वो लम्हा आ ही गया, जिसका संजय दत्त को लंबे समय से इंतजार रहा होगा। जेल से मिली आजादी के बाद संजय दत्त सिनेमाई परदे पर वापसी कर रहे है। भूमि अब से चंद घंटो बाद परदे पर होगी और धुरंधर समीक्षकों से लेकर उनके फैंस और दूसरे दर्शक तय कर चुके होंगे कि र्ये वापसी कितनी दमदार रही होगी। वापसी के नतीजों पर इस वक्त कोई टिका-टिप्पणी करना मुनासिब नहीं होगा।
तकरीबन तीन साल बाद संजय दत्त की फिल्म रिलीज हो रही है। जुलाई 2013 में जब उनकी पिछली फिल्म पुलिसगिरी रिलीज हुई थी, तो वे पुणे जेल में सजा काट रहे थे। फिल्म तो खैर आई-गई हो गई, लेकिन जब संजय दत्त इस साल सजा पूरी करके बाहर आए, तो उनकी वापसी की फिल्म तय होने में आधा साल लग गया। इस दौरान मुन्नाभाई 3 से लेकर न जाने किन किन फिल्मों के नाम आते-जाते रहे। वे भूमि से वापसी करेंगे, ये भी उस वक्त ही पक्का माना गया, जब आगरा में पहला शेड्यूल हो गया। भूमि से ज्यादा चर्चा में तो राजकुमार हीरानी की वो फिल्म रही, जो संजय की जिंदगी पर बन रही है। हीरानी की फिल्म अगले साल मार्च में परदे पर आएगी और तय है कि तब तक ये लगातार खबरों में बनी रहेगी। हीरानी की फिल्म को लेकर चर्चा फिर कभी....
अभी भूमि के साथ हो रही बालीवुड के बाबा की वापसी को लेकर बातें करना ज्यादा ठीक रहेगा। इस बात के लिए दत्त की तारीफ हो रही है कि वे परदे पर अपनी उम्र का रोल निभा रहे हैं। ये सवाल भी हमारे बालीवुड के सितारों की देन है, जहां अपनी आधी उम्र की कन्याओं के साथ परदे पर रोमांस करना सुपर सितारों का शगल बन चुका है। दत्त भी अपवाद नहीं। पुलिसगिरी में उनकी जोड़ी प्राची देसाई के साथ थी, जिनकी उम्र दत्त से आधे से भी कम थी। इसमें शायद ही कोई अपवाद हो। दत्त ने अगर वापसी के लिए एक जवां बेटी के पिता का रोल चुना, तो इसे अच्छी बात कहा जाए, लेकिन जरुरी नहीं कि आगे की फिल्मों में उन पर कम उम्र की हीरोइनों के साथ रोमास करने पर कोई बैन होगा। बात को आगे बढ़ाते हैं....
दत्त ने भूमि को वापसी के लिए चुना या भूमि ने संजय दत्त को चुना, ये सबसे दिलचस्प सवाल हो जाता है। दत्त का कैरिअर 36 साल पुराना (राकी, 1981) हो चुका है। इस सफर में उन्होंने तमाम सफल-असफल फिल्मों में काम किया, लेकिन जहां तक फिल्में चुनने वाली बात है, तो संजय कभी उन कलाकारों में नहीं रहे, जो फिल्में चुनते हैं या इंतजार करते हैं। वे दरअसल मूडी हैं और मूड कब किस पर आए, कौन कह सकता है।
थोड़ा पीछे जाएं, तो संजय दत्त जिस दौर में आगे आए, उस दौर में संजय के साथ चमके जैकी श्राफ और मिठुन चक्रवर्ती उन सितारों में माने गए, जो दोस्ती-यारी में फिल्में करने में ज्यादा भरोसा करते रहे, जबकि अनिल कपूर, सनी देओल उनमें से रहे, जो
ठोक बजाकर फिल्में करने में भरोसा करते रहे। ये अलहदा बात है कि हिट-फ्लाप का मामला इन सबके साथ एक जैसा रहा। संजय, जैकी और मिठुन जैसे सितारे यारों के यार माने गए, जिनके लिए फिल्मों की कहानियां सुनने तक जरुरी नहीं होता था। इनमें अगर कोई फिल्म चल निकली, तो ये उनकी तकदीर।
याद करें, जब राजेंद्र कुमार ने नाम बनाई थी, तो संजय दत्त बुरे दौर में थे। नाम कुमार गौरव के लिए बनी थी। यही वजह थी कि अनिल कपूर सहित उस दौर के दूसरे कलाकारो ने इसमें (संजय वाला रोल) करने से मना कर दिया था। उनको लगता था कि कुमार गौरव की फिल्म में उनका रोल कमजोर रहेगा। सबने मना कर दिया, तो संजय दत्त को मजबूरी में कास्ट किया गया।
