Saturday, August 26, 2023

सरकारी पुरस्कारों की इस बंदरबांट में हैरानी किसे ?

क्या कश्मीरी फाइल को नेशनल एवार्ड मिलने से वो लोग हैरान हुए होंगे, जो इसे मुस्लिमों के खिलाफ हिंदुओं को जगाने वाली फिल्म मान रहे थे। क्या वे लोग हैरान हुए होंगे, जो इसे सरकारी प्रोपगंडा वाली ऐसी फिल्म मान रहे हों, जिसे सत्ताधीश पार्टी ने चुनाव प्रचार में खुलकर इस्तेमाल किया। 

विडंबना ये है कि मुस्लिमों पर  खुलकर कीचड़ उछालने वाली फिल्म को राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाली फिल्म की कैटेगिरी में सिलेक्ट किया गया। कुछ लोग इस बात को लेकर बहस कर सकते हैं कि इस फिल्म को बेस्ट फिल्म का, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर से लेकर बेस्ट स्टोरी, स्क्रीनप्ले वगैरहा के दूसरे एवार्ड क्यों नहीं मिले। अनुपम खेर को एवार्ड नहीं मिला, तो मीडिया में वो अपनी तकलीफ रोक नहीं पाए। 
नेशनल एवार्ड के इतिहास को देखें, तो ऐसे वाक्यों से इन पुरस्कारों का इतिहास भरा पड़ा है, जब इन पुरस्कारों पर  सरकारी पक्षपात का आरोप लगा । दरअसल ये एक ऐसी परंपरा बन चुकी है, जिसका पालन हर सरकार अपनी मर्जी से करती है। मौजूदा सरकार ने भी कुछ डिफरेंट नहीं किया। इस सरकार ने चुन चुनकर ऐसे लोगों को इन पुरस्कारों से नवाजा, जिनकी योग्यता सिर्फ सरकारी विचारधारा का खुलकर प्रचार करना हो, वो अक्षय कुमार हों या कंगना हों। 

अक्षय कुमार  वही हैं, जो प्रधानमंत्री से इंटरव्यू करते हैं और आम काटकर खाते हैं या चूसकर खाते हैं जैसे सवाल पूछकर अपनी शान बढ़ाते हैं। वे सतारुढ़ पार्टी के लिए वफादारी दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। एक अघोषित पार्टी कार्यकर्ता की तरह वे आकाओं को खुश करने के लिए ऐसी फिल्मों का निर्माण करते हैं, जिनकी कहानियों और किरदारों का झुकाव या तो हिंदुवादी सोच की तरफ रहा या फिर सरकारी कार्यक्रमों का भोंपू बजाती रहीं। अगर अगले चुनावों में यही सरकार वापसी करती है, तो ओह माय गॉड 2 के लिए अक्षय  की झोली सरकारी पुरस्कारों से भर जाएगी। 

सरकारी पार्टी का समर्थन करने में अक्षय कुमार के साथ सीधा मुकाबला करने वाली कंगना वही हैं, जिनको लगता है कि देश को 2014 में असली आजादी मिली थी। कश्मीरी फाइल के डायरेक्टर की तो बात ही क्या करनी, सरकार ने भले ही उनको नेशनल एवार्ड देकर उनको खुश किया हो, लेकिन उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में अपनी फिल्म के लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रमोशन की बात को नकार दिया। 
सरकारी पुरस्कारों में सरकारी बंदरबांट का सबसे दिलचस्प किस्सा अब भी वही माना जाता है, जब 1991 में नेशनल एवार्ड तय किए गए। 

पुरस्कारों को तय करने के लिए जब अशोक कुमार (दादा मणि) के नेतृत्व में ज्यूरी की दिल्ली में मीटिंग हो रही थी, तो वहां एक मंत्री (तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री सुबोधकांत सहाय) आते हैं और ये कहकर चले जाते हैं कि ज्यूरी बेस्ट हीरो के लिए कोई नाम तय न करे। सरकार ने (मतलब प्रधानमंत्री स्तर पर) उस साल बेस्ट हीरो के लिए एक नाम तय कर लिया, जिसके बारे में ज्यूरी को भी भनक नहीं थी। जब पुरस्कारों की घोषणा हुई, तो ज्यूरी को ये पता चला कि इस साल का नेशनल एवार्ड फिल्म अग्निपथ के लिए अमिताभ बच्चन को दिया जाता है। ये पहला मौका था, जब अमिताभ को कोई नेशनल एवार्ड मिला था। 

अगले साल के आम चुनावों में मौजूदा सत्ता वापसी करती है या नहीं, ये आने वाले वक्त की बात है। इस दौर का सत्तातंत्र हमेशा इस बात के लिए याद किया जाएगा, इस दौरान आजाद भारत के हर तंत्र को अपने हिसाब से बदला। ऐसे में ये मुमकिन नहीं था कि फिल्म इंडस्ट्री और सरकारी एवार्ड अछूते रह जाते। और हां, अगर कोई ये सोचता है कि अगली बार (जब कभी) सत्ता परिवर्तन के बाद नेशनल एवार्ड मैरिट पर दिए जाने लगेंगे, तो ये भी ख्याली पुलाव ही है। मुमकिन है कि वहां चेहरे और किरदार बदले हुए हों, लेकिन परदे के पीछे का सरकारी तमाशा ऐसा ही होगा,जैसा अब हो रहा है। उस वक्त उस दौर के किसी अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, कंगना से लेकर किसी कश्मीरी फाइल के साथ यही बंदरबांट हो रही हो।

 

  



2 comments:

Anonymous said...

Does that mean that even the National awards are not purely on merit, like other awards?

Anonymous said...

यह हकीकत है, देश के बड़े से बड़े पुरस्कारों में सरकारी बंदर बांट चलती है l चाहे सरकार कोई भी हो बस चेहरे बदलने हैं l

कंगना मतलब...

हिमाचल प्रदेश की मंडी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रही स्वंयभू महाज्ञानी कंगना के ताजा बयान पर अमिताभ बच्चन को ये तय करना है कि वे इस पर अपना ...