बनाम
दिल्ली की फिजां ही कुछ ऐसी है कि वहां जाकर हर कोई सियासी जुबां बोलने लगता है। अगले बुद्धवार से शाहरुख खान की रईस से मुकाबला करने जा रही काबिल के नायक रितिक रोशन ने कहा कि वे चाहते थे कि ये टकराव न हो। रईस के रईस शाहरुख खान भी फरमा चुके हैं कि उनको इस टकराव का अफसोस है। दोनों एक दूसरे की फिल्मों के लिेए गुड-लक भी कह चुके हैं। इन दोनों भले मानुसों को हम भी लगे हाथों गुडलक कहने की रस्म निभा देते हैं।
यहां ये बात बहुत अहम नहीं रह जाती कि दोनों में से कौन सी फिल्म किस फिल्म को बाक्स आफिस के मैदान में पटकनी देगी और कौन सी इस मुकाबले को जीतेगी। वैसे भी इस तरह के मुकाबले में ऐसा कम ही होता है, जबकि हार-जीत जैसा कुछ हो। सबसे ज्यादा संभावना इसी बात को लेकर है कि मुकाबला बराबरी पर रहेगा और दोनों को अच्छी खासी कमाई होगी। हिट या फ्लाप जैसा इन दोनों फिल्मों के साथ होने की संभावना नजर नहीं आती। शाहरुख और रितिक, दोनों को बड़ी फिल्मों के साथ मुकाबले का अच्छा खासा अनुभव रहा है। दिलचस्प ये है कि दोनों ही बाक्स आफिस के ऐसे मुकाबलों में हार और जीत देख चुके हैं। इससे पहले एक मुकाबला इन दोनों के बीच भी हुआ, जब मिशन कश्मीर और मोहब्बतें एक साथ रिलीज हुई थी। उस मुकाबले में मोहब्बतें मिशन कश्मीर पर भारी पड़ी थी।
ये सब कुछ अतीत का हिस्सा है। मौजूदा सच ये है कि दोनों की फिल्में मुकाबले के लिेए तैयार हैं। हां, ये बात भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि न तो बालीवुड का ये पहला मुकाबला है और न आखिरी। यही इस चर्चा का मूल आधार है कि क्यों बालीवुड में दो बड़ी फिल्मों के एक साथ रिलीज होने को लेकर इतना बवाल काहे होता है। क्या ये जरुरी है। क्या ये कानून है कि एक शुक्रवार को एक फिल्म को सिर्फ इसलिए बाकी फिल्मों का रास्ता रोकने की इजाजत दे दी जाए कि उसमें कोई बड़ा स्टार है या ये बड़े बजट की फिल्म है। कानूनन तो ये मुमकिन नहीं, फिर दो ही रास्ते बचते हैं कि या तो इस बिजनेस को हर किसी के लिए ओपन रखा जाए या फिर कोई रास्ता निकाला जाए, जिससे फिल्म रिलीज करने को लेकर बाक्स आफिस को किसी की जायदाद बनाने का हक न दिया जाए।
ये आसान नहीं है, लेकिन अब इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक ऐसी दुनिया, जिसमें हर किसी को अपनी मर्जी से, अपनी पसंद से फिल्म बनाने की आजादी है, लेकिन हर धंधे के कुछ तो कायदे-कानून होते हैं। सत्तर हजार करोड़ का सालाना कारोबार करने वाली इस इंडस्ट्री को कैसे चंद बड़े लोगों के रहमोकरम पर छोड़ा जा सकता है। अगर अब तक यही रहा है, तो अब जरुरी हो गया है कि इस गलती को सुधारा जाए और फिल्म मेकिंग से लेकर रिलीज तक को लेकर चंद ऐसे कानून बनाए जाएं, जिनको सख्ती से लागू किया जाए, ताकि इस मुकाबले में हर किसी को बराबरी का मौका मिले। खास तौर पर इन बड़ी फिल्मों के चक्कर में छोटी फिल्मों और प्रादेशिक भाषाओं की फिल्मों को थिएटरों के लिए भटकना पड़ता है। सिर्फ इसलिए कि बड़ी फिल्में रिलीज होती हैं, तो सारे थिएटरों पर एक तरह से कब्जा जैसा हो जाता है।
इसके लिए कोई एक नहीं, बल्कि बहुत सारे खलनायक हैं। बड़े सितारे, बड़े प्रोड्यूसर और साथ में सबसे गंदा खेल सिनेमाघरों के प्रशासक करते हैं, जो बड़ी कमाई के लालच में अपने सिनेमाघरों को बड़ी फिल्मों के हवाले कर देते हैं और छोटे निर्माताओं को कोई मौका नहीं होता। राकेश रोशन हों या शाहरुख खान या कोई और, अब वक्त आ गया है कि रिलीज होने वाली फिल्मों को लेकर कायदे-कानून तय किए जाएं कि किस फिल्म को कितने थिएटरों में रिलीज करने की अनुमति दी जाए और अनुमति देने का काम संगठन के स्तर पर हो। इसके लिए निर्माताओं से लेकर सिनेमाघरों के मालिक मिलकर कोई नीति बनाएं और तय करें कि बिना कायदे कानूनों के सिनेमाघरों को किसी की बपौती नहीं बनने दी जाएगी।
अतीत अपनी जगह है। लेकिन जब वर्तमान और भविष्य की बात होती है, तो सोच भी बदलनी पड़ती है और कायदे भी। अब तक सिनेमाघर सिंगल हुआ करते थे और आमदनी सीमित हुआ करती थी। ये मल्टीप्लेक्स का दौर है, जहां से करोड़ों की कमाई होती है। न्याय का तकाजा ये है कि हर रिलीज होने वाली फिल्म का आखिरी फैसला कोई और नहीं, बल्कि वो आम आदमी करे, जिसके नाम पर करोड़ों का ये कारोबार चल रहा है। आम आदमी फैसला करे, इसके लिए उसे हक मिलना ही चाहिए कि वो सभी फिल्मों में से अपनी पसंद की फिल्म चुन सके। इस फैसले को छिनने का हक न किसी रितिक रोशन को मिलना चाहिए और न ही किसी शाहरुख खान को। अगर दर्शक सिनेमा की दुनिया का भगवान है, तो उसे सबसे बड़ा सम्मान और पदवी मिलनी ही चाहिए। हर शुक्रवार को सितारों की तकदीर के सितारों को तय करने वाले सिनेमा के इस भगवान (आम दर्शक) ने जिस दिन अपना रुख मोड़ लिया, उस दिन कथित तौर पर भगवान की तरह अपने स्टारडम को एंज्वाय करने वालों की सत्ता के महल भरभराकर गिर जाएंगे।
आसान कुछ नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। अगर सिनेमा कारोबार है, तो इसके लिए नियमों का बनाया जाना और सख्ती से उनका पालन करने की जरुरत को अगर अब भी अनदेखा नहीं किया गया, तो आने वाले समय में सिनेमा का खेल बिगड़ता चला जाएगा। अब तक कहा जाता रहा है कि सिनेमा का कारोबार दो और दो पांच की संवेदनाओं से जुड़ा होता है, जिसमें लाजिक काफी पीछे रह जाता है। ये अतीत था। अब लाजिक को पहले लाना होगा और इसे सीधे तौर पर दर्शकों के साथ जोड़ना होगा।





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