज सितारों को अपने प्रोडेक्ट का एड करने के लिए बड़ी रकम देती हैं। जिस सितारे के पास ज्यादा प्रोडेक्ट होते हैं, फिल्मों के बाजार में उस सितारे का रुतबा बड़ा होता है, जिसक फायदा उसके कैरिअर को मिलता है। 

देखा जाए, तो इस गंगा में हर कोई हाथ धोने में संकोच नहीं करता। न सरकार, न बहुराष्ट्रीय कंपनियां, न सितारे और न ही हमारी पब्लिक। हर कोई एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अभय देओल एक ऐसे मुद्दे को हवा देने की कोशिश करते हैं, जिसका सरोकार समाज के साथ तो सीधे तौर पर जुड़ा नजर आता है, लेकिन अभय देओल को इस मुद्दे को अपनी आवाज देने के साथ साथ तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी गौर करना होगा। किसी भी समस्या का समाजिक पहलू अपनी जगह अहम होता है। अगर सितारों की नैतिकता को लेकर सवाल हो सकते हैं, जो कहीं से गलत नहीं हैं, तो फिर सवालों के घेरे में फिल्मी सितारों से पहले सरकारी तंत्र, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जाल और जनता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। 
विशुद्ध तौर पर पैसे के इस खेल में जब हर कोई हमाम में नंगा है, तो किसी एक को कपड़ों की नसीहत देने वाली बात हुई। अभय देओल ने सही मुद्दा उठाया, लेकिन..... इसके आगे ही इस मुद्दे की असली राम कहानी शुरु होती है, जिसका अधूरापन अगर अभय समझ जाएं, तो मुमकिन है कि वे भागीरथी को जमीन पर लाने का पराक्रम कर लें, जो किसी चमत्कार से कम नहीं होगा 

और एक आखिरी सच- दुनिया और दुनियादारी चमत्कारों के बूते नहीं चलती। 


2 comments:

DR.ASHISH KUMAR TIWARI said...

रोचक एवं विचारोत्तेजक लेख ।

अभय ने जो मुद्दा उठाया है वो प्रासंगिक है परंतु अभय की इस विषय पर दीर्घकालिक दृढ़ता एवं समर्थन को परखना आवश्यक है । मेरा अनुभव तो ऐसा रहा है कि चलचित्र जगत के सितारों की बौद्धिकता उनके प्रचार विशेषज्ञों का दिया हुआ ज्ञान है जिसे वो एक चलचित्र के संवाद की तरह कह कर अदृश्य हो जाते है ।

अनुज जी आपको इस सुंदर लेखन हेतु बधाई ।

Vidyut Prakash Maurya said...

बेहतरीन लिखा...आगे भी जारी रखें...

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