Tuesday, September 5, 2017

कंगना एक, जंग अनेक



ये महिला सशक्तिकरण का दौर है। देश ने रक्षा मंत्री के पद पर एक महिला निर्मला सीतारमण की नियुक्ति का जश्न मनाया। केंद्र की सत्ता की ताकतवर मंत्री के तौर पर स्मृति ईरानी ने एक झटके में बेलगाम सेंसर बोर्ड के चेयरमैन का पत्ता साफ करके देश को एक बड़ी मुसीबत से निजात दिलाने की हिम्मत दिखाई। सियासत से परे देखा जाए, तो सिनेमा की दुनिया की एक वीरांगना को इस दौर की लक्ष्मीबाई कहा जा रहा है, क्योंकि उसने करण जौहर और रितिक रोशन जैसे सितारों की सत्ता को ललकारा है। इस दौर की ये लक्ष्मीबाई दुनिया में कंगना के नाम से जानी-पहचानी जाती है। दुनिया ने देखा कि कैसे एक निजी चैनल की निजी अदालत में अवतरित इस लक्ष्मीबाई ने हिंदी फिल्मों के बड़े बड़े सूरमाओं की खबर ली और जमकर पहले तालियां बंटोरी और अब वे इंसाफ के लिए लड़ रही एक अदना सी लड़की का चेहरा बन चुकी हैं, जिसकी लड़ाई सीधे तौर पर फिल्मों के बड़े लोगों से हो रही है। इस लड़ाई के अंजाम पर अभी तप्सरा करने का सही वक्त नहीं आया है और ये वक्त कब आएगा, इसके लिए भी वक्त का इंतजार ही करना होगा।
कंगना ने उस चैनल के निजी अदालत में किसके लिए क्या कहा, ये दोहराने का कोई मतलब नहीं है। इस अदालत के जज साहब बने हिंदी के एक दिग्गज पत्रकार जब कंगना को इस दौर की लक्ष्मीबाई होने का खिताब दे देते हैं, तो ऐसा लगता है कि सब कुछ तय हो गया है। तय हो गया है कि कंगना के साथ ज्यादती हुई और ज्यादती करने वालों की चुप्पी इस बात का सबूत है कि कंगना ने न्यूज चैनल के कठघरे की आरामदेह कुर्सी पर विराजमान होकर उनको लेकर जो कुछ कहा, वही सत्य वचन है।
इंसाफ का तकाजा है कि अब करण जौहर या रितिक रोशन या कंगना के निशाने पर आए बाकी लोग भी किसी ऐसी ही अदालत की शरण में जाएं और कंगना को कोसें। न्यूज चैनलों की अदालतों में उनका दिल खोलकर स्वागत किया जाएगा। ऐसा होगा और होगा तो कब होगा, ये आने वाले वक्त में पता चलेगा। अगर ऐसा होता है, तो क्या कंगना की अदालत की तरह उन अदालतों के ट्रायल कहीं असलियत के आसपास भी फटकेंगे? इंसाफ का एक रास्ता ये भी हो कि किसी चैनल पर कंगना का मुकाबला पहले रितिक रोशन से, फिर करण जौहर से, फिर आदित्य पंचोली से और फिर अध्यायन सुमन (शेखर सुमन के बेटे, जो एक जमाने में कंगना के घोषित ब्वायफ्रेंड हुआ करते थे) से हो। वहां दोनों तरफ से वार हों, पलट वार हों। चीखने चिल्लाने वाले एंकरनुमा बंदे या बंदिया हों और इन सबसे बढ़कर टीआरपी का शानदार खेल हो.. सोचने में ये सब कितना अच्छा लगता है। हकीकत में ऐसा होने से रहा। सिर्फ इतना हो सकता है कि आने वाले दिनों में रितिक या करण जौहर अपने किसी पसंदीदा चैनल या पत्रकार के सामने हों और अपनी भड़ास निकालें और फिर से मीडिया वाले कंगना के साथ नई अदालत लगाने के चक्कर में लग जाएं। ये सब बातें फिलहाल तो हकीकत से दर ही लगती हैं।

