सोशल मीडिया पर आमिर खान की दंगल को जब इस दौर की मदर इंडिया कहा गया, तो पहली नजर में ये अतिशियोक्ति का मामला लगा, लेकिन थोड़ा सोचने पर लगा कि कुछ बातों को लेकर इस तुलना का कुछ आधार तो तय हो सकता है। मसलन, दोनों फिल्मों का आधार गांव की जिंदगी, गांव की सोच और गांव की परंपराएं हैं, जिनमें अक्सर औरतों को रसोई के लायक ही माना गया। दोनों में महिला सशक्तिकरण को कहानी के साथ सीधे तौर पर जोड़ा गया। जो बात अलग रही, वो ये कि मदर इंडिया का किसी खेल से कोई वास्ता नहीं था।
टीम दंगल और खास तौर पर आमिर खान के साथ निर्देशक नितेश तिवारी इस बात पर फख्र कर सकते हैं कि उनकी फिल्म को इतनी महान फिल्म के साथ कंपेयर किया गया। बात को यूं भी कहा जा सकता है कि दोनों देसी ठेठपना समेटे हुए फिल्में रहीं। कुछ लोग ये भी मान रहे हैं कि दंगल के बाद हिंदी सिनेमा का रुख गांव की ओर मुड़ सकता है, तो मुमकिन है कि देसीपन के साथ हिंदी सिनेमा के टूटे रिश्तों के तार फिर से जुड़ जाएं। ये जब होगा, तब होगा, अभी तो ये बात उम्मीद से ज्यादा कहीं नहीं ठहरती।
एक बात जरुर ठहरती है, जो दंगल को मदर इंडिया से जोड़ी जाए, तो इसकी सार्थकता बढ़ेगी। फर्ज कीजिए कि महबूब खान ने 2016 में अगर मदर इंडिया फिल्म बनाई होती, तो उनको अंग्रेजी दां मीडिया से दो-चार होना पड़ता और बहुत मुमकिन होता कि महबूब खान को रिलीज के बाद मदर इंडिया के लिए प्रमोशन की खातिर अंग्रेजी मीडिया को ही थैंक यू कहना होता।
दंगल के साथ भी ऐसा ही कुछ होता नजर आया। फिल्म रिलीज हुई, तो देसीपन के मिजाज को लेकर तारीफ बंटोरने वाली दंगल से जुड़ी आमिर खान की मार्केटिंग टीम के धुरंधरों को यही सही लगा होगा कि रिलीज के बाद सिर्फ अंग्रेजी अखबारों, चैनलों और डिजिटल के धाकड़ों के कमेंटस को ही प्रमोशन में इस्तेमाल किया जाए। मुमकिन ये भी है कि दंगल की मार्केटिंग टीम को ये लगता होगा कि अंग्रेजी के अलावा किसी और भाषा के मीडिया में तो दंगल की तारीफ में एक शब्द भी न कहा गया होगा, न लिखा गया होगा।
यहां भाषा को लेकर विवाद का मुद्दा नहीं है। हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी सोच के असर को लेकर काफी कुछ लिखा गया है और लिखा जाता रहेगा। यहां आमिर के अंग्रेजी लगाव को चुनौती नहीं है, न ही किसी तर्क से इसे गलत ठहराने की कोई कोशिश। कुल जमा बात इतनी सी है, जो अगर हरियाणवी स्टाइल में ही कही जाए, तो कुछ यूं होगी कि अगर तैने अंगरेजी के साथ दूसरी जबानों को भी थोड़ी अहमियत दे दी होती, तो क्या तेरी भैंस की बावली पूंछ निकल जाती के
बात मजाक की नहीं है, अफसोस इसीलिए हुआ कि आमिर ने इसे मजाक बना दिया। आमिर ने इसलिए कि अगर दंगल के सारे देसीपन का क्रेडिट आमिर को जाता है, तो इस अंग्रेजीपन के लिेए भी वही जिम्मेदार हैं। आमिर खान अंग्रेजी में बतियाएं, इससे किसको क्या तकलीफ। उनकी टीम अंग्रेजी मीडिया की तारीफ में शीर्षासन करे, इससे भी किसी को गुरेज नहीं। ये भी कोई नहीं कह रहा है कि अंग्रेजी मीडिया ने दंगल को लेकर कोई निगेटिव काम किया। जी नहीं, अंग्रेजी मीडिया ने भी दंगल की तारीफ की, लेकिन ये तो नहीं कहा जा सकता कि सिर्फ अंग्रेजी के दस मीडिया पब्लिकेशन ही दंगल की तारीफ में जुटे थे।
सारे विलाप का जड़ सिर्फ इतना है कि दंगल ठेठ देसी फिल्म बनी, तो लगा कि आमिर खान की टीम हिंदी और साथ ही रिजनल मीडिया को भी इसका थोड़ा सा क्रेडिट देगी। ऐसा होता, तो ये आमिर का बड़प्पन होता। ऐसा होता, तो दंगल के देसीपन को और मजबूती मिलती। ऐसा होता, तो लगता कि आमिर खान सही वक्त पर सही फैसला करना जानते हैं। अफसोस, हकीकत कहीं और किसी और शक्ल में नजर आई, जो खुशनुमा नहीं थी। दंगल को मदर इंडिया से कंपेयर करने वालों को ये पोस्टर सामने रखकर फिर से अपनी अक्ल के घोड़ों को थोड़ा और दौड़ाना पड़ेगा।

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