नाम का नतीजा वो आया, जो अगर राजेंद्र कुमार को ख्वाब में भी एहसास हो जाता, तो वे कभी नाम न बनाते। राजेंद्र कुमार जिंदगी भर इस मलाल के साथ जीते रहे कि उनके बेटे के लिए बनी फिल्म में सारा क्रेडिट संजू महाराज ले उड़े, जिनको खुद भी एहसास नहीं था कि ये रोल उनके कैरिअर के लिए टर्निंग प्वाइंट बनेगा। नाम से संजय दत्त चमके, तो इसे तमाम लोगों ने चमत्कार मान लिया। चमत्कार एक बार होता है, संजय के साथ बार बार हुआ।
शाहरुख खान और विधु विनोद चोपड़ा के बीच ईगो क्लैश न हुआ होता, तो मुन्नाभाई एमबीबीएस में संजय दत्त को जिमी शेरगिल वाले रोल में कैंसर पीड़ित के तौर पर देखा जाता। शाहरुख को आज भी अफसोस होता है कि उन्होंने मुन्नाभाई छोड़ने की गलती की। चमत्कार का एक और मामला वास्तव से जुड़ता है। महेश मांजरेकर मीडिया को कहानी सुनाते हैं कि संजय ने ढाई घंटे तक कहानी सुनी और रोते रोते उनको गले लगा लिया। असली कहानी अलहदा थी। वास्तव का निर्माता दीपक निखंजे छोटा राजन का भाई था। मुंबई बम कांड में फंस चुके संजय ने छोटा राजन की गैंग से कंप्रोमाइज के तौर पर ये फिल्म करने के लिए हामी भरी थी।
एक छोटा सा किस्सा याद आता है। संजय महेश भट्ट की दुश्मन की शूटिंग कर रहे थे। उस समय जमानत पर चल रहे संजय इतने घबराए रहते थे कि अपन आसपास किसी अजनबी को देखकर असहज हो जाते थे। महेश मांजरेकर सेट पर आए, तो वे मांजरेकर को पहचानते भी नहीं थे। संजय के उस दौर के सेकेट्री पंकज खरबंदा ने अपने बास को याद दिलाया कि वे मांजरेकर की फिल्म निदान में एक छोटा रोल कर चुके हैं। सेकेट्री ने बताया कि नई फिल्म के लिए स्टोरी सुनाने आए हैं। संजय ने दो लाइनों में मामला निपटा दिया। मांजरेकर से संजय ने कहा कि जब मुझे फिल्म में काम करना ही है, तो स्टोरी क्या सुनना। पंकज (सेकेट्री) के साथ डेट्स का मामला सैटल कर लो। बात को यूं समझा जा सकता है कि संजय दत्त दरअसल किसी तरह से एक फिल्म करके छोटा राजन के साथ एडजेस्ट करना चाहते थे। मांजरेकर वास्तव बनाते या कुछ और, इससे कोई खास फर्क संजय को नहीं पडने वाला था, न वो इतनी दूर की सोच रहे थे। वास्तव संजय दत्त से ज्यादा मांजरेकर के लिए अहम थी, जिसके साथ वे बालीवुड की कमर्शियल दुनिया में मौका चाहते थे। मंशा अपनी अपनी, लेकिन वास्तव ने दोनों की तकदीर चमका दी और ये फिल्म मांजरेकर और संजय, दोनों के लिए चमत्कार साबित हुई।
ऐसे चमत्कारों के किस्से तमाम हैं, जिनको यहां बताना मुमकिन नहीं। बात सिर्फ इतनी सी है कि संजय दत्त कोई आमिर खान नहीं, जो परफेक्निस्ट होने की इमेज के चक्कर में एक एक फिल्म में सालों का वक्त लगा दें। संजय का फंडा क्लीयर रहा है। फिल्म के आफर से ज्यादा आफर लाने वाले को देखो। लाने वाला दोस्त है, तो हां और दोस्त नहीं है, तो अगली गली पकड़ या इंतजार में बैठकर माला जपता रहे। यही संजय के पूरे कैरिअर की पहचान रही, जहां उन्होंने सोच-विचारकर शायद ही कभी कोई काम किया हो। संजय और सोचने वाला मामला कनेक्ट होता, तो क्या वे इतनी बड़ी बड़ी मुसीबतों में घिरते, जिन्होंने उनको कहां से कहां पंहुचा दिया। संजय के लिए यही कहना ठीक है कि वे दिल से सोचने वालों में हैं और हर कोई जानता है कि दिल से सोचने का काम कभी होता ही नहीं।
