Wednesday, June 21, 2023

न पुरुष, न आदिपुरुष, ये हैं...

राजकुमार संतोषी की फिल्म अंदाज अपना अपना में आमिर खान का किरदार अक्सर बोलता है कि आप पुरुष नहीं हैं, तो सामने वाला ये सुनकर हैरान हो जाता है और आमिर खान का किरदार फिर उसे पूरी बात समझाता है कि आप पुरुष नहीं, महापुरुष हो और ये सुनकर सामने वाला ठहाका लगाने लगता है। अंदाज अपना अपना के इस सीन की याद इस वक्त ताजा इसलिए हुई कि इन दिनों बवाल मचा रही फिल्म आदिपुरुष को देखकर एक गुस्से में भन्नाए दर्शक ने ये कहते हुए अपना गुस्सा जाहिर किया कि ये लोग (फिल्म की टीम से जुड़े हुए) पुरुष नहीं है, बल्कि कुछ और हैं। ऐसे लोगों को आइंदा से कोई फिल्म बनाने की परमीशन ही नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि आदिपुरुष के नाम पर इन्होनें जो बनाया है, उसके लिए इन पर केस होना चाहिए और इनको जेल भेज देना चाहिए, ताकि इनके बाद आने वाले वक्त में कोई और इस तरह से भारतीय जनमानस की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने की हिमाकत नहीं करे। 

विवादों के जरिए प्रचार का भारी-भरकम प्लान तैयार करने के बाद आदिपुरुष को सिनेमाई परदे पर लाने वाली टीम के लिए भावनाओं के साथ खिलवाड़ का मसला ऐसा नहीं था, जिसे कोई हैरान होकर देखे। फिल्म की टीम ने जब पहली बार टीजर लांच किया था, तो ही इसमें वीएफएक्स को लेकर टीम की खिंचाई होने लगी थी। टीजर में सैफ अली खान (फिल्म का रावण) के गेटअप से लेकर प्रभास (फिल्म के राम जी) के गेटअप को लेकर लोगों की जो प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया के जरिए सामने आईं थीं, उन्हें देखते हुए फिल्म की टीम ने इशारा किया कि वे अमेरिका जाकर वीएफएक्स पर नए सिरे से काम शुरु करेंगे और इन कमियों को दूर करेंगे। इस टीम के कप्तान, यानी निर्देशक ओम राउत ने अमेरिका से लौटने के बाद जब एक नया टीजर लांच किया, तो सामने आया कि मामला लगभग वही है और उन कमियों को लेकर कुछ खास नहीं किया। इससे पहले कुछ और होता, ओम राउत के एक बयान ने उनके तेवर बयां कर दिए, जिसमें उन्होंने कहा कि टीम वीएफएक्स को लेकर खुश है और उनका इरादा किसी भी तरह के बदलाव का नहीं है। वे बिना किसी बदलाव के फिल्म को रिलीज करेंगे। 

 

ये बात भी समझ में आ रही थी कि 500-600 करोड़ के आसपास के बजट के साथ बनी इस फिल्म को लेकर टीम प्रचार का ऐसा खाका तैयार करेगी, जिसमें विवादों के लिए भरपूर मसाले होंगे, जिनका मकसद किसी तरह से पब्लिक को थिएटरों में लाना था। टीम ये मान कर चल रही थी कि उनकी फिल्म में राम हैं और राम के नाम पर जनता जनार्दन भावुकता में थिएटरों में दौड़ी चली आएगी। पब्लिक को राम जी का संदेश पंहुचाने के लिए फिल्म के प्रमोशनल इवेंट में प्रभास ने जयश्री राम का नारा लगाया, तो एक और कदम आगे बढकर ओम राउत ने ये फिल्म दिखाने वाले सारे थिएटरों में हनुमान जी के नाम की एक सीट छोड़ने का शगुफा छोड़ा, जो  फिल्म के प्रमोशन का हिस्सा था, इसमें बहस की कोई गुंजाइशन नहीं। किसी ने ओम राउत की टीम से ये नहीं पूछा कि सिर्फ हनुमान जी के नाम की सीट क्यों खाली रखना। राम संग सीता, लक्ष्मण जी और रामायण के दूसरे किरदारों के लिए भी तो ऐसा शगूफा छोड़ा जा सकता था।



