आने वाली फिल्म जॉली एलएलबी के प्रोमो में बताया जाता है कि हमारे देश की अदालतों में साढ़े तीन सौ करोड़ से ज्यादा केस लंबित हैं। इन केसों को निपटारे तक पंहुचने में कई सदियां बीत सकती हैं। ये बात इसलिए और ज्यादा दिलचस्प हो जाती है कि देश की दो बड़ी अदालतें इन दिनों ये तय करने में बिजी हैं कि क्या इस फिल्म में कानून व्यवस्था की कोई तौहीन तो नहीं की गई है।
मुंबई के एक वकील ने हाईकोर्ट में केस दर्ज किया कि फिल्म में न्याय व्यवस्था की मजाक उड़ाई गई है। चूंकि मामला वकील ने दर्ज किया था, इसलिए करोड़ों केस लंबित होने के बाद भी मुंबई हाईकोर्ट ने इसे संज्ञान में लिया और तीन वकीलों का पैनल बना दिया, जिसको फिल्म देखकर अदालत को ये रिपोर्ट देनी थी कि क्या सचमुच फिल्म में कानूनी व्यवस्था की तौहीन हुई है। इससे पहले मामला आगे बढ़ता, दो दिलचस्प बातें हो गईं। एक तरफ, फिल्म के निर्माण से जुड़ी कंपनी ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती की। कंपनी का तर्क था कि इस तरह का पैनल बनाना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, लिहाजा सुप्रीम कोर्ट इस पैनल के गठन को अमान्य करे।
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| Mumbai High Court |
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| Supreme Court |
इस बीच दूसरी एक बड़ी घटना का जिक्र करना जरुरी हो जाता है, जिसका इस केस के साथ बेहद दिलचस्प रिश्ता है। फिल्म सेंसर बोर्ड पंहुची। सेंसर बोर्ड अपनी गाइडलाइन के हिसाब से किसी भी फिल्म को जज करता है और अहम बात ये रही कि सेंसर बोर्ड से फिल्म बिना किसी आपत्ति के पास हो गई। साफ सी बात है कि सेंसर बोर्ड को बिल्कुल ही नहीं लगा होगा कि इस फिल्म में कानून की किसी भी तरह की अवमानना हुई है, वरना पहलाज निहलानी की टीम आदित्य चोपड़ा की बेफिक्रे पर मेहरबान हो सकती है, मगर जॉली.. को तो सेंसर बोर्ड अपने पंजे में जकड़ ही लेता। यहां अब दिलचस्प तस्वीर बन जाती है कि सेंसर बोर्ड को नहीं लगता कि फिल्म में कुछ भी गलत है। सेंसर बोर्ड को देश की सरकार ने ये अधिकार दिया हुआ है कि वो किसी फिल्म को अपने दिशा निर्देशों के मुताबिक देश के सिनेमाघरों में रिलीज करने के लिए सार्टिफिकेट दे। मोटे तौर पर सेंसर बोर्ड के फैसले को ही मान्य किया जाता है। अगर किसी को गलत लगे, तो सेंसर बोर्ड के फैसले को भी अदालत में चुनौती देने का विकल्प भी मौजूद रहता है।
मजे की बात ये है कि जॉली एलएलबी के इस केस में तो ये प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई। फिल्म को लेकर सेंसर बोर्ड का फैसला हुआ भी नहीं था, उससे पहले ही मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दौड़ा दिया गया। हाईकोर्ट में भी इस बाबत इंतजार करना सही नहीं समझा गया कि सेंसर बोर्ड इस फिल्म को लेकर क्या रुख अपनाता है। अब अगर सेंसर बोर्ड मानता है कि फिल्म में कुछ गलत नहीं है, तो फिर हाईकोर्ट में इस केस का आधार क्या रह जाता है। अगर मुंबई का एक वकील फिल्म के प्रोमो देखकर ये मान ले कि फिल्म में कानून व्यवस्था का अपमान हुआ है, तो फिर हो सकता है कि देश के किसी भी कोने का कोई भी वकील या आम आदमी इसी आधार पर फिल्म के विरोध में अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है और अगर ऐसा होता है, तो सोचिए कि फिल्म को क्या कभी थिएटरों का मुंह देखना नसीब हो पाएगा।
