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| Raj Kumar Rao and Director Vikramaditya Motwani |
सिनेमा के इतिहास में अगर बड़े सितारों वाली भारीभरकम बजट वाली फिल्में कमाई के खजाने भरकर सुर्खियां बंटोरती हैं, तो नए, अजनबी चेहरों के साथ छोटे बजट की गंभीर फिल्में भी अपना असर छोड़ती रही हैं। इनका इतिहास लंबा है और दिलचस्प है। ट्रैप्ड का बनना ऐसे मौके पर ज्यादा अहम हो जाता है, जब कारपोरेट घरानों के पंजों में जकड़ा बालीवुड छटपटा रहा है और बड़े बजट की फिल्मों का बाजार सिनेमा पर हावी है।
यहां आकर पहला जिक्र विक्रमादित्य मोटवानी का, जो इससे पहले अपनी पहली फिल्म उड़ान में दिखा चुके थे कि वे किस तरह के सिनेमा में विश्वास रखते हैं। विक्रमादित्य लुटेरे में रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा के स्टारडम में लड़खड़ाए, लेकिन अच्छी बात ये है कि ट्रैप्ड से वे अपने पुराने रास्ते पर लौट आए। विक्रमादित्य को लेकर एक और दिलचस्प बात ये है कि वे जिस प्रोडक्शन कंपनी में पार्टनर हैं, वहां विकास बहल और स्वनाम धन्य अनुराग कश्यप जैसे फिल्मकार मौजूद हैं, जो कमर्शियल सिनेमा के साथ खेलने के सारे तौर तरीके जानते हैं और कारपोरेट वाले सिनेमा के माहिर हैं। उनके बीच रहकर अगर विक्रमादित्य मोटवानी अपनी सोच पर कायम रहते हैं या कहें कि लुटेरे के बाद अपनी पटरी पर लौट आते हैं, तो ये न सिर्फ सुखद एहसास है, बल्कि उस सिनेमा की छोटी जीत का रास्ता है, जिस पर विक्रमादित्य को भरोसा रहा है। ये भरोसा उनको इस दिलचस्प अतीत के साथ और दिलचस्प बना देता है कि वे संजय लीला भंसाली को गुरु और मनमोहन देसाई के सिनेेमा के साथ मानते हैं। विक्रमादित्य की फिल्मों में न तो भंसाली सरीखी भव्यता होती है और न मनमोहन देसाई के खोए-पाए फार्मूले का कोई अंश होता है। जब कोई फिल्मकार अपने गुरु और अपने मेंटर के सिनेमा से अपना रास्ता अलग करता है, तो सही मायनों में वो अपने लिए कामयाबी की पहली बड़ी रेखा खिंचता है। इस कारनामे के लिए विक्रमादित्य के नाम तालियां तो बजती हैं।
अब बात राजकुमार राव की। ये बहुत सही बात है कि कोई भी फिल्मकार अपनी किसी फिल्म की सोच के साथ उस वक्त तक न्याय नहीं कर सकता, जब तक उसकी फिल्म के किरदारों की कल्पनाशीलता को पकड़ने वाले कलाकारों की टीम न बन जाए। ये कहना सबसे आसान होगा कि ट्रैप्ड में काम करने को लेकर राजकुमार राव ने एक प्रयोग किया और ये कहना इससे भी ज्यादा ठीक रहेगा कि वे इस प्रयोग के साथ खुद को आजमाने के लिए इसलिए तैयार हो गए, क्योंकि उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं था। मतलब, राजकुमार राव किसी ऐसे सितारे का नाम नहीं है, जो किसी सितारे की तरह अपने स्टारडम की इमेज से बंधा हो। राजकुमार राव अच्छे एक्टर हैं, ये बात बहुत पहले समझ में आ गई थी। ट्रैप्ड से पहले शाहिद और अलीगढ़ फिल्मों में राजकमार राव को जब भी कुछ करने का मौका मिला, उन्होंने आजाद परिंदे की तरह उड़ान भरी। शुक्रगुजार होना चाहिए विक्रमादित्य का, जिन्होंने राव की इस उड़ान के लिए ये आसमान मुहैया कराया, जिसको ट्रैप्ड नाम मिला है।
ट्रैप्ड में खूबियां हैं, तो कमियां भी रही होंगी, लेकिन यहां न तो फिल्म की समीक्षा हो रही है और न पोस्टमार्टम। यहां जिक्र सिर्फ इस सकून भरे एहसास का है, कि इस दौर में भी राजकुमार राव के साथ विक्रमादित्य मोटवानी अच्छे सिनेमा की उम्र और दायरे को बढ़ाने के लिए आगे आ जाते हैं। जब एक ट्रैप्ड बनती है, तो उसे देखकर न जाने कितने विक्रमादित्य मोटवानी सरीखे नए फिल्मकारों के हौसलों की उड़ान नए परवाज भरने की उमंग से लबरेज हो जाती है। इनमें से ही कोई नया फिल्मकार किसी राजकुमार राव के साथ इस सिनेमा को नए आयाम दे सकता है।
सिनेमा की हर धारा दर्शकों के मनोरंजन की प्यास बुझाने के लिए जरुरी होती है। सिनेमा मनमोहन देसाई का हो या संजय लीला भंसाली का या फिर विक्रमादित्य मोटवानी का। हर सिनेमा की हर विधा को एक पहचान की जरुरत होती है। उससे भी ज्यादा जरुरत इस बात की है कि युवा निर्देशकों की पीढ़ी अपने सिनेमा में विश्वास करें। इसका मतलब ये नहीं कि बड़े सितारों के सिनेमा से कोई गुरेज किया जाए। ये सिनेमा जरुरी है, तो वो सिनेमा भी जरुरी है और इनके बीच अनुराग कश्यप की महानता के दर्शन भी जरुरी हैं, जो बांबे वैलवेट से सिर्फ इतना भला करते हैं कि इसकी नाकामयाबी में एक बोर्ड टांग देते हैं, जहां लिखा होता है कि सिनेमा से खुद को बड़ा समझने वालों की नादानी एक भयंकर चेतावनी से कम नहीं है।
अनुराग का पुराण किसी और वक्त। ये जश्न का मौका है। ये मौका है विक्रमादित्य के सिनेमा के जश्न का। ये मौका है राजकुमार राव सरीखे कलाकार की जीविषा के जश्न का और ये मौका है उस युवा दर्शक वर्ग की उमंग और समझ का, जो किसी मसालेदार फिल्म में टाइमपास करने की जगह ट्रैप्ड के जाल में जकड़ कर खुश होते हैं। हिंदुस्तानी सिनेमा की नई रोशनी, नई चमक को रेखांकित करने के लिए मोटवानी, राव और टीम का शुक्रिया।




1 comment:
सार्थक सिनेमा पहले भि कमर्शियल सिनेमा के समानांतर अपनि उपस्थिति दर्ज कराता रहा है।आगे भि कराता रहेगा ।
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