रिश्तों के नाम पर बालीवुड की ये पहली जग नहीं है और न ही आखिरी जंग है। ऐसी जंगों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, जब दो बड़े सितारों के बीच ऐसी तनातनी हुई हो, जिसमें रिश्तों की आत्मीयता और निजता को तार तार किया गया हो। कुछ मामले एकतरफा आरोपबाजी के साथ शांत हुए, तो कुछ मामलों में दोनों तरफ से इल्जामों का दौर चला और कुछ मामलों में दोनों या एक तरफा खामोशी बरती गई और वक्त के साथ मामले खुद ही शांत हो गए। इन किस्सों का जिक्र भी किया जाए, तो मामला बेहद लंबा हो जाएगा, इसलिए बेहतर होगा कि मौजूदा दौर के इस मामले को इसी के दायरे में देखा जाए और समझने की कोशिश सिर्फ इतनी हो कि क्या ये मामला बिल्कुल वही है, जो बताया और दिखाया जा रहा है या कोई बोलकर और कोई चुप रहकर हकीकत पर से परदा डाले रहने की कवायद में लगा हुआ है।
कंगना पहली स्टार नहीं, जिन्होंने किसी से अफेयर किया। रितिक उनकी जिंदगी के पहले बंदे नहीं, जिनके साथ उनका अफेयर हुआ हो। ये भी पहली बार नहीं हुआ हो कि कामयाबी की सीढियां चढ़ती कोई हीरोइन किसी बड़े शादीशुदा स्टार के साथ अफेयर कर बैठी हो और ये भी पहली बार नहीं कि दोनोंं तरफ से अपने ही रिश्ते को जलील करने का काम किया जा रहा हो। कहने वाली बात ये है कि कंगना-रितिक के मामले में अजूबा जैसा तो कुछ भी नहीं है।
कंगना एक साथ कई मोर्चों पर उलझी हुई नजर आती हैं। रितिक के साथ रिश्तों का बवाल अपनी जगह, तो करण जौहर एंड कंपनी से फिल्मों में परिवारवाद  और उनके मूवी माफिया होने के अपने इल्जाम को लेकर भिड़ रही हैं, तो आदित्य पंचोली और अध्यायन के साथ रिश्तों के पुराने दौर को भी खंगाल रही हैं। इनसे अलग देखें, तो क्वीन और तनु वैड्स मनु के बाद उन्होंने किसी और डायरेक्टर के साथ काम न करने का एलान भी कर दिया। इस लिहाज से सिमरन और लक्ष्मीबाई पर बनने वाली फिल्मों के बाद वे खुद निर्देशन के मैदान में आएंगी और ये समझना मुश्किल नहीं कि बतौर निर्देशक वे महिला प्रधान विषयों पर ही फिल्म बनाएंगी, जिनमें हीरोइन नहीं, वे हीरो जैसे तेवरों के साथ होगी। रंगून के बाक्स आफिस पर न चल पाने के बाद उनका ये फैसला साहसिक माना जाएगा।
अगर कंगना अपने साथ हुई किसी भी ज्यादती के खिलाफ बोलना चाहती है, तो ये उनका हक है। वे कहां बोलना चाहती हैं, ये भी उनका हक है। वे किसी निजी चैनल की निजी अदालत को इसके लिए मुफीद मानती हैं, तो ये भी उनका फैसला है। ऐसा करके उनको क्या हासिल हुआ, ये आकलन करना भी उनका काम है और जिम्मेदारी भी। वैसे कंगना को जानने और मानने वाले इतना तो जानते होंगे कि वे कभी नतीजो की परवाह करके किसी जंग का आगाज नहीं करतीं। उनके लिए जंग का मतलब सिर्फ अपनी बात कहना और डंके की चोट पर अपनी बात कहने तक सीमित हो जाता है। इससे बात अधूरी रह जाए, इससे भी उनको कोई असर नहीं पड़ता। कह दिया, सो कह दिया वाली तर्ज पर कंगना की शैली, कंगना का मूड, कंगना का अल्हड़पन और कंगना का ये अंदाज नया तो नहीं है, लेकिन उनको एक ऐसी लिस्ट में जरुर शामिल कर देता है, जहां सिर्फ अपनी कहो और जोर से कहो की सोच और समझ रह जाती है।
वे लोग निश्चिंत तौर पर मुगालते मे रहेंगे, जो एक निजी चैनल की निजी अदालत में कही सुनी बातो पर मान लें कि मामला यहां खत्म हो रहा है। जी नही, ये कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि यहां से एक नई जंग शुरु होगी।इस जंग में कंगना का मुकाबला कब और किससे होगा, ये समझना बहुत मुश्किल नहीं लगता और हां, इसके किसी ठोस नतीजे की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। जहां मामला कोरी संवेदनाओं का रह जाता है, वो मामला ठोस धरातल पर बहुत अागे नहीं जा पाता। देखना सिर्फ इतना होगा कि इस जंग में कंगना के मुकाबले कौन कब सामने आता है और कब तक कोई चुप्पी के साथ तमाशा देखता है।

इस पूरे मामले की एक और तस्वीर के साथ हैलो सिमरन..... का इंतजार कीजिए... .

पिक्चर अभी बाकी है...

इस पिक्चर के किस्से को समझने के लिए ये लिंक खोलिए और पढिए- हैलो सिमरन

http://anujalankar.blogspot.in/2017/09/blog-post_12.html

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