Wednesday, June 14, 2017

तुम कौन हो कृतिका चौधरी, कुछ भी तो नहीं...

तुमको न कोई जानता था, न पहचानता था, फिर कोई कैसे तुम्हारी मौत पर मातम मनाता? किसी को क्या गरज पड़ी थी कि एक स्ट्र्गलर आर्टिस्ट की मौत पर, किसी का मन एक पल के लिए भी इंसानियत का एहसास करता। तुम एक स्ट्रगलर थीं, जिनको हिराकत से देखना बड़े लोगो का जन्मसिद्ध अधिकार होता है।

तुम अगर किसी बड़े परिवार से कोई ताल्लुक रखतीं, तो 12 जून की शाम को खबरों की दुनिया में एक धमाका होता। चैनलों पर गाय और इंसानों से लेकर मोदी और राहुल की राजनीति पर उबलने वाले चैनलों के लिए तुम्हारी मौत ब्रेकिंग न्यूज बनती। नाचते-गाते विज्ञापनों के बीच खबर के नाम पर कृतिका चौधरी नहीं रहीं की ब्रेकिंग न्यूज चलाने वाली एंकर की आंखें भर आतीं, तो पुरुष एंकर अपने दिल पर पत्थर रखते। देखते ही देखते पुलिस स्टेशन के बाहर न्यूज चैनलों की ब्रेकिंग ब्रिग्रेड की गाड़ियों से निकलते कैमरों की लपलपाहट में पुलिस स्टेशन के अंदर जाने वाला और बाहर आने वाला कोई सिपाही भी ब्रेकिंग न्यूज बन सकता था। पुलिस के बड़े साहब लोगों को कैमरे के सामने आकर बताना पड़ता कि पुलिस ने इंक्वायरी शुरु कर दी है। प्रेस-मीडिया की भीड़ को संभालने के लिए पुलिस को अपनी हिफाजत के लिए बंदोबस्त करना पड़ता।

अस्पताल के गेट के बााहर लगे कैमरों के पीछे खींसे निपोरने वालों को इंतजार होता कि डैडबाडी की एक झलक मिल जाए और इसके लिए वे मरीजों और आने जाने वाले डाक्टर-नर्सों को रोकने-टोकने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते पाए जाते। अस्पताल में अगर कोई तुमसे दोस्ती निभाने के नाम पर रात को काले चश्मे पहनकर आता, तो दोस्त के हवाले से मिलने वाली न्यूज कितने चैनलों का भला करती। तुम्हारी यादों का मातम मना रहे दोस्तों को अस्पताल में कैमरों के आगे आने के बाद घर जाकर टीवी न्यूज चैक करना जरुरी होता कि कमबख्तों ने मुझे कितनी फुटेज दी...

भला तुम्हारा घर कैमरों से दूर कैसे रहता। जितना जल्दी यमराज नहीं पंहुचा होगा,  उससे भी जल्दी से फटाफट और तेज खबरों के उस्ताद तुम्हारी जिंदगी की कुंडली निकालने के साथ साथ, आस पड़ोस के उन चेहरों की उदासी को भी कवर करते, जो शायद तुम्हारा नाम भी न जानते हों। कैमरे ऐसे में हर किसी के दुख को एक लाइन में बताने की कला में माहिर होते हैं- आपको कैसा महसूस हुआ? कोई पड़ोसी सिंगर होता, तो चैनल के कैमरों पर तुम्हारी याद में कोई गाना गुनगुनाने की फरमाइश भी जरुर होती।

तुम बड़े, अमीर घराने से नहीं थी, वरना पुलिस स्टेशन से लेकर अस्पताल और घर.. कहां कहां चैनलों के कैमरे नहीं पंहुचते। सुबह सवेरे का मंजर तुम्हारी मौत के मातम को अलग ही रंग देता। बहनों से भी ज्यादा प्यार करने वाली हीरोइनों और तुम्हारे सदमे में हर कोई सफेद पोशाक और काला चश्मा लगाए आता और साथ में टायर जैसी शक्ल में फूलों की माला के साथ वहां रुकना न भूलता, जहां कैमरे तुम्हारे दोस्तों से तुम्हारे साथ बिताए पलों को याद करने के लिए कहते और तुम्हारे दोस्तों की आंखें छलक आतीं। आपको कैसा लगा वाले सवाल पर कोई दोस्त बुरा नहीं मानता।

शमशान में कैमरो और फोटोग्राफरों की भीड़ इसलिए धक्कामुक्का करती कि तुम्हारे अंतिम सफर का चेहरा उनके लिए गुड पोज बन जाए। शमशान से निकलने वाले सितारों का मजमा फिर से आपको कैसा लगा का जवाब देते हुए आंसू बहाने लगता। और अपने फेवरेट सितारों के दर्शन पाकर शमशान घाट पर उमड़ी भीड़ स्टारों को देखकर तालियां और सीटी बजाकर खुशी जाहिर करने की रस्म भी निभा देती।

