पहलाज निहलानी के नपने पर बालीवुड में दीवाली से कई महीनों पहले ही दीवाली जैसा जश्न चौंकाने वाली बात नहीं है। पहलाज निहलानी ने कितनों की नाक में दम किया और कितनों के कान मरोड़े, ये लिस्ट काफी बड़ी और दिलचस्प बन सकती है। फिल्म इंडस्ट्री को मुबारक कि एक त्रासदी से मुक्ति मिल गई। पहलाज की जगह लेने वाले प्रसून्न जोशी जादु की कौन सी छड़ी से फिल्मवालों को सब कुछ ठीक हो गया का फील कराएंगे, ये आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल उनको भी मुबारकबाद ।
हर कोई मान रहा है कि पहलाज निहलानी को इस बात की सजा मिली कि उनके रवैये से फिल्मवाले परेशान थे।याद नहीं आता कि सेंसर बोर्ड में कभी कोई ऐसा चेयरमैन रहा हो, जिसकी नुमाइंदगी से फिल्म वाले परेशान न दिखे हों। जब तक सेंसर बोर्ड की नियमावली में अंग्रेजों के जमाने के कायदों की भरमार रहेगी, तब तक इस गद्दी पर बैठा हर चेयरमैन फिल्मवालों के लिए परेशानी का सबब बना रहेगा। प्रसून्न जोशी की अगुवाई में सेंसर की नियमावली बदल जाए, तो मामला अलहदा हो जाएगा। इसके लिए सब्र और इंतजार करना होगा।
सेंसर बोर्ड के चेयरमैन के पद पर हमेशा केंद्र की सत्ता पर काबिज पार्टियों की पसंद वाले लोग बैठते आए है। 2014 मई में दिल्ली में सत्ता बदली और 2015 की शुरुआत में लीला सैमसन को हटाकर पहलाज को ये कुर्सी इसी रवायत का नतीजा था कि यहां भी अपना आदमी फिट हो गया। पहलाज सचमुच केंद्रीय सत्ता के आदमी थे, जिसे कुछ लोग चाटुकारिता कहें तो कहें, पहलाज के लिए ये उस पार्टी का आदेश था, जिसके विचारों को वे पसद करते हैं। चाटुकारिया और वफादारी को लेकर बहस फिर कभी। यहां बात आगे बढ़ाते हैं।
क्या किसी ने ये सोचा था कि पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड की कुर्सी पर आकर उन तकलीफों को दूर करेंगे, जो तकलीफें लीला सैमसन के दौर में थीं। पहलाज निहलानी ऐसा कुछ नहीं करने आए थे, जो लीला सैमसन नहीं कर पा रही थीं। जब नियमों की किताबें वही हों, तो इस बात से कितना फर्क पड़ता है कि चेयरमैन के पद पर कौन बैठा है? क्या पहलाज निहलानी ने सेंसर नियमों को बदलवाने के लिए कुछ किया, तो जवाब मिलेगा- नही, तो फिर?
इस सवाल के साथ बात को और आगे बढ़ाते हैं। इतना तो समझ में आया कि पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड में किसी तरह के सुधार करने के लिए सरकारी ओहदा नहीं दिया गया था। याद करना मुश्किल नहीं कि कैसे अपनी कुर्सी संभालने के कुछ दिनों के अंदर ही पहलाज एक चैनल के इंटरव्यू में गर्व से बता रहे थे कि वे भारतीय संस्कारों के मामले में हमारी फिल्में कितनी कमजोर हैं। यहीं से संस्कारी मिशन की शुरुआत हुई। इस मिशन का मकसद और रास्ता साफ था। दिल्ली की सत्ता की विचारधारा का संदेश फिल्मवालों तक पंहुचाए। अरबों-खरबों के कारोबार वाली इस फिल्म इंडस्ट्री में पहलाज राष्ट्रवाद का मुखौटा पहनकर आए थे और उनके पास सार्टिफिकेट ये था कि वे दिल्ली में सत्ता पर काबिज पार्टी और उनके नेताओं के राष्ट्रवाद को नमन करते हैं। उधर, पुणे इंस्टिट्यूट में गजेंद्र सिह और मुंबई में सेंसर बोर्ड मे पहलाज निहलानी के ओहदे केंद्र की राष्ट्रवाद की नीतियों को फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ने का मिशन का एक अहम पड़ाव थे। नतीजा साफ था कि पिछले ढाई साल में पहलाज का जितना विरोध हुआ, वो उतने ही मजबूत होते गए। नागपुर से लेकर दिल्ली तक की सत्ता अपने आदमी के मिशन की कामयाबी से संतुष्ट थे, इसलिए विरोधी आवाजों को अनसुना ही किया जाना था।
पहलाज निहलानी ने गड़बड़ दो तरह से कीं, जिनका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा। पहली, वे फिल्मवालों को सेंसर बोर्ड के कायदों की वे किताबें दिखाने लगे, जिनमें फिल्मवाले अक्सर खुद फंसते हैं। दूसरी, अपनी हैसियत से आगे जाकर पहलाज ने उन लोगों से पंगेबाजी शुरु कर दी, जिनका दिल्ली दरबार में उनसे भी ज्यादा रसूख था। पहलाज ये मानकर चल रहे थे कि नागपुर और दिल्ली की सत्ता उनके मिशन से खुश है, तो उनके खिलाफ किसी की सुनवाई नही होगी। इसी मुगालते ने पहलाज का काम तमाम कर दिया। सत्ता कोई भी हो, वो किसी भी ऐसे इंसान को पसंद नहीं करती, जो खुद को सत्ता का केंद्र मानने लगे। पहलाज जब तक संस्कारी लेबल के साथ फिल्मों में राष्ट्रवाद की दुहाई देते रहे, तब तक वे दिल्ली के प्यारे बने रहे। जिस दिन पहलाज ने इस मिशन से हटकर खुद की हैसियत का एहसास कराना शुरु कर दिया, तो वे सत्ता के गलियारों की आंखों की किरकिरी बने और एक झटके में उनको वहां मार्गदर्शक मंडली का मेंबर बना दिया गया।
अब पहलाज आगे क्या करेंगे, ये तो वही जानें। क्या अब भी वे पार्टी का गुणगान करते हुए फिर से किसी नए मिशन पर भेजे जाने का इंतजार करेंगे या फिर अपने बॉस (शत्रुघ्न सिन्हा) की तरह एक कोने में परकटे पंछी की तरह अवचेतना के दौर में समा जाएंगे। पहलाज निहलानी का खेल खत्म हुआ। नए खिलाड़ी मैदान में आ चुके हैं। खेल वही पुराना है। कायदे कानूनों की किताब वही है। सेंसर बोर्ड से हमेशा पंगेबाजी करने वाले फिल्मवाले भी तकरीबन वही हैं।
अगर कोई सोचता है कि पहलाज निहलानी के जाने सेंसर का खेल बदल जाएगा, तो ये मुगालते से ज्यादा कुछ नहीं है। नए बॉस को आजमाया जाएगा। उनके आगे भी मिशन की चुनौती होगी। प्रसून्न जोशी अगर दिल्ली की सल्तनत को खुश रखने में माहिर निकले, तो कुर्सी पर कोई कील नहीं निकलेगी।







1 comment:
बहुत ही बेहतरीन समीक्षा👍
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