संजय कलाकार या स्टार से ज्यादा एक आकर्षण रहे हैं, जिनकी चमक लोगो को उनके पास खींच लाती है। भूमि खत्म हुई नहीं कि टी सीरिज ने उनके साथ दो और फिल्मों की योजना के इरादे बना लिए। संजय के कैरिअर में शायद ही कोई ऐसा मेकर हो, जिसने एक फिल्म के बाद उनके साथ दोबारा फिल्म बनाने की घोषणा न की हो। जिनकी दत्त के साथ पंगेबाजी हुई, वो भी बाद में पछताकर लौट आए। डिपार्टमेंट के रिलीज के दिन संजय दत्त को गालियां तक देने वाले रामगोपाल वर्मा को अब अपनी भूल पर मलाल होता है, तो याद करें, विधाता के दौरान सुभाष घई ने कभी उनके साथ काम न करने की कसम खाई थी। मुकुल आनंद से खुदागवाह के वक्त संजय का टकराव हुआ, तो ऐसी ही कसम मुकुल आनंद ने खाई थी। दोनों का हाजमा कमजोर निकला और दोनों ही दत्त के पास लौट आए। इन किस्सों की लिस्ट भी लंबी है। बात फिर वही आ जाती है कि संजय यारों के यार हैं और गिले शिकवे के दौर में ज्यादा वक्त नहीं जीते।
संजय दत्त इस दौर में वैसे ही स्टार हैं, जैसे अमिताभ बच्चन के सुपर स्टारडम के दौर में धर्मेंद्र, जीतेंद्र रहे। मतलब, दूसरे नंबर पर जमे रहो। इस दौर में सुपर स्टारडम खान सितारों के पास है, तो उनके आसपास अक्षय कुमार, अजय देवगन, रितिक रोशन भी हैं। संजय दत्त को इनमें से ही एक माना जा सकता है। नंबर वन पोजीशन के साथ दत्त का दौर रहा, जब साजन, सड़क से उनका सितारा बुलंदी पर था। कौन जाने, उस वक्त बम कांड से उनका नाम न जुड़ता, तो उनको भी सुपर स्टारडम का लंबा दौर देखने को मिलता। खैर... संजय वैसे भी जिस फितरत के साथ काम करते है, वे सुपर स्टारडम की कुर्सी खिसकने के डर से जीने वालों में तो कभी नहीं रहे।
इतना मान लेते हैं कि इस दौर में भी वे बिकाऊ है। भूमि का सौदा करने में टी सीरिज को कोई परेशानी नहीं हुई, तो इसे कही न कहीं संजय के स्टारडम का सबूत ही मान सकते हैं। बाक्स आफिस पर भूमि का नतीजा कोई भी रहे, संजय दत्त के सेलेबेल रहने में हाल फिलहाल तो संकट नहीं। ये निर्भर करेगा कि वे आगे किस तरह की फिल्मों में काम करेेंगे। अगर सोलो हीरो, रोमांटिक लीड, कमसिन कन्याओं की जिद पकड़ी, तो उनके कैरिअर को संकट में घिरने में वक्त नही लगेगा। अगर वे कैरेक्टर्स करते रहे। दूसरे सितारों की फिल्मों में काम करते रहे, तो उनका कैरिअर ज्यादा मजबूत रहेगा। तय खुद संजय को करना है कि वे अपने कैरिअर को किस दिशा में मोड़ना चाहते हैं। फिल्मों की कमी उनके पास कभी नहीं होगी, इसमें कोई शक नहीं है। स्थापित सितारों और फिल्मकारों से लेकर नए दौर के सितारों और फिल्मकारों में संजय के साथ काम करने की उत्सुक्ता बनी हुई है, जो उनके कैरिअर के लिए अच्छा है, लेकिन बात वही है कि क्या संजय अब कैरिअर की सोचंगे... क्या संजय प्रोफशनल बनेंगे? इन सवालों के जवाब अगर न में आते हैं, तो यही कहना ठीक होगा कि संजय दत्त के कैरिअर में नाम, वास्तव या मुन्नाभाई जैसे चमत्कार होते ही रहेंगे।
इस शुक्रवार को रिलीज होने जा रही भूमि उनके लिए चमत्कार बनेगी या नहीं, ये आने वाले वक्त की बात है। इस वक्त का सबसे बड़ा सच ये है कि वे परदे पर लौट रहे हैं। इसके आगे उनकी नई पारी का नया सफर है, जिसमें कई फिल्मों के नाम हैं। अगले साल मार्च में हीरानी की फिल्म उनके लिए अलग मील का पत्थर होगी।
जहां तक रही उनकी जिंदगी, तो उतार-चढ़ाव उनकी जिंदगी का हिस्सा रहे है। वे नीचे गिरे, लड़खड़ाए, संभले और फिर मजबूत हुए। अतीत के हादसे उनके साथ हमेशा रहेंगे और संजय फिर भी बाबा रहेंगे... 50 साल के संजू बाबा... ‘










2 comments:
बहुत बढ़िया 👌👌
बहुत अच्छा आलेख। वैसे आप तो संजू बाबा के पुराने प्रशंसक हैं।
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