चौथे दिन तुम्हारी प्रार्थना सभा में भी यही मंजर होता। वही कैमरों की फ्लैश, वही न्यूज चैनलों के कैमरों की लपलपाहट होती। वही महंगी कारों से सफेद ड्रेस और काले चश्मेधारी दोस्तों की फौज चैनलों के साथ तुम्हारे दूर जाने का मातम मनाती। तुम्हारे विशालकाय फ्रेम वाले फोटो में तुम्हारे हंसते चेहरे पर फूलों की माला होती। मोमबत्तियां होतीं। तुम्हारी शांति के लिए मंत्रों का उच्चारण होता। एक दूसरे के गले लगकर सितारे धीमी आवाज में व्हेयर यू आर बेबी जैसी शिकायत धीमी आवाज में करते और तुम्हारी आत्मा को शांति पंहुचाकर उसी मीटिंग में नई फिल्मों के सेटअप भी तैयार होते और बमुश्किल कुछ मिनट रुककर सितारों का कारवां गला तर करने के इंतजामों में लग जाता।

क्या क्या नहीं हो सकता था। कौन जाने, तुम्हारी हैसियत बड़ी होती, तो मुल्क के प्रधानमंत्री से लेकर सियासी जमात भी तुम्हारे गम में शरीक होने के लिए सोशल मीडिया को आरआईपी के संदेशों से लबालब कर देती। न्यूज चैनलों के धुरंधरों की टीम तुम्हारी अंतिम यात्रा से लेकर प्रार्थना सभाा में आने और न आने वालों का बहीखाता निकालकर देश की सबसे बड़ी समस्या का हल निकालने की कोशिश करते नजर आते। अगर और बड़ी हीरोइन होतीं, तो म्यूजिक चैनलों पर फैंस की  डिमांड पर तुम्हारे हिट गानों की परेड होती। मूवीज चैनलों पर सारा शेड्यूल होता और तुम्हारी एक सीन वाली फिल्म को भी ट्रिब्यूट टू ए ग्रेट स्टार की तख्ती के साथ चलाया जाता, जिसके लिए स्पांसरों की लाइन तो लगनी ही थी।

कितना कुछ और हो सकता था,.. कोई तुम्हारे लिए शहर में स्टेचू लगवाने की सोचता, तो कोई तुम्हारे नाम पर गली का नाम रखने की मुहिम चलाने की सोचता, तो कोई सरकार से तुम्हारे लिए बड़ा सम्मान दिलाने की खातिर आंदोलन शुरु करने की बात भी करता।

तुमने कितना कुछ मिस कर दिया। काश तुम इस सच को समझ पातीं कि एक स्ट्रलगर हीरोइन की मौत की यहां कोई कीमत नहीं होती। चैनलों की भाषा में ऐसी मामूली खबरों से उनको टीआरपी नहीं मिलती, इसलिए एक स्ट्गलर की मौत की खबर की कोई कीमत होनी ही नहीं थी।

मौत सबको आनी है। जीते जी मौत को महबूबा समझने वालों को भी आती है। 12 जून को कृतिका चौधरी की मौत से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। किसी ने जानने की कोशिश भी नहीं की कि उसका बेजान जिस्म अगर किसी बंद फ्लैट में सड़ांध मारता रहा, तो कुछ तो ऐसा हुआ होगा, जिसने जिंदगी को ऐसे छला...  तुम्हारी जिंदगी ने तुम्हारे सपनों को छीन  लिया, तो मौत ने जिंदगी को खामोश कर दिया।

तुम्हारी जिंदगी का सच तुम्हारे साथ चला गया। तुम्हारे जाने का गम तुम्हारे माता-पिता को होगा। तुम्हारे बहन-भाइयों को होगा। तुम्हारे गांव के दोस्तों-सहेलियों को होगा। मुंबई की चकाचौंध भरी फिल्मी दुनिया में किसी स्ट्रगलर की मौत की अहमियत नहीं होती। मीडिया से कोई गिला शिकवा करने का हक तुमको नहीं हो सकता। सितारों के रोमांस, अफेयर से लेकर दो बड़ी हीरोइनों की कैटफाइट से लेकर नंबर वन के लिए हीरो और हीरोइनों के नाम तय करने में बिजी मीडिया को एक स्ट्गलर की मौत की वजह तलाशने की फुर्सत नहीं होती।

कोई नहीं जानता कि तुम कैसी जिंदगी जी रही थीं। कोई नहीं जानता कि कौन तुम्हारा दोस्त था और कौन यहां तुम्हारा रिश्तेदार था। कोई नहीं जानता कि हर महीने किराए के लिए पैसों का इंतजाम कैसे होता होगा। कौन नहीं जानता था कि हर शाम तुमको किसी कोर्डिनेटर के काल का इंतजार होता होगा, जिसमें कोई कहे कि मैडम आपको इस रोल के लिए सिलेक्ट कर लिया है। कितने पल ये शब्द सुनने के इंतजार में कटे होंगे और सपनों की हत्याओं का सिलसिला चलता रहा होगा।

तुम अब इस दुनिया में नहीं हो। जाओ, अगर फिर से एक्ट्रेस बनने की ललक लेकर दुनिया में वापस आना हो, तो भगवान जी से सिर्फ इतना वरदान मांगना कि तुमको स्ट्रगलर कभी न बनाए। एक स्ट्रलगर की तो न जिंदगी होती है और न मौत।

शु्क्रिया कृतिका चौधरी, तुम्हारी मौत के नाम मीडिया और स्टारडम की एक दिन की अघोषित मौत की खामोशी को तुम्हारी दिवंगत आत्मा ही समझे तो समझे, धड़कते दिल, चलती सांसे और रिश्तों की राख और खाक पर जमे इंसानों के  लिए ये समझना न तो मुश्किल है और न ही जरुरी।

ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे।


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