रोड़ों के बजट वाली फिल्म की मार्केटिंग और प्रमोशन के लिए लाए गए महारथियों की इन हरकतों पर ताज्जुब नहीं होता, क्योंकि राजनीति के बाद अब सिनेमा में भी भगवान और धर्म के जज्बातों का घालमेल कोई सरप्राइज नहीं रहा। खास तौर पर दिल्ली दरबार पर बैठी भाजपा और उनके साथी संगठनों को इसी तरह के मसाले खुश करने के लिए काफी माने जाते थे। एक जमाना फिल्मों की दुनिया में ऐसा हुआ करता था कि फिल्म रिलीज से पहले प्रोड्यूसर और सितारों की टीमें अपनी फिल्मों की रीलों के डिब्बे लेकर साईं के दरबार में शिर्डी से लेकर साउथ में तिरुपति, पंजाब में गोल्डन टेंपल और राजस्थान के अजमेर में हाजिरी देने जाया करती थीं, लेकिन उस दौर में किसी फिल्म को प्रमोशन के लिए किसी भगवान के नाम का इस्तेमाल जरुरी नहीं समझा जाता था।

 
खैर, वो अतीत है, वर्तमान में लौटकर फिल्म से आदिपुरुष के बवाल की बात करें, तो पहले तो ये समझ में नहीं आता कि तमाम प्रपंचों के बावजूद अगर फिल्म को पब्लिक ने पसंद नहीं किया, तो फिल्म के डायरेक्टर (राउत) या लेखक (शुक्ला) जनता के फैसले को सहजता से क्यों नहीं मान लेते। फिल्म की टीम पब्लिक सेंटीमेंट्स को देखकर अपनी गलती के लिए सॉरी बोल देती, तो क्या पता पब्लिक को थोड़ा बहुत रहम आ जाता, लेकिन रावण के दरबार में अंगद के पांव की तरह अपनी सोच और हरकतों को सही ठहराने के लिए डायरेक्टर और संवाद लेखक न सिर्फ अपनी छिछलेदारी करने में मगन हैं, बल्कि पब्लिक का एक नए सिरे से अपमान कर रहे हैं। अगर राउत मानते हैं कि उनकी फिल्म की आलोचना करने वाले धन दौलत के लालच में ऐसा कर रहे हैं, तो ये भी मानना होगा कि या तो राउत इसके बाद कोई फिल्म नहीं बनाएंगे और अगर बनाएंगे, तो पब्लिक उनकी इन बातों को याद रखेगी और सबक भी सिखाएगी। जो लोग इस फिल्म की बर्बादी के लिए संवाद लेखक को भाव दे रहे हैं, वो इस फिल्म से दुखी जनता के लिए एंटरटेनमेंट का मसाला तैयार कर रहे हैं। फिल्म मेकिंग के सिस्टम को समझने वाले जानते हैं कि सलीम-जावेद के बाद फिल्मों में कोई ऐसा लेखक नहीं आया, जो दावा करे कि उसकी लिखाई को कोई डायरेक्टर ज्यों का त्यों लेता है। ओम राउत ने भी शर्तिया तौर पर ऐसा नहीं किया होगा। बात सिंपल है कि बुरे लेखन की मिसाल बने लेखक महोदय विवादों के नाम पर अपनी ब्रैडिंग की दुकान चमका रहे हैं, जिसका शोर-शराबा थोड़े दिनों तक जरुर चलेगा, लेकिन लंबे भविष्य में ऐसे महानुभवों को कोई भाव नहीं देता। 

अब आखिरी सवाल ये रह जाता है कि आदिपुरुष के नाम पर राम जी और रामायण से जुड़ी भारतीय संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ की इस तस्वीर से किसे क्या सीखने के लिए मिला। पहला सबक इस फिल्म में राम बने प्रभास को मिला होगा कि बाहुबली की तूफानी कामयाबी के बाद तेलुगु से नेशनल हीरो बनने की हसरत के लिए राउत जैसों पर भरोसा उनको कहीं का नहीं छोड़ेगा। राउत कोई सबक सीखेंगे, इसकी उम्मीद शून्य है और संवाद लेखक शुक्ला जी का मामला शून्य से नीचे रसातल में पंहुच चुका है। 

आम जनता के लिए एक सबक ये है कि मनोरंजन की दुनिया को धार्मिक संवेदनाओं से जोड़ने का अधिकार किसी को न दें और संदेश साफ होना चाहिए कि राम और रामायण से जुड़ी हमारी भावनाएं इतनी कमजोर नहीं है, जो किसी राउत या शुक्ला की मोहताज हों। राउत और शुक्ला आएंगे, जाएंगे, लेकिन सिनेमा की दुनिया से दूर अपनी आम जिंदगी का नायक जानता है कि राम जी उसके लिए क्या हैं और ये बात राउत और शुक्ला जैसे दयनीय पात्र कभी नहीं समझेंगे। एक बार जोर से बोलिए- 

जय राम जी की ! 🙏









4 comments:

Anonymous said...

सही लिखा आपने

shrikishore said...

बेहतरीन लेखन अनुज, 👍👌

Anonymous said...

इस फिल्म पर अभी तक का सबसे बेहतरीन विश्लेषण अनुज अलंकार जी का ।

Anonymous said...

Behtareen vishleshan

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