Sunday, January 29, 2017

भंसाली जी, पिक्चर अभी बाकी है.....






जयपुर में संजय लीला भंसाली और उनकी फिल्म के सेट पर जो फसाद किया, उसके एक नहीं, कई सारे पहलू हैं। राजपूती शान के नाम पर बनी किसी सेना के गुट को दोषी मानना उस केंद्र की सत्ता की अनदेखी करना होगा, जिसके मौन इशारे और समर्थन पर आए दिन बालीवुड के उन लोगों को निशाना बनाया जाता है, जिनको सत्तासीन पार्टी और उनके विचारक दल अपना दोस्त नहीं मानते। मामला कुछ ऐसा ही समझो, जैसे कि कश्मीर या कहीं भी कोई हमला कराने के बाद कोई बड़ा आतंकी संगठन जिम्मेदारी लेने के नाम पर किसी नौसखिया संगठन को आगे कर देता है। ये मामला इससे अलग नहीं है।


हमले की घटना सामने आने के बाद राजस्थानी सरकार के मंत्रियों से लेकर देश की सत्तासीन पार्टी के आला नेता खींसे निपोरकर राजपूती शान की यादों का मातम मना रहे थे, तो फिर शक कहां रह जाता है कि भंसाली को दिए गए पैगाम के कनेक्शन कहां कहां से जुड़ते हैं। देश के मुखिया से तो कतई उम्मीद मत कीजिए कि वे इस हमले की निंदा में एक शब्द भी खर्च करेंगे। साहेब के लिए बालीवुड का मतलब सलमान के साथ पतंग उड़ाने, उनको जेल जाने से बचाने की तरकीबें लड़ाना और सहनशीलता की बात करने के गुनाह कर चुके खान सितारों को बार बार जलील करने तक सीमित है। ये भी तो आखिरकार कोई छोटा-मोटा काम नहीं होता। हां, मधुर भंडारकर और अनुपम खेर की भक्ति की खुशी की खुराक का मामला अलग रह जाता है। उसका इस चर्चा से कोई सीधा या कैसा भी वास्ता नहीं बैठता। हैरानी की बात नहीं रही कि केंद्रीय सरकार की सत्ता का हर बात पर समर्थन करते आए अनुपम खेर को भंसाली वाले मामले पर चुप रहने को कहा गया। भंसाली को देशद्रोही करार देने वाली सेना में अनुपम खेरों की कोई कमी नहीं है।


यहां बात दूसरी हो जाती है। समझने वाली बात ये है कि ये चोट भंसाली को पंहुचाने की कोशिश थी या बालीवुड में अपने विरोधियों को कोई नया संदेश देने की कोशिश थी या फिर इस चुनावी माहौल में राजपूती वोटों के असर वाले इलाकों के लिए कोई सलीके से बनाया गया प्लान, जिसमें संदेश साफ रहे कि केंद्र की सत्ता राजपूती संवेदनाओं का सम्मान करती है और उसी पुराने जुमले को दोहराना कि किसी मुस्लिम शासक की तारीफ बर्दाश्त नहीं होगी। खुदा जाने, अगर 60 के दशक में ये सेना और मानसिकता होती, तो मुगले आजम कतई नहीं बनती। के. आसिफ को एक राजपूती रानी के सम्मान को ठेस पंहुचाने के इल्जाम में चपियाने का काम जरुर कर लिया जाता। बच गए आसिफ साहब और बच गई अकबर की प्रेम कथा।

सीधे तौर पर भंसाली के साथ जो भी किया गया, उसके लिए कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। भंसाली अपनी फिल्म की कहानी को सात तालों में बंद रखना जानते हैं। किसी को नहीं पता कि उनकी फिल्म में पद्मावती का किरदार क्या है, खिलजी के साथ उसका रिश्ता क्या है। तर्क वाली बात ये होती कि जब फिल्म बनकर तैयार हो जाती, तो इस कथित सेना के कप्तान साहब अपने अंदेशों को लेकर कोर्ट में अर्जी लगा सकते थे। मुमकिन था कि भंसाली को रिलीज से पहले अपनी फिल्म दिखा देते। मामला क्लीयर हो जाता, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि ऐसा करने की कोई मंशा नहीं थी। ये भी नहीं है कि इस तरह से किसी निर्माणाधीन फिल्म के सेट पर इस तरह का हल्ला गुल्ला पहली बार किया गया हो। बनारस काफी लोगों को याद होगा, जहां दीपा मेहता की फिल्म वाटर की शूटिंग पर कल्चर के पहरेदारों का झुंड इसी तरह से टूटा था। दीपा मेहता इंटरनेशनल स्टंडर्ड की मेकर हैं, इसलिए दुनिया भर में हमारे कल्चर का तमाशा बना। दीपा मेहता ने श्रीलंका में शूटिंग करके फिल्म को रिलीज कर दिया। कल्चर के पहरेदार शांत रहे। चलिए, बात को आगे बढ़ाते हैं।
दीपा मेहता का तो कुछ नहीं बिगड़ा, भंसाली का कुछ बिगड़ेगा, ये भी नहीं कहा जा सकता। इलेक्शन में अगर राजपूती वोट मिल गए, तो इस छोटी-मोटी बात को कोई याद भी नहीं करेगा। जो लोग कह रहे हैं कि भंसाली ने अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए अपनी फिल्म के सेट पर खुद को रुसवा कराया, वो निरे मूर्खों की दुनिया के बाशिंदे हैं। अगर भंसाली की फिल्म के रिलीज में एक-दो महीने बचते, तो इस तर्क का आधार बनता था। भंसाली मूर्ख नहीं है कि पब्लिसिटी के इस बेहतरीन मौके को फिल्म बनने से पहले यूं जाया करे। भंसाली खासे अनुभवी हैं। बाजीराव मस्तानी के रिलीज के वक्त विरोध को अपनी फिल्म के लिए इस्तेमाल करने के गुरों की नुमाइश कर चुके हैं। वे पद्मावती के लिए कोई स्टंट नहीं करेंगे, ये कोई नहीं कह सकता, लेकिन जब आधी फिल्म बननी बाकी हो, तो एेसे में भंसाली जैसा घाघ इंसान ये ओच्छी चोट करने की हिमाकत नहीं करेगा।