इस बात से कोई मना नहीं कर सकता कि देश के किसी भी नागरिक की तरह किसी वकील को भी अगर कुछ गलत लगता है, तो वो किसी अदालत में मामला दर्ज कर सकता है। यहां आकर मुंबई के वकील द्वारा जॉली एलएलबी को लेकर हाईकोर्ट में दायर याचिका का कानूनी आधार तो बनता है, लेकिन कुछ अहम सवाल फिर भी खड़े रह जाते हैं, जिनका न सिर्फ इस फिल्म से, बल्कि देश की कानून व्यवस्था के साथ गहरा सरोकार है। पहला सवाल ये कि इस केस की सुनवाई से पहले हाईकोर्ट ने सेंसर बोर्ड का फैसला आने का इंतजार क्यों नहीं किया। वकीलों के पैनल के गठन को लेकर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने में फिल्म की प्रोडक्शन टीम ने क्या जल्दबाजी नहीं की। अगर हाईकोर्ट के निर्देश पर अमल करते हुए वकीलों के पैनल को फिल्म जल्द दिखाई जाती, तो मुमकिन था कि फिल्म की रिलीज पर आशंका के ये बादल न मंडराते।
जहां तक कानून व्यवस्था के अपमान की बात है, तो ये एक बेहद गहरा और संवेदनशील मुद्दा इसलिए बन जाता है कि सालोंसाल इंसाफ के लिए अदालतों के दरवाजों में ठोकरे खाते देश के आम आदमी से ज्यादा इस बात को कौन समझ सकता है कि न्याय व्यवस्था की मजाक का सही अर्थ क्या होता है। हैरानी होती है कि ये वकील साहब उन अखबारों और सोशल नेटवर्किंग साइटस पर रोज केस क्यों नहीं करते, जिन पर रोज कानून व्यवस्था को लेकर तमाम किस्से पूरी दुनिया में पंहुचते हैं।
यहां चूंकि मामला एक फिल्म का था, इसलिए देश की दो बड़ी अदालतों ने इसे गंभीरता से लिया। पूरी दुनिया में अगर हमारी व्यवस्था पर सवाल हों, तो कोई बात नहीं, लेकिन एक फिल्म में (अगर) हो जाए, तो अपमान बहुत बड़ा हो जाएगा, जिस पर देश की दो बड़ी अदालतों का तुरत फुरत में हरकत में आना जरुरी हो जाता है। इसके लिए धन्यावाद।
जॉली एलएलबी 2 का भविष्य क्या होगा, अब ये तो अदालत ही तय करेगी, लेकिन अदालतों के लिए बालीवुड से जुड़ी एक और अहम बात बताना जरुरी हो जाता है कि फिल्म के रिलीज से ठीक पहले फिल्मों से जुड़े कोर्ट तक पंहुचने वाले केसों पर गौर किया जाए, तो पता चलेगा कि ज्यादातर केसों में मामला महज पब्लिसिटी पाने की ललक तक होता है। जॉली.. के मामले में ये शौक कोई वकील साहब पूरा करें या फिर फिल्म की टीम ऐसी कोई प्लानिंग करे, ये सच तो अपनी जगह, लेकिन जब साढ़े तीन सौ करोड़ केसों के लंबित रहने के बाद भी कोई अदालत ऐसे केसों को लेकर गंभीरता दिखाती है, तो उन आम आदमियों की मायूसी का ख्याल जरुर आ जाता है, जिनके अतिगंभीर मामले अदालतों में सालों तक खींचते रहते हैं।
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| Sunny Deol in Damini |
आखिरी बात- जब राजकुमार संतोषी की फिल्म दामिनी में सनी देओल का वकील किरदार परदे पर अदालती सिस्टम की बखिया उधेड़ते हुए तारीख, तारीख और तारीख की गर्जना कर रहा था, तो मुमकिन है कि ये वकील साहब या तो भीड़ में शामिल होकर सनी के डायलॉग पर तालियां पीट रहे होंगे या फिर ये मुमकिन है कि दामिनी के रिलीज होने तक कानून और व्यवस्था की किसी ने तौहीन नहीं की हो। कम से कम किसी फिल्म में तो ऐसी अवमानना कभी नहीं हुई होगी।
वाकई.. ?







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