Sunday, January 15, 2017

बिग बास क्या चाहते हैं....

ये तो होना ही था। स्वामी के नाम से एक बंदा बिग बास के घर में आया और भस्मासुर की कहानी को याद कराते हुए अगर थोड़ा सा असभ्य होकर कहा जाए, तो बिग बास नहीं, इसे टेलीकास्ट करने वाले चैनल के बॉस लोगों की बैंड बजा गया। जो हो सकता था, वही हुआ। बिग बास से बाहर निकला कथित स्वामी न्यूज चैनलों के कैमरों के आगे वही करतूतें कर रहा है, जो वो करना चाहता है। उसे अपने चैनलों पर बुलाने वाले मीडिया के महानुभवों के चेहरों पर भी उसने दनादन थप्पड़बाजी की है और साबित किया है कि नकारात्मकता को लेकर हमारे देसी चैनल किस हद तक गिर सकते हैं।
 
 यहां चर्चा उस धूर्त की नहीं है, न ही उसके महिमामंडित में लगे चैनलों की है। यहां घेरे में है कलर्स चैनल, जिसने टीआरपी के खेल में खुद को इतना छोटा कर लिया कि इस छोटेपन का मुकाबला शायद किसी और दूसरे चैनल से हो सके। टीआरपी का खेल भारत का हर चैनल खेलता है। भारत ही नहीं, दुनिया के हर चैनल पर यही खेल होता होगा। हर चैनल को टीआरपी चाहिए, क्योंकि इसके नाम ही धंधा मिलता है। करोड़ों का वारा-न्यारा होता है। इसकी अच्छाई-बुराई अपनी जगह।
जहां तक बात है बिग बास की, तो इसका कांसेप्ट बहुत ही शानदार है। दीन-दुनिया से बेखबर, अनजाने लोगों के बीच 100 से ज्यादा कैमरों के बीच रहने का ये खेल आसान नहीं है। यही वजह है कि पहले सीजन से ये खेल भारतीय दर्शकों को भा गया। ऐसा न होता, तो इसको लेकर इतना बड़ा दांव नहीं खेला जाता। शो का कांसेप्ट ये था कि अलग अलग मिजाज के लोग एक अजनबी दुनिया में एक साथ रहें। जाहिर है, उनके बीच मतभेद भी होंगे और विवाद भी। दोस्ती के रिश्ते भी बनेंगे और टूटेंगे भी। यही इस खेल का रोमांच है और कामयाबी भी।
टीआरपी के लिए उल्टी सीधी हरकतें करने के माहिर चैनलों को निगेटिव किरदार ही नजर आते हैं, जिनको हमारा समाज भौंचक्का होकर देखता है और चैनलों का काम हो जाता है। यही तो होता रहा बिग बास में। जान बूझकर चैनल बिग बास के घर में ऐसे लोगों को भर्ती करता रहा, जिनकी पहचान सिर्फ यही थी कि उन्होंने कुछ ऐसा किया, जो विवादों में रहा। विवाद मतलब नकारात्मकता। इन लोगों की बदौलत चैनल को बिग बास के घर की टीआरपी मिलती चली गई। नतीजा ये रहा कि बिग बास के घर में ऐसे लोगों का जमावाड़ा हर साल ब़ता चला गया, जिनका नाम सिर्फ लड़ना-भिड़ना और गाली गलौच करके चैनल के लिए टीआरपी जुटाना था। खेल ब़ढ़ता गया। शो पर स्क्रिप्टेड होने के इल्जाम लगते रहे। इल्जाम आते-जाते रहे। कलर्स के मुंह में बिग बास को लेकर निगेटिव लोगों को भर्ती करने का खून इसकदर मुंह लग चुका था कि देखते ही देखते बिग बास ऐसे लोगों का घर नहीं, अड्डा बनता चला गया।

पिछले नौ सीजनों में कब किसने क्या करतूत की, क्या गुल खिलाए, इसका बखान करने की जरुरत नहीं है। सवाल छोटा सा है और बिना लाग लपेट के कलर्स चैनल के महानुभवों से है। क्या भस्मासुर टाइप के नमूनों की बिग बास जैसे घर में एंट्री बंद होगी या नहीं। क्या कलर्स चैनल के आका इस भस्मासुर की हरकतों से कोई सबक लेंगे, जिसकी हर शरारत की जिम्मेदारी से ये चैनल बच नहीं सकता। अगर पहले ही दिन इस शैतानी सोच को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता, तो आज कहानी दूसरी होती। कम से कम चैनल की इज्जत बच गई होती। चैनल के लिए इस बंदे ने अपनी हरकतों से सीधा संदेश दिया है कि अगर आइंदा ऐसे किसी और प्राणी को लाया गया, तो चैनल को टीआरपी का खेल बहुत महंगा पड़ेगा।
ये एक खेल है, इसे खेल की तरह खेलने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। चैनल को कम से कम एक बार कोशिश करनी चाहिए कि शो को उस भावना के साथ रखें कि परिवार के साथ देखने वाले दर्शकों को भी टीआरपी देनी आती है। टीआरपी चाहिए, तो जरुर मिलेगी, बस इस घर से बुरी आत्माओं को दूर रखें। चैनल याद रखे कि भस्मासुर पैदा करोगे, तो नुकसान शो को होगा। क्या अब भी चैनल की नींद नहीं टूटेगी

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