चुनावी समर में राजपूती वोटों की खातिर ये खेलना इस पार्टी को जंचता भी है और फबता भी है और इसके लिए उनके पास धुरंधरों की टीम है, जो इस तरह के कारनामों को अंजाम देना जानती है। सियासी गुणाभाग वाले बताते हैं कि यूपी, पंजाब के कई इलाकों में राजपूती वोटों की तादाद काफी असरकारक है। ये सियासी दांव है, तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे कि अपने ही गुजराती भाई (जी हां, भंसाली गुजरात से ही आते हैं) को ऐसे पिटवाकर गुजरात के महापुरुष ने फिर साबित कर दिया कि सियासत मतलबपरस्ती का कोई और मतलब नहीं रह जाता।



अब इस मसले का एक और पहलू कि क्या ये बालीवुड को कोई नया सिगनल है, तो ये कमजोर पहलू लगता है। पूरे बालीवुड को सिग्नल देने के लिए उनके पास सलमान खान से लेकर उनके अब्बा हुजूर, अनुपम खेर से लेकर मधुर भंडारकर तक की खासी फौज है। शाहरुख और आमिर सरीखों का गुनाह समझ में आता है कि उन्होंने सहनशीलता के मुद्दे पर मुंह खोलने की गुस्ताखी की थी। उनको लपेटना सत्ताधीशों के अनुायायियों का हक बनता है। इसीलिेए तो रईस के वक्त भी देश द्रोही कहकर शाहरुख खान को नमन करना बदस्तूर जारी है। भंसाली ने तो कभी न तो इस पार्टी के खिलाफ कुछ कहा, न ही देश के मुखिया के लिए कुछ बोला। जाने-अनजाने में कोई पाप उनसे हुआ, तो बात अलहदा हो जाती है। समझ में नहीं आता कि एक गैर राजनैतिक दिलचस्पी रखने वाले एक फिल्मकार को, जो अपनेअाप में मस्त रहता है और बालीवुडवालों से ही भिड़ता रहता है, उसे सियासत के इस घिनौनेपन का शिकार क्यों बनाया गया, जिसका किसी चुनावी कसरत से कोई वास्ता ही नहीं है।


साफगोई से तीन-चार बातें- अगर सिर्फ विधानसभा चुनावों में चंद राजपूती वोटों की खातिर अगर ये चिंगारी दिखाई गई, तो एक दिन इसी आग में इस पार्टी के सत्ता से जुड़े सपने स्वाहा होंगे। अगर बालीवुड को संदेश था, तो थैंक यू। बालीवुड की विचित्र नगरी के प्राणी अगर अब भी सियासती झंझावत में फंसकर अलग अलग राग और ढपली बजाते रहे, तो याद रखिए कि हर वो शख्स अपना गाल बचाकर रखे, जो मोदी की स्तुति करना नहीं जानता। अपने आका को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तैयार और वोटों की खातिर कुछ भी करने को तैयार इन आकाओं से निपटने के लिए बालीवुड को एकजुट होना जरुरी नहीं, मजबूरी समझी जाए या लाचारी, लेकिन अब कोई रास्ता नहीं। सत्ता के लालच में सियासी मैदान में घोड़े दौड़ाने वाले बालीवुड के सितारों ने अगर अपने समुदाय का साथ नहीं दिया, तो उनको भी याद रखना होगा कि सियायत की जमीन पर किसी को अपनी मर्जी से फसल  की पैदावर नहीं दी जाती, वहां रहमोकरम पर रहना होता है। बालीवुड को जो संदेश दिया जा रहा है, उसे समझे। खामोश न रहे। एकजुट होकर इन सियासी खेलों को समझा जाए और रेस्पांस दिया जाए।


बालीवुड के बंदे भी याद रखते हैं कि 2019 का आधा सफर ही बचा है। असली खेल उस वक्त होगा, तब तक इन मोहरों को समझकर उनकी ही चाल से दांव खेलना होगा। भंसाली इस थप्पड़ की गूंज को याद रखें, तो पूरा बालीवुड बहुत कुछ समझ सकता है। आखिरी संदेश- सियासत में शर्म नहीं होती और शर्म करने वालों को कभी सियासत करनी नहीं आती। वे अपना खेल आगे भी खेलेंगे। साफ्ट टारगेट होने का मातम मनाने की जगह सही समय पर सही चोट करने के मौके का इंतजार किया जाए और संदेश दिया जाए, कि संयम और मौका, सियासती दावों में उलटफेर करते आए हैं।


भंसाली जी, पिक्चर अभी बाकी